अंगद का पांव बनते मुख्यमंत्री कमलनाथ

प्रमोद भार्गव

मध्य-प्रदेश विधानसभा ने पन्ना जिले की पवई विधानसभा सीट से निर्वाचित भाजपा विधायक प्रहलाद लोधी की सदस्यता समाप्त कर दी है। लोधी के खिलाफ एक आपराधिक मामले में भोपाल की विशेष अदालत ने दो साल की सजा सुनाई थी। इस आधार पर विधानसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी। इससे भाजपा को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि उसकी सीटें घटकर 108 रह गई हैं। इसके पहले झाबुआ विधानसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया की जीत से भी न केवल विधानसभा में कांग्रेस की ताकत बढ़ी है, बल्कि मुख्यमंत्री कमलनाथ विधानसभा के भीतर और पार्टी में अंगद का पांव बनते जा रहे हैं। इसीलिए कमलनाथ ने भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि ‘हमारी सरकार कभी भी अल्पमत में नहीं रही। वह तो अंगद के पैर जैसी जमी हुई है। भाजपा इसे उखाड़ने के दिन में सपना देखती रहे, उसे हासिल कुछ भी होने वाला नहीं है। बल्कि तीन विधायक और जल्दी ही हमें मिलने वाले हैं।‘ इसके पहले भी कमलनाथ कह चुके हैं कि ‘भाजपा मैदान में आए और सरकार को गिराकर दिखाए।‘

कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा के विरुद्ध इतने कठोर शब्दों का इस्तेमाल पहले कभी नहीं किया। यह संदेश केवल भाजपा हल्के तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कांग्रेस के विरोधियों को भी सबक है, जो अनर्गल बयानबाजी करके मुख्यमंत्री को यह संदेश देने में लगे हैं, कि सरकार चुनावी संकल्प में किए वादों को 10 माह में भी निभा नहीं पाई है। याद रहे कमलनाथ पर इस समय अपनी परंपरागत लोकसभा सीट गुना से पराजित ज्योतिरादित्य सिंधिया सबसे ज्यादा हमले बोल रहे हैं। उन्होंने किसान कर्जमाफी पर तो सवाल उठाए ही हैं, हाल ही में दूध व मिठाईयों में मिलावटखोरी करने वाले व्यापारियों को सजा नहीं होने पर भी सवाल खड़े किए हैं। ये सवाल ऐसे है, जो यह दर्शाते हैं कि सिंधिया करीब 18 साल सांसद रहे, बावजूद उनमें न तो कानून की समझ विकसित हो पाई और न ही किसान व बैंकिंग व्यवस्था की भीतरी पेचीदगियों को वे समझ पाए हैं। 

               भाजपा को झाबुआ सीट पर हार के बाद प्रहलाद लोधी की सदस्यता खोना, दूसरा बड़ा झटका है। इस सदस्यता समाप्ति की अधिसूचना जारी करने के बाद भारत निर्वाचन आयोग को रिक्त सीट की सूचना भेजी जाएगी, जिससे छह माह के भीतर उपचुनाव संपन्न हो सके। हालांकि भाजपा ने मामले को लेकर उच्च न्यायालय जाने की घोषणा कर दी है। मध्य-प्रदेश में लोधी की तरह सदस्यता गंवाने का यह दूसरा मामला है। इसके पहले छतरपुर जिले की बिजावर विधानसभा सीट से विधायक रहीं आशा सिंह के खिलाफ भी विधानसभा ने इसी तरह का फैसला सुनाया था। वे तेरहवीं विधानसभा की सदस्य थीं। इसी प्रकृति का एक मामला नीना वर्मा का था, जिसमें अदालत ने विधायक की सदस्यता खत्म कर दी थी। हालांकि यह मामला अपराध से जुड़ा नहीं था। मामले में विधानसभा ने उनकी सदस्यता समाप्त कर, उनसे पराजित कांग्रेस प्रत्याशी बालमुकुंद गौतम को विधानसभा की सदस्यता दिलाई थी।  

लोधी के खिलाफ अवैध उत्खनन रोकने पहुंचे तहसीलदार और सरकारी अमले से मारपीट का एक मामला भोपाल की विशेष अदालत में विचाराधीन था। इसमें सुनवाई के बाद लोधी को दो साल की सजा सुनाई गई है। सजा के दो दिन बाद ही विधानसभा सचिवालय ने तत्परता बरतते हुए न्यायालय के आदेश पर अमल किया और लोधी की सदस्यता समाप्त कर दी। विधानसभा के प्रमुख सचिव एपी सिंह ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के 2013 के लिली थाॅमस विरुद्ध यूनियन आॅफ इंडिया की याचिका के फैसले के आधार पर लोधी की सदस्यता समाप्त की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) को समाप्त कर दिया था। इस धारा में अदालत के फैसले पर अपील अवधि तक सांसद या विधायक की सदस्यता निरंतर रहने का प्रावधान है। चूंकि विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने फैसले पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, लिहाजा सचिवालय ने फैसले पर अमल करके अपने दायित्व का निर्वाह किया है।  

