तेजू जांगिड़
अंगू भोला भाला सा था । वो पांचवी तक मेरे साथ शाला चलता था, हालांकि जब मैं पांचवी में था तब अंगू पहली में था अर्थात् वो एक वर्ष मेरे साथ शाला गया। फिर मैंने गाँव में ही दूसरे विद्यालय में प्रवेश ले लिया। फिर भी अंगू मेरा दोस्त था और इसी कारण हम दोनों दिन का कुछ समय साथ में गुजारते। उस समय हम दोनों को साथ में देख गाँव के लोग कहते की ये दोनों पक्के दोस्त है, परंतु उस समय हमें पक्के दोस्त की परिभाषा भी ज्ञात नहीं थी।
जब मैंने दूसरे विद्यालय में प्रवेश लिया तब अंगू ने भी माँ के आगे बहुत जिद्द की मेरे साथ में नए विद्यालय जाने की पर काकी नहीं मानी और अंगू का मासूम हृदय भावनाओं से भर गया, क्योंकि वो मेरा “पक्का दोस्त” था । वैसे अंगू पढ़ने लिखने में भी अव्वल था पर गणित के सूत्र उसके दिमाग में घर नहीं कर पाते थे।
प्रातः मेरा मन विद्यालय जाने का नहीं था और माँ को मैंने अपना पुराना सा घिसापिटा बहाना सुनाया।
“माँ आज मेरे पेट में कुछ लग रहा है ।” मैंने अपने चेहरे को बात के अनुसार भाव दिया।
“अच्छा, क्या लग रहा है ?” माँ ने यह बात ऐसे पूछी जैसे उन्हें पता हो कि मैं बहाना बना रहा हूँ।
“पेट में दर्द है, आज तो विद्यालय भी नहीं जा पाउँगा।”
“तो बेटा रुक मैं तुझे औषधि लाकर देती हूँ लेले फिर ठीक हो जाएगा।”
माँ ने घर में रखी औषधि लाकर मुझे दी पर मैं बिना दर्द के वो औषधि ले कैसे सकता था क्योंकि मैंने गाँव में सुन रखा था कि अगर बिना रोग के कोई भी औषधि लेते है तो हमें उल्टा रोग हो जाता है, इस डर के मारे एक बात और बनाई और कहा –
“माँ ! आप तो हमेशा हमको बताते हो कि खाली पेट औषधि नहीं लेनी चाहिए, और मेरा पेट तो अभी खाली ही है तो बाद में लूँगा।” इतना कहकर मैं वहां से सीधे अंगू के पास गया ।
“अंगू ! तू अभी तक उठा भी नहीं देख भोर हो गई है।”
“अरे भईया आप अभी तक शाला नहीं गए आपको तो विलम्ब हो गया।” अंगू ने मेरे कहने पर उठते ही मुझसे कहा।
“आज मैं नहीं जाऊंगा, तुम भी घर पे रुक जाओ न आज।”
“ठीक है तो आज मैं भी नहीं जाऊंगा।”
“चलो फिर आज हम बिसकु काका के बगीचे में चलें वहां आम खाएंगे दिन भर।”
“हाँ चलो आज मेरा भी मन कर रहा है।” अंगू ने जीभ से अधरों को गीला करते हुए कहा।
हम दोनों अंगू के खेत से होकर रमैया के खेत की बाड़ के किनारे-किनारे बतियाते हुए चल रहे थे तभी बाड़ से सांप निकल आया जिसे देख हम दोनों के प्राण गले में आ गए। हमसे जितना तीव्र हो सका उतने भागे , दौड़ते-दौड़ाते हम कई बार ठोकर खाकर गिरे भी अंततः हम बिसकु काका के बगीचे में आ पहुंचे। चूँकि सांप बहुत पीछे रह चुका था पर फिर भी हमें भय था कि कहीं वो यहाँ न आ जाए।
हमें यह बात तो ज्ञात थी की आज बिसकु काका घर पर नहीं होंगे क्योंकि हमने गाँव में सुन रखा था कि आज बिसकु अपने ससुराल गए हुए थे वहां किसी का ब्याह है । इस बात का फायदा उठाते हुए उस दिन हमनें खूब आम का आनन्द लिया। क्योंकि हमें ज्ञात था कि बिसकु काका के अलावा कोई और बगीचे में नहीं आता तो हम वहीँ आराम से बगीचे में बैठे गप्पें लगाते रहे।
अंगू छोटा था मुझसे भी पर वो सोचता बहुत था, सोचते सोचते यकायक वो बोला –
“भईया! अब तो हम गाँव में हैं तो साथ है फिर आप तो पढ़ने शहर जाओगे फिर हम कैसे रहेंगे अकेले।” अंगू के चहरे पर स्पष्ट दिख रहा था कि वो मुझसे कभी दूर नहीं होना चाहता ।
