लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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दिनांक १८ अगस्त मंगलवार की शाम को मैं संयोग बस Constitution क्लब पहुँच गया था।उड़ती उड़ती खबर मिली थी कि वहाँ अन्ना हजारे आने वाले हैं।अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल के सम्बन्ध में मीडिया में बहुत सी परस्पर विरोधी खबरे आ रही थीं।आ रहा था कि अन्ना और केजरीवाल में खटपट हो गयी है। अन्ना हजारे नहीं चाहते कि भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन वाले राजनैतिक पार्टी बनाए उनका शायद यह मानना था कि राजनीति में जाने के बाद इस आन्दोलन का भी वही हस्र होगा जो जय प्रकाश के आन्दोलन का हुआ।अतः सोचा कि इस संयोग का लाभ उठाना चाहिए।उम्मीद थी कि शायद कुछ सवाल जवाब भी हो और अपनी बात कहने का भी मौका मिल जाए।पर सब कुछ अपनी सोच के अनुसार तो होता नहीं।वहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

अन्ना के आने का समय छः बजे बताया गया था।मैं वहाँ उसके पहले ही पहुंच गया था। अन्ना हजारे सात बजे के बाद पहुंचे।इन्तजार की घड़ियाँ लम्बी हो गयी थी,पर समय बेकार नहीं गया था,क्योंकि वहाँ बाबू जगजीवन राम की स्मृति में एक गोष्ठी पहले से चल रही थी और अनजाने में ही सही उसका लाभ उठाने का भी मौका मिल गया था।

हाँ तो अन्ना हजारे करीब सवा सात बजे मंच पर आये।उनके साथ मंच पर कोई जाना पहचाना चेहरा नजर नहीं आया।न किरण बेदी और न उन जैसे अन्य जो राजनैतिक पार्टी बनाए जाने के विरोध में हैं और न अरविन्द केजरीवाल और उनके साथी,जो राजनैतिक विकल्प के पक्ष में हैं।मैं मंच के बहुत नजदीक था,अतः लग रहा था कि कुछ प्रश्न पूछने का मौका मिल जाएगा,पर भाषण के प्रारंभ में ही निराशा हुई,,जब अन्ना हजारे ने साफ़ साफ़ शब्दों में कह दिया कि वे केवल अपनी बात कहेंगे।उनसे न कोई प्रश्न करेगा और न वे उसका उत्तर देंगे।उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी ने शोर मचाने का प्रयत्न किया तो वे मंच छोड़ कर चले जायेंगे।इसके बाद तो श्रोताओं के लिए शांति बनाए रखने के अतिरिक्त अन्य कोई चारा नहीं रहा।

अन्ना हजारे ने अपने दस बारह मिनट के भाषण में जो कहा उसका सारांश यही था कि न तो वे कभी चुनाव लड़े हैं और न अब चुनाव के मैदान में कूदना चाहते हैं।उन्होंने अपना पुराना राग दुहराया कि चुनाव में एक एक उम्मीदवार के पीछे करोड़ों रूपये खर्च होते हैं,वह पैसा कहाँ से आयेगा।

दूसरी बात जो उन्होंने कही वह यह थी कि जब परिवर्तन लाने के लिए जेपी के नेतृत्व में लोगों ने चुनाव लड़ा तो उसका हस्र क्या हुआ?लालू जैसे भ्रष्ट नेता पैदा हो गये।प्रश्न पूछने की ईजाजत नहीं थी, नहीं तो मैं अवश्य पूछता कि एक बार परीक्षा में असफल होने के बाद क्या दूसरी बार परीक्षा नहीं दी जाती?क्या जेपी के समय में की गयी गलतियोंको सुधारा नहीं जा सकता है? ऐसे भी सम्पूर्ण दोष लालू या उनके समक्ष जेपी के आन्दोलन के साथ पैदा हुए नेताओं पर नहीं जाता।लालू हो या नितीश या शरद यादव या अन्य जो जेपी के आन्दोलन की देन थे ,ये तो बाद में महत्त्व प्राप्त किये।असल में तो स्वार्थ का नंगा नाच उनलोगों ने दिखाया जिनसे पथ प्रदर्शन की अपेक्षा थी।लालू १९९० में मुख्य मंत्री बने थे ,जबकि जनता पार्टी का प्रयोग १९८० में ही समाप्त हो गया था।आधुनिक भारत के इतिहास के उन काले पृष्ठों से क्या यही सबक मिलता है कि अब वैसा प्रयोग किया ही नहीं जाए और जनता को इन भूखे भेडियों के चंगुल में ही रहने दिया जाए?क्या यह सबक नहीं लिया जा सकता कि उन गलतियों को न दुहराते हुए आगे बढ़ा जाए?

