भगवान बलभद्र, सुभद्रा ओर जगन्नाथ दारूब्रम्ह का प्राकट्य-रहस्य

(आत्माराम यादव पीव)

    भगवान श्रीकृष्ण 16 हजार एक सौ रानियों तथा आठों पटरानियों के कक्ष में उनके मध्य शयन कर रहे थे। अर्द्धरात्रि का समय रहा होगा तब उनकी आठों पटरानियाॅ रूक्मिणी, सत्यभामा,जाम्बन्ती, कालिन्दी, मित्रवृन्दा,सत्या, रोहिणी और लक्ष्मणा अपने-अपने कक्ष में प्रभु के निद्रामग्न स्वरूप को निहारने का आनन्द उठा रही थी। कि आठों पटरानियों के कक्ष में प्रभु ने स्वप्नावस्था में अकस्मात रोना शुरू कर दिया और हा राधे! हा राधे! उच्चरण करने के साथ ही उनके चेहरें पर गहरा दर्द-पीडा के साथ आंसुओं की जलधार दिखी। तभी महारानी रूकमणी और सत्यभामा ने अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण को इस रूप में देखकर व्याकुल हो उठी और उन्होने उन्हे  स्वप्नावस्था से मुक्त करने हेतु निंदा तोड़ने का संकल्प लिया। भगवान को निंदा से उठाने का साहस किसी का नहीं रहा था किन्तु उनकी दशा देखकर महारानी रूक्मणी ने उनके चरणों को दबाकर जागृत किया। प्रभु निंदा से जागे पर मन में स्वप्न स्मरण आते ही लज्जा का भाव दिखाकर चतुराई से पुनः निंद्रा की मुद्रा में चले गये, सभी पटरानियों की आॅखों की नींदें गायब हो गयी और वे इस रहस्य को जानने के लिये अत्यन्त व्यग्र हो उठी, कि आखिर क्या कारण है जो प्रभु हमारे इतनी सेवा के बाद किसी अन्य को स्मरण करें। 

            प्रातः नित्यक्रिया एवं पूजन आदि से निवृत हो सभी आठों पटरानियाॅ एक कक्ष में एकत्र हुई और इन आठों के कक्ष में रात्रि को प्रभु के हा राधे, हा राधे का उच्चारण कर रोने की घटना एक दूसरे के समक्ष रखी। सत्यभामा ने कहा कि हम सोलह हजार एक सौ आठ महर्षियाॅ है और कुल, शील,रूप एवं गुणों में कोई किसी से कम नहीं है,तथापि हमारे प्राणवल्लभ किसी अन्य रमणी के लिये इतने व्याकुल है, यह तो बड़े ही विस्मय की बात है। जाम्बन्ती ने कहा कि रात्रि को वे जिस रमणी  के लिये इतने व्याकुल थे, वह रमणी न जाने कितनी रूप-गुणवती होगी। इस पर रूकमणी जी बोली  हमने सुना है वृन्दावन में राधा नाम की एक गोपकुमारी है,उसके प्रति हमारे प्राणेश्वर अत्यन्त आकर्षित है, इसलिये रूप-लावण्य नयनाभिराम हमारे प्राणनाथ हम सबसे द्वारा परिसेवित होकर भी उस सर्वचित्ताकर्षक-चित्तकर्षिणी राधा के अलौकिक गुण, ग्राम आदि को भूल नहीं सके है। कालिन्दी ने कहा कि एक गोपकुमारी के लिये हमारे प्रभु का इतना गहरा प्रेम-लगाव किस आसक्ति के कारण है, आखिरी हम सभी अपने- माधुर्य रूपगुणादि से उन्हें आसक्त क्यों न कर सकी जिससे वे उस गोप कन्या के लिये व्याकुल हुये। सभी पटरानियों के बीच राधा एक प्रश्न बन चुकी थी और वे सभी उत्तर चाहती थी, उत्तर कौन देगा, किसी ने राधा को देखा तो था नहीं, राधा के साथ वृन्दावन में प्रभु कुछ समय रहे, यह बात उन्हें पता थी किन्तु उस समय की सम्पूर्ण घटनाओं से वे परिचित नहीं थी, इसलिये सभी को जिज्ञासा थी कि वे राधा को जाने, इसलिये उन्होंने आपसी सहमति बनायी कि माता रोहणी वृन्दावन रही थी, वे अवश्य ही राधा और गोपियों के प्रभु से सम्बन्धों को ज्यादा और भॅलीभाॅति परिचित होगी, क्यों न ही माता रोहणी से इसका रहस्य जाना जाये।

