क्या न्यायपालिका सर्वशक्तिमान है?

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह कि पारदर्शिता के इस दौर में और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पारदर्शिता की पक्षधर न्यायपालिका अपने लिए पारदर्शिता की पक्षधर नहीं है। वह रंच-मात्र भी जवाबदेह नहीं होना चाहती। वह सबके मामले में हस्तक्षेप कर सकती है, यहां तक कि कानून भी बना सकती है जो संसद का काम है, पर अपने मामले में वह कोई नियंत्रण स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

appointment-of-judgesवीरेन्द्र सिंह परिहार
देश में कुछ महीनों से स्थिति यह है कि हाईकोर्ट के जजों की नियुक्तियों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय और सरकार आमने-सामने स्थिति में हैं। अभी 29 अक्टूबर को हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति में हो रही देरी को लेकर केन्द्र सरकार पर नाराजगी व्यक्त करते हुए उसे अहंकारी बताया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कहा गया कि सरकार यह बताए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट जजों की सूची सरकार 9 महीनों से क्यों दबाए बैठी है? जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट में 160 में मात्र 77 जज ही काम कर रहे हैं। छत्तीसगा गया और समय पर पश्चिमी देशों की तर्ज पर न्यायिक आयोग बनाने की बातें होती रहीं। लेकिन इसे असली जामा पहनाया 2014 में सत्ता में आई नरेन्द्र मोदी सरकार ने। जिसने संसद में ही सर्वसम्मति से ‘‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त आयोग’’ ही नहीं पारित कराया, वरन देश की अधिकांश विधानसभाओं ने भी इस विधेयक का समर्थन किया। भारतीय संविधान भी चेक एंड बैलेन्स (संतुलन एवं निरोध) के सिद्धान्त के तहत यह एक उत्कृष्ट व्यवस्था थी। जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं दो अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश इसके सदस्य होते। इसके साथ ही इसमें दो ऐसे सदस्य होते, जिनका चुनाव मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री एवं विपक्ष के नेता करते। इसके अलावा भारत सरकार के विधि एवं न्याय मंत्री भी इसके सदस्य होते। इस तरह से यह पाॅच सदस्यीय आयोग सर्वोच्च न्यायालयों और उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति, स्थानान्तरण का कार्य तो करता ही, जजों के विरुद्ध भ्रष्टाचार एवं कदाचरण की शिकायतें सुनने और उसमें कार्यवाही के लिए सक्षम होता। लेकिन पिछले वर्ष अक्टूबर में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने इस अधिनियम को संविधान में मूल ढांचे को प्रभावित करने वाला और इस तरह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बाधक होने के नाम पर इसे संविधान विरोधी घोषित कर दिया। यद्यपि यह नहीं बताया गया कि इससे संविधान का लकनी चाहिए। यानी मेरिट के बजाय काॅलेजियम अपने चहेतों को जज बनाने का सिलसिला बंद करे। सरकार ने प्रावधान किया है कि काॅलेजियम द्वारा भेजे गए नामों में से अगर राष्ट्रीय सुरक्षा की कसौटी पर कोई पूरी तरह खरा न उतरता हो तो सरकार ऐसे नाम को खारिज कर सकती है। सरकार का यह भी कहना है कि ऐसी स्थिति में भी सरकार अपनी पसंद का जज तो बना नहीं सकती। नया नाम भी तो काॅलेजियम द्वारा ही तय होगा। सरकार का यह भी कहना है कि अगर वह सुरक्षा कारणों से किसी नाम को अस्वीकार करेगी तो उसकी वजह भी बताएगी, फिर भी पता नहीं क्यों मुख्य न्यायाधीश को इसमें सरकार के हस्तक्षेप की बू आती है। इसी के चलते सुप्रीम कोर्ट काॅलेजियम द्वारा सरकार को जिन 110 नामों की इस साल मार्च-अप्रैल में सिफारिश भेजी गई, उसमें अधिकांश लटके पड़े हैं। कालेजियम द्वारा भेजी गई सूची के संबंध में सरकार का कहना है कि जजों की सूची में कई ऐसे नाम हैं, जो उचित नहीं कहे जा सकते। बावजूद इसके सरकार ने 88 नाम फाइनल कर दिए हैं। एम.ओ.पी. तैयार करने की दिशा में भी सरकार प्रयासरत है।