इसके बाद अन्ना हजारे ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि अगर कोई पार्टी बनाता है तो वे उसका हिस्सा नहीं बनेंगे।और न उस पार्टी के लिए प्रचार करेंगे।यह अवश्य है कि वे देश भर में घूमेंगे और जनता को जागृत करेंगे।उनसे कहेंगे कि आपलोग ईमानदार और कर्मठ व्यक्तियों को वोट देकर संसद में भेजे ,जिससे वे लोग वहाँ जाकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठायें और जन लोकपाल बिल पारित कराने में मदद करें।यह बात अन्ना हजारे ने अवश्य कही कि जो लोग राजनैतिक विकल्प दे रहे हैं उनसे उनका कोई विरोध नहीं है।वे लोग अपने ढंग से भ्रष्टाचार मिटाने का प्रयत्न करेंगे और मैं अपने ढंग से।मेरे विचार से अन्ना हजारे ने इस वक्तव्य में दो महत्त्व पूर्ण बातों पर ध्यान नहीं दिया कि जब पार्टियाँ स्वयं भ्रष्टाचार में निमग्न हैं तो ऐसा उम्मीदवार आयेगा कहाँ से।अगर गलती से कोई आ भी आ गया तो वह पार्टी अनुशासन में बंधा होने के कारण वही करेगा जो आलाकमान की इच्छा होगी।मान लिया जाए कि कुछ निर्दलीय उम्मीदवार वैसा निकले तब भी अकेले या एक दो अन्य को साथ लेकर वे क्या कर पायेंगे?

भाषण समाप्त होते ही वे दनदनाते हुए वहाँ से निकल गए।उन्होंने मुड कर भी देखने का प्रयत्न नहीं किया कि आखिर उनके श्रोताओं की प्रतिक्रिया क्या है।अगर अन्ना हजारे मुड कर देखते तो उन्हें भान हो जाता कि लोग कितने छले हुए महसूस कर रहे थे।

दूसरे दिन भंग टीम अन्ना के सदस्यों के साथ साथ अन्य गण मान्य व्यक्तियों के साथ अन्ना हजारे की मीटिंग उसी जगह सुबह में ही शुरू हो गयी। मीटिंग करीब सात घंटे तक चली। चूंकि यह मीटिंग आम जनता की मीटिंग नहीं थी,अतः मेरे जैसे लोगों का उसका हिस्सा बनने का प्रश्न ही नहीं उठता ।मीटिंग का जो समाचार आया उससे पता चला कि उस सभा में बहुमत राजनैतिक विकल्प के पक्ष में था,पर अन्ना हजारे ने बहुमत के विचारोंको वीटों करते हुए वही राग दुहराया जो उन्होंने अपने पिछले शाम के भाषण में कहा था,पर उस सभा से बाहर निकलने के बाद तो उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि बनने वाली पार्टी में उनका नाम नहीं आएगा और न किसी पत्राचार में उनके नाम का उल्लेख होगा।पर उस मीटिंग के अंत में उन्होंने जो बाते कही थी उनका एक वीडियो दूसरे ही दिन यूं ट्यूब पर आ गया।उसमे अन्ना हजारे साफ साफ़ यह कहते हुए दिखाई पड रहे हैं कि भारत के निर्माण और विकास के लिए दो बातों की जरूरत है।एक तो विकास के कामों को गति देनी पड़ेगी और दूसरे भ्रष्टाचार को मिटाना होगा।मैं इस आन्दोलन को बहुत दिनों से चला रहा हूँ।पिछले डेढ़ सालों से जन लोकपाल के लिए आन्दोलन चल रहाहै।अब इस आन्दोलन के दो हिस्से बन गये हैं। एक हिस्सा राजनीति में जाएगा और दूसरा आन्दोलन चलाता रहेगा।दोनों हिस्से महत्त्व पूर्ण हैं।देश को दोनों की आवश्यकता है।भारत को भ्रष्टाचार मुक्त करने और पूर्ण परिवर्तन के लिए त्याग और बलिदान की आवश्यकता है।।मैं मानता हूँ कि देश का युवक वर्ग इसके लिए सामने आयेगा और भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण में मदद करेगा।

एक अन्य बात भी सामने आयी।।वह है अरविन्द केजरीवाल का यह वक्तव्य कि अन्ना तो हमारे गुरु हैं और हमारे ह्रदय में निवास करते हैं। ऊनको मैं अपने दिल से कैसे निकाल सकता हूँ।वे तो हमेशा वहाँ विराजमान रहेंगे।अरविन्द केजरीवाल के इस वक्तव्य ने मुझे एक पुरानी कहानी याद दिला दी।

