विद्वानों के अनुसार सृष्टि के जन्मकाल से ही मान और अपमान का अस्तित्व है। लक्ष्मण जी ने वनवास में शूर्पणखा की नाक काटी थी। उसने इस अपमान की रावण से शिकायत कर दी। अतः सीता का हरण हुआ और फिर रावण का कुलनाश। द्रौपदी के एक व्यंग्य ‘‘अंधे का पुत्र अंधा ही होता है’’ ने महाभारत रच दिया। महाराणा प्रताप ने मानसिंह के साथ भोजन नहीं किया। इससे अपमानित होकर वह विदेशी और विधर्मी आक्रांता अकबर से जा मिला।

सम्मान की बात करें, तो मुगल और फिर अंग्रेज शासक भारत के प्रभावी लोगों को विभिन्न उपाधियां देकर अपने पक्ष में कर लेते थे। मियां, मिर्जा और शाह से लेकर सर, रायसाहब और रायबहादुर ऐसी ही उपाधियां थीं। भारत सरकार भी प्रतिवर्ष कुछ विशिष्ट लोगों को पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण और भारत रत्न से अलंकृत करती है। ये सम्मान किसे, क्यों और कैसे दिये जाते हैं, इनकी कहानी ‘‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’’ की तरह है; पर यह बात सौ प्रतिशत सत्य है कि सम्मान से सुख मिलता है और अपमान से दुख।

soniaआजकल सब तरफ राजनीति का बोलबाला है। कहीं सम्मान में राजनीति होती है, तो कहीं राजनीति में सम्मान। कुछ दिनों बाद बिहार में चुनाव होने हैं। जैसे करवाचैथ पर महिलाएं छलनी से चांद देखकर व्रत तोड़ती हैं, ऐसे ही नेताओं के हर वक्तव्य को वहां चुनाव की छलनी से देखा जा रहा है। किसी समय नीतीश बाबू नरेन्द्र मोदी के बड़े प्रशंसक थे; पर लोकसभा चुनाव से पहले किसी के बहकावे में आकर उन्होंने मोदी से बैर ठान लिया। परिणाम ये हुआ कि बेचारे न घर के रहे न घाट के। अब विधानसभा चुनाव में वे नये-पुराने सब हिसाब बराबर करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने उन लालू जी से हाथ मिला लिया है, जिसके जंगलराज के विरोध में बिहार की जनता ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया था।

पिछले दिनों मोदी ने बिहार की एक जनसभा में कहा कि धोखा देना नीतीश जी के डी.एन.ए. में शामिल है। वैसे इसमें गलत कुछ नहीं है। जिस थाली में खाना, उसमें ही छेद करना समाजवादियों की खास पहचान है। नीतीश जी भी जब से राजनीति में हैं, तबसे कई बार दल बदल चुके हैं; पर मोदी के इस वक्तव्य को नीतीश बाबू ने बिहार का अपमान बता दिया। यानि इन दिनों नीतीश जी खुद को ही बिहार समझ बैठे हैं। शायद उन पर कांग्रेस नेता देवकांत बरुआ का भूत सवार हो गया है, जो आपातकाल में ‘इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा’ के नारे लगाते थे। अब असली निर्णय तो बिहार की जनता को करना है कि कौन कितने पानी में है।

कुछ ऐसी ही दशा बेचारे राहुल बाबा और उनकी मम्मीश्री की है। वे अपने 25 सांसदों के निष्कासन को लोकतंत्र का अपमान बता रहे हैं। वे भूल गये कि कांग्रेस और उसकी देखादेखी अधिकांश दलों को खानदानी कारोबार बनाने का श्रेय उनके परिवार को ही है। वे यह भी भूल गये कि कांग्रेस ने ही 1975 में लोकतंत्र की हत्या कर पूरे देश को कारागार बना दिया था; पर क्या कहें ? समय-समय की बात है। कभी नाव पानी में, तो कभी पानी नाव में।

इन दिनों तो वामपंथ की लुटिया डूब चुकी है; पर 1947 के बाद उनका काफी जोर था। प्रधानमंत्री नेहरू जी रूस की प्रगति से बहुत प्रभावित थे। वामपंथी लोग उन्हें अपने दिल के करीब तो लगते थे; पर कहीं वे उनकी खानदानी राजनीति की राह में रोड़ा न बन जाएं, इसलिए वे उनसे दूरी बनाकर भी रखते थे।

