लेखक परिचय

संजीव कुमार सिन्‍हा

संजीव कुमार सिन्‍हा

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

Posted On by &filed under समाज.


संजीव कुमार सिन्‍हा

हम देखते हैं कि 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जहां आंतरिक कलह और परिवारवाद के कारण दिन-प्रतिदिन सिकुड़ती जा रही है, वहीं 1925 में दुनिया को लाल झंडे तले लाने के सपने के साथ शुरू हुआ भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन आज दर्जनों गुटों में बंट कर अंतिम सांसें ले रहा है। इनके विपरीत 1925 में ही स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिनोंदिन आगे बढ़ रहा है।

आज यदि गांधी के विचार-स्वदेशी, ग्राम-पुनर्रचना, रामराज्य-को कोई कार्यान्वित कर रहा है तो वह संघ ही है। महात्मा गांधी का संघ के बारे में कहना था- ‘आपके शिविर में अनुशासन, अस्पृश्यता का पूर्ण रूप से अभाव और कठोर, सादगीपूर्ण जीवन देखकर काफी प्रभावित हुआ’ (16.09.1947, भंगी कॉलोनी, दिल्ली)।

आज विभिन्न क्षेत्रों में संघ से प्रेरित 35 अखिल भारतीय संगठन कार्यरत हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, वैकल्पिक रोजगार के क्षेत्र में लगभग 30 हजार सेवा कार्य चल रहे हैं। राष्ट्र के सम्मुख जब भी संकट या प्राकृतिक विपदाएं आई हैं, संघ के स्वयंसेवकों ने सबसे पहले घटना-स्थल पर पहुंच कर अपनी सेवाएं प्रस्तुत की हैं।

संघ में बौध्दिक और प्रत्यक्ष समाज कार्य दोनों समान हैं। संघ का कार्य वातानुकूलित कक्षों में महज सेमिनार आयोजित करने या मुट्ठियां भींचकर अनर्गल मुर्दाबाद-जिंदाबाद के नारों से नहीं चलता है। राष्ट्र की सेवा के लिए अपना सर्वस्व होम कर देने की प्रेरणा से आज हजारों की संख्या में युवक पंचतारा सुविधाओं की बजाय गांवों में जाकर कार्य कर रहे हैं। संघ के पास बरगलाने के लिए कोई प्रतीक नहीं है और न कोई काल्पनिक राष्ट्र है। संघ के स्वयंसेवक इन पंक्तियों में विश्वास करते हैं-‘एक भूमि, एक संस्कृति, एक हृदय, एक राष्ट्र और क्या चाहिए वतन के लिए?’

संघ धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता। इसके तीसरे सरसंघचालक बाला साहब देवरस ने उद्धोष किया कि ‘अस्पृश्यता यदि पाप नहीं है तो कुछ भी पाप नहीं है।’ बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का कहना था- ‘अपने पास के स्वयंसेवकों की जाति को जानने की उत्सुकता तक नहीं रखकर, परिपूर्ण समानता और भ्रातृत्व के साथ यहां व्यवहार करने वाले स्वयंसेवकों को देखकर मुझे आश्चर्य होता है’ (मई, 1939, संघ शिविर, पुणे)।

संघ की दिनोंदिन बढ़ती ताकत और सर्वस्वीकार्यता देखकर उसके विरोधी मनगढ़ंत आरोप लगाकर संघ की छवि को विकृत करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन हमें स्वामी विवेकानंद का वचन अच्छी तरह याद है: ‘हर एक बड़े काम को चार अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है: उपेक्षा, उपहास, विरोध और अंत में विजय।’ इसी विजय को अपनी नियति मानकर संघ समाज-कार्य में जुटा हुआ है।

74 Responses to “संघ का सच”

  1. Prem Sagar

    संजीव जी आपके कई लेखों को मैंने अभी एक साथ पढ़ा, पंकज जी पर उगलते आपके भड़ास को देखकर रूचि बढ़ने लगी आपके लोकतंत्र को जानने की. पर अफ़सोस हुआ, जैसे जैसे मैं आपकी लेखनी को जनता समझता रहा यह हिंदूवादी मानसिकता से ग्रसित लगा. लोकतंत्र सिर्फ हिन्दुवाद की इजाज़त नहीं देता ऐसे में जब आप सम्पादक हैं, आपको इसका ख्याल रखना चाहिए. वामपंथ और साम्यवाद से झुलसते इस देश को किसी हिंदूवादी सोच की ज़रुरत नहीं है. ऐसा न हो समाजवाद की बात करने वाला कोई और गाँधी मारा जाय.

    Reply
  2. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    हिंद विरोधियों की चालाकी भरी चालों को समझते हैं अब भारत के लोग. भारत, भारतीयता,भारतीय संस्कृति और साहित्य से नफ़रत करने वालों को केवल वही लोग भाते हैं जो भारत की केवल निंदा करते हैं. इन विदेशी ताकतों के पुछलों को भारत का उत्थान फूटी आँख भी नहीं सुहाता.ये वे लोग हैं जो भारत के प्राचीन साहित्य, परम्पराओं को नफरत की नज़र से देखते हैं. तभी तो इन्हें महात्मा गांधी ने ” गटर इंस्पेक्टर” कहा है जो केवल भारत की बुराईयाँ ही गिनाते रहते हैं, भारत की प्रशंसा से ये तिलमिलाने लगते हैं .अतः यदि ये लोग भारत की देशभक्त संस्थाओं की दिन-रात आलोचना,भर्त्सना करते हैं तो क्या बड़ी बात है. इसी बात की तो ये रोटी खाते ( मोटी कमाई करते ) है. भारत की महानता का सच ये हम से अधिक अछि तरह जानते है और उसी आत्म गौरव को नष्ट-ब्रष्ट करने की इनकी योजना है जो लाख चाहने पर भी सिरे नहीं चढ़ रही. इसीलिए ये खूब तिलमिला रहे हैं.

    Reply
  3. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    २२०१ व्यूज़, वाह ! यह है देशभक्त संगठन की लोकप्रियता का एक पैमाना. निर्बुधों को न समझ ए तो न सही, क्या फर्क पड़ता है. भगवान् उन्हें सदबुधी दे.

    Reply
  4. Jeet Bhargava

    संघ का अनर्गल विरोध करनेवाले लोग वही हैं जिन्होंने संघ के कार्य को करीब से नहीं देखा है.
    या फिर ‘पेट्रो डॉलर’ की खैरात या चर्च की स्पोंसरशिप पर पलनेवाले तथाकथित ‘बुद्धिजीवी’.