कविवर सूरदास भगवान कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे।एक बार वे कुएं में गिर पड़े और बचाने के लिए गुहार लगाई।कहा जाता है कि भगवान कृष्ण स्वयं उनको निकालने के लिए पहुँच गए।कविवर को कुएं से निकालने के बाद वे बांह छुडा कर जाने लगे।कविवर को भान हो गया कि उनको कुएं से निकालने वाला कोई अन्य नहीं ,बल्कि स्वयं उनके आराध्य हैं।कहा जाता है कि इस दोहे की रचना कविवर ने उसी समय की थी,

बांह छुडाये जात हो ,निर्बल जानि को मोहि ।

ह्रदय से जब जाहुगे मर्द बखानब तोहि।

अरविन्द केजरीवाल की हालत कुछ वैसी ही लगती है।

————–

ऐसे तो मैं अप्रैल २०११ के अन्ना के अनशन के साथ ही इस आन्दोलन की ओर आकृष्ट हो गया था,पर अगस्त २०११ के अनशन वाले आन्दोलन से मैं बहुत प्रभावित हुआ था।अन्ना हजारे की लोकप्रियता और उनके प्रति लोगों की श्रद्धा मैंने देखी थी।मैं यह मानता हूँ कि आन्दोलन के इस स्वरूप की यह पराकाष्ठा थी। इसके आगे कुछ भी नहीं हो सकता था।अब आवश्यकता थी तो देश भर में घूम घूम कर अलख जगाने की और लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की।

जब मुम्बई में यही कार्यक्रम दुहराया जाने वाला था,उस समय मैं विदेश में था।मेरे पास टीम अन्ना के साथ संपर्क करने का कोई साधन नहीं था।और न उम्मीद थी कि कोई मेरे जैसे अदने की बात सुनेगा और उसको समझेगा।फिर भी अपने विचारों से अवगत कराने के लिए और विकल्प के लिए सुझाव देने के लिए मैंने एक मेल किरण बेदी को भेज दिया था। मैंने उसमे लिखा था कि आपलोगों का यह कदम गलत है इसमे आप लोगों को वैसा सहयोग नहीं मिलेगा लोग इसको आपके अगस्त वाले प्रदर्शन से तुलना करेंगे और इसको असफल मानेंगे। हो सकता है की मेरे जैसे मत रखने वाले अन्य लोग भी हों और उन्होंने भी ईसी तरह का सलाह दिया हो,पर वे लोग अपने रास्ते पर चले और आगे मुंबई में जो हुआ ,वह सर्व विदित है

दिल्ली में २६ जुलाई से अनशन ,वह भी अन्ना हजारे के सहयोगियों द्वारा।यह कदम मेरी समझ से परे था।फिर भी मुझे लगा कि शायद ये लोग अपने आलोचकों को बताना चाहते हैं कि हमलोग अन्ना हजारे के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहते और स्वयं बलिदान हेतु प्रस्तुत हैं।।अरविन्द केजरीवाल मधुमेह के रोगी हैं।मैं जानता था कि मधुमेह में उपवास आत्मघाती सिद्ध हो सकता हैं मैं यह भी जानता था कि इन सबका न सरकार पर कोई प्रभाव पड़ेगा और न जनता ही इसमें उतने उत्साह पूर्वक भाग लेगी।मैं दूसरे दिन वहाँ गया था मैंने वहाँ मौजूद कार्य कर्ताओं से कहा था कि यह गलत कदम है।इससे कोई लाभ नहीं होगा।उसी शाम मैंने अरविन्द केजरीवाल को एक पत्र भी लिखा था।बाद में वह एक खुले पत्र के रूप में टाईम्स आफ इंडिया में भी प्रकाशित हुआ था।उसमे मैंने साफ़ साफ़ लिखा था कि राजनैतिक विकल्प को छोड़कर इन गुंडों से निपटने का अन्य कोई मार्ग नहीं है।अगर आपलोग अपनी बात पर अड़े रहे और खुदा न खास्ता कहीं अन्ना हजारे भी इस अनशन में शामिल हो गए तो आपलोग शहीद होने के लिए तैयार हो जाईये सरकार ने तो शायद आपलोगों के लिए कफ़न का भी इंतजाम कर रखा है।उसके बाद होने वाले उपद्रवो के लिए सरकार तैयार नजर आ रही है।कटाक्ष तो चल ही रहा था कि अगर जन लोकपाल बिल पारित कराने का इतना ही शौक है तो चुनाव लड़कर संसद में क्यों नहीं आ जाते।