समस्या यह है कि सरकार चाहती है कि किसी सेशन जज को हाईकोर्ट का जज बनाने के पहले हाईकोर्ट का काॅलेजियम जज के रूप में उसके पन्द्रह साल के कामकाज का मूल्यांकन कर उसका ब्योरा अपनी सिफारिश के साथ संलग्न करे। जबकि न्यायपालिका इस मामले में मात्र वरिष्ठता की ही जिद पकड़े हुए है। होता ये था कि इसी मापदण्ड के तहत हाईकोर्टों में ऐसे सेशन जजों की नियुक्ति हो जाती है, जिनकी निष्ठा एवं ईमानदारी संदिग्ध रहती थी। फलतः उच्च न्यायालयों में भी बहुत कुछ माहौल प्रदूषित हो चला है। मोदी सरकार चाहती है कि उच्च न्यायालय में जो जज नियुक्त हों उनकी ईमानदारी एवं निष्ठा पूरी तरह से असंदिग्ध हो। यदि ऐसा हो सके तो निचली अदालतों से जो जज न्यायालयों में पदस्थ होंगे, वह सिर्फ मेरिट के आधार पर ही नहीं निष्ठा और ईमानदारी के मामले में भी अलग होंगे। इतना ही नहीं इस निचली अदालतों में जहां भ्रष्टाचार एवं स्वेच्छाचारिता पूरे परवान में है, इसके चलते व्यापक सुधार हो सकता है, क्योंकि तब कोई भी जज यह समझ सकता है कि यदि उसकी कार्यपद्धति निष्ठा एवं ईमानदारी संदिग्ध रही तो वह उच्च न्यायालय का जज तो कम-से-कम नहीं बन सकेगा। यह भी सही को पता है कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के जजों के भ्रष्टाचार और कदाचरण की शिकायत सुनने के लिए कोई फोरम अभी तक नहीं है। न्यायिक नियुक्त आयोग को यह अधिकार होता पर सर्वोच्च न्यायालय ने उसे अस्तित्व में ही नहीं आने दिया। ऐसी स्थिति में सरकार चाहती है कि जजों के विरुद्ध आने वाली शिकायतों के निपटारे की एक स्थायी, पारदर्शी और एक समान सचिवालय बने। ऐसे सचिवालय का मुखिया कौन हो और उसकी प्रक्रिया क्या हो? सरकार एमओपी में इसका प्रावधान भी जरूरी मान रही है। सरकार का इरादा सचिवालय को शिकायतों को समयबद्ध, पारदर्शी और कारगर ढंग से निपटाने की व्यवस्था बनाने का है।
लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह कि पारदर्शिता के इस दौर में और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पारदर्शिता की पक्षधर न्यायपालिका अपने लिए पारदर्शिता की पक्षधर नहीं है। वह रंच-मात्र भी जवाबदेह नहीं होना चाहती। वह सबके मामले में हस्तक्षेप कर सकती है, यहां तक कि कानून भी बना सकती है जो संसद का काम है, पर अपने मामले में वह कोई नियंत्रण स्वीकार करने को तैयार नहीं है। जबकि दुनिया के किसी भी देश में न्यायपालिका को ऐसा अधिकार नहीं है, कि वह खुद ही अपनी नियुक्तियाॅ और तबादले करे। यह शुभ संकेत है कि अब न्यायपालिका की ओर से ही इस काॅलेजियम व्यवस्था को लेकर असहमति के स्वर उठने लगे है। अभी हाल में ही सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस चेलमेश्वर ने काॅलेजियम व्यवस्था को अपर्याप्त मानते हुए उसकी बैठक में ही जाने से इंकार कर दिया। इतना ही नहीं, उनके रवैए का समर्थन करते हुए सुप्रीम कोर्ट के तीन भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि काॅलेजियम की कार्यवाही में पारदर्शिता एवं सर्वसम्मति होना जरूरी है। तीनों पूर्व मुख्य न्यायाधीशों का यह मानना है कि जजों की नियुक्ति के समय उसके गुणों एवं दुर्गुणों पर स्वतंत्र एवं खुली बहस होनी चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के काॅलेजियम की सद्बुद्धि जागृति होगी। संवैधानिक स्थिति के अनुसार देश का सर्वोच्च न्यायालय इस तरह से सर्वशक्तिमान नहीं बनाया गया है कि वह अपनी जिद के चलते सरकार को अपने डंडे से हांके। एकात्म मानववाद के प्रणेता पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का ‘‘कौन बड़ा’’ के संबंध में कहना था कि यह तो ऐसा ही सवाल है कि ‘‘दायां पैर बड़ा या बायां पैर बड़ा। सबसे सर्वोच्च तो धर्म है यानी सभी को अपने विहित कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।’’ सर्वोच्च न्यायालय को यह पता होना चाहिए कि सम्पूर्ण सत्ता सिर्फ सत्ताधीशों को ही नहीं, न्यायपालिका को भी भ्रष्ट कर सकती है। ऐसी स्थिति में देश उनके बारे में कोई फैसला करने को बाध्य हो, उन्हें स्वतः एकाधिकारवादी प्रवृत्ति त्याग कर संविधान की मूल भावना के तहत कार्य करने को तैयार होना चाहिए।

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