    विरोधियो के विरोध से चिंतित होने की जरूरत नहीं है. उनकी बहन-बेटियों-भाई-बेटो की ‘लव जेहाद’ या धर्मान्तरण या कुसंस्कृति से रक्षा भी संघ ही करता है. अत: आज नहीं तो कल वह भी संघ के भागीरथ प्रयास समझ जायेंगे. और अगर नहीं समझे तो संघ का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है. सृष्टि में सनातम मूल्य कभी नष्ट नहीं होंगे. संघ उन्ही सनातन मूल्यों का वाहक है.

    Reply
  5. ajit bhosle

    अखिल जी से कोई शिकायत नहीं, ऐसे लोग हर जगह मोजूद हैं इन पर समय खर्च करना कम से कम मैं तो मूर्खता समझता हूँ.

    Reply
  6. ajit bhosle

    आपने अपना नाम निरंकुश रख कर अच्छा किया अब हम आपको को भारतीयों के विरुद्ध किये हर गुनाह के लिए माफ़ करते हैं/.

    Reply
  7. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    एक लोमड़ी थी.जंगल में रहती थी.किसी कटीली झाड़ी में उलझने से उसकी पूंछ जाती रही.
    चालाक लोमड़ी ने अपनी इज्जत का फलूदा होने के डर से जंगल के राजा शेर की अध्यक्षता में मीटिंग बुलाई और प्रस्ताव रखा की पूँछ बहुत बुरी चीज होती है,हम जंगली जानवरों को अनावश्यक परेशानी में धकेल सकती है सो इसे कटवा दिया जाये.प्रस्ताव रखते वक्त लोमड़ी एक पेड़ से कुछ इस तरह टिक कर बैठी थी की उसकी पूँछ जहाँ होना चाहिए वो हिस्सा पेड़ की ओट में था.सभी जंगली जानवरों ने प्रस्ताव का समर्थन किया किन्तु एक बूढ़े शेर ने आपत्ति की.बूढ़े शेर ने लोमड़ी से कहा की तुम्हारी पूंछ दिखाओ.लोमड़ी घबराई और बहाने करने लगी ,कुतर्कों का सहारा लेकर अपनी दुम्विहीनता छिपाने लगी.सभी जंगली जानवरों ने जोर देकर उसे पेड़ की ओट से हटाया तब उन्हें पता चला की लोमड़ी की तो पूंछ ही नहीं है.बूढ़े शेर ने सभी जंगली जानवरों को समझाया की चालाक लोमड़ी ने अपनी पूंछ न होने की विवशता के चलते हम सभी की पूंछ कटवाने का प्रस्ताव इसलिए पास कराया कि जब उसकी पूंछ नहीं तो और किसी कि भी नहीं होनी चाहिए.
    आज जिसका कोई विचार है वो उसके समर्थन या पक्षधरता के लिए पूरी ईमानदारी से जुटेगा.वह उसकी प्रासंगिकता स्थापित करने के लिए प्रतिवेशी विचारधारा से द्वन्द करेगा.वाद-प्रतिवाद से संवाद स्थापित होगा और यही एक वैज्ञानिक तथ्य है कि जो सत्यानुगामी होगा वही जिन्दा रहेगा .हलाकि कोई भी विचारधारा कभी भी नष्ट नहीं होती ,वह सिर्फ रूपान्त्ररित
    होकर अद्द्तन होती जाती है,इसी का नाम वैचारिक क्रांति है.
    विचार शून्यता या सिद्धांत हीनता का समर्थन करने वाले एक किस्म कि स्वछंदता के पैरोकार होकर समाज ,राष्ट्र या दुनिया को कुछ भी नहीं दे सकते .यह सामाजिक लम्पटता कि ओर धकेलने की सनातन बीमारी है..

    Reply
  8. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    वि. अवलोकन। देखा है, कि, कुछ टिप्पणीकार आते हैं। जब तर्क के आधारपर टिप्पणी नहीं कर पाते, तो फिर कहने लगते हैं, कि प्रवक्ता “संघी” है। जब कहा जाता है, कि “प्रवक्ता तो सभी विचार धाराओं को जगह देता है”।
    फिर कहने लगते हैं, कि नहीं,मेरा कहना है, कि, टिप्पणीकार सारे संघी हैं।
    भाई टिप्पणी कार तो जो टिप्पणी करेंगे वे टिप्पणीकार कहलाएंगे। आपकी टिप्पणी भी तो, छपती ही है, जब सभ्य भाषा में लिखी जाती है।
    क्यों “नाचने न आए तो बोले आंगन टेढा है।”
    नोट: क्षमा कीजिए। कठिनाई से इस स्तरपर लिखना पड रहा है। किसी, लेखक बंधु का द्वेष अभिप्रेत नहीं है। और कैसे, और कौनसे, मृदु शब्दों में इसे कहा जाए? आप कहके दिखा सकते हैं।

    Reply
  9. शैलेन्‍द्र कुमार

    shailendra kumar

    @ अखिल जी देश ऐसे कई राजनेताओं को जानता है जिन्होंने समय समय पर अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं बदली और एक राजनीतिक दल को छोड़कर दुसरे राजनीतिक दल में शामिल हुए, तर्क यही दिया की निरपेक्ष है और देशहित में ऐसा कर रहे है, अखिल जी इसे अवसरवादिता कहते है जो कम से कम संघियों और वामपंथियों में ढूंढे नहीं मिलेगी

    Reply
  10. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    भारत पर जब भी कोई आपत्ति आयी है। संघने उस आपत्ति का सामना किया है।
    कांग्रेसी इंदिरा गांधी ने आपात्काल लाया।
    संघने सारी यंत्रणा खडी की। संघ स्वयम्सेवक परदे के पीछे रहकर भूमिगत होकर काम करते थे। प्रसिद्धि विन्मुख होने के कारण, उन्हे पकडना अ संभव था। अमरिका में जो आंदोलन चला, कई स्वयंसेवकों के पासपोर्ट(दूतावास द्वारा, इंदिरा के आदेशपर) छीने गए।आंदोलन के कारण, भारत शासन पर अमरिका से दबाव बढाया गया। और आपात्काल समाप्त हुआ। ना. ग. गोरे, सु्ब्रह्मण्यं स्वामी, मकरंद देसाई और अन्य कई नेताओं को सारे अमरिका में यात्राएं, वॉशिंग्टन में राजनिति्ज्ञों से भेंटे, नगर नगर में आयोजित सभाएं, सारे घरों में उनका आतिथ्य करने, और कोई भी संस्था वाले, इंदिरा के भय के कारण, तैय्यार नहीं थे।
    यह १०० % सत्य ही है। कोई नहीं, नितान्त कोई भी नहीं था, जो डर के मारे इस काम को करने तैय्यार हुआ? जब आपात्काल समाप्त हआ, तो सारे के सारे दौड कर सत्ता का लड्डू खाने के लिए तैय्यार?
    विपत्तिमें जो सहायक होता है, वही आपका मित्र हैं। भारत की हर विपत्ति में संघ सामने आता है।
    संघ भी सापेक्ष रूपसे विकसन-शील संस्था है। आज संघमें मुस्लिमों को भी प्रवेश दिया जाता है। आप को केवल भारत को अधिकार(हक) का भाव छोडकर कर्तव्य भावसे देखना है।
    स्वयम्‌ सेवक केवल कर्तव्य भाव रखता है। यही उसकी कसौटी का लक्षण है।

