लेखक परिचय

शिवानंद द्विवेदी

शिवानंद द्विवेदी "सहर"

मूलत: सजाव, जिला - देवरिया (उत्तर प्रदेश) के रहनेवाले। गोरखपुर विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र विषय में परास्नातक की शिक्षा प्राप्‍त की। वर्तमान में देश के तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादकीय पृष्ठों के लिए समसामयिक एवं वैचारिक लेखन। राष्ट्रवादी रुझान की स्वतंत्र पत्रकारिता में सक्रिय एवं विभिन्न विषयों पर नया मीडिया पर नियमित लेखन। इनसे saharkavi111@gmail.com एवं 09716248802 पर संपर्क किया जा सकता है।

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 शिवा नन्द द्विवेदी “सहर” 

“ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद (दिलीप मंडल परिभाषित) ही समाज का सबसे बड़ा शत्रु है ” ये मानना है मेरे फेसबुकिया मित्र दिलीप मंडल का ! पिछले कुछ दिनों से फेसबुक पर पर दिलीप मंडल जिस तरह से “जातिगत आरक्षण” के समर्थन में ढोल पीट रहे हैं लग रहा है उनसे बड़ा जातिवादी कोई दुसरा नहीं हो जबकि वो खुद को समानता स्थापित करने का नेता साबित करने पर तुले हैं ! इस क्रम में शब्दों के महागुरु दिलीप मंडल ने एक शब्द खोज निकाला है ” ब्राहमंवाद ” ! ब्राहमण को छोड़ कर लगभग जितनी भी जातिया ( आरक्षण लाभान्वित) इस भारतीय समाज में रहती हैं उनके खिलाप प्रयुक्त होने वाले एक एक शब्द को सहेज कर दिलीप मंडल ब्राहमंवाद को परिभाषित करने में तुले हैं ! हालांकि इस बात को समझना या समझाना अभी मुश्किल है कि उनके इस सुधार आन्दोलन के भावी परिणाम कितने नाकारात्मक प्रभाव डालेंगे !आज के हज़ारो साल पहले की किसी किताब मनुस्मृति का हवाला वो आज भी यत्र सर्वत्र देते रहते हैं ! हालांकि वर्त्तमान में दिलीप मंडल में जिस जातिगत महाग्रंथ को लिख रहे हैं उसे हम जाति व्यवस्था पर आधारित अदृश्य महाग्रंथ कह सकते हैं ! मनुस्मृत का कोई संवैधानिक महत्त्व है की नहीं ये तो सर्व विदित है लेकिन जो नए निर्माण कि वकालत आज दिलीप मंडल सरीखे लोगों द्वारा की जा रही है वो तो संवैधानिक स्वीकृति पर आधारित भी है ! सवाल यहाँ यह है कि क्या वर्ण व्यवस्था को ख़तम करने के लिए नई जाति व्यवस्था को स्थापित करना ” सामाजिक समानता ” कि तरफ एक कदम कहा जा सकता है ? जबकि उन्ही लोगों द्वारा वर्ण व्यवस्था का विरोध भी हो रहा है ! यहाँ आरक्षण वादियों का यह ढोंग साफ़ तौर पर नज़र आता है !

आरक्षण शब्द के उपर दिलीप मंडल जी कि सोच इतनी निम्न एवं जातिगत है कि मेरे एक मित्र ने यहाँ तक कहा कि ” अगर कहीं भूकंप आ जाय तो दिलीप मंडल सबसे पहले लाश को उलटा कर उसकी जाति ही देखेंगे ” और दिलीप मंडल का बर्ताव इससे जुदा नहीं है ! मेरे मत में जितने जातिवादी दिलीप मंडल हैं उतना तो कोई मनुवादी भी नहीं रहे होंगे ! इन सबसे हट कर ज़रा आरक्षण पर बात करे तो यह विचार सिर्फ इस हित में लाया गया कि ” दौड़ प्रतियोगिता में दो सही सलामत पैरों वालों के साथ एक विकलांग को भी हिस्सा लेने और जितने का अवसर मिल सके ! लेकिन उनको क्या पता था कि भावी दिनों में दिलीप मंडल जैसे विचार धारा वाले लोग विकलांगो को अवसर देने की वजाय सबको विकलांग बनाकर ही दौडाने के लिए ही लड़ते फिरेंगे ! परिणामत: आज ब्राहमण को छोड़कर लगभग हर छोटा बड़ा समुदाय आरक्षण कि मांग कर रहा है , और देश के स्वार्थी तत्व ( राजनेता) आरक्षण के तवे पर अपनी रोटी खूब सेंक रहे हैं !