हुआ वही जिसका डर था।इस बार सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी। ३ अगस्त को बिना शर्त अनशन समाप्त करने की घोषणा के साथ जो अगला कार्यक्रम तय हुआ कि अब हम राजनैतिक विकल्प देंगे, तो मुझे लगा कि यह अनशन वाला कार्यक्रम जनता को फिर से याद दिलाने और सरकार की वेरूखी का पर्दाफास करने के लिए था,जिससे अगले कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार हो सके।उस योजना के कार्यावयन के लिए आगे की रूप रेखा भी बनने लगी थी।लगता था कि वे लोग उस राजनैतिक विकल्प को सामने लायेंगे ,जिसकी जनता वर्षों से प्रतीक्षा कर रही थी। यह भी लगने लगा था कि जय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति वाले आन्दोलन की असफलता से सबक लेकर ये लोग सावधानी पूर्वक आगे बढ़ेंगे और उन गलतियों को नहीं दुहराएंगे ,जो उस समय की गयी थी।

पर यह क्या?कुछ ही दिन बीते होंगे कि राजनैतिक विकल्प के विरोध में आवाजें उठने लगी।उसमे सबसे मुखर किरण बेदी और संतोष हेगड़े थे।ऐसे उन लोगों के विरोध का कुछ कुछ कारण मेरी समझ में आ रहा था,पर मैं सोचता था कि अगर बहुमत राजनैतिक विकल्प के पक्ष में है तो देर सबेर वे भी इसमे शामिल हो ही जायेंगे। उसी समय जी समाचार चैनल ने एक सर्वे भी कराया था जिसमे देश के कोने कोने से लोगों ने राजनैतिक विकल्प के पक्ष में वोट दिया था।आई।ए।सी। ने अपना अलग से सर्वे भी कराया, उसमे भी जी वाले परिणाम की पुनरावृति हुई। अब तो लगने लगा था कि नया विकल्प आकर ही रहेगा। पर हुआ तो कुछ और ही।अन्ना हजारे ने तो सबके विचारों की अवहेलना करते हुए वीटो का इस्तेमाल कर दिया।पता नहीं उनकी सोच क्यों बदल गयी?जिन लोगों ने ३ अगस्त को जंतर मंतर के मंच से दिया हुआ उनका भाषण नहीं सुना होगा या उसका लाइव ब्रोडकास्ट नहीं देखा होगा ,वे तो यह कह सकते हैं कि शायद अन्ना हजारे ने ऐसा कहा ही नहीं हो,पर अन्ना हजारे अपने लाखों समर्थकों और कार्यकर्ताओं को अपने बदलने का क्या कारण बताएँगे?

15 Responses to “अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल और राजनैतिक विकल्प”

  1. prasoon kukreti

    आर सिंह जी….मैं आपके विचारों से बिलकुल सहमत हूँ और डरा हुआ भी हूँ. इसमें कोई शक नहीं के अन्ना आन्दोलन ने हमें चेतना दी जीवन दिया. लेकिन सारी भारतीय जनता क्यूँ जयचंद होने की होड करने लगती है जब भी हिन्दुस्तान के उत्थान की बात आती है, एक बदलाव की बात आती है.

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      प्रसून जी,
      धन्यवाद.
      वैचारिक वैभिन्य जागरूकता का द्योतक है.सार्थक बहस प्रजातंत्र की जान है.गलत है,हठधर्मिता और यथा स्थिति से चिपकने की आदत. हम सभी ऐसे लोगों को जयचंद नहीं कह सकते,जो अपनी हठधर्मिता के कारण कुतर्कों द्वारा अपने गलत को भी सही सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहे हैं,पर इतना अवश्य कह सकते हैं क़ि वे अपनी संकीर्ण विचार धरा के चलते इस परिवर्तन को समझ नहीं पा रहे हैं.

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  2. Ram narayan suthar

    अब एक और नई पार्टी भष्टाचार मिटाने के लिए अस्तित्व में आ रही है या और भर्ष्टाचार करने के लिए देखिये इस लिंक पर

    यहाँ पर वह दोनों लिंक दी हुई हैं, जिनसे केजरीवाल का यह ऐयाशी का बिल मिला है.

    http://www.bhaskar.com/article/NAT-india-against-corruption-movement-complete-fund-and-expenditure-details-3836280-PHO.html?seq=4&HT1=%3FBIG-PIC%3D

    http://www.bhaskar.com/article/NAT-india-against-corruption-movement-complete-fund-and-expenditure-details-3836280-PHO.html?seq=5&HT1=%3FBIG-PIC%3D

    जो लोग कहते हैं, कि अरविन्द केजरीवाल को अगर पैसा ही कमाना होता, तो वो राजनीति क्यों आता. वो तो वैसे भी अच्छे सरकारी फंड पर था.