“देखो अंगू, मैं जब शहर जाऊंगा तब तुम भी साथ चल देना।”
“पर भैया आप तो जानते ही हो माँ को वे नहीं भेजेंगी मुझे आपके साथ शहर।”
“मैं काकी को कहके राजी कर दूंगा फिर चलना साथ।” मैंने अंगू को खुश करने के लिए झूठा दिलासा दिया क्योंकि मुझे पता था कि काकी कभी इस बात को नहीं मानेंगी।
“सच में आप माँ को कहोगे।” अंगू ने बड़ी माशूमियत से पुछा।
“हाँ, पर अभी चलो यहां से कभी भी बिसकु काका आ सकते है और अगर हमें यहाँ देख लिया तो कल उल्हाना लेकर आएँगे घर पर।” मैंने बात को बदलने के लिए कहा।
“हाँ भईया चलो”
हमनें रस्ते में खाने के लिए कुछ आम ओर लिए और चल दिए उसी पगडण्डी से सांप ने हमें भागने पर विवश किया था।
कुछ देर बाड़ के किनारे चलते-चलते हम रमैया के घर के समीप पहूंचे तभी रमैया ने हमारा रास्ता रोका और कहा –
“आज तो बहुत आम खाए न दोनों ने।”
“न् न् नहीं रमैया हम तो ऐसे ही उधर गए थे तो ये दो चार आम लाए है।” मैंने हकलाते हुए रमैया को कहा।
“अच्छा अब झूठ बोल रहे हो?”
“नहीं”
“मैंने प्रातः तुम दोनों को वहां जाते देखा और मैं वहां आकर भी गया जहाँ तुम दोनों आम के मजे ले रहे थे।”
“हाँ, हम गए थे पर यह बात तू किसी को मत कहना।” अंगू ने आग्रह करते हुए कहा।
“ठीक है नहीं कहूंगा पर यह जो अभी तुम दोनों के पास आम है वे मुझे देने होंगे।”
“हाँ ठीक है ले लो।” मैंने कहा।
वैसे भी हम दोनों के उदर में उस समय ओर आमों के लिए स्थान रिक्त नहीं था।
हम वहां से घर गए। घर जाते ही माँ ने मुझसे बहुत सारे प्रश्न पूछे पर मैं भी बहाने बनाने में निपुण था आखिर मना ही लिया माँ को।
हनारा समय ऐसे ही बीतता गया और वो दिन भी आ गया जब मुझे अपने गाँव से दूर जाना था क्योंकि गाँव में आठवीं तक की ही विद्यालय थी और मुझे आगे की पढाई करनी थी तो उसके लिए शहर जाना था । तभी अंगू मेरे पास आया और मौन खड़ा रहकर अनिमेष मुझे निहारता रहा उस समय वो मुझे किसी प्रतिमा की तरह लग रहा था।
“कैसे हो अंगू?” मैंने उसके मौन में विघ्न डालते हुए कहा ।
“अच्छे है भईया।”
“मैं आज शहर जा रहा हूँ।”
“मुझे ज्ञात है।” अंगू के इस कथन में मुझे उसके हृदय की गहराइयों में छुपा दर्द स्पष्टता से महसूस हो रहा था, पर मैं कुछ करने में असमर्थ था।
अब अंगू भी कुछ बड़ा हो गया था और अब उसकी भी समझ में आ गया था कि वो मेरे साथ शहर नहीं चल सकता ।
शहर जाने वाली बस प्रातः आठ बजे हमारे गाँव से निकलती है, वैसे घर से बस स्टैंड की दूरी लगभग दो मील है जो हमें पैदल ही तय करनी होती है। उस समय माँ और बाबा के चहरे पर भी मुझसे दूर होने का दुःख झलक रहा था। माँ की आँखें तो दरिया बन गई जब मैं बस स्टैंड को चल दिया था घर से ।
वैसे किसीसे बिछड़ने का दुःख हमारे हृदय को अंदर तक झकझोर कर डालता है और उन लोगों की याद अक्सर हमें रात के घने अँधेरे में जब हम एकांत में होते है तब कचोटती है।
मेरा हृदय भी भर आया था जब वहां से चला था मैं, मेरे साथ कुछ सामान था जो एक पथिक के साथ होता है। अंगू बस स्टैंड तक मेरे साथ चला। यूं तो घर से बस स्टैंड तक का सफर मैंने बहुतों बार किया पर इस बार कुछ अलग अनुभव हो रहा था, पता नहीं क्या हुआ था मुझे जो मैं हर घर को निहार रहा था और हर आदमी से बतिया रहा था। रस्ते में मुझे रमैया भी मिला। ऐसे हम बस स्टैंड पहुंचे तभी अंगू ने पूछा –
“भईया आप वापस गाँव कब लौटोगे?”