अगर आज़ादी के बाद पिछड़े तबके को विकास का विशेष अवसर देने के लिए एस.सी/एस.टी वर्ग का निर्धारण किया गया तो निश्चित तौर पर यह देख कर ही किया गया होगा कि आरक्षण कि जरुरत वास्तविक रूप से किसे है और पिछड़ा कौन है ? लेकिन जिनके लिए यह आरक्षण प्रावधान लाया गया उनको क्या मिला इस पर सोचने वाला कोई दिलीप मंडल भले ना आया हो लेकिन इस आरक्षण के कामधेनु के दायरे को और कितना बढाया जाय इस मुद्दे पर हज़ारों दिलीप मंडल खड़े मिलेंगे ! एस.सी / एस.टी के बाद ओ.बी.सी का आना इसी राजनीतिक और जातिवादी सोच रूपी ढोंग का परिणाम है ! क्या ओ.बी.सी के अंतर्गत आने वाले लोग आज़ादी की बाद अचानक पिछड़ गए ? अगर नहीं तो फिर ये ओ.बी.सी क्यों ? और अगर ये पहले पिछड़े थे तो इन्हें उसी समय एस.सी के दायरे में क्यों नहीं रखा गया ? आज यादव , बनिया , और भी तमाम जातियां जो कितनी पिछड़ी थीं और आज कितनी पिछड़ी हैं किसी से छुपा नहीं है ? लेकिन ओ.बी.सी नाम के इस राजनीतिक ढोंग ने इनको भी पिछड़ा मान लिया ! दिलीप मंडल जी अगर आप आरक्षण के माध्यम से जाति व्यस्था का अंत करना चाहते हैं तो जाइए थोड़ा पता लगाइए कि आपके गाँव में कितने ओ.बी.से ऐसे हैं जो सीना चौड़ा कर ये कहने को तैयार हैं कि मै एस.टी हूँ , पता लगाइए फिर जातिवाद ख़तम करने कि दुहाई दीजिये ! आज ओ.बी.सी क्या शर्म महसूस करता है एस.सी/ एस.टी कहलाने में , अगर नहीं तो उसे भी एस.सी एस.टी के दायरे में लाने कि लड़ाई लड़िये , शायद जातिवाद समस्या का कुछ निवारण मिल सके ! अगर ये हो गया तो पुरे समाज में सिर्फ एक ब्राहमण ही जातिवादी बचेगा उसे भी देख लिया जायेगा लेकिन पहले इन आरक्षण लाभावन्वित जातिवादीयों से तो दो हाथ कर लीजिये ! अगर ये जातिवादी नहीं हैं तो इतनी कटेगरी ( एस.से, एस.टी, ओ.बी.सी ) को स्वीकार क्यों किये हैं ? वी.पी .सिंह सरकार के समय जब सरकारी नौकरियों में ओ.बी.सी आरक्षण कि जब बात आई तब ओ.बी.सी में तमाम ऐसी जातियों को राजनीतिक हित ध्यान में रखते हुए रखा गया जो पहले से ही मजबूत स्थिति में थी ? ये कैसी समानता है दिलीप मंडल ?

सबसे बड़ा सवाल है की आखिर आरक्षण में इतनी कटेगरी क्यों बन रही है ? आज का हर गैर ब्राहमण ( जाट, गुर्जर,मीना) जो सर्व शक्ति सम्पन्न है, आरक्षण की मांग कर रहा है या आरक्षण से लाभान्वित भी हो रहा है ! क्या आरक्षण के दायरे में हो रही वृद्धि( ओ.बी.सी ) का दुष्परिणाम नहीं है ? क्या यहाँ विकास से ज्यादा राजनीति की बू नहीं आ रही है ?

दिलीप मंडल जी, रही बात सोच कि तो आप लोग पाषाण युग से बाहर आयें , ब्राहमण ने हमेशा समय और समाज के जरुरत के हिसाब से अपने सोच में विकासोन्मुख बदलाव किये हैं ! आज का कोई एक ब्राहमण दिखा दें जो नौकरी नहीं करने को तैयार है या नौकरी के समय यह बात पूछता हो की जिस संस्था के साथ वो काम कर रहा है , उसका मालिक किस जाति का है या उसे किसके अंतर्गत काम करना पड़ रहा है ? हमने सोच को बदला है अब आप बदल लें तो थोड़ा बेहतर हो समाज में ! आज का ब्राहमण पाषाण युग में नहीं है बल्कि यथार्थ में सामाजिक तौर तरीको से जी रहा है ! क्या आप बता सकते हैं कि आपकी इस ढोंगी समानता का राज क्या है ? जिस मानक के आधार पर आप विकास के सपने देख रहे है उस आधार पर ना तो कोई समानता आ सकती है ना ही कोई विकास की संभावना ! दिल्ली विश्वविद्द्यालय में एड्मिसन ले लेने से कोई सामाजिक समानतअ नहीं आ सकती है ! डी.यु और जे.एन.यु इस समाज में हैं जबकि आप डी.यु और जे.एन.यु में ही समाज खोजने में लगे हैं ! इसी बहस के क्रम में फेसबुक मेरे एक मित्र ने कहा ” द्विवेदी जी जिस दिन आप अपनी बेटी की शादी किसी आदिवासी से करने को तैयार हो उसी दिन समानता आ जाएगी ”

