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    Homeसाहित्‍यकविताआर्य कोई जाति नहीं यह एक समाज रहा है

    आर्य कोई जाति नहीं यह एक समाज रहा है

    —विनय कुमार विनायक
    आर्य कोई जाति नहीं
    यह एक समाज रहा है प्रारंभ से हीं!

    जैसे कि आज भी दयानंद स्थापित
    आर्य जाति नहीं कोई, एक आर्य समाज रहा है!

    आर्य,द्रविड़,तुर्क,भोज,म्लेच्छ हैं संतति,
    आर्य चन्द्रवंशी क्षत्रिय पुरुरवा प्रपौत्र ययाति की!

    मूल आर्य समाज के संस्थापक,
    अदिति-कश्यप संतति आदित्य विवश्वान सूर्य के पुत्र
    वैवस्वत मनु और उनके बेटी-जमाता इला और बुध थे!

    आर्य समाज ने आरंभ की थी पितृसत्तात्मक सृष्टि,
    आर्य समाज के पूर्व सृष्टि मातृसत्तात्मक प्रकार की थी!

    मातृसत्तात्मक सृष्टि चली थी
    दक्ष की बारह पुत्री और दक्ष जमाता कश्यप ऋषि से!

    दक्ष प्रजापति ने बारह कन्या अदिति,दिति,दनु आदि
    सप्त ऋषियों में से एक मरीचिपुत्र कश्यप को ब्याही थी!

    दक्ष कन्या अदिति व कश्यप के पुत्र आदित्य कहलाते,
    इसी तरह दिति और कश्यप संतति दैत्य जाति कहलाती,
    दनु और कश्यप की संतान दानव जाति कहलाती रही!
    कद्रू-कश्यप की नाग,विनता और कश्यपवंशी वैनतेय कहलाते!

    आदित्य, दैत्य,दानव आदि आपस में
    एक पिता और अनेक माता की संतान दायाद बांधव थे!

    मातृसत्तात्मक समाज की विकृति,
    दायाद बांधवों में लड़ाई और पतन को यादगार
    वैवस्वत मनु ने इच्छवाकु आदि पुत्रों के लिए
    स्वपिता सूर्य के नाम से सूर्य कुल और पुत्री इला के
    पुत्र पुरुरवा को उनके पितामह चन्द्र के नाम
    चन्द्रवंशी आर्य कुल समाज का संबोधन दिया!

    वैवस्वत मनु प्रथम आर्य राजा,प्रथम कर ग्रहण कर्ता,
    प्रथम नगर निर्माता, आर्यावर्त के राज्य व्यवस्थापक थे,
    मनु ने सरयू तट पर सूर्य वंशी गद्दी अयोध्या नगरी
    और बुध ने चन्द्र वंशी गद्दी गंगा यमुना तट पर
    प्रतिष्ठानपुर नगरी बसाकर दोनों ने वर्ण व्यवस्था अपनाई!

    वैवस्वत मनु के पुत्र और दौहित्र ही प्रारंभिक आर्य थे,
    कृण्वन्तो विश्वमार्यम एक अभियान मानव पिता मनु का!
    कोई जरूरी नहीं कि एक मां-पिता की सब संतान आर्य हो,
    आर्य कोई पारिवारिक संस्था नहीं थी
    बल्कि किसी को आर्य होने और नहीं होने की छूट थी!

    जैसे आज पंजाब में ज्येष्ठ पुत्र सिख,बांकी हिन्दू होते!
    आर्य सभ्य सुसंस्कृत श्रेष्ठ जन को कहे जाते थे,
    जैसे अनुज विभीषण आर्य,अग्रज रावण अनार्य थे!
    जैसे भांजे कृष्ण-बलराम आर्य मामा कंस असुर थे!

    कालांतर में सभी क्षत्रिय-वैश्य श्रेष्ठी आर्य कहलाने लगे!
    पर सूर्यवंशी व चंद्रवंशी में आर्य कहने की लंबी परंपरा रही
    ऋषि मारीचि कश्यप और ऋषि अत्रि के गोत्रज परंपरागत
    क्रमशः सूर्य वंशी और चन्द्र वंशी आर्य कहे जाते रहे हैं!

    आत्रेय चन्द्र के पुत्र बुध,बुध से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु,
    आयु से नहुष, नहुष से ययाति एक महान आर्य सम्राट हुए,
    जिनका विवाह भृगुवंशी ब्राह्मण शुक्राचार्य कन्या देवयानी
    और गांधर्व विवाह दानवराज वृषपर्वा पुत्री शर्मिष्ठा से हुई थी!

    एक दिन उद्यान भ्रमण में भेद खुला और देवयानी जान गई,
    उनकी शर्तिया दासी शर्मिष्ठा व ययाति के बीच दाम्पत्य रिश्ते को!
    फलतः देवयानी ने पति ययाति की शिकायत पिता से कर दी
    असुर याजक शुक्राचार्य ने जमाता को वृद्ध होने का शाप दिया!

    तत्क्षण शाप फलीभूत हुआ और ययाति वृद्ध हो गए
    शाप के असर से युवा देवयानी दाम्पत्य सुख से वंचित हो गईं,
    इससे खेद हुआ शुक्राचार्य को और ययाति के शाप में सुधार किया,
    बड़े पुत्रों के मुकर जाने पर छोटे पुत्र पुरु ने पिता को यौवन उधार दिया!
    खुश होकर ययाति ने पुरु को मुख्य राजगद्दी उपहार दिया!

    फिर रोष में आकर अन्य पुत्रों को शापित कर धिक्कार दिया,
    देवयानी से उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र यदु को युवराज पद से च्युत कर
    कृषि, पशुपालन, वणिक व्यवसाय कर्म का प्रभार दिया!

    ययाति के बड़े पुत्र यदु के वंशज आज कृषि गोपालन करते,
    दूसरे पुत्र तुरुष्क को तुर्क कहकर तुर्किस्तान का राज दिया,
    तीसरे पुत्र द्रहयु को शापित कर बनाया द्रविड़ जाति का जन्मदाता,
    जो आज भी हैं दक्षिण में, उत्तर भारत से पूरी तरह लापता!

    चौथे पुत्र अनु को शापित कर
    उसे कहा आनव भोज-म्लेच्छ-यवन जातियों का कुलपिता!

    ये अंत:साक्ष्य है आर्य, द्रविड़,तुर्क भोज-म्लेच्छ-यवन का
    एक वंश,जाति,गोत्र में जन्म लेने का ऐतिहासिक पता!
    बाह्यसाक्ष्य मार्क्सवादियों की किताब, संस्कृत ग्रंथों के
    पश्चिमी देशों के अनुवाद के पीछे दौड़ने से कुछ लाभ नही होता!
    —विनय कुमार विनायक

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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