“ईश्वरीय ज्ञान और वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित आर्यसमाज”

आर्यसमाज वेदों के उच्च-कोटि के विद्वान ऋषि दयानन्द सरस्वती द्वारा मुम्बई में 10 अप्रैल सन् 1975 को स्थापित
एक ऐसा धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक संगठन है जो ईश्वर प्रदत्त वेद
ज्ञान पर आधारित होने के साथ विज्ञान के अनुकूल धार्मिक सिद्धान्तों को
मानता व उन्हें ज्ञान, विज्ञान, तर्क व युक्ति की कसौटी पर सिद्ध भी करता
है। आर्यसमाज के समान विशेषताओं वाला पृथिवी पर कोई भी धार्मिक
संगठन नहीं है। प्राचीनता की दृष्टि से देखें तो वैदिक धर्म, जिसका
आर्यसमाज प्रचार व प्रसार करता है, सबसे प्राचीन धर्म व मत है जिसका
आरम्भ परमात्मा ने स्वयं ही चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा
की पवित्र जीवात्माओं में मनुष्य के लिये आवश्यक समग्र ज्ञान देकर किया
था। वेद के किसी सिद्धान्त को तर्क व युक्ति अथवा ज्ञान व विज्ञान के किसी सिद्धान्त, नियम व तर्क से नहीं काटा जा
सकता। विज्ञान पृथिवी को गोल बताता है तो वेद, वैदिक धर्म और आर्यसमाज भी पृथिवी को आरम्भ से ही भूगोल बताते हैं।
अग्नि की परिभाषा देते हुए हमारे ऋषि कहते हैं कि अग्नि अग्रणी भवति अर्थात अग्नि उसे कहते है जो सदैव आगे या ऊपर की
ओर ही जाती है। हम हवन कुण्ड या चूल्हे अग्नि जलाते हैं तो उसकी लपटे दायें, वायें या नीचे की दिशा में नहीं जाती अपितु
हमेशा ऊपर की दिशा में ही जाती व गति करती है। किसी व्यक्ति में इस नियम व सिद्धान्त को काटने की क्षमता नहीं है। इसे
ज्ञान व विज्ञान सम्मत सिद्धान्त कह सकते हैं। भाषा की दृष्टि से देखें तो वेदों की भाषा संसार की सब भाषाओं से श्रेष्ठ है।
इसका अनुमान संस्कृत का स्वयं अध्ययन कर ही लगाया जा सकता है। वेदों के एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं। अग्नि के एक
सौ से अधिक पर्यायवाची शब्द हैं। संस्कृत के समान यह विशेषता संसार की किसी भी भाषा में नहीं है। इसी आधार पर संसार के
अन्य मत भाषा की दृष्टि से भी वैदिक धर्म की तुलना में नहीं आते। वेदों का ज्ञान व भाषा ऐसी है जिसका अध्ययन कर मनुष्य
उच्च कोटि का विद्वान तथा विवेक से युक्त मानव बनता है। उसका आचरण श्रेष्ठ व पवित्र होता है। वह संसार के मनुष्यों को
अपना बन्धु समझता है। वह किसी ऐसी बात को नहीं मानता व ऐसा कोई कार्य नहीं करता जिससे संसार के किसी मनुष्य व
प्राणी को हानि होती है। यह बात हम सभी मतों में नहीं देखते। कई मत तो दूसरे मतों का येन केन प्रकारेण मत परिवर्तन कर
अपने-अपने मत में सम्मिलित करने को ही अपने मत का प्रयोजन प्रदर्शित करते हुए प्रतीत होते हैं। उन्हें सत्य व असत्य तथा
मानव के हित व अहित से कुछ अधिक लेना देना नहीं है। यदि उनमें सत्य को स्वीकार करने की भावना व जज्बा होता तो वह
सत्य मत वेद वा वैदिक धर्म को स्वीकार कर लेते जहां ईश्वर व जीवात्मा का सत्य व निर्दोष स्वरूप पाया जाता है और इसका
आचरण कर मनुष्य सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी ईश्वर का साक्षात्कार भी कर सकता है। विधर्मी व विपक्षियों द्वारा वेदाध्ययन
न करना उन्हें पक्षपाती सिद्ध करता है। इससे उनकी सत्य की उपेक्षा की प्रवृत्ति भी प्रकट होती है। आर्यसमाज व इसके
अनुयायियों को किसी मत की पुस्तक से कोई आपत्ति व विरोध भाव नहीं है। आर्यसमाज के विद्वानों ने सभी मतों की भाषाओं