“जब मेरी पढ़ाई पूरी हो जाएगी।”
“जल्दी ही होगी न?”
“हाँ अंगू, ये कुछ वर्ष तो ऐसे निकल जाएंगे हमें तो पता ही नहीं चलेगा।”
तभी अंगू यकायक बोला-
“भईया आपके बस आ गई।”
“ओह्ह हाँ।” बस के आने से पूर्व तक मेरा मन शहर जाने का था परंतु जब बस को आते देखा तो अचानक हृदय परिवर्तित हो गया, लगने लगा कि शहर न जाऊं यहीं पर अंगू के साथ रहूँ और बाबा के साथ खेती करूँ। मैं यह सोच ही रहा था कि बस आकर रुकी और मैं अंगू को अलविदा कहकर बस में चढ़ा। मुझे याद है उस समय काफी देर तक अंगू बस को अनिमेष निहारता रहा ।
बस का सफर खेतों की मेड़ों के पास से होते हुए शहर की इमारतों के बीच ख़त्म हुआ। वहां रहकर मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की। इस बीच कभी कभार गाँव से बाबा के नाम की चिट्ठी आ जाया करती थी जिसे पढ़ मैं बहुत ज्यादा खुश होता था ।
रात को विलम्ब से नींद आती तब तक मेरा मन गाँव की खट्टी-मीठी यादों के भंवर से होकर निकलता और अंततः मेरी आँखें भी दरिया बन ही जाती। ऐसे ही सदैव गाँव की यादें हृदय के तार को झंकृत करती रहती थी और समय कटता रहता।
मैंने शहर में बी.ए. की तब तक मुझे माँ-बाबा और अंगू से बिछड़े सात वर्ष हो गए थे। अंततः सात वर्ष बाद मैं पुनः अपने गाँव जाने वाला था इसलिए मैंने अपने माँ-बाबा के लिए कुछ खरीद और अपने “पक्के दोस्त” अंगू के लिए भी।
इस बार बस स्टैंड तक का सफर भी अकेले करना पड़ा वैसे शहर में बस स्टैंड इतना दूर नहीं था। इस बात की ख़ुशी थी कि गाँव जाकर उन बीते पलों को फिर से जीऊंगा। आखिर बस आई और मैं कई शहरों से होते हुए अपने गाँव पहुंचा, जब बस रुकी और मैंने अपनी गाँव की माटी पर कदम रखा तो सब कुछ वहीँ था जहां मैं छोड़ कर गया था सिवाय अंगू के।
स्टैंड से घर जाते समय मुझे गाँव के कई लोग मिले जिनसे मेरी कुछ बातें भी हुई और चलते-चलते घर पहुंचा। माँ-बाबा की आँखों में ख़ुशी के आंशूं थे । मैंने काफी देर तक उनसे बातें की और फिर बाबा से पूछा-
“बाबा! अंगू नहीं आया अभी तक, उसे पता है या नहीं की आज मैं शहर से आया हूँ?”
“बेटा वो अंगू तो…।”
“तो क्या बाबा?”
“अब वो न् न् नहीं रहा बेटा।” यह कहते हुए बाबा की आँखों से आंशूं बहने लगे।
यह सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मैं खूब रोया और सिर्फ रोया क्योंकि उस समय मैं और कुछ नहीं कर सकता था।
“वो बेटा गाँव में बच्चे महामारी के शिकार हुए थे उनमें से अंगू और रमैया भी…।”
“रमैया भी?” मैंने दुःखी मन से पुछा।
“हाँ”
यह सब सुन मैं मौन किसी पुतले की भांति खड़ा रहा। सिर्फ सुनता रहा और आँखों से झरने के पानी की भांति आंशू गिर रहे थे।
-तेजू जांगिड़-

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