    Reply
  11. डॉ अनिल

    महोदय संघ एक ऐसा संगठन है जिसके बारे में वो लोग ज्यादा लिखते बोलते हैं जो इस संगठन को नही जानते विशेषतः विरोध में लिखने वाले। ये भी है कि सुनीसुनायी बातों पर विश्वास करके संघ के बारे में जानना भी नही चाहते इस संगठन के साथ यही विडंम्बना है। अधिकतर भारतीय स्वार्थी होते है इस का उद्धारण उपरोक्त कई टिप्पणी में मिल रहा है कई विचारक कह रहे है कि दूसरे धर्म के लोगों ने हमारा आज तक कुछ नही बिगाडा। जिनका बिगाडा है उऩका दर्द स्वार्थी नही समझ सकते। संघ का मकसद समाज जागरण रहा है ये लोग उसे सिर्फ राजनीतिक जागरण ही समझते है। जो कहते है कि संघ घृणा फेलाने का काम करता है उन्होने कभी संघ के बौद्धिक नही सुने होगे, मीडिया ने जो बता दिया मान लिया। एक शिक्षक अनेकों छात्रों के पढाता है उनमे से यदि कोई चोर डाकू बन जाये तो क्या शिक्षक की शिक्षा गलत है। संघ जैसा पारदर्शी संघठन कोई नही है जरुरत इसके अंदर झांकने की है वो भी इमानदारी के साथ।

    Reply
  12. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    प्रिय अखिल जी,
    आप में प्रतिभा है. एक सुझाव है कि जिस विषय पर टिपण्णी करें, उसके पक्ष और विपक्ष के तथ्यों को बिना पूर्वाग्रह के पढ़ लें. अभी से यह अभ्यास बना तो श्रेष्ठ बुद्धिजीवी के रूप में पहचान बनेगी. अन्यथा कोई भी यदि एक ही पक्ष को पढ़ता रहेगा तो उसकी कंडिशनिंग हो ही जानी है. मेरी शुभकामनाएं.

    Reply
  13. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    अखिल साहब कहते है की “ye gyaan ko vikrit karke uska manovanchhit chehra dikhane ki chaal hai jismen aam janta ki tarah aap log bhi fanste najar aate han…….”
    अगर यह ज्ञान संघ के बारे में है तो उसके लिए तो लेख से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है संघ को जानने व् देखने वाले पर कोई ज्यादा लेखो का असर होता है एसा मेने देखा नहीं ,होता तो मैं तो अब तक जबरदस्त संघ विरोधी बन गया होता …………..बचपन से ही मैं संघ समर्थक से कही ज्यादा उनको गालिया बकते हुवे लेख ही पढ़ता हु संघ के बारे में जो संपादक जी सोचते है उसे स्पष्टतया रख रहे है ये बात बहुत तारीफ योग्य है आप विरोध में सोचते है तो आप भी एक लेख लिखिए अपने पात्र में व् उसका लिंक भी दीजियेगा………….
    समपादक जी ज्यादा तत्याष्ट है तत्य्ष्ट का अर्थ क्या है??संघ का लेख नहीं छापना तय्स्थ्त है??या संघ-kamyunist-muslim- आदि सभी विचारधारो का लेख छापना??
    हम संपादक नहीं है जी सही कहा आपने………….आप भी “इंजिनियर” नहीं है जी लेकिन अगर सड़क टूटी हुयी हो या बहुत अच्छी हो तो उस पर कमेन्ट करने का आपको अधिकार है ओउर मुझे ये अधिकार नहीं की मई आपको कहू की आप “इंजीनियर” नहीं है………….अपने घरो में पत्र उनके संघ विरोध में होने की जानकारी के बाद भी हम पैसा खर्च करके मागते है ………..हर विचार में कुछ न कुछ तो अच्छा है ही……….

    Reply
  14. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    इंजी. दिवास दिनेश जी, कम शब्दों में सही, सटीक बात कही है आपने. बहुत उत्तम.

    Reply
  15. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    fir se mere sujhaav padhiyega……Er. diwas dinesg gaur sahab aur abhishek purohit ji…..ye gyaan ko vikrit karke uska manovanchhit chehra dikhane ki chaal hai jismen aam janta ki tarah aap log bhi fanste najar aate han…….

    tatasthta aur vaichaarik shuchita ka path sampaadkon ke lie hota hai kyoki apni bhoomika men unhen ek patrakaar se jyada ek vichaardhaara ki paridhi ke aage ka ya yon kah len ki …………..jane dijie aap log SAMPAADAK nahi hannn
    SINHA ji samajh rahe honge….

    Reply
  16. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    भाई अखिल जी विचार निरपेक्षता की बात आप कैसे कह सकते हैं? यहाँ तो इसका सबसे अच्छा उदाहरण आदरणीय संजीव सिन्हा ने दे ही दिया है| स्वयं के विरोध में आने वाली टिप्पणियों को भी यहाँ प्रकाशित कर उन्होंने अपनी महानता व तटस्थता का सबसे बड़ा उदाहरण प्रस्तुत किया है| वे सम्पादक हैं तो क्या उन्हें अपने विचार रखने का अधिकार नहीं है, या उन्हें आपसे परमिशन लेनी होगी कि मै क्या छापूं| प्रवक्ता पर सभी के विचारों का स्वागत है फिर स्वयं सम्पादक इससे क्यों वंचित हों? स्वयं संघी होते हुए भी उन्होंने संघ के विरोध में आने वाले विचारों को भी यहाँ स्थान दिया, ऐसे में बजाय उनका बड़प्पन मानने के आप उन्हें ही उपदेश दे रहे हैं कि आपको क्या छापना चाहिए और क्या नहीं| यह भी याद रखिये ऐसी महानता आपको केवल संघ के विचारों को मानने वालों में ही मिलेगी| किसी भी कांग्रेसी या वामपंथी पत्रिका पर जा कर देख लीजिये आपको पता चला जाएगा तटस्थता को कैसे अपने विचारों तले रौंदा जाता है| आपके पास गुदा हो तो वहां जा कर सम्पादक को तटस्थता का पाठ पढाएं| आपको यदि लेख पसंद आया हो तो आप उसपर अपना समर्थन दे सकते हैं| यदि नापसंद आया हो तो अपने विचार रख सकते हैं| किन्तु सम्पादक के चरित्र पर ऊँगली उठाने का अधिकार आपको नहीं है, यह याद रखें|