            इधर प्रातःकृत्य समापन करके श्रीकृष्ण राजसभा पधारे और राजकाज निपटाकर यथासमय पुनः अन्तःपुर में अपनी पटरानियों के सम्मुख थे। रूक्मणी जी ने उन्हें राजभोग परोसा, शेष पटरानियाॅ अन्य सेवा में जुट गयी। प्रभु ने भोजन ग्रहण कर आचमन किया और किंचित विश्रामपूर्वक राजसभा को गमन किया। प्रभु के राजसभा पहुॅचते ही सभी पटरानियाॅ माता रोहिणी के कक्ष में पहुॅची और पूर्वरात्रि की पूर्ण घटना सुनाकर उनसे राधाजी के बृज-वृतान्त को जानना चाहा। माता रोहणी ने अपनी पुत्रवधुओं को जबाव दिया-पुत्रियों में ब्रजलीला की घटनाओं से परिचित हॅू किन्तु माता होकर पुत्र की गुप्त लीलाओं का रहस्य बहुओं से क्यों और किस प्रकार कहॅू,यह उचित नही? बहुओं को चाहिये कि वे अपने पति के विवाहपूर्व के किसी भी ऐसे प्रेम-प्रसंग को लेकर उत्सुक न रहे, यह प्रसंग मैं अगर तुमसे कहॅू और उसी समय कृष्ण बलराम आ जाये तो फिर लज्जा की सीमा न रहेगी। बहुयें जिद करने लगी कि माता जी जिस प्रकार से भी हो, आपको ब्रजलीला अवश्य सुनानी होगी। तब माता रोहणी जी ने कहा कि एक उपाय है जिस कक्ष में मैं तुंम सभी बहुओं को राधा-कृष्ण की ब्रजलीला सुनाउॅ, उस कक्ष की बातें तुम्हारे अलावा कोई ओर न सुने इसलिये, इसलिये पहले उस कक्ष के द्वार पर किसी पहरेदार को बैठाना होगा ताकि कोई भी कक्ष में न आ सके, यहाॅ तक कृष्ण बलराम भी कक्ष में प्रवेश न कर सके तभी मैं यह रहस्यमय लीला कहॅूगी। सभी पटरानियों ने द्वार से संतरी को हटाकर सुभद्रा को द्वार-रक्षा की जिम्मेदारी सौंपकर कह दिया कि कुछ भी हो जाये, माता का आदेश है अपने दोनों भैईया कृष्ण बलराम को भी कक्ष में आने मत देना। सुभद्रा ने जो आज्ञा कहकर द्वाररक्षा के लिये द्वार पर उपस्थित हो गयी। सभी पटरानियों ने कक्ष में माता रोहणी को चारों ओर से घेरकर ब्रजलीला का रस्सास्वादन लेना शुरू कर दिया।