मै यहाँ सिर्फ एक बात कहूंगा कि इन पैसठ सालों के आरक्षण वादी युग में क्या आपने इतनी समानता देखि है कि कोई चमार(जातिगत नहीं) अपनी बेटी की शादे किसी धोबी के घर कर दे ! नहीं सर , अभी औरों को छोडिये ये आरक्षण का महामंत्र अभी उन्ही लोगों के बीच समानता नहीं ला सका है जो पैसठ सालों से इसका रसास्वादन कर रहें है ! इसका कारन एक मात्र यह है कि ” आरक्षण कभी समानता का मन्त्र हो ही नहीं सकता सिवाय राजनीतिक मुद्दे के ” !मेरे मित्रवत अग्रज दिलीप जी कभी कभी अजीब पूर्वाग्रह से ग्रसित मुद्दे लेकर आते हैं , जैसे उनका उद्देश्य जातिगत असामनता का विरोध करना नहीं बल्कि ब्राहमणों का विरोध करना हो ! कभी किसी फिल्म में विलेन कि जाति को लेकर तो कभी फिल्म को ही जाति से जोड़ना काफी हास्यपद लगता है और ऐसे मुद्दे पर बहस करना दीवार पर सर मारना है ! दिलीप मंडल के बदन से सामाजिक कार्यकर्ता की महक नहीं एक जातिवादी राजनेता कि गंध आती है ! उनको अपना पक्ष खुलेआम कर देना चाहिए कि क्या वो सामाजिक मुद्दों के चिन्तक हैं या जातिवादे नेता ? क्योंकि दोनों नहीं हो सकते ! फिलहाल तो अन्यों को जातिवादी बताने वाले मेरे मित्र सबसे बड़े जातिवादी खुद हैं जिनकी सुबह दोपहर शाम जातिवादी घड़ी देकर ही होती है ! मेरे मत में इस तरह से जातिवाद फैलाना साम्प्रदायिकता  फैलाने जैसा है !

6 Responses to “सबसे बड़े जातिवादी हैं दिलीप मंडल”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    यह दिलीप मंडल कौन हैं मैं नहीं जानता ,पर अपने कुछ अनुभव बताना चाहता हूँ.ये अनुभव उस समय के हैं जब मैं शायद ग्यारह या बारह बर्ष का रहा होउंगा .उस समय मेरे इलाके में गन्ने की खेती होती थी.(अब नहीं होती)मैं कभी कभी गोडनी करने वाले मजदूरों के लिए खाने के लिए रोटी ले जाता था.चूंकि खेत में काम करने वाले अनुसूचित जातियों में दो भिन्न जाति के थे इसलिए मुझे पानी केलिए दो वर्तन ले जाने को कहा जाता था और यह हिदायत थी की वहां कुएं से पानी लेकर उनको अलग अलग दे देना.यह बात मेरी समझ में नहीं आती थी की जब ये लोग तथाकथित उच्च जाति वालों के खिलाफ छुआ छूत के लिए आवाज उठाते थे तो आपस में फिर इतना छुआ छूत क्यों ?क्यों वे एक दूसरे का छुआ हुआ पानी भी नहीं पी सकते?नतीजा यह होता था की मैं पानी के लिए एक बर्तन ले जाता था और वहां उन्ही से कुंएं से पानी भी निकलवाता था ,पर उनको बड़ी मुश्किल से एक दूसरे का छुआ हुआ पानी पीने को राजी कर पाता था. मेरे स्कूल छात्रावास में जो घटना घटी थी उनका विवरण तो मैं अपनी संस्मरणात्मक कहानी में दे ही चुका हूँ.मैं बिना किसी दुराग्रह और पूर्वाग्रह के यह बताना चाहता हूँ की हमारी जाति प्रथा के दोषी केवल अगड़े ही नहीं हैं.इसमे हिदू समाज का हर किसी का हिस्सा है और यह हमारे समाज में किसी अंग्रेज या मुसलमान की देन नहीं है.चूंकि ब्राहमण हमारे हिन्दू समाज के ऐसे अंग हैं जो हमारे लोक परलोक दोनों के नेतृत्व का दावा करते हैं अतः इस को बढ़ावा देने में भी उनकी भूमिका अग्रणी हो जाती है. अंतर्जातीय विवाह के बारे में भी सबका रवैया एक है.कोई ब्राह्मण अगर अपनी बेटी की शादी किसी क्षत्रिय या अन्य जाति के लड़कों से नहीं करना चाहता तो कोई क्षत्रिय या अन्य जाति वाला भी अपनी बेटी या बेटे की शादी ब्राह्मण के बेटे या बेटी से नहीं करना चाहेगा.हमारी यही परम्परा रही है.अतः इसके लिए भी किसी एक अंग को दोषी करार करना जायज नहीं है.