    Reply
  17. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    संघी या कम्युनिस्ट होकर जीवन जीने मे श्र्म करना पडता है या और दुसरि किसी भी विचार धार का जो एक विचार्धारा कि श्रेणी मे आती है मे जीवन जीना आसान नही है अभी का जो समय है उसमे येन केन प्रकारेण लाभ अर्जित करना है इस कारण अनेक पत्र्कार समय देखते हुवे पाला बदलने मे माहीर है और उसे वे अपनी तट्स्था कहते है एसा मात्र मीडिया के क्षेत्र मे ही हो एसा नही है सब जगह अपने लाभ को ही एक मात्र जीवन ध्येय मानने वाले बैथे है जो इन वैचारीक प्रतिबध लोगो को यह पाठ पढाते है कि एसा होना सही नही है वे खुद क्या करते है?भाजपा की सरकार हुयी तो उसका प्रस्सतिगान करेन्गे कोन्ग्रेस आते ही कट्ट्र नेहरु वादी हो जायेंगे कभी कभी कम्युनिस्म को भी याद कर देंगे क्या एसे लोग कुछ भी कह जा सकते है??कौन विचार गलत है या सहि.कौन विचार समयानुकुल है या नही ये तो बाद की बात हो जाती है प्रथम विचार तो हो व स्पष्टयता से हो…………………..

    Reply
  18. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    जिस पत्रकार की विचारधारा नहीं होती वो पत्रकार ही नहीं है,पत्रकार क्या एक विशेष प्रकार के लोगो का नाम है??या ये बात है की आप चाहे कम्युनिस्ट होवो या हिंदूवादी या समाजवादी या कोंग्रेसी स्प्स्ताताया स्वीकार करे ओउर विचारो के प्रवाह को बहने दे ,दुआसरे के विचार को भी आने दे ,तथाकथित तथाय्स्था का जो ढोंग करते है उन्हें किसी से लगाव नहीं होता है सिवाय पैसे के |तिवारी साहब व् संपादक महोदय दोनों के अपने अपने विचार है उन्हें प्रकट करने का उन्हें पूरा अधिकार है पत्र चलने के नाम पर यदि उनके विचारो को बंद करके केवल सत्ताधीशो की चमचागिरी की जाये तो हो सकता है पत्र को बहुत भौतिक उन्नत्ति मिल जाये या उनकी पैठ राजनीति में हो जाये लेकिन उससे धर्म का निर्वाह नहीं होता है ,जहा तक मेने प्रवक्ता को अनुभव किया है शायद ही कोई इसी दूसरी पत्रिका होगी जो एक साथ हिन्दू विचार के एवं कम्युनिस्ट विचार के एवं तथ्यास्थ विचार के एवं कोंग्रेसी विचार के एवं सामाजिक न्याय या दलित विचार के एवं मुस्लिम विचार के अदि लेख छापती हो |अनेको बार संघ की या कोंग्रेस की कम्यूनिस्टो की कटर आलोचना भी छपती है क्या एसा कोई दूसरा पत्र देखा??मेने नहीं देखा|इसके लिए संपादक महोदय बहुत ही ज्यादा बधाई के पात्र है ,साहब यह विचारो का मैदान है यहाँ तटस्थ से काम नहीं चलता है इस तथाकथित तत्यास्था ने मिडिया की क्या हालत कर रखी है ये किसी से छिपा नहीं है आप सबको अवसर दो तथ्याताम्क बात दो खबर को खबर रूप में दो विचारो का आग्रह रखो न की थोपो तो जनता अपने आप तय कर लेगी की कौन खरा है कौन खोटा|जहा तक मुझे पता है विचार को लेकर जीवन जीने वाले का जीवन ही कुछ जीवन है वरना करोडो लोग जी रहे है पर पता नहीं क्यों जी रहे है कोई मकसद नहीं कोई विचार नहीं कोई अनुभूति नहीं ,इसे समय में भी अगर संपादक जी स्वयं कष्ट सह कर भी हर विचार के व्यक्तिओ को अपने पात्र में आश्रय दिए हुवे है तो मुझे उसमे इनकी महानता ही लगती है…………….ओउर एक बार अपने इसी सिधांत के कारन अपने एक मित्र से भी वैचारिक मतभेद कर चुके है ये बात प्रवक्ता के नियमित पाठक जानते है ,यधपि मुझे उस समय बुरा लगा था इर भी चाहे कम्युनिस्ट हो क्यों न हो उन्हें अपने पात्र में लेख छपने की अनुमति दूंगा वैचारिक स्वतंत्रता के लिए इस सिधांत को पालने करने के लिए अभिनन्दन………………

    Reply
  19. संजीव कुमार सिन्‍हा

    संजीव कुमार सिन्‍हा, संपादक, प्रवक्‍ता

    अखिलजी, आपके महत्‍वपूर्ण सुझावों के लिए आपको हार्दिक धन्‍यवाद। आपने जिन बातों को उठाया है वह प्रवक्‍ता पर बार-बार उठती रही है। मैंने हर बार यह स्‍पष्‍ट तौर पर कहा है कि मेरी राष्‍ट्रवाद और लोकतंत्र में अगाध श्रद्धा है। परन्‍तु एक संपादक के तौर पर मैंने यहां पारदर्शिता और ईमानदारी से काम करने और हर विचारधारा को जगह देने की कोशिश की है। यही कारण है प्रवक्‍ता के पाठकगण विभिन्‍न विचारों के प्रहरी है और वे यहां मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं। लाखों रूपए खर्च कर जो अनेक वेबसाइट्स चल रही हैं उसे भी प्रवक्‍ता जैसी हिट्स नहीं मिल रही है। प्रवक्‍ता के अर्काइव को खंगाल कर देख लें, आपको सब पता चल जाएगा।

