“आर्टिकल 15” नींद गायब है, दिमाग में शोर है

आज फिल्म “आर्टिकल 15” रात का अंमित शो देखने का अवसर मिला। हमारे सामाजिक ताने-बाने में विसंगतियां अपार हैं और अंतर्विरोध इतने अधिक कि सयानों को भी लगता है कि आप कितना कुछ ठीक करलीजिए किंतु फिर भी बहुत कुछ ठीक करने के लिए रह ही जाएगा। ऐसे में सभी समस्याओं का समग्रता के साथ ‘चाणक्य’ भी भाषा में समाधान खोजें तो पहले समस्या की जड़ों का पता लगाओ, फिर उन जड़ों पर प्रहार करो और यह प्रहार तब तक करते रहो जब तक कि समस्या का ठोस समाधान न हो जाए।

सच पूछिए तो फिल्म “आर्टिकल 15” देखने के बाद से आखों से नींद गायब है। प्रश्न कई हैं, जिनके उत्तर मैं भारत के संविधान (जैसा कि फिल्म में बताया भी गया) में खोजने का प्रयत्न कर रहा हूँ लेकिन मुझे तो इसी संविधान में समस्या नजर आ रही है। वर्तमान संविधान अपने अंदर इतने अधिक भ्रम समेटे हुए दिख रहा है कि कब सवेरा होगा, कुछ दिखाई नहीं दे रहा।

फ़िल्म का एक दृष्य “सर ये तीन लड़कियां अपनी दिहाड़ी में सिर्फ़ तीन रुपए अधिक मांग रही थीं सिर्फ़ तीन रुपए…जो मिनरल वाटर आप पी रहे हैं, उसके दो या तीन घूंट के बराबर…उनकी इस ग़लती की वजह से उनका रेप हो गया….उनको मारकर पेड़ पर टांग दिया गया ताकि पूरी जाति को उनकी औक़ात याद रहे”

वास्तविकता है, वास्तविकता है, वास्तविकता है। यह हमारे तथाकथित सभ्य कहे जानेवाले समाज की असभ्य वास्तविकता है। लेकिन क्या संविधान एक कानूनी पुस्तक, देश को चलानेवाले नियम के भरोसे समाजगत समरसता ला सकते हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है आज ? यदि यह होना होता तो आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी ऐसा क्यों नहीं हो सका है ? क्यों कि हमने संविधान तो बना लिया, कानून तय कर लिए लेकिन अपना मानस नहीं बदला है।

कुत्तों को पारले जी बिस्कुट खिलाते बार-बार के दृष्य मन में कई बार यह सोचने को विवश करते हैं कि क्या हमारे अपने भाई इन जानवरों से भी गए बीते हैं जो आजादी के इतने वर्षों बाद भी रोटी-बेटी के संबंध की बात न भी करें तो एक कुंआ, एक शमशान और एक मंदिर में हम एक साथ नहीं बैठ सकते हैं। तकनीकि व्यवस्था होने के बाद भी क्यों देश में मैला साफ करने के लिए इंसानों को गटर में उतरना पड़ रहा है ? फिल्म का पात्र सही कहता है कि ‘हमारी मौतों पर कोई आन्दोलन नहीं, कोई धरना प्रदर्शन नहीं होता, जैसे हमारी जिन्दगी की कोई कीमत ही न हो’ ……..’मैं और तुम इन्हें दिखाई ही नहीं देते हैं। हम कभी हरिजन हो जाते हैं तो कभी बहुजन हो जाते हैं। बस जन नहीं बन पा रहे कि जन गण मन में हमारी भी गिनती हो जाए।…

कहने को भारतीय संविधान का “आर्टिकल 15” कहता है कि 1. राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध के केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।

2. कोई नागरिक केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर — (क) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश, या (ख) पूर्णतः या भागतः राज्य-निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग के संबंध में किसी भी निर्योषयता, दायित्व, निर्बन्धन या शर्त के अधीन नहीं होगा।

यही संविधान किंतु धारा 35 ए और धारा 370 को स्वीकार करता है। यह आर्टिकल जम्मू-कश्मीर की महिलाओं से भेदभाव करता था। अगर जम्मू-कश्मीर की महिला किसी अस्थायी निवासी से शादी कर लेती है तो इस तरह की महिलाओं के बच्चों को संपत्ति के उत्तराधिकार से वंचित होना पड़ता है। यह आर्टिकल संपत्ति के अधिकार में उनके साथ विभेद करता है। अनुच्छेद बाकी भारत के लोगों को भी जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीदने से रोकता है। उन्हें नौकरी करने और अन्य सरकारी मदद के भी हकदार होने से रोक देता है। यहां जम्मू-कश्मीर मामले में साफ दिखाई देता है कि राज्य संविधानिक तौर पर कैसे अपने ही नागरिकों के साथ भेदभाव कर रहा है।

इसी प्रकार राज्य धर्म के आधार पर भी भेदभाव करता दिखता है। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक आखिर क्या बला है ? संविधान में कोई प्रावधान दिखाई नहीं देता कि इतने प्रतिशत पर अंल्पसंख्यक परिभाषित होंगे लेकिन राज्य अपने ही नागरिकों के साथ वर्षों बरस से भेदभाव कर रहा है। जरा आप, समान नागरिक संहिता की आप बात तो कर दो, फिर क्या है, चारो ओर से गाली सुनने के लिए हो जाओ तैयार। आपको एक खास वर्ग के साथ जोड़ दिया जाता है।

वास्तव में यह फिल्म देखकर मुझे अपने संविधान और उन तमाम नेताओं पर गुस्सा आया जिनके हाथों में लोक की शक्ति बसती है। चाहें तो वे इन सभी कानूनी पुस्तक में लिखित अपने संविधान की गलतियों को लोकसभा में बैठकर सुधार सकते हैं। फिर बात वही है न कि यदि ऐसा हो गया तो उनकी राजनीति कैसे चलेगी। राजनीतिक मुद्दे गायब नहीं हो जाएंगे, उनके पास से ? देश में आज भी एक वर्ग विशेष को उनकी औकात दिखाने के लिए जो कुछ हो रहा है, फिर उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप जो हो रहा है। उससे हम सभ्य समाज के असभ्य लोग आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं ? बहुत बड़े-बड़े प्रश्न आज हम सभी के समक्ष मौजूद हैं, सच पूछिए तो इन तमाम प्रश्नों के बीच मेरी नींद गायब हो चुकी है। केवल अंदर कहीं शोर ही शोर है और यह शोर यही कह रहा है।

अभी कुछ किया, न के बराबर है जो
बहुत कुछ करना शेष है, 
समर भयंकर, युद्ध असीम 
समरस समाज का ताना बुनने 
हो जाना बलिदान शेष है

आपका 
डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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