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  2. Awadhesh

    श्री दिलीप मंडल की सच्चाई तो आपने लिखी, लेकिन लेख की दिशा बदल दी. मैं इन जैसे नकारात्मक विचार वाले पत्रकार को अपने फेसबुक मित्रो में से हटा चुका हूँ, आप भी हटाइए और जुट जाइए उन्हें अपने साथ जोड़ने में जहाँ मंडल जी जैसे लोग कभी नहीं पहुच सकते. देश को बाँटने का इनका सपना कभी पूरा नहीं होगा. भारत माता की जय.

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  3. jagadish

    “ज्यादातर न्यूज चैनल का यही हाल है। एक या दो सवर्ण एंकर, कई सवर्ण गेस्ट और एक अवर्ण गेस्ट के साथ मिलकर एक ऐसी फिल्म पर चर्चा करते हैं जिसे एक सवर्ण फिल्मकार ने लीड रोल में सिर्फ सवर्ण कलाकारों को लेकर बनाया है।”

    “News चैनलों पर आरक्षण फिल्म को लेकर होने वाली लगभग हर बहस में फिल्म के खिलाफ बोलने वाले 1 आदमी के मुकाबले फिल्म के पक्ष में बोलने वाले 3-4 आदमी बिठा दिए जाते हैं। एंकर भी आरक्षण फिल्म का समर्थन करता है। यानी बहुजन समुदाय (90% आबादी) के 1 आदमी के मुकाबले जातिवादी संप्रदाय के 4 से 5 लोग। कर लीजिए बहस!! वॉक्स पॉप यानी आम आदमी की बाइट लेने में भी यही भेदभाव साफ देखा जा सकता है।”

    “वे दिन गए प्रकाश झा साहब, जब OBC-SC-ST का ब्राह्णवादी लोग बेखौफ मजाक उड़ाया करते थे। जिस समय आप अपना जातिवादी घिनौना Twitt मैसेज डिलीट कर रहे होंगे, तो भारतीय लोकतंत्र और संविधान को बुरी तरह कोस रहे होंगे। खैर, यह नया भारत है। आपकी फिल्म का वो विरोध होगा कि आपके पुरखों के होश ठिकाने आ जाएंगे। ”
    ये सिर्फ कुछ विचार हैं दिलीप जी के जो उन्होंने फेसबुक पर दिए हैं ! आपको क्या लगता है ये विचार आरक्षण के समर्थन में हैं या जातिगत भावना से ग्रस्त किसी के विरोध में हैं ! ये सिर्फ शीर्षक है कहानी भी पढ़ लीजिये फेसबुक पर !

