लौटने लगा है एशिया प्रसिद्ध पलामू के लाह बगान का गौरव

कुमार कृष्णन
एशिया प्रसिद्ध पलामू के कुंदरी लाह बगान का गौरव लौटने लगा है। इसके पुनरूद्वार की कवायद जारी है। सखी मंडल की दीदियों की लगन, उनकी मेहनत से लाह की खेती में समृद्धि आने लगी है। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग एवं ग्रामीण विकास विभाग के बीच अभिसरण के अंतर्गत झारखंड लाइवलीहूड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) को पुनरूद्वार की जिम्मेदारी मिलने के बाद सखी मंडल की दीदियों को वैज्ञानिक तरीके से लाह उत्पादन हेतु प्रशिक्षण दिलाया गया। साथ ही
वित्तीय वर्ष 2020-21 में 915 पेड़ों पर लगाने हेतु करीब 2 क्विंटल ब्रूड लाह (बिहन लाह) महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना (एमकेएसपी) के अंतर्गत महिला लाह किसानों को उपलब्ध कराया गया, जिससे करीब 25 क्विंटल ब्रूड लाह तैयार किया गया है। इस वर्ष करीब 700 महिला लाह किसान कुंदरी लाह बगान से जुड़ गये हैं। ब्रूड लाह को कुंदरी लाह बगान में लगे पलाश के पौधों पर चढ़ाने का कार्य अंतिम चरण में है। लाह के प्रति महिला किसानों का जज्बा देखते बनती है। पूर्व के समय जिन महिलाओं का जीवन घर की देहरी के अंदर गुजरता था। ऐसी महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़कर राज्य सरकार पारंपरिक पेशे में ही आजीविका के बेहतर अवसर प्रदान कर रही है। इससे नीलांबर- पीतांबरपुर प्रखंड क्षेत्र की महिलाएं लाह की खेती से नई इबादत लिख रही हैं। लाह की खेती से इन महिलाओं की पहचान वनोपज उद्यमी के रूप में होने लगी है।
लाह की खेती से जुड़ी बोराखांड़ की परिनिता देवी ने बताया कि पूर्व के वर्षो में उनके यहां खैर, पलाश एवं बैर के पौधे पर लाह की खेती होती थी, लेकिन समय के साथ खेती बंद हो गयी, जबकि यह अच्छा कार्य है और इसमें काफी फायदा भी होता है। जेएसएलपीएस की ओर से खेती कराये जाने से अब उन्हें पुनः फायदे की उम्मीद जगी है। साहद निवासी चिंता देवी, ओरिया गांव की रहने वाली आरती देवी आदि महिलाओं का लाह के प्रति काफी उत्साह था। महिलाओं ने बताया कि सखी मंडल से जुड़ने के बाद वैज्ञानिक तरीके से लाह की खेती हेतु प्रशिक्षण दिया गया। सरकार से प्रोत्साहन, वैज्ञानिक विधि से लाह की खेती करने, कीटनाशक का प्रयोग से उपज बढ़ाने, उसका समुचित देखभाल करने एवं समूह में कार्य कर बेहतर एवं गुणवत्तापूर्ण उपज एवं बेहतर मुनाफा कमाने की जानकारी मिली। साथ ही वैज्ञानिक विधि से कुंदरी लाह बगान में खेती कराई जा रही है। इससे बहुत फायदा मिलेगा।
421 एकड़ में फैले इस लाह बगान में पलाश के 62 हजार पौधे हैं। सखी मंडल से जुड़ी विभिन्न स्वयं सहायता समूह की करीब 700 महिला किसान लाह की खेती से जुड़ गयी हैं। ग्रामीण क्षेत्र की ये महिला लाह किसान वैज्ञानिक विधि से लाह की खेती कर बेहतर आजीविका की ओर अग्रसर हैं। लाह की खेती को बढ़ावा देने, लाह बगान को विकसित करने एवं स्थानीय लोगों को स्वरोजगार से जोड़कर उनका आर्थिक व नगदी आमदनी कराने को लेकर राज्य सरकार के साथ-साथ प्रमंडलीय शासन व स्थानीय पलामू जिला प्रशासन प्रयत्नशील है। सखी मंडल की जुड़ी महिलाओं को वैज्ञानिक विधि से लाह उत्पादन की बढ़ोतरी का प्रयास हो रहा है।
लाह की खेती प्रारंभ होने के पूर्व वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग तथा ग्रामीण विकास विभाग के सहयोग से प्रमंडलीय मुख्यालय के नीलांबर-पीतांबरपुर स्थित कुंदरी लाह बगान का सर्वे किया गया है। सर्वे के अनुसार यहां 62 हजार पलाश के पेड़ हैं। भविष्य में सभी पौधों पर लाह की खेती की जायेगी। इसमें 700 से अधिक महिला लाह किसानों (सखी मंडल की दीदियों) को जोड़ने की कार्ययोजना तैयार की गयी है, ताकि महिला लाह किसान वैज्ञानिक विधि से खेती कर अपना जीविकोपार्जन कर सकें।
वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग एवं ग्रामीण विकास विभाग के बीच अभिसरण के अंतर्गत झारखंड लाइवलीहूड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) को राज्य के आठ ब्रूड फार्म केन्द्र के पुनरूद्वार की जिम्मेदारी सौंपी गयी है,जिसमें पलामू जिले के नीलांबर-पीतांबरपुर (लेस्लीगंज) के कुंदरी लाह बगान भी शामिल है। जेएसएलपीएस जेएफएमसी/एसएचजी की संयुक्त समिति के साथ पांच जिलों के आठ ब्रूड फार्म केन्द्रों को विकसित करने के लिए जिम्मेदार है। लाह फार्म स्तर पर जेएफएमसी/एसएचजी की संयुक्त समिति एवं संबंधित किसानों को एमकेएसपी कार्यक्रम के तहत विकसित वैज्ञानिक लाह खेती के एसओपी के आधार पर प्रशिक्षण दिलाया गया, ताकि लाह की खेती प्रारंभ की जा सके।
प्रमंडलीय आयुक्त जटा शंकर चौधरी ने बताते हैं कि पलामू लाह उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहा है। एसिया के प्रसिद्ध कुंदरी लाह बगान में एक पैच में 60 हजार से अधिक पलाश के पौधे हैं, जहां लाह का उत्पादन हो रहा है। प्रमंडल के पलामू, गढ़वा में बहुतायत मात्रा में पलाश के पौधे हैं। लाह की खेती की ओर आगे बढ़ने से भविष्य में सभी जगहों पर पलाश के पेडों पर लाह की खेती करना संभव हो सकेगा और लाह उत्पादन में पलामू पुनः प्रसिद्धि हासिल करेगी। गांव-गांव में सखी मंडल की महिलाओं को संगठित कर लाह की खेती कराएं, ताकि पलाश के पेड़ से उत्पादित लाह की बिक्री बाहर भी की जा सके। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों कुंदरी लाह बगान के भ्रमण के दौरान जेएसएलपीएस के पदाधिकारियों को निदेश दिया है कि अगले 2-3 वर्षो में सभी पौधे पर लाह की खेती कराना सुनिश्चित करायें, ताकि महिलाओं की आर्थिक आमदनी बढ़ाया जा सके।
पलामू उपायुक्त श्री शशि रंजन का कहना है कुंदरी लाह बगान एसिया का प्रसिद्ध लाह बगान है। यहां पलाश के 60 हजार से अधिक पौधे हैं। जहां पूर्व में भी लाह की खेती होती थी। लाह की खेती को जेएसएलपीएस की सखी मंडल से जोड़ने के बाद तेजी से इसका विकास हो रहा है। भविष्य में यह सबसे अधिक लाह उत्पादन का केन्द्र होगा। आसपास की महिलाएं लाह की खेती से जुड़कर सशक्त हो रही हैं। स्वयं से इसकी देखभाल, उत्पादन एवं बाजार से जुड़कर लाभ कमाने की ओर अग्रसर हैं। कुंदरी लाह बगान पलामू के साथ-साथ राज्य का सबसे बड़ा लाह उत्पादन केन्द्र बनेगा।
वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग एवं ग्रामीण विकास विभाग के बीच अभिसरण के अंतर्गत झारखंड लाइवलीहूड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) को नीलांबर- पीतांबरपुर (लेस्लीगंज) के कुंदरी लाह बगान में ब्रूड फार्म केन्द्र के पुनरूद्वार का कार्य चल रहा है। पलाश के 62 हजार पौधे पर कार्य किया जाना है। पेड़ों का आवंटन किया गया है। एक महिला को 15 एवं उससे अधिक पौधे का आवंटन किया गया है, इसपर अच्छी खेती से एक महिला को 10 हजार एवं उससे अधिक की आमदनी हो सकती है।
नीलांबर-पीतांबरपुर के जेएसएलपीएस बीपीओ नवनीत कुमार पांडेय बताते हैं कि पर्यावरण की सुरक्षा के अनुरूप कुंदरी लाह बगान में 10 हजार से अधिक पलाश के पौधों की प्रूनिंग (कटाई-छटाई) मार्च-अप्रैल माह में की गयी थी, ताकि उसमें नया तना आये। नये तना में लाह की अधिक उत्पादन की संभावना होती है। लाह की खेती की सही देखभाल हो, इसके लिए सखी मंडल की प्रत्येक दीदियों को पौधे आवंटित की गयी है। वहीं जेएसएलपीएस एवं वन विभाग के लाह विशेषज्ञों द्वारा इसकी मॉनिटरिंग, सलाह/सुझाव एवं तकनिकी जानकारी दी जाते रही है, ताकि खेती से अधिक उत्पादन लिया जा सके। लाह की खेती से यहां के सखी मंडल की दीदियों को लाभ होगा। उन्हें रोजगार की तलाश या आर्थिक आमदनी के लिए दूसरे स्थानों पर जाने की आवश्यकता नहीं होगी। साथ ही दूसरे स्थानीय महिलाओं को प्रेरणा, प्रोत्साहन एवं आत्मबल मिलेगा। इससे लाह की खेती को और बढ़ावा मिलेगा।

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