    पर एक बार इस बिल पर ज़रूर नज़र डालें, जो केजरीवाल ने आंदोलन में आए चंदे के हिसाब के रूप में दिया है.

    पहले बिल में ९ लाख २९ हज़ार रुपये सैलरी के दिखाए हैं वही दूसरे बिल में १९ लाख ७८ हज़ार ८२५ रूपये सैलरी के लिए खर्च बताए हैं.
    ऐसी ही कई सारी गडबडियां इस बिल में आप देख सकते हैं. पर मेरा उद्देश्य यहाँ पर केवल इस बात को दिखाने का है, कि क्या यह आंदोलन जनता की हक की लड़ाई था या पैसे लेकर आंदोलनकारियों को बुलाया गया था?
    क्या अन्ना गैंग जो भी अनशन या नौटंकी कर रही थी, वो एक ‘पेड’ स्टंट थे?

    अगर आंदोलन भी पेड होते हैं, तो इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी, कि पैसे लेकर भी आंदोलन किये जाते हैं.

    जय जय श्रीराम…….
    वन्देमातरम……..

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      यह आन्दोलन पेड था या नहीं ,इस बहस में मैं पड़ना चाहता,क्योंकि जिसके बारे में मुझे पूरी जानकारी नहीं हो उस पर बहस से मुझे कोई लाभ नहीं दिखाई देता,पर जिस दिन के अनशन का आँखों देखा हाल मैंने अपने रिपोर्ट “अन्ना का अनशन ,आँखों ने जो देखा ” में चित्रित किया है,उसके बारे में मैं इतनाही. कह सकता हूँ कि वैसा दृश्य पेड प्रदर्शन में दिख ही नहीं सकता.आगे यह भी प्रश्न उठता है की क्या उतने लोग पैसे देकर बुलाये जा सकते हैं?दूसरी बात यह सामने आती है कि अगर ऐसा होता तो जिन लोगों के पीछे ये लोग हाँथ धोकर पड़े हुए हैं ,वे लोग अब तक चुप नहीं बैठे रहते.उनके पास इसके तह तक पहुँचने के लिये साधनों की कमी नहीं है.यह आलोचना प्रत्यालोचना तो चलती रहेगी,अब तो आगे यह देखना है कि ये लोग बंधे बंधाये पार्टियों और उनके अनुशरण करने वालों के बीच ये लोग अपने को कैसे स्थापित कर पाते हैं.

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      • Ram narayan suthar

        बहस जानकारी के अभाव में नहीं हो सकती यह सही है पर अब में कुछ लिंक आपकी जानकारी के लिए दे रहा हु शायद इसके बाद आप इस मुद्दे को गौण न समझकर बहस के लायक मुद्दा समझे कभी भी जनता बिकी हुई नहीं होती बल्कि जनता का नेत्रत्व बिका हुआ होता है

        http://www.youtube.com/watch?v=K34AgiQBogc

        http://www.youtube.com/watch?v=fQGW5fbfTUY

        http://www.youtube.com/watch?v=iwtqNLSbI3w

        http://www.youtube.com/watch?v=sn6cN-JJCrA

        http://www.youtube.com/watch?v=ca2n9dqjKto&feature=relmfu

        इन सारे वीडियो को देखने के बाद ज्यादा नहीं तो थोडा तो बहस लायक मुद्दा लगेगा आपको ये मेरा विश्वाश है

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        • आर. सिंह

          आर.सिंह

          आपके द्वारा भेजे हुए लिंक मैंने सरसरी निगाह से देखे.हो सकता है की इस लिंक में दिया गया विवरण सही हो या नहीं हो ,पर अब उससे क्या फर्क पड़ता है?मुझे अभी भी लगता है कि अगर कुछ खामियां हो तो भी तो दूसरों की तुलना में ये लोग बेहतर सिद्ध होंगेअब तो इनकी भावी पार्टी का मसौदा भी आ गया है.यद्यपि अभी यह केवल ड्राफ्ट है,पर इससे एक दिशा निर्देश तो मिलता ही है.अगर वे इसीको या या कमोबेशी इसी को आधार मान कर अपने भावी कार्यक्रम तैयार करते हैं तो मैं नहीं समझता कि आज के नेताओं की तरह स्वेच्छ्चारी बन पायेंगे.ऐसे भारत में ऐसे लोग ही ज्यादा है कि दर्पण देखे बिना दूसरों का मीन मेख निकालने लग जाते हैं.इस पर मैं पहले बहुत लिख चूका हूँ,अतः अब ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहता.
          यह भी सत्य है कि अगर ये लोग पाक साफ़ भी हों तो दूसरों को लगता है कि पाक साफ़ तो कोई हो ही नहीं सकता,अतः ये वैसा कैसे हो सकते हैं?