    Reply
  20. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    संघ को वीदेशी ताकतों के हाथों बीके मीडीया के झरोखे से देखोगे तो सब काला ही काला नज़र आयेगा.यदि सच को जानना है तो नि कट जाकर देखो . तभी सत्य को जान पाओगे. पर इतना याद रहे की संघ को भी इंसान ही चलते हैं, आकाश से उतारे कोई देवदूत नहीं. कुछ न कुछ कमीयाँ तो हर जगह मील ही जाएँगी .संघ की तुलना देश के अन्य सभी संगठनों के साथ करके देखेंगे तो आसानी से समझ आयेगा की देशभक्तों के निर्माण की यह आज देश की एकमात्र निर्माण शाला संघ ही है. इसी लीये देश की दुश्मन ताकतें इस के विरुद्ध पूरी ताकत से षड्यंत्र और अनेक प्रकार के प्रहार कर रही हैं, एकदम झूठे आरोप लगा कर बदनाम करने का प्रयास कर रही हैं. सचे और इमानदार भारतीयों को यह सत्य जानने-समझने का प्रयास करना चईये. अन्यथा ऐसा न हो की हम अपने देश के शत्रुओं के हाथों का खीलौना बन कर देश भक्त शक्तियों के विरुद्ध अपनी शक्ति लगाते रह जायेंगे और दुश्मन हमें समाप्त करते रहें.

    Reply
  21. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    अखिलजी आप तो वयक्तिक और संस्थागत दोनों ही ध्रुवों को जबरिया -नजरिया बनाने पर तूल दे रहे हैं. प्रवक्ता का सम्पादन और प्रवंधन करने वालों की भाव भूमि सर्व विदित है और मेरी उससे से सर्वथा भिन्न है ये भी सर्वविदित है ,विश्वास न हो तो मेरे ब्लॉग www .janwadi.blogspot com पर तशरीफ़ लायें..आप थोडा सब्र करें प्रवक्ता .कॉम को भी आप पाएंगे कि पत्रकारिता के आदर्श कीर्तमान के समकक्ष नहीं तो यह किसी से पीछे भी नहीं है.इसका प्रमाण भी यही है कि यहाँ आप को भी बात रखने का अवसर मिल रहा है और मुझे भी, फिर आप और क्या चाहते हैं?

    Reply
  22. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    श्रीराम तिवारी जी, आपके मद में आपकी कही बातें सत्य हो सकती हैं क्योंकी संभव है की आपका दिमाग किसी विचारधारा (अगर main गलत नहीं हूँ और आपके जातीय prishthbhoomi पर आपकी विचारधारा को कसूं तो आप rightist utpaad के roop में saamne aayenge) का utpaad हो किन्तु सम्पादक का पद और दायित्व आपके सोच और मद से बहुत उठा हुआ होना chaahie…शायद सम्पादक सिन्हा जी अपने नयेपन के कारण इस भूमिका का इमानदारी पूर्वक निर्वाह नहीं कर पाए honge….और jo कारण हो saktaa है उसे मैंने किसी sangathan से लाभ लेने वाले प्रकरण में पहले ही बता दिया है… मैंने पहले भी कहा था की सम्पादक की नज़र प्रस्तुत और दिखाई जा रही सच्छियों की तह में जाने वाली होनी chaahie ……….. आज उँगलियों पे गिनिये कितने सम्पादक या पत्रकार “नेम एंड फेम” के लेवल पर अंतररास्ट्रीय स्तर के हैं….और अन्तार्रस्त्रिय स्तर क्या होता है ये पत्रकारिता के क्षेत्र में जान्ने के lie dilli में baithe logon को batana sooraj को deepak dikhaane के samaan hoga…..”pandit sriram tivari जी”

    Reply
  23. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    विचार धारा ही सार्वभौम सत्य है,फिर चाहे वो दक्षिणपंथ हो या बामपंथ.माध्यम मार्ग भी सर्व स्वीकृत विचारधारा है..जो लोग तथाकथित तटस्थता की बात करते हैं या विचार निरपेक्षता का उपदेश ‘प्रवक्ता.कॉम’ को दे रहे हैं उन्हें अपने गिरेवान में झाँक कर देखना चाहिए ‘की कहीं यह भी तो एक काइयां किस्म की विचारधारा ही तो नहीं है!

    Reply
  24. अखिल कुमार (शोधार्थी)

    akhil

    सिन्हा जी, आप पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं, सम्पादक भी हैं…….पत्रकारिता में क्या ऐसे विशेष लगाव वाले लेख लिखे jane kee परम्परा hai?…एक सुझाव और hai…अपनी पत्रकारिता को संघी या काम्युनिस्ती चोला (लेफ्टिस्ट और राइटिस्ट), दोनों से दूर रखिये…..आखिर मेरी जानकारी में पत्रकारिता पक्षधरता नहीं…वह क्रिटिकल एनैलिसिस करने वाली होनी चाहिए……..हाँ यदि संगठन और उसके उत्पाद सरकारों से लाभ के सरोकार जोड़ने हों तो और बात hai……यह लेफ्तिस्तों और राइतिस्तों दोनों के खिलाफ का इस दौर का सत्य hai……

    Reply
  25. himwant

    १. संघ भारतीय राष्ट्रवादी संगठन है, हिन्दु संगठन नही। इसकारण वह हमारे जैसे लोगो की अपेक्षाओ पर खरा नही उतरता.
    2. संघ ताकतवर संगठन है. अतः इसके अन्दर विधर्मियो (खास कर चर्च) का वैचारिक घुसपैठ है जो संघ को गलत नीतियो पर चला रहा है. यह समस्या तब दुर होगी जब निर्णय प्रकृया मे ज्यादा से ज्यादा छोटे कार्यकर्ताओ को सहभागी कराया जाए. लेकिन आज के दिन संघ निर्णय उपर से लाद रहा है.
    3. संघ से समाज अपेक्षाए तो बडी करता है, लेकिन सहयोग कम करता है.
    4. संघ की आलोचना करने की बजाए इसमे रह कर इसे सुधार कर ले जाना सही रहेगा.