            कृष्ण बलराम राजसभा में बैठे राजकाज निपटा रहे थे कि अकस्मात उनके मन में चंचलता प्रवेश कर गयी और वे उदिग्न हो उठे तथा राजपाट का काम छोड़ अन्तःपुर की ओर चल पड़े । प्रभु के मन में उत्कृंठा का भाव उन्हें स्थिर नहीं रख सका और अन्तःपुर जाने से पूर्व माॅ रोहणी के कक्ष के द्वार पर उन्हें बहिन सुभद्रा खड़ी दिखी। वे माॅ के कक्ष की ओर बढ़े और सुभद्रा से कहा तुम यहाॅ खड़ी क्या कर रही हो, द्वार से हटो, हम भीतर माॅ के पास जाना चाहते है। सुभद्रा ने कहा-रोहिणी माॅ का आदेश है इसलिये तुम्हारा कक्ष में प्रवेश निषेध है, यह सुनकर दोनों भाई आश्चर्य से भर गये कि  माॅ के कक्ष में, पुत्र के निषेध का कारण क्या हो सकता है? दोंनो भाईयों ने माॅ के कक्ष की ओर अपने कान कर सम्पूर्ण चित्त से वहाॅ चलने वाली रहस्यात्मक ब्रजलीला को सुनना शुरू कर दिया। लीला इतनी अदभुत थी कि वृन्दावन चंद श्रीकृष्ण और बलराम इस परम कल्याणमय परमपावन लीला को सुनते ही भाव-विहोर हो गये। दोनों भाईयों के मंगल श्रीअंगों में अदभुत प्रेम विकार के लक्षण दिखाई देने लगे और वे प्रेमानन्द में डूब गये। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु की मन्दाकिनी धारा प्रवाहित होने लगी, उन्हें देख सुभद्रा भी एक अनिवर्चनीय महाभाववस्था को प्राप्त हो गयी। वृन्दावनेश्वरी श्रीराधा जी के अदभुत प्रेमवैचित्यावस्था का श्रवण कर बलराम के धैर्य का बाॅध टूट गया और उनके श्रीअंग से महाभाव का प्रकाश प्रस्फुटित हुआ जिससे उनके श्रीहस्तपद संकुचित होने लगे और जब माता जी निभृत निगूढ़ विलास-वर्णन करने लगी तब श्रीकृष्णकी भी बलराम जैसी दशा हो गयी और दोनों भाईयों की यह दशा देख बहिन सुभद्रा की भी यही दशा हो गयी। तीनों ही मंगलस्वरूप महाभावस्वरूपिणी वृन्दावनेश्वरी श्री राधाजी के अपार महाभावसिन्धु में निमज्जित होकर ऐसी स्वसंवेद्यावस्था को प्राप्त हो गये कि लोगों को देखने में निश्चल स्थावर प्रतिमूर्तिस्वरूप दिखने लगे। ब्रजलीला का भावपूर्ण श्रवण से कृष्ण बलराम और सुभद्रा का निश्चल, निर्वाक,स्पन्दरहित महाभावावस्था में होना एक अतिशय घटना थी जिसमें इन तीनों के न हाथ परिलक्षित हो रहे थे और न ही पैर। भगवान कृष्ण की उॅगली में विराजमान आयुधराज सुदर्शन चक्र भी विगलित होकर लम्बिताकार हो गया।

            देवर्शि नारद प्रभु के दर्शनों हेतु श्रीधाम द्वारका उपस्थित हुये और राजसभा से उनके अन्तःपुर जाने की खबर लगते ही अबाध गति से अन्तःपुर के द्वार पर पहुॅचे और उन्हें जो अदभुत दर्शन हुये जिससे वे अवाक, अचम्भित हो गये। अपने प्रभु के ऐसे दर्शन उन्होंने कभी नहीं किये थे, इसलिये उनके इस स्वरूप के कारण को जानने की जिज्ञासा से वे वहाॅ शांतचित्त खड़े हो गये। कृष्ण, बलराम और सुभद्रा तीनों ही मूर्तिमान थे,इसलिये उनसे उनकी दशा पूछने का कारण समझ नहीं आ रहा था। नारद की शांति भंग हुई और उन्होंने माता रोहणी के स्वर सुनाई दिये जिसमे ंवे रसान्तर का प्रसंग सुना रही थी, जिसे सुनकर सबको पूर्ववत स्वास्थ्यलाभ हुआ। प्रभु के स्वस्थ्य होते ही नारदजी ने अनेक विधि से प्रभुु की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया तब श्रीकृष्ण बोले -देवर्षि आज बड़े ही आनन्द का दिन है , कहिनये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हॅू। देवर्षि ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की- प्रभो वर्तमान में यहाॅ पर उपस्थित होकर आप सबका जो एक अदृष्टाश्रुतपूणर्् महाभावावेश स्वरूप के दर्शन किये है, स्वरूपतः वह क्या पदार्थ है और किस प्रकार उस महावस्था का प्राकट्य हुआ? निवेदन है वह विस्तारित कीजिये। प्रभु श्रीकृष्ण ने कहा हे देवर्षि- प्रातः तथा मध्यान जिस समय हम दोनों भाई राजसभा में थे, उसी समय रूक्मणी,सत्यभामा,जाम्बन्ती आदि पटरानियों ने माता रोहणी के समक्ष अपनी जिज्ञासा रखी तब माता ने महाचित्ताकर्षिणी, अपार माधुर्यमयी,ब्रजलीला के अवतारणा की कथा सुनाई । महामाधुर्य शिखरणी ब्रजलीला में राधाजी के प्रेमाभाव का ऐसा प्रभाव है कि हम जहाॅ और जिस अवस्था में हो,हमें वहीं से और उसी अवस्था में आकर्षण करके वह कथास्थल पर खींच लाता है। हम दोनों भाई उसी तरह आकर्षित होकर यहाॅ आये और देखा कि सुभद्रा द्वारपालिका के रूप में है। हम दोनों को सुभद्रा द्वारा माॅ के कक्ष में जाने से रोकने का हम कारण ढूंढते रहे, उसी समय माता जी के मुख से अदभुत ब्रजलीला कानों तक पहुॅच हमारे हृदय को विगलित कर दिया। उसके बाद की अवस्था तो तुमने देखी है। मेरी प्राणेश्वरी महाभावरूपिणी श्री राधा के महाभावकर्तक सम्पूर्ण भाव से ग्रस्त होने के कारण हम,आपका पधारना भी नहीं जान सके। यह कहकर प्रभु ने नारद जी से वरग्रहण करने का आग्रह किया।