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        • prasoon kukreti

          एक छोटा अदना होने के नाते बड़ों की बात काटने का संस्कार तो हमारे देश का नहीं है. लेकिन मैं अपने पुराने संस्कारों को पकडे ही रहूं ऐसा मेरे जैसी उम्र के कई सारे लोगों में सवाल उठ खड़ा हो गया है? “बहस” को अभद्र तरीके से देखे जाने की वजह से, पुरानों और नयों में कोई संवाद नहीं होने की वजह से …आज का माहोल यह हो गया है के बहस शुरू भी की जाये तो कहाँ से ? पुरानों से या नयों से ? पुराने कभी यह नहीं मानेंगे के अगर उन्होंने कभी कु-व्यवस्था के प्रति जिम्मेदारी से आवाजें उठाई होती तो नयों को ये दिन नहीं देखना पड़ता? और नए तो वैसे ही शायद परिपक्व नहीं. लेकिन छोडिये जी इन बातों को..क्या समय नहीं आ गया के अब हम एक ही हो के सोचें? छोड़ें आपसी कु-तर्कों को और मिल बैठ के सोचें के क्या सही है क्या गलत?

          पहला ही लिंक देखा तो शुरुआत ही निराशावादी से लगी…और फिर खुद कि पार्टी बनाने और उसमें हुई देरी का सपष्टीकरण थोड़ा ठीक नहीं जान पड़ा..लगा जैसे मुझ से देर हो गयी और अगला मेरा मुद्दा लेकर आगे बढ़ गया. ऐसी गलती तो बड़े बड़े बाबाओं और संतों में भी मैंने देखा है…तो चलो मान लेते हैं के कोई अपवाद नहीं. खैर मैं तो कोशिश में हूँ कैसे सुथरा बनूँ अब.

          आप लोगों की वार्ता में हड्डी की तरह आने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ. कृपया अन्यथा न लें.

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      इकबाल हिन्दुस्तानी जी,आज अन्ना हजारे का जो बयान आया है ,उसमे उन्होंने दो बातें कही हैं.पहली बात तो उन्होंने यह कही है कि अब वे अनशन नहीं करेंगे.दूसरी बात उन्होंने यह कही है कि वे देश भर में आन्दोलन करेंगे.उस आन्दोलन की रूप रेखा वे तैयार कर रहे हैं.ऐसे आज उन्होंने फिर कहा है कि अरविन्द केजरीवाल और उनका रास्ता अलग हो गया,पर आपस में कोई मतभेद नहीं है.अन्ना की यह बात जो वे बार बार दुहराते हैं कि राजनीती में बहुत गन्दगी हैऔर उससे वे दूर ही रहेंगे, मेरी समझ में नहीं आती है कि उस स्थिति में वे उसमे सुधार कैसे कर सकेंगे?

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  3. आर. सिंह

    आर.सिंह

    सिन्हा जी,मैं आपसे सहमत न होते हुए भी आपकी विचार धारा को पूर्ण रूप से अस्वीकार नहीं कर सकता,पर यहाँ जो कुछ मैंने लिखा है ,वह पूर्ण रूप से मेरे विचार हैं ,क्योंकि जैसा मैंने लिखा है,जिस समय मैं इस विचार धारा को संजो रहा था,उस समय तो अरविन्द केजरीवाल भी शायद ही इस दिशा में सोच रहे होंगे.मुझे ऐसा तब अवश्य लगा था कि ये लोग अनशन की व्यर्थता को समझ गए ,जब इन्होने बिना शर्त ३ अगस्त को अनशन समाप्त कर दिया और अपने भावी कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार करने लगे.अन्ना हजारे भी उस समय इन लोगों से सैद्धांतिक तौर पर अलग नहीं थे.अब रह गयी राजनैतिक महत्वाकांक्षा की बात तो यह संभव है,पर मेरे विचार से बिना राजनैतिक विकल्प के व्यवस्था में बदलाव संभव नहीं है,क्योंकि कोई भी परिवर्तन बिना संसद की सहमति के संभव नहीं है.१९७७ में वर्तमान दलों को यह अवसर मिला था,पर उस समय स्वार्थ देश भक्ति पर भारी सिद्ध हुआ था,अतः किसी तरह का परिवर्तन नहीं आ सका .उसके लिए कौन कितना दोषी है,यह इतिहास बन चूका है.मेरे जैसों के लिए तो यह आंखन की देखी था,अतः कागज़ की लेखी की शायद कोई आवश्यकता भी नहीं है.मैं चूंकि सब पार्टियों का असली चेहरा देख चूका हूँ,अतः मैं किसी भी दल या पार्टी से कोई उम्मीद नहीं रखता.अगर अन्ना हजारे की नज़रों में अपने को ऊँचा रखने का आदर्श लेकर किसी दल या पार्टी की संरचना होती है और अगर वह पार्टी अरिन्द केजरीवाल लिखित पुस्तक स्वराज को अपना आदर्श मान कर आगे बढ़ती है तो हो सकता है कि उसे सफलता मिलने में देर लगे ,पर वह ऐसा परिवर्तन ला सकती है ,जो बहुतों का सपना है.