    Reply
  26. kamlesh pandey

    वाकई में आज संघ अपने विकास की ओर बढ़ रहा है …कई नीतियां भी संघ की काबिले तारीफ रही हैं..देशहित में संघ के लोगों की कोई सानी नहीं है..बात जहां आती है उन लोगों की जो किसी संघटन को गलत सही कहने की पहले उन्हे अपने बारे में सोचना चाहिए ..उन्होने तो किसी संगठन को राजनीति के में आकर एक राष्ट्रहित में आगे आने वाले संगठन को और उसके लोगों को गलत कहना गलत होगा..आज हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि लोग बोट पाने के लिए किसी को भी बुरा कहने उसके बिचार व्यक्तित्व को किसी भी हद तक जाने से उन्हें कोई गुरेज नहीं होता ….ऐ भी सही है संघ में कुछ ऐसे भी लोग आ जाते हैं अपना उल्लू सीधा करने के लिए इतने बड़े संगठन और समूह को की साख को दांव पर लगा देते हैं..उनका तो अपना कोई स्तित्व होता ही नहीं..ऐसे लोगों का तो समाज में रहने का कोई हक ही नहीं ।

    Reply
  27. bhoopen

    अगर संघ की सच्चाई बस इतनी होती तो सारे हिन्दू संघ के सदस्य होते संघ ने समाज में कट्टरत फैलाई है उससे हिन्दू धर्म की महानता बहुत कम हो गई है
    हिन्दू तो ऐसा धर्म है जहा लोग मंदिर नहीं जाते फिर भी हिन्दू है अगर कट्टरता इस धर्म में लड़ा जायेगा तो लोग नास्तिक होना पसंद करेंगे लेकिन कट्टर होना नहीं
    हिन्दू धर्म को किसी संघ की जरुरत नहीं है संघ को हिन्दू धर्म की जरुरत है
    इसलिए हिन्दुओ को आगे बढ़ाना है तो पख्न्दो छोड़ सभी हिन्दुओ को बराबर मानो नहीं तो संघ का हिन्दुत्व सिर्फ संघ के सदस्यों के पास रहेगा धन्यवाद

    Reply
  28. mukesh sen

    सिन्हा जी आप ne वास्तव में apne इस लेख ke mahyam se संघ के asli चेहरे or deyeh से परिचित karaya . लोग इस लेख ko padne के बाद राजनेतिक स्वार्थों के लिए bewajah bayanbaji कर रहे दिग्विजय सिंह जेसे मुर्ख नेताओं की की bato से नहीं भटकेंगे. निश्चित hi ab to logo ko इस bat ko समझ lena चैये की ये राजनेता अपने vot बेंक के लिए hi बडबडा रहे हे. sach तो ये ये है की देश की उन्नति को लेकर inka कोई सकारात्मक rawaiya तक नहीं हाही हे. or kori प्रशिद्दी बटोरने के लिए तमाम prakar की बेबुनियब बयां बजी करते rahte है. अब तो देश को भी एकजुट hokar esse स्वार्थी logo को जवाब देना चाहिये……
    मुकेश sen, biaora

    Reply
  29. Ashwani Garg

    Shri Sanjeev Sinha ka lekh shat pratishat satya hai. I congratulate the writer.

    Reply
  30. KAMLESH PANDEY

    सही कहा आपने,
    लेकिन लोग बहकावै में आ जाते हैं, फिर सोचते हैं कि “पुराना” नाम उन्हें ले डूबता है …

    Reply
  31. Rakesh Singh

    सार्थक आलेख और उससे भी सार्थक टिप्पणी | इतनी सारी टिप्पणी में ढेर सारी सार्थक बातें आई हैं |

    इसमें कोई शक नहीं की संघ के विचार पवित्र हैं और रास्ट्रियता ही इनका मूल स्वभाव है | संघ शक्तिशाली भी है पर इस शक्ति का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है | और इसके कई कारन हैं – मीडिया और सेकुलरों का दुष्प्रचार संघ के कई कार्यों में बाधा बन कर कड़ी है | लोगों में सच्ची भारतीय शिक्षा का अभाव आम जन को संघ से जुड़ने से रोकता है |

    संघ या अन्य रास्ट्रीय संगठन को उच्च गुणवता वाले विद्यालय हर जिला, तहसील में खोलने चाहिए |

    Reply
  32. shishir chandra

    संजीव कुमार सिन्हा जी आपके बेहतरीन लेखन शैली की मैं सराहना करता हूँ. आपका भविष्य पत्रकारिता के क्षेत्र में उज्जवल है. आप अपनी लेखनी की धार को इसी तरह संजोए रखना. बिहार की उर्वर धरती को आप जैसों पर गर्व होना चाहिए.

    Reply
  33. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    संघ के पेशेवर स्वयम सेवक की सोच .प्रतिवाध्धता .उस संगठन के प्रति समर्पित होना स्वाभाविक है .वह अपने दृष्टिकोण से प्रत्येक वस्तु ;व्यक्ति ;स्थान ;विचारधारा .तथा धर्म-मजहब
    की जो छवि उसके जेहन में प्रत्यारोपित कर दी जाती है ..वह
    उसी पर कोल्हू के बेल की तरह निरंतर चलता रहेगा .भले ही उसके हाथों
    किसी व्यक्ति विचार या सत्यनिष्ठ सिद्धांत की हत्या ही क्यों
    न हो जाए ;जैसे की दीपा जी के पिता के साथ हुआ ..इसी तरह इस्लामिक कट्टरता वादी न केवल भारत बल्कि सारी दुनिया में अमानवीय चेहरा प्रस्तुत कर रहे है .कट्टर जैन तक हिसा को आमंत्रण दे रहे हैं .कट्टर सिख्यों ने पंजाब को खालिस्तान बनाने का षड्यंत्र किया .अनेक निर्दोषों की जान ली .कट्टर इसाई क्या कर रहे हैं .हम सबको मालूम है .इतिहास के एक विशेष दौर में बोध्धों ने सनातनी /वैदिक /वैष्णवों की कितनी हत्याएं की वो आदि शंकराचार्य के उद्भव पर ही रुक सकी .तात्पर्य यह है की जब हर धर्म मजहब की ओर से हिसा का शंखनाद होगा तो नतीजा क्या होगा .अब प्रश्न यह है की सिर्फ हिदुओं या उनके संगठनो की हिंसात्मक गतिविधियों पर ही ज्यादा हायतोबा क्यों ?हकीकत ये है की हजारों वर्ष की साहित्यिक सांस्कृतिक आध्द्यात्मिकता के प्रभाव से हिदुओं ने विश्व को अनेक बार शांति का पथ दिखलाया .कई ने हमारे सिद्धांत मान्य किये ;किन्तु हम ज्ञान के वैयक्तिक मुक्ति मार्ग में सिरमौर होते हुए भी राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में फिसड्डी सावित हुए .स्वाधीनता संग्राम के दौरान जब यह तय ही हो गया था की हम swtantrta के bad samaanta sahastitw तथा dharmnirpeksh भारत की shakl में navnirmaan karenge ,तो kuchh hinu maha sabh kuchh R S S.aur kuchh purane saamnton ने baat fela दी की हम तो hidu rashtr banayege .iski ulti prtikriya हुई .muslim leeg par dabav pada की pakistan mango ..aur pakitan ban गया jinhine jwala sulgai be तो dadve me ja chhupe aru lakhon hindu muslim जो की begunah the bemot maare gaye .hmen अब स्वयम sochna है की जब aapko lagta है की kuchh log desh के प्रति bafadar nahin हैं aur hamare shashn prshaSHN KO तथा smvidhan को या nyaypalika को samman nahin dete .तो aap swymbhoo bankar kanoon vyvastha पर kabja karke jag hansai तो mt karao.aap yadi vaakai deshbhakt हैं तो prtey bhrst hidu I A S HINDU PUJARI HIDU MATHADHEESH KA PAAP PANK SE MUKT KIJIYE .DOOSRE DHARM MAZHB MEN TAANG MAT ADAAIYE .yadi aapko lagta है की mera kathan asty है तो किसी भी bade hidu धर्म sthal के andar jhankiye ,aap yadi उनके pakhndpurn jeevan str को dekhoge तो dang rh jaaoge . beshak is site pravakta .com पर likhne bale प्रतेक saathi को में राष्ट्र की amuly dharohr maanta hun किन्तु हम aap jinke liye vagmeeyta में guthmgutha हो रहे उनके baare में abhi aapko aur addhyn कर lena chihiye