झाबुआ सीट जीतने के साथ ही कमलनाथ की न केवल ताकत बढ़ती दिखाई दे रही है, बल्कि उनकी रणनीतिक व कूटनीतिक समझ भी पेश आने लगी है। यह भी तय हो रहा है कि उनमें दो टूक फैसले लेने का आत्मबल है। झाबुआ चुनाव में उनकी साख दांव पर थीं, इसलिए उन्होंने रणनीतिक फैसले लेते हुए दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य को दूर रखा। जबकि खुद चार माह के भीतर पांच बार झाबुआ गए और झाबुआ का विकास छिंदवाड़ा के माॅडल पर करने का भरोसा मतदाताओं को दिया। दरअसल कमलनाथ जानते थे कि दिग्विजय की जुबान पर लगाम लगी नहीं रह पाएगी और वे हिंदू विरोधी कोई भी बयान दे देंगे तो मतदाताओं को राश्ट्रवाद का षिकार होने में देर नहीं लगेगी। ज्योतिरादित्य अपनी हार से इतने कुंठित हैं कि सरकार के विरोध में कुछ भी ऊल-जुलूल बोलने से चूक नहीं रहे हैं। एक तरह से वह अपने पैरों में अपने हाथों से ही कुल्हाड़ी मारने में लगे हैं। लिहाजा कांग्रेस की इस जीत से कमलनाथ की जो शक्ति बड़ी है, उससे तय है कि कालांतर में ज्योतिरादित्य का कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनना भी मुश्किल है ? कमलनाथ ने इस जीत के बाद ऐलान किया है कि ‘भाजपा और कुछ कांग्रेसी ऋणमाफी को लेकर किसानों को गुमराह करने के प्रयास में लगे हैं। हमने कभी भी सभी किसानों की ऋणमाफी का वादा नहीं किया। जिन किसानों के पास दो लाख रुपए तक का कर्ज है, केवल वही माफ होंगे। पहले चरण में 21 लाख किसानों का कर्ज माफ हो चुका हैं, शेष की ऋणमाफी की प्रक्रिया चल रही है। जनता को जो वचन दिया है, उसका जवाब जनता को ही देंगे।‘ इस तीर से कमलनाथ ने भाजपा को तो निशाना बनाया ही, ज्योतिरादित्य को भी निशाने पर साधने से नहीं चुके हैं।

                              झाबुआ में कांग्रेस की जीत से कांतिलाल भूरिया आदिवासी राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। भूरिया को लगातार दो चुनाव में हार मिलने के बाद इस जीत से संजीवनी मिली है। इससे कांग्रेस में जो अवसरवादी आदिवासी राजनीति उभर आई थी, उसे भूरिया किनारे लगा देंगे। साफ है, भूरिया को या तो मंत्रीमण्डल में जगह मिलेगी या फिर प्रदेश अध्यक्षी का सेहरा उनके सिर बांधा जाएगा। आदिवासी युवा शक्ति संगठन (जयस) ने भी कांग्रेस को झाबुआ में खुला समर्थन देते हुए अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था। इस वजह से भूरिया की जीत आसान हुई। इस हेतु कांग्रेस के आदिवासी विधायक हीरालाल अलावा की भूमिका अहम् रही है। हालांकि आदिवासी नेताओं में इस समय गृह मंत्री बाला बच्चन, वन मंत्री उमंग सिंघार, आदिम जाति कल्याण मंत्री ओमकार सिंह मरकाम और बिसाहूलाल सिंह की तूती बोलती रही है। अध्यक्षी के लिए इनके नाम भी उछलते रहे हैं। सिंधिया के विरोध में कमलनाथ ने खुद बाला बच्चन का नाम पेश किया था। किंतु अब लगता है भूरिया ताकतवर आदिवासी नेता के रूप में एक बार फिर पहचान बनाएंगे। दरअसल मध्यप्रदेश विधानसभा में 47 आदिवासी विधायकों में से कांग्रेस के 31 विधायक हैं। भूरिया पांचवी बार विधायक की शपथ लेंगे। वे दिग्विजय सिंह सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं।

               प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष को लेकर पार्टी के अंदर जो घमासान मचा है, उस दौड़ में अब भूरिया सबसे आगे है। सज्जन सिंह वर्मा ने भूरिया का नाम उछालकर सिंधिया की राह में कांटे बिछाना शुरू कर दिए हैं। वर्मा का कहना है कि कांग्रेस के 31 आदिवासी विधायक हैं, इसलिए वरिष्ठ कांग्रेस आदिवासी नेता भूरिया को अध्यक्ष बनाया जाना कांग्रेस के लिए लाभदायी होगा। भूरिया के पक्ष में यह पैरवी सुनियोजित बताई जा रही है। एन वक्त दिग्विजय सिंह और उनके समर्थक भी भूरिया के पक्ष में खड़े दिखाई देंगे। इस कवायद के साथ निगम मंडलों में नियुक्तियों की कवायद भी तेज हो गई हैं। अंदरूनी विवाद के चलते अब तक कमलनाथ केवल चार ही राजनीतिक नियुक्तियां कर पाए हैं। ये नियुक्तियां निजी विवि नियामक आयोग के अध्यक्ष स्वराज पुरी, षुल्क नियामक आयोग के अध्यक्ष कमलाकर सिंह, माखनलाल पत्रकारिता विवि के कुलपति दीपक तिवारी और अपेक्स बैंक के प्रशासक अशोक सिंह के रूप में हुई हैं। इनमें से कोई भी सिंधिया समर्थक नहीं है। दरअसल सिंधिया स्वयं अध्यक्ष पद की दावेदारी के रूप में पेश आ जाने के कारण अपने नुमाइंदों की वकालात ही नहीं कर पर रहे हैं। यह उनकी बड़ी भूल राजनीतिक नादानी मानी जा रही है। साफ है, प्रदेश की राजनीति में कमलनाथ एक शक्तिशाली नेता के रूप में दिखाई देने लगे हैं।  

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