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  4. Ram narayan suthar

    राजनेतिक पार्टी आन्दोलन खड़ा करने के लिए व् उसे लम्बे समय तक चलाने के लिए बनाई जाती है परन्तु अन्ना आन्दोलन मूल रूप से राजनेतिक पार्टी खडी करने के लिए ही चलाया गया था जितना जल्दी इस आन्दोलन को मिडिया के द्वारा लोकप्रिय बनाया गया था उतना ही जल्दी ये आन्दोलन अपने अंजाम तक भी पंहुचा दिया गया
    जन लोकपाल अन्ना का उदेश्य हो सकता है अन्ना टीम का उदेश्य पहले भी राजनीती में आना था और आज भी राजनीती में आना ही है फिर भले ही अन्नाजी की विचारधारा की बलि चढ़ा दिया जाये
    शायद अन्ना को अब समझ में आ गया है की उसे एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया था इसीलिए इन्होने राजनितिक विकल्प से किनारा कर लिया है
    अन्ना टीम ने एक विदेशी आन्क्र्ता की तरह हर राष्ट्रवादी को अपने बयानों से छलनी किया है चाहे वो बाबा रामदेव हो या नरेंद्र मोदी संघ हो या उमा भारती इन्होने इस विकल्प को सफल बनाने के लिए ही बुखारी जैसे लोगो के भी चरण चाटुकार बनाना स्वीकार कर लिया तो हर देश वासी को इनकी नियत तो पहले से ही समझ लेनी चाहिए थी

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    • आर. सिंह

      आर.सिंह

      मेरे विचार से आज भारत में किसी नेता को राष्ट्रवादी कहना राष्ट्रवाद को गाली देने के सामान है.भारत जिस हालात में आजादी के ६५ वर्षों के बाद भी है उस अधोपतन में कम या ज्यादा सभी पार्टियों और नेताओं का साझा है.भ्रष्टाचार जो भारत को दीमक की तरह खोखला कर रहा है,उसको समाप्त करनेया कम करने का किसी ने भी गंभीर प्रयत्न नहीं किया. नरेंद्र मोदी ने भी अभी तक अपने राज्य में लोकायुक्त की बहाली नहीं की है. ऐसे तो हम बड़ी बड़ी बातें करने और अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने में माहिर हैं,पर हकीकत यह यह है की हमाम में सब नंगे हैं.हम भ्रष्टाचार के इतने आदी हो चुके हैं कि यह लगता ही नहीं कि कोई भी इसको दूर कर सकता है.

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      • ram narayan suthar

        इस देश के अधो पतन का वास्तविक कारन राजनेतिक पार्टी नहीं बल्कि इस देश की लोक तांत्रिक (वोट बैंक पर आधारित ) व्यस्था है जब हर क्षेत्र में कार्य करने वालो को योग्यता के आधार पर जिमेदारी सोपी जाती है तो राजनेतिक क्षेत्र में क्यों नहीं जबकि यह क्षेत्र राष्ट्र का सबसे जिमेदार क्षेत्र है जिसमे एक विद्वान् और गंवार को एक ही तराजू में तोला जाता इस कारन देश का पतन तो निश्चित है और वही हो रहा है कानून लाने से भ्रष्टाचार थोड़े समय के लिए जरुर मिट जायेगा परन्तु वो कानून भी भर्ष्टाचार में लिप्त होने में ज्यादा समय नहीं लेगा इसमें कोई दो राय नहीं हीनी चाहिए
        अन्ना टीम की राष्ट्र भक्ति सदेव सदिग्ध रही है चाहे वो भारत माता का चित्र हटाना हो या कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले करने जैसे बयान हो अगर वही टीम इस देश में राजनेतिक सुधार की बात करते है तो इस देश के स्वाभिमान के साथ मजाक उड़ाने जैसा है एक उदहारण के लिए अगर प्रशांत भूषण देश के रक्षा मंत्री या गृह मंत्री हो जाये तो कश्मीर तो पाकिस्तान के हाथ जायेगा ही साथ में देश के बाकि हिस्सों की क्या दशा हो सकती है इसके बारे में विचार कीजिये इसलिए कुछ लोगो का विश्वास अन्ना टीम के प्रति है अगर उनके द्वारा संभव हुआ तो वो इस देश को गर्त में ले जाकर ही छोड़ेगे
        राजनीती में आये बिना सुधार संभव नहीं है परन्तु राजनीती में राष्ट्रवादी लोगो का होना जरुरी है अन्ना टीम का नहीं