व उनकी पुस्तकों का अध्ययन किया है और उनकी वैदिक मान्यताओं से तुलना कर असत्य का त्याग और सत्य का ग्रहण
किया है परन्तु अन्य मत इस सर्वमान्य सिद्धान्त ‘‘सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग” का पालन करते हुए नहीं दिखाई
देते।
हम अपने जन्म से अब तक इस सृष्टि को देखते आ रहे हैं जो कि अपौरुषेय है। मनुष्य इसकी रचना व निर्माण नहीं कर
सकते। संसार में अन्य कोई सत्ता दिखाई नहीं देती जिससे इस सृष्टि का निर्माण हुआ हो? अतः इस सृष्टि का रचयिता व पालक
एक अदृश्य निराकार, सर्वातिसूक्ष्म, चेतन, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, सूक्ष्म जीवात्माओं में भी व्यापक तथा घट-घट

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की वासी सत्ता सिद्ध होती है। विज्ञान सार्वजनिक रूप से ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता परन्तु उसके पास इसका समुचित उत्तर
भी नहीं है कि इस सृष्टि की, जो कि बुद्धिपूर्वक रची गई कृति है, उत्पत्ति किस ज्ञान-विज्ञान से युक्त सत्ता ने की? अतः सृष्टि की
उत्पत्ति एवं इसके पालन का वेद और ऋषियों का दिया हुआ सिद्धान्त ही सत्य है। भविष्य में वह समय अवश्य आयेगा जब
विश्व के वैज्ञानिक भी तर्क के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करेंगे। अनेक वैज्ञानिक वर्तमान में भी इतना तो
स्वीकार करते ही हैं कि संसार में ऐसी एक सत्ता हो सकती है जिसने सृष्टि की रचना की है परन्तु विज्ञान अभी तक उस सतता
जान नहीं पाया है। वह सत्ता वेद प्रतिपादित ईश्वर ही है जिसने सृष्टि रचकर कर सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को वेदों का ज्ञान
दिया था तथा जिसकी सहायता से मनुष्य जीवनयापन करने सहित धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त हो सकता है। सृष्टि के
आरम्भ से हमारे असंख्य ऋषि व योगी वेदानुसार योगयुक्त जीवन व्यतीत करते हुए जन्म व मरण के बन्धनों से छूट कर मोक्ष
अर्थात् ईश्वर को प्राप्त हुए हैं और सभी दुःखों से छूटे हैं। ऋषियों की योग्यता देख कर हम दंग रह जाते हैं। ऋषियों ने ही हमें
बताया है कि जन्म व मरण दुःखों से युक्त होते हैं। जन्म व मरण के बन्धनों से छूटना ही मोक्ष है। मोक्ष में जीवात्मा ईश्वर से
अनेकानेक शक्तियों को प्राप्त करता है और सुख व आनन्दपूर्वक समय व्यतीत करता है। मोक्ष की अवधि भी हमारे ऋषियों ने
अपने दिव्य ज्ञान चक्षुओं से ज्ञात कर 31 नील अरब वषों से कुछ अधिक की बताई है जिसका उल्लेख ऋषि दयानन्द ने अपने
ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के नवम् समुल्लास में सप्रमाण किया है।
आर्यसमाज ईश्वर व जीवात्मा के जिस वैदिक स्वरूप को मानता है वह पूर्णतः तार्किक एवं सन्देह से परे है। ऋषि
दयानन्द ने वेदों के आधार पर लिखा है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा,
अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है।
ईश्वर वेदज्ञान का दाता, जीवात्मा के शुभ व अशुभ कर्मों के फलों का देने वाला, ईश्वर साक्षात्कार की हुई पवित्र जीवात्माओं को
मोक्ष प्रदान करने वाला, सत्पुरुषों का प्रेरक व रक्षक, ईश्वर भक्तों के ज्ञान को बढ़ाने वाला व उन्हें दुःखों से मुक्त रखकर, उनकी
सहनशक्ति बढ़ाकर, उन्हें परसेवा व परोपकार की प्रेरणा देने वाला तथा ईश्वरोपासना तथा अग्निहोत्र यज्ञ करने पर उत्साह व