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  4. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    मुख्य मुद्दा आरक्षण नहीं. मुख्या मुद्दा है कि
    आरक्षण के मुद्दे को हथियार की तरह इस्तेमाल करके आग लगाने वाला षड्यंत्रकारी दिमाग किसका है और उसका निशाना कहाँ हैं, वे लोग वास्तव में करना क्या चाहते है…….. आखिर सारे समाचार माध्यम अचानक ही आरक्षण के मुद्दे पर इतने अधिक मुखर क्यूँ होगये ? सारे देश में यह मुद्दा अनायास इतना गरमा गया है या कोई सोची-समझी चाल है ? इसी विषय पर फिल्मों की चर्चा क्या मात्र संयोग है ? मित्रो मुझे तो नहीं लग रहा की यह अनायास है. बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, देश की लूट के सारे कीर्तिमान तोड़ती केंद्र सरकार और उसके नेतृत्व ( नेत्री ) से ध्यान हटाने की यह चिर परिचित देश तोड़क मुद्दों को हवा देने की सुनियोजित चाल नहीं है क्या ? ……………. इन दुष्टों का खतरनाक मकसद है की देश को आरक्षण के नाम पर बाँट कर दो उद्देश्य पुरे किये जाएँ. (१) भारत को और अधिक टुकड़ों में बांटने और अधिक दुर्बल बनाने का कार्य करना. (2) सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों के घोर काले कारनामों पर परदे डालना अब असंभव होता जा रहा है. उस तरफ से जनता का ध्यान हटाने के लिए देश में आरक्षण की आग लगाना. ……. ऐसे में आरक्षण का विरोध करें तो देश व समाज के टूटने का खतरा. विरोध न करें तो ….? कोई फर्क पडेगा क्या? मुझे नहीं लगता की लेश मात्र भी अधिक हानि होगी. सरकार ने जितना आरक्षण देना है, उतना तो देगी ही. विरोध होने पर अधिक से अधिक देने का और जिद से प्रयास करेगी. असंतोष को अधिक से अधिक बढ़ाना इनका उद्देश्य है. पर यदि आरक्षण का विरोध नहीं किया तो एक निश्चित सीमा से अधिक तो किसी भी हालत में दे नहीं पाएगी, अस्सीमित आरक्षण संभव नहीं. फिर न्यायालय भी तो हैं. जो भी ऊर्जा लगानी हो वहाँ लगा सकते है. देश में आग लगाने वालों की चालों के शिकार होने से तो बचें. शांत रह जाने से दंगे, विद्वेष बटवारा रुकेगा. अपनी करतूतों से ध्यान हटाने की सरकार की चाल असफल हो जायेगी. … मित्रो मत भूलो कि देश की सारी समस्याओं की असली जड़ यह विदेश भक्त सरकार और इसके विदेशियों के हाथों बीके नेता है. इस केंद्र सरकार और इसके नेताओं से देश के अन्य सभी नेता और दल कम भ्रष्ट हैं, निश्चित रूप से देश के लिए कम खतरनाक हैं. …. हो सकता है कि मेरे निष्कर्ष से अनेक लोग सहमत न भी हों तो भी इस पर विचार तो ज़रूर करें कि आरक्षण का विरोध करने पर हम देश के उन दुश्मनों की चाल के शिकार ही बनेंगे जो हमारा विनाश चाहते हैं. वे न तो आरक्षण पाने वालों के मित्र हैं और न ही आरक्षण का विरोध करने वालों के. उन्हें तो किसी भी तरह देश में आग लगानी है. सरकार पूरी तरह उनके कहने में ही नहीं, उन्ही के द्वारा संचालित है. तो जो भी करें, जो भी कहें ज़रा शांत मन से ओर दूर दृष्टी से सोच-समझ कर. वही जो सबके हित में हो, सब सज्जनों के लिए कल्याण कारी हो. ” साधुनां परित्राणाय ….”

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  5. -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    प्रिय श्री शिवानन्द जी|
    वैसे तो पहली नजर में आपका यह लेख आपके फेसबुकिया मित्र श्री दिलीप मण्डल को सम्बोधित है या श्री दिलीप मण्डल की आलोचना करने में और (क्षमा करें) आप द्वारा ब्राह्मणों की उच्चता को प्रमाणित करने हेतु लिखा गया प्रतीत होता है| जिसके बारे में सीधा संवाद तो आपके और श्री मण्डलजी के बीच में ही होना चाहिये, तब ही पाठकों को ज्ञात हो सकेगा कि आपने जो जो भी बातें श्री मण्डलजी के बारे में लिखी हैं, वे कितनी सही और विश्‍वसनीय हैं| क्योंकि आज हमारे समाज में सबसे बड़ा सवाल विश्‍वसनीयता का ही है| जिस पर खरा उतरना हम सबके लिये एक चुनौती है और इसी कारण से मैं यहॉं बीच में आ टपका हूँ| मेरी नजर में आपके लेख में कुछ बातें ऐसी हैं, जिन पर श्री मण्डलजी के अलावा भी आपने लोगों को बिना किसी तथ्य या कानूनी या संवैधानिक आधार के कटघरे में खड़ा किया है|

    श्री शिवानन्द जी आगे कुछ लिखने पूर्व आपको बतलाना जरूरी समझता हूँ कि हमारे देश में प्रचलित कानूनी एवं न्यायिक व्यवस्था में यदि कोई व्यक्ति किसी पर भी किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष या परोक्ष आरोप लगाता है तो उससे उस व्यक्ति या समुदाय का अपमान होता है| अत: कानून आरोप लगाने वाले से ये अपेक्षा करता है कि आरोप लगाने वाला स्वयं अपने आरोपों को सिद्ध भी करे| जिस पर आरोप लगाये गये हैं, उस व्यक्ति पर अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने की कानूनी जिम्मेदारी कतई भी नहीं है| हॉं आरोपी उस पर लगाये गये आरोपों को असत्य या मनगढंथ या बनावटी या किसी दूरगामी षड़यन्त्र का हिस्सा सिद्ध करने के लिये अवश्य स्वतन्त्र है, जिसके लिये उसे भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं| इस पृष्ठभूमि में, मैं विनम्रतापूर्वक आपके लेख के कथनों (निम्न) पर कुछ कहना चाहता हूँ|