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        • आर. सिंह

          आर.सिंह

          आज के राजनीति में कोई इमानदार तो ढूँढने से भी नहीं मिलेगा.फिर राष्ट्रवादी कहाँ से मिलेगा?अगर इक्के दूक्के ईमानदार कहीं होंगे भी तो वे दलगत अनुशासन में बंधे हुए होने के कारण वही कर रहे होंगे जो उनका आला कमान चाहता होगा..अब बात आती है भारत माता की काल्पनिक तस्वीर के साथ राष्ट्र भक्ति का जोड़ा जाना तो यह मेरी समझ से परे है.यह उसी तरह है की जो मूर्ति पूजा नहीं करता ,वह इश्वर भक्त नहीं है या जो नास्तिक है वह ईमानदार या राष्ट्र भक्त हो ही नहीं सकता.इन्हीं पृष्ठों पर कुछ दिनों पहले मैंने लिखा था की अगर आस्तिक ईमानदार या राष्ट्र भक्त होते तो आज भारत में भ्रष्टाचार का इतना बोलबाला होता ही नहीं. केवल कश्मीर या पूर्वोतर सीमा प्रान्त ही नहीं,बल्कि नक्शल समस्या भी भ्रष्टाचार की ही देन है.अगर आज भी जन लोकपाल बिल पारित हो जाए और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक संस्था आ जाएतो नयी राजनैतिक पार्टी अस्तित्व में हीं नहीं आयेगी.

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  5. Bipin Kishore Sinha

    आपकी विवेचना काफी हद तक सत्य के करीब है। अन्ना और केजरीवाल में सैद्धान्तिक मतभेद है। कार्य करने की शैली भी अलग-अलग है। अन्ना व्यवस्था में परिवर्तन के पक्षधर हैं, सामाजिक क्रान्ति के द्वारा। वही केजरिवाल सत्ता परिवर्तन के द्वारा देश में परिवर्तन लाना चाहते हैं। केजरीवाल की राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा तो अब जगजाहिर है। मूल समस्या हमारी व्यवस्था है जो कही से भी हमारी नहीं। इंडियन पेनल कोड, हमारी न्यायपालिका, हमारी ब्यूरोक्रेसी, हमारी संसदीय व्यवस्था, हमारी शिक्षा-व्यवस्था, हमारे सभी कानून उपनिवेशवाद की देन है। क्या इससे इन्कार किया जा सकता है कि हमारा संविधान पूर्णतः उधारी संविधान है, जिसमें इंडिया तो है, भारत कहीं नहीं। बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे इस तथ्य को भलीभांति जानते हैं। इसलिए वे व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं। इस व्यवस्था में अगर मूल जनलोकपाल बिल भी कानून का रूप ले ले, तो भी कुछ नहीं होनेवाला। उसका भी हश्र सीबीआई जैसा ही होगा। चरित्र निर्माण और व्यवस्था परिवर्तन ही एकमात्र विकल्प है, जो केजरीवाल के एजेन्डे में नहीं है। जेपी की संपूर्ण क्रान्ति चरण सिंह की महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ गई। अगर जनता पार्टी की सरकार ५ साल चल गई होती तो लोग कांग्रेस को भूल गए होते। अन्ना का आन्दोलन भी केजरीवाल की राजनैतिक महत्वा्कांक्षा की भेंट चढ़ने जा रहा है। अनुभवहीन केजरीवाल को यह भी पता नहीं कि कौन दोस्त है और कौन द्श्मन? वे चोर का भी घेराव करते हैं और सिपाही का भी। देश की आम जनता की आशा के केन्द्र अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव ही हैं।

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