सुख प्रदान करने वाला है। संसार में तीन नित्य पदार्थों में से प्रथम ईश्वर के बाद दूसरे चेतन पदार्थ जीवात्मा का स्वतन्त्र,
अनादि, अविनाशी एवं अमर अस्तित्व है जो संसार में अनन्त संख्या में विद्यमान हैं। सभी जीवात्मायें जो मनुष्य आदि नाना
प्राणियों में दृष्टिगोचर व अनुभव में आती हैं वह सब अल्पज्ञ, एकदेशी, ससीम, ज्ञान व कर्म की क्षमता से युक्त, जन्म-मरण
धर्मा, पाप व पुण्य कर्मों के कर्ता, कर्मों के फलों के भोक्ता तथा इच्छा-द्वेष-सुख व दुःख से ग्रस्त देखे जाते हैं। संसार में तीसरा
नित्य पदार्थ सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति है। यह प्रकृति भी अत्यन्त सूक्ष्म एवं सत्व, रज एवं तमों गुणों वाली है। इन गुणों
की साम्यावस्था प्रकृति कहलाती है। इस प्रकृति से ही ईश्वर इस सृष्टि की रचना करते हैं। इसका विभिन्न चरणों महतत्व,
अहंकार, पांच तन्मात्राओं आदि के रूप में विकार व विकास होकर यह सृष्टि अस्तित्व में आती है। इसके लिये वैशेषिक दर्शन
आदि सहित सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार से ईश्वर द्वारा सृष्टि की रचना कर
जीवों को जन्म-मरण एवं सुख व दुःख प्रदान किये जाते हैं जिसका आधार जीवों के कर्म होते हैं।
आर्यसमाज की स्थापना ऋषि दयानन्द से हुई है। उन्होंने वेद विषयक अपनी सभी मान्यताओं को वेद प्रमाणों के साथ
तर्क व युक्ति के आधार पर प्रस्तुत कर उनका अपने ग्रन्थों में प्रकाश किया है। उनका उद्घोष है कि वेद सब सत्य विद्याओं का
पुस्तक है। उन्होंने यजुर्वेद एवं ऋग्वेद का आंशिक भाष्य भी किया है। उनका किया वेदभाष्य ज्ञान व विज्ञान के सिद्धान्तों के
सर्वथा अनुकूल है। वेदों की सभी शिक्षायें व सिद्धान्त तर्क से अकाट्य हैं। वेद कर्म-फल सिद्धान्त को मानते हैं जिसके अनुसार
मनुष्य जो भी शुभ व अशुभ कर्म करता है उसका फल उसको ईश्वर इस जन्म व परजन्म में प्रदान करते हैं। संसार में प्राणी
जगत में जो विभिन्नतायें देखने को मिलती है उसका समाधान पूर्वजन्म व परजन्म सहित कर्मफल सिद्धान्त के आधार पर ही
होता है। ईश्वर की योग विधि से उपासना वेदसम्मत होने के साथ ज्ञान व विज्ञान से सम्मत कर्म है। ईश्वर की उपासना से
मनुष्य के अहंकार का नाश होने के साथ उसके गुणों में सुधार व वृद्धि होती है। आत्मा का बल बढ़ता है। ऐसा ईश्वरोपासक
मनुष्य पहाड़ के समान मृत्यु आदि दुःख प्राप्त होने पर भी घबराता नहीं है। अग्निहोत्र भी एक धार्मिक एवं देश व समाज को

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सुखों से युक्त करने वाला कर्म है। इससे अनेक लाभ होते हैं। वायु व वर्षा जल के दोष दूर होने से मनुष्य स्वस्थ रहता है।
अग्निहोत्र यज्ञ करने का लाभ इस जन्म में सुखों सहित परजन्म में भी परमात्मा के द्वारा प्रदान किया जाता है। वेदाध्ययन एवं
आर्य विद्वानों के यज्ञ विषयक ग्रन्थों को पढ़कर यज्ञ विज्ञान व इससे लाभों को जाना जा सकता है। आचार्य डॉ0 रामनाथ
वेदालंकार की यज्ञ-मीमांसा तथा डॉ0 रामप्रकाश जी की यज्ञ-विमर्श पुस्तकें पठनयी हैं।
आर्यसमाज के सभी सिद्धान्त वेदों के अनुकूल होने सहित ज्ञान व विज्ञान के सिद्धान्तों के भी पूरक एवं इनके
अनुकूल हैं। वेद मार्ग पर चलने से ही मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है अन्यथा नहीं। इसी के साथ इस चर्चा
को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
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