    नोट : आपसे और सभी विसम्मत बन्धुओं से यह आग्रह है कि कृपया किसी भी बात को निजी तौर पर नहीं समझें| यहॉं हम सब चर्चा में हिस्सा ले रहे हैं और चर्चा के दौरान कई बार अप्रिय लगने वाले सटीक किन्तु कड़वे लगने वाले शब्दों का प्रयोग करना ही पड़ता है| जैसे श्री शिवानन्द जी ने ‘‘चमार’’ और ‘‘धोबी’’ जाति सूचक शब्दों का उपयोग किया है, जिसके पीछे निश्‍चय ही उनका मकसद चमार एवं धोबी जातियों के लोगों का अपमान या तिरस्कार करना नहीं है| इसी प्रकार से चोर को चोर, दुष्ट को दुष्ट, क्रुर को क्रूर और आततायी को अततायी लिखना भी लेखकीय बाध्यता होती है| यहॉं की चर्चा को चर्चा तक सीमित रहने दिया जाये तो ही हम देश, धर्म, समाज और साहित्य का भला कर सकते हैं| अन्यथा…!

    श्री शिवानन्द जी आप लिखते हैं कि-

    ‘‘….सवाल यहॉं यह है कि क्या वर्ण व्यवस्था को ख़तम करने के लिए नई जाति व्यवस्था को स्थापित करना सामाजिक समानता कि तरफ एक कदम कहा जा सकता है ? जबकि उन्ही लोगों द्वारा वर्ण व्यवस्था का विरोध भी हो रहा है ! यहॉं आरक्षण वादियों का यह ढोंग साफ़ तौर पर नज़र आता है !’’

    टिप्पणी-आपको सिद्ध करना चाहिये कि आरक्षणवादी किस प्रकार से जातिवाद को बढा रहे हैं? आरक्षित वर्ग की सूचियों में जिन भी जातियों का उल्लेख है, उनका नामकरण कम से कम उन्हीं जातियों की पहल पर तो नहीं ही किया गया होगा| प्रवक्ता पर ही एक बन्धु जो संघ से प्रेरित हैं, लिखते हैं कि भारत में जाति व्यवस्था थी इसी कारण से तुलनात्मक रूप से कम लोगों का धर्मपरिवर्तन हुआ| आरक्षणवादी जातिवाद को कैसे बढा रहे हैं| इस बारे में आपको विस्तार से स्पष्ट करना चाहिये| तब ही आपके कथन को विचारयोग्य पाया जा सकता है| देश में वर्ण-व्यवस्था और जाति दोनों ही आज की नहीं, हजारों वर्षों पुरानी हैं| बल्कि सच्चाई तो यह भी है कि देश के संविधान द्वारा ऐतिहासिक कारणों से प्रदान किये जा रहे आरक्षण का विरोध करने वाले लोग ही आरक्षित वर्गों में शामिल जातियों के प्रति घृणा और दुश्मनी का भाव पैदा कर रहे हैं| जिसके प्रतिकार में आरक्षित वर्गों के कानून और संविधान सम्मत तर्कों को जातिवाद को बढावा देना कहना ‘‘घोर अन्याय’’ है|

    श्री शिवानन्द जी आप आगे लिखते हैं कि-

    ‘‘… इन सबसे हट कर ज़रा आरक्षण पर बात करे तो यह विचार सिर्फ इस हित में लाया गया कि दौड़ प्रतियोगिता में दो सही सलामत पैरों वालों के साथ एक विकलांग को भी हिस्सा लेने और जितने का अवसर मिल सके !…..’’

    टिप्पणी : कृपा करके बताने का कष्ट करेंगे कि आपका सिद्धान्त संविधान के किस अनुच्छेद में लिखा हुआ है? या संविधान सभा की चर्चा के दौरान किस महान व्यक्ति ने आरक्षण के समर्थन में उक्त विचार रखा था? या किसी भी निर्णय में इस प्रकार की व्याख्या हो तो उसे भी बताने का कष्ट करें?

    श्री शिवानन्द जी आप आगे लिखते हैं कि-

    ‘‘…..आज ब्राहमण को छोड़कर लगभग हर छोटा बड़ा समुदाय आरक्षण कि मांग कर रहा है , ….’’