    Reply
  34. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    आदरणीय सम्पादक जी
    आपके सद्विचारों को जान ने के बाद कुछ भी कहना सुनना निरर्थक है .आपने सवा सौ साल की कांग्रेस को मृत घोषित कर दिया .जबकि कांग्रेस तो अमर फल खाकर जन्मी है . सो ख़त्म वो नहीं हुई. बल्कि एक सच्चा स्वयम सेवक लगातार पचास साल तक पूरी राष्ट्र निष्ठां से देशभक्तिपूर्ण राजनीति में सम्लग्न रहा .किन्तु वैकल्पिक प्रधानमंत्री से आगे नहीं जा सका .क्या आप इसका उत्तर कहीं अपने ही गिरेवान में झांककर दे सकेंगे .क्या आपको मालूम है की न केवल भावबोधक दर्शनशास्त्र अपितु वैज्ञानिक भौतिकवाद भी इस सिद्धांत को मानता है की
    असत्य की आधारशिला पर सत्य का भवन खड़ा नहीं किया जा सकता .
    बहरहाल में न तो कांग्रेसी हूँ और न ही तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ;.में सौ टंच विशुद्ध हिन्दू .कान्यकुब्ज ब्राहमण हूँ और सदियाँ बीत गई किसी माई के लाल ने खासतौर से अल्प्स्मख्यक ने हमें कभी कोई चोट नहीं पहुंचाई .मेरे पूजा पाठ में कभी किसी मुस्लिम ने आपत्ति नहीं दिखाई ..पूर्वजों की सनातन परम्पराओं में जो हिंदुत्व हमें सिखाया गया वो तो कुछ और ही है .कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुंधरा पुण्यवती च तेनु ..अपार्स्म्वितुसुखासाग्रे अस्मिन लीनं परे ब्रह्मणि अस्य चेत ह .
    श्रीमद भागवत पुराण में दर्ज इस श्लोक को मद्द्ये नज़र रखते हुए में उन तमाम लोगों से विनम निवेदन करता हूँ की vatave ense samgthan को jo kahta है की hm तो केवल saskrutik samajik sudhar के liye ही kam karte है aur jb bhajpa को satta में bithane को ghar ghar peele chaval baante jaye तो क्या kahne ise kahte है gud khao किन्तु gugulgulon से parhej karo .क्या sangh का certificate jaruri है hindutw के liye .एक baat aur की honhaar virwaan के hot cheekne paat .sampaadakji baza farmaate है aur ye jo आपके katipa bhatkel anuyai hain inki baat solah aane sach है की katipay doosre samprday के logon ने aatank macha rakha है तो bhai आप को क्या aapki police militry पर bharosa नहीं है क्या .lagadeejiye ense deshdrohiyon के kam jo desh से gaddari kare lekin papi को maarne bala pavitr hona chahiye .kitne janral karnal roj yon shaoshn bhrushtrachaar में kort marsahal को prapt ho rahe hain we adhikans us mazhb kwe hain jiske jhandavardar आप log van baithe hain .koi kkahta firta है की batao dunia में bharat jaisa koi aur prajatantr है .?में kahta hun bharat के alawa dunia में sb paappank है .kinti abhi तो hm ye jaante hain की dunia में sbse jayada mahngaai sabse jayda bhrustachar sbse jyada haty balaatkaar honer kiling bhay bhunkh gareevi berijgaari sbhi में hmara pyara bharat sbse upr है mrea bharat mahan bhad में jaaye jahaan ensi vichardhara को hm reject karte hain .

    Reply
    • दीपा शर्मा

      Deepa sharma

      Mahoday!
      Shabd nahe he mere pas aapke is jawab ke liye. Aapka har shabd satay se bhara he. Mere parivar ko bhi aaj tak us varg se koe hani nahi hui he jiska bhay samaj me vyapt kiya ja raha hai. Haan mene apne pita ko khoya he. Wo bhi inki vichardhara ke karan. Karseva me. Khud faisla kiya ja sakta he ki khatrnak kya he? Iske atirikt jahan tak us samuday ki baat he. Ham khud saksham he agar kuch hua to. Hamko jhute lambardaro ki zarurat nahee.
      Aapki tippani ke lye aabhar. Jab tak aap jese log hein bharat akhand bana rahega

      Reply
      • shishir chandra

        deepa ji aap kitni swarthi ho gayee hain? aap sirf apna dekh rahin hain. mujhe khed hai ki aapke pitaji ki jaan gayee. seemaon par bhi sirf sainik marte hain ham ko kya? dangon me dusre marte hain, ham to surakshit rahte hain. aap kash sakaratmak tareeke se soch patin. tathapi mai ummid karta hoon ki aap yah soch viksit karengi!