            देवर्षि नारद ने कहा कि प्रभु मैं किसी वरका प्रार्थी नही हॅू, निजजनों के सर्वाभीष्टप्रदाता चरणयुगल में यही प्रार्थना है कि आप चारों की जिस अदभुत महाभावावेश मूर्ति का मैंने प्रत्यक्ष दर्शन किये है वे ही भुवनमंगल चारों स्वरूप जनसाधरण के दर्शनार्थ पृथ्वीतल पर विराजमान रहे। प्रभु श्रीकृष्ण ने नारद से कहा कि देवर्षि मैं पूर्व से ही अपने दो ओर भक्तों के प्रति भी वचनवद्ध हॅू जिसमें एक भक्त चूडामणि महाराज इन्द्रद्युम्न है और दूसरे परमभक्तिस्वरूपणी श्रीविमला देवी जिनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर मैं उन्हें नीलाचल क्षेत्र में दारूब्रम्हस्वरूप में अवतीर्ण होकर दर्शन देने का वचन दे चुका हॅू तथा श्री विमला देवी द्वारा की गयी महातपस्या से प्रसन्न होकर उनकी प्राणिमात्र को बिना विचार किये महाप्रसाद वितरण करने की आज्ञा को उक्त स्वरूप से ही पूर्ण करने की स्वीकृति दे चुका हॅूॅ अतः तीनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिये हम चारों इसी स्वरूप में समुद्रतटवर्ती नीलाचल क्षेत्र में अवतीर्ण होंगे। नारद जी मनोेवांछित वर पा प्रणाम करके चले गये। श्री प्रभु के अमृतमय नाम-गुणों की माधुरी का गान करते लोगों के बीच वे दारू ब्रम्ह स्वरूप चतुष्टय मूर्ति श्रीजगन्नाथ जी श्रीकृष्ण, श्री बलभद्र जी बलराम, श्री सुभद्रा जी एवं सुदर्शनरूप में नीलाचल क्षैत्र को विभूषित करके आज भी समुद्रतट पर जगन्नाथ पुरी में भगवान का यह श्रीविग्रह विराजमान है। भगवान जगन्निवास ने अपने भक्तों को दिये वरदान को पूरा किया वहीं श्रीविमला देवी के महाप्रसाद वितरण के मनोरथ ’’भगवान जगन्नाथ का भात, जगत पसारे हाथ’’ को पूर्ण कर इस जगत के लोगों को परम आनन्द एवं सुख से अनुभूत प्राप्त हो रही है।

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