वामपंथियों में एक खास बीमारी होती है। जब तक वे दिन में चार-छह बार पैसे वालों को गाली न दे लें, उनका पेट साफ नहीं होता। एक बार एक लालपंथी नेता एक उद्योगपति के पास पहुंचा। बोला, ‘‘सेठ जी, आपके पैसे पर देश के हर नागरिक का हक है। यह धन और धरती बंटकर रहेगी।’’ सेठ जी ने उंगलियों पर कुछ गिना, फिर उसे दो पैसे देकर कहा, ‘‘मेरे पास जितना धन है, उसे यदि भारत के हर नागरिक में बांटें, तो सबके हिस्से में दो पैसे ही आएंगे। तुम अपना हिस्सा लो और यहां से फूटो। हमें और भी कई काम हैं।’’ ये सम्मान था या अपमान, आप खुद तय करें।

खैर, अब कुछ घरेलू बात कर लें। हमारे नगर का ‘साहित्य मंडल’ हर उस छोटे-बड़े लेखक को सम्मानित कर देता है, जो शाॅल खुद लाए और बाद में सबको नाश्ता करा दे। जहां तक हमारे प्रिय शर्मा जी की बात है, वे वर्षों से समाज सेवा में लगे हैं। कुछ विघ्नसंतोषी मित्रों ने उन्हें यह कहकर बल्ली पर चढ़ा दिया कि इतनी समाजसेवा के बाद आपको भारत सरकार की ओर से ‘पद्मश्री’ तो मिलनी ही चाहिए। शर्मा जी इससे उत्साहित होकर और तेजी से काम करने लगे; पर इतने साल बीतने पर भी किसी ने उनसे सम्पर्क नहीं किया। हर साल 26 जनवरी से पहले वे प्रतीक्षा करते हैं कि शायद सरकार की तरफ से कोई पत्र या फोन आएगा; पर बेकार।

लेकिन पिछले दिनों शासन ने तो नहीं, पर नगर की एक धनाढ्य संस्था ने उन्हें ‘नगरश्री’ की उपाधि से विभूषित किया। इसमें उपाधि के साथ पचास हजार रु. भी दिये गये। शर्मा जी बहुत खुश हुए। चलो, किसी ने तो उनकी सेवाओं का महत्व समझा। उन्होंने अपनी तरफ से भी कई लोगों को समारोह में बुलाया। जब उनका बोलने का नंबर आया, तो उन्होंने संस्था की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह सम्मान मेरा नहीं, यहां उपस्थित सब लोगों का है। मैं इसे आपको ही समर्पित करता हूं।

गुप्ता जी की पिछले कुछ दिनों से शर्मा जी से खटपट चल रही थी। वे खड़े हो गये, ‘‘शर्मा जी, सम्मान तो आप अपने पास ही रखें। हां, जो धन आपको मिला है, उसे यदि आप यहां आये लोगों को समर्पित करना चाहें, तो हम सब तैयार हैं।’’

फिर क्या था, शर्मा जी ने मेज पर रखा फूलदान उठाया और मंच से उतरकर गुप्ता जी की ओर दौड़े। जैसे-तैसे लोगों ने उन्हें शांत कराया। सारा कार्यक्रम गुड़-गोबर हो गया। तबसे शर्मा जी ने तय कर लिया है कि वे किसी सम्मान समारोह में नहीं जाएंगे। आपको भी यदि कोई सम्मानित करने के लिए बुलाए, तो ठोक बजाकर जांच लें, कहीं ऐसा न हो कि…।

1 thought on “मान और अपमान

  1. मान और अपमान लोकेषणा से सीधे जुड़ा है. जब किसी का सम्मान होता है तो वह प्रचारित प्रसारित भी होना चाहिए. आजक्ल.pooja,आरती ,संतो के पैर छूने ,के फोटो अख़बार में प्रकाशित होते हैं. जब कोई व्यक्ति संतो के पैर छूता है तो वह पैर को या संत को नहीं देखता वह कैमरे को देखता है. क़िसि का सम्मान करते समय गुलदस्ता ,हार या माला को कोई नहीं देखता वरन फोटोग्राफर को देखता है. मान और ”राग” शाश्वत हैं. लम्बे समय तक जिन लोगों ने मालाएं पहनी हों ,संसद को बपोती समझी हो उन्हें सत्ता से दूर रहने पर अपमान का आभास होना स्वाभाविक है. ऐसे लोग अपना सर पीटते रहते हैं. किन्तु समय सबका है. प्रत्येक का समय एक समान रहता नही. नियति आदमी को जो देती है वह स्थाई नहीं है.

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