    टिप्पणी : आपका उक्त कथन आपके अनुभव हीन होने और हवा के साथ बहने की मानसिकता का जीता जागता प्रमाण है! मेरा मानना है कि किसी भी विषय पर लिखने से पूर्व उस बारे में कम से कम सतही ज्ञान तो होना ही चाहिये| आपको ब्राह्मणों के बारे में ही पूर्ण ज्ञान नहीं है और आप दूसरों के बारे में विश्‍लेषण करके दूसरों को न मात्र कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, बल्कि बे-सिर-पैर की बातों के आधार पर देश के माहौल को भी खराब कर रहे हैं| कृपया अपनी जानकारी को सही (अपडेट) कर लें कि-
    राजस्थान में लम्बे समय से ब्राह्मणों द्वारा आरक्षण की मांग की जा रही है| देशभर के ब्राह्मण जानते हैं कि राजस्थान में ब्राह्मण आरक्षण आन्दोलन को दबाने के लिये राज्य की पूर्व मुख्यमन्त्री मैडम वसुन्धरा राजे के कार्यकाल में सैकड़ों ब्राह्मणों को पुलिस ने लहुलुहान कर दिया गया था| बाद में वर्तमान मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत ने ब्राह्मणों के दबाव में आकर इस मांग को स्वीकार कर लिया और ब्राह्मणों सहित अनेक सवर्ण जातियों को १४ प्रतिशत आरक्षण की अधिसूचना भी जारी कर दी, जिसे राजस्थान उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक कर दिया|

    श्री शिवानन्द जी आप आगे लिखते हैं कि-

    ‘‘…..क्या ओ.बी.सी के अंतर्गत आने वाले लोग आज़ादी की बाद अचानक पिछड़ गए ? अगर नहीं तो फिर ये ओ.बी.सी क्यों ? और अगर ये पहले पिछड़े थे तो इन्हें उसी समय एस.सी के दायरे में क्यों नहीं रखा गया ?….’’

    टिप्पणी : क्षमा करें, मुझे विवश होकर फिर से लिखना पड़ रहा है कि आपको आरक्षण की ऐतिहासिकता और इसे लागू करने के कारणों के बारे में बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है| जिस बात को सुप्रीम कोर्ट के प्रथम मुख्य न्यायाधीश से लेकर वर्तमान मुख्य न्यायाधीश तक हजारों बार आरक्षण सम्बन्धी मामलों के निर्णयों में दौहराया गया है, आपको उस वर्गीकरण के सिद्धान्त का तनिक भी ज्ञान नहीं है और आप आरक्षण पर लेख लिखकर स्वयं को समानता का पैरोकार सिद्ध कर रहे हैं और लोगों को आरक्षण के बारे में अपना ज्ञाप बांट रहे हैं!

    किसी भी एक जाति को दूसरे वर्ग में उसी प्रकार से शामिल नहीं किया जा सकता, जिस प्रकार से एक ब्राह्मण को बनिया या क्षत्रिय वर्ण में शामिल नहीं किया जा सकता| वर्ण व्यवस्था तो धर्म के ठेकेदारों की दैन है, लेकिन आरक्षण के लिये जारी वर्ग व्ययवस्था (जिसमें अनेक वर्ग हैं, शायद आपको केवल तीन का ही मालूम है) में एससी, एसटी, बीसी, ओबीसी, ईबीसी, एसबीसी आदि वर्ग संविधान द्वारा निर्मित किये गये हैं और भारत की स्वतन्त्र न्यायपालिका ने बार-बार इस वर्गीकरण को केवल सही ही नहीं, बल्कि न्याय संगत और देश में समानता की स्थापना के लिये बेहद जरूरी ठहराया है|

    आपने अस्पष्ट तरीके से यह भी लिखा है कि ओबीसी के लोग शुरू से तो पिछड़े नहीं थे और वीपी सिंह द्वारा मण्डल कमीशन लागू करते ही अचानक कैसे पिछड़ गये? यदि आपका कहना यही है तो यहॉं पर भी आपके ज्ञान पर तरस आता है| आप संविधान के अनुच्छेद १६ (४) के प्रावधानों को पढें जो संविधान लागू होने के समय से ही संविधान में विद्यमान हैं और इसमें पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण प्रदान करने का स्पष्ट उल्लेख है| ये तो देश के सत्ताधारियों का कभी क्षमा न किया जा सकने वाला अपराध है कि उन्होंने इस हक को मण्डल आयोग लागू किये जाने तक दबाये रखा|

    श्री शिवानन्द जी आप आगे लिखते हैं कि-

    ‘‘……दिलीप मंडल जी अगर आप आरक्षण के माध्यम से जाति व्यस्था का अंत करना चाहते हैं तो जाइए थोड़ा पता लगाइए कि आपके गॉंव में कितने ओ.बी.से ऐसे हैं जो सीना चौड़ा कर ये कहने को तैयार हैं कि मै एस.टी हूँ , पता लगाइए फिर जातिवाद ख़तम करने कि दुहाई दीजिये ! आज ओ.बी.सी क्या शर्म महसूस करता है एस.सी/ एस.टी कहलाने में , अगर नहीं तो उसे भी एस.सी एस.टी के दायरे में लाने कि लड़ाई लड़िये , शायद जातिवाद समस्या का कुछ निवारण मिल सके !….’’

    टिप्पणी : मुझे कहने को विवश होना पड़ रहा कि आपका उक्त तर्क पूरी तरह से कुतर्क है| आप आरक्षण, समानता और जातिवाद में देश की हजारों साल पुरानी जातियों की बेड़ियों को या तो समझते नहीं या समझना नहीं चाहते या जानबूझकर झुठला रहे हैं| आपने जो बातें एससी, एसटी और ओबीसी के लिये लिखी है, वही बात कथित उच्च सवर्ण जातियों के लिये भी उतनी ही लागू होती है! आप ये बताने का कष्ट करेंगे कि आपने ये बात कहॉं पढली कि आरक्षण प्राप्त जातियों को समानता स्थापित करने के लिये आपस में अपना वर्ग बदलना होगा? या आपसी पारिवारिक रिश्त कायम करने होंगे? कुतर्क बुद्धिजीवियों को शौभा नहीं देते!

    श्री शिवानन्द जी आप आगे लिखते हैं कि-

    ‘‘दिलीप मंडल जी, रही बात सोच कि तो आप लोग पाषाण युग से बाहर आयें , ब्राहमण ने हमेशा समय और समाज के जरुरत के हिसाब से अपने सोच में विकासोन्मुख बदलाव किये हैं ! आज का कोई एक ब्राहमण दिखा दें जो नौकरी नहीं करने को तैयार है या नौकरी के समय यह बात पूछता हो की जिस संस्था के साथ वो काम कर रहा है , उसका मालिक किस जाति का है या उसे किसके अंतर्गत काम करना पड़ रहा है ? हमने सोच को बदला है अब आप बदल लें तो थोड़ा बेहतर हो समाज में ! आज का ब्राहमण पाषाण युग में नहीं है बल्कि यथार्थ में सामाजिक तौर तरीको से जी रहा है !…..’’

    टिप्पणी : क्या आपकी उपरोक्त टिप्पणी आपकी मानसिकता का द्योतक नहीं है? यदि श्री मण्डल जी की सोच पाषण युग जैसी है तो आप उन्हें कुछ भी लिखें, लेकिन ब्राह्मणों के अलावा शेष सभी जातियों और वर्गों को पाषाण युगीन सोच का लिखना ‘‘अपने मु:ह मियॉं मिठ्ठू’’ बनना नहीं तो और क्या है? आज के समय में हम संक्रमण काल में हैं, जहॉं पर कोई भी वर्ग दूसरे वर्ग के जीवन मूल्यों से पूरी तरह से अछूता नहीं है| आज भी ब्राह्मणों की दशा अजा एवं अजजा के लोगों जैसी या उनसे भी बदतर हो सकती है| ऐसे में आरक्षित वर्गों को कोसने या उन्हें हेय दृष्टि से देखने से कुछ नहीं हो सकता| बेहतर होगा कि आरक्षण के बारे में अध्ययन करें और फिर कुछ चिन्तन करें|

    श्री शिवानन्द जी आप आगे लिखते हैं कि-

    ‘‘……. इसी बहस के क्रम में फेसबुक मेरे एक मित्र ने कहा द्विवेदी जी जिस दिन आप अपनी बेटी की शादी किसी आदिवासी से करने को तैयार हो उसी दिन समानता आ जाएगी ….’’

    टिप्पणी : ऐसी टिप्पणी करने वाले लोग उसी प्रकार से उथली सोच के लोग हैं, जिस प्रकार से अनेक लोग वैवाहिक मामलों में देशभर में एक समान कानून (समान नागरिक संहिता) लागू करने की बात करके लोगों को गुमराह करते रहते हैं| उन्हें ज्ञान ही नहीं है कि हमारे देश में एक ओर जहॉं भानजी (बहन की बेटी) को अपनी बेटी के समान समझा जाता है, वहीं दूसरी ओर देश के कुछ राज्यों में ब्राह्मण सहित सभी हिन्दूओं में मामा-भानजी का विवाह सामान्य ही नहीं, बल्कि अनिवार्यता है!

    उपरोक्त के अलावा भी कहने को और लिखने को बहुत कुछ है, लेकिन वह तब, जबकि उक्त बातों पर आपकी सोच सार्वजनिक हो!
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
    098285-02666

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    • Vinay Vinayak

      “पैदाइशी टैलेंटेड ब्राह्मण” शिवानंद तिवारी (शायद इसीलिए वे किसी भी विषय पर बिना किसी अध्ययन के ज्ञान बांटने को अपना मौलिक अधिकार मानकर अक्सर ज्ञान बाँटते नजर आते हैं) को आपने जिस सलीके और इज्जत के साथ जवाब दिया है, उसके लिए आपको साधुवाद!!!☺
      और आश्चर्य है कि 4 वर्षों से ज्यादा का समय बीत गया है लेकिन आज तक उनका कोई जवाब नहीं आया है…हालाँकि कि मुझे इसकी कोई उम्मीद भी नहीं दीखती !!!

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