        Reply
        • दीपा शर्मा

          Deepa sharma

          Mahoday!
          Mere pitaji ki kisi sainik se tulna na karen. Sainik desh ki raksha karte shaheed hote hein. Jbki mere pitaji desh ko asurkshit karne wali gatividhiyon me jaan gavan bethe. Mujhe dukh he ki wo us dhara me beh gaye jisme dimag ki zarurat nahe hoti. Aap log jb bomb blast ki baat karte hen to kya usme muslim nahi marte. Aap log kuch sanghthno ki kartuto ko dharm se jodkar puri manavta ko thes lgate hain. Agar aap sirf aatankvad ki burai karte to samajh aata he lekin yahan muslims ke khilaf zehar ugalkar ek esi ladai ko shuru kiya ja raha he jiska ant kbhi nahi hoga. Ye khuli aankho se dekha ja sakta he ki yahan kis pirkar ke vicharak apni vichardhara ke dvara aatankpurn lekh likhte hen. Samsya tb gambhir ho jati he jb virodh sampardayik ho jata he. Jb wo kanun ki paridhi ke bahar chala jata he. Ye sb baten btane ki hoti bhi nahee he. Qki ye samany buddhi wala bhi samajh sakta he. Parntu yadi sirf ek varg vishesh ke khilaf aag ugalna maksad bana liya jaye to kuch kehna bekar ho jata he. Mujhe bharat par garv he hmari sanskirti hi esi he ki ashishunta isme vyapat nahi ho sakti, wo khatam ho jati hai. Chahe wo kisi bhi varg dwara ki jaye. Wese bhi sirf muslim ya isaai dharm ka andha virodh kar hamko satyvadi hindu ya rashtrbhakt banne ka certificate kisi bhi sangh ya party se nahi chahiye. Mahoday aapka aabhar vyakt karte hue.
          Yadi koi galat ya kathor shabd istemal hua ho to kirpiya usko ignore karen. Lekin ye hamra pakka vishwas aur soch he aur rahegi

          Reply
          • shishir chandra

            दीपा शर्मा जी मुझे खेद है कि मेरे विचारों से आप आहत हुईं. प्रवक्ता के पाठकों के स्तम्भ पाठकों के अपने होते हैं. ये कहना ठीक नहीं होगा की ये प्रवक्ता के विचार हैं. पाठक अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र है. यहाँ कोई सेंसर नहीं है. जैसे मेरे और आप के विरोधाभासी विचारो को स्थान मिल रहा है. इससे आप ये नहीं कह सकतीं कि पत्र केवल समर्थक विचारों को शामिल करती है.
            मुस्लिम धर्मं का विरोध इसलिए नहीं है कि ये हम हिन्दू हैं. मैं नास्तिक हूँ. लेकिन इस धर्मं में निहित बुराइयों पर हमला करता हूँ. मेरे दृष्टि में ये दुनिया का सबसे तंग धर्म है.

          • shishir chandra

            दीपा जी आप यदि मुस्लिम धर्म को करीब से देखते तो आप इस धर्म के बारे में जान पाएंगे. इसके मूल में इस धर्म की जड़ता है. कुरान में लिखी गई बातों को आप कहीं भी चैलेन्ज नहीं कर सकते. पिछले 13 सौ सालों से यह जस के तस चला आ रहा है. आप देखी अहमदिया लोगों की क्या दशा है? शिया और सुन्नी आपस में क्यों लड़ते हैं? महिलाओं की क्या दशा है? कट्टरवाद की शिक्षा दी जा रही है. मुस्लिम का ब्रेन वाश हो जाता है. और फिर उनमे से एक छोटा हिस्सा अराजक गतिविधियों में लिप्त हो जाता है. सबसे बड़ी समस्या इस धर्म में उदारवादी ताकतों का अभाव है. मुस्लिम देशों के कानून, महिलाओं की दशा, अल्पसंख्कों की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं रहती. मैंने कहा की यह समुदाय एक औरत पर जानलेवा हमले को भी सही ठहराने में शर्म नहीं आई. इन सिरफिरों ने गोधरा में ट्रेन को निशाना बनाया था. मुस्लीम इतने अधिक हिंसक क्यों हो जाते हैं? अपने धर्म की निंदा पर ये मौत का फतवा जरी कर देते हैं. आखिर कौन इनको काबू में करेगा

          • दीपा शर्मा

            Deepa sharma

            Iska jawab me apko aaram se dungi. Qki isme kai samsyaen uthai gai he..
            Jinke liye muje kuch samay chaiye.

          • shishir chandra

            thank you deepaji for your response of my all comments. indeed take time and reply me. are you fine deepaji and where do you live? you are a candid writer. sure you would go ahead on this field. i want just sharpness on your comments and see all aspects of angle. i can understand your pain deepaji.
            ok again thank you for your response. i am not related to sangh just i have become a new reader so pravkta. ok nice for you

          • दीपा शर्मा

            Deepa sharma

            Me bi yaha nayee hun. Last month se hun. Law graduate hun. Uttrakhand se hun. Dehradun se. Judiciary ki tayyari kar rahi hun. Mere kuch exam hen islye waqt ki tangi he. 8 aup ko mp civil judge pre aur 19 ko uk pcs j main exam. Thoda tight shedule hone ki wajah se mene apse time manga tha. Mera email ad. He. Mahi1deepa@gmail.com mujhe yahan akar acha lagta he. Kai lekhak jinko mene jana he mujhe pasand hen. Jinme mina ji, tiwari ji, madhusudhan ji, aur rajesh kapoor jese kai log hen. Kuch muslim laikhak yahan dharohar ke saman hein. Jb me thoda free ho jaungi to kuch laikh zarur likhungi. Qki ye ek esa rasta he jo hamre dirshtikaun ko saaf karta hai. Mere vicharo me kuch nakaratmakta ho sakti he jo kuch jevan me hota he uska prbhav bana rehta hai mujhe lagta he wo yahan dur ho sakta he aur mein aur behtar soch sakti hun. Me nastik nahi hun or ishwar aur dharm me vishwas rakti hun. Par mere liye dharm ki bhasha parmpragat nahi he jo bhi grahan karne yogye ho wahi dharm he aur apna dhrm sarvsresht hota hai. Mera yahi manna hai. Iske atirikt yadi apko kuch janna ho to kirpiya sankoch na karen.

          • shishir chandra

            दीपा जी आप के विचार बहुत सुलझे हुए हैं. मुझे तो आपसे सीखना पड़ेगा. आप यदि देवनागरी स्क्रिप्ट में हिंदी लिखतीं तो अच्छा रहता. मै परीक्षा में आप की सफलता की कामना करता हूँ. संघ भी इसी समाज का प्रतिबिम्ब है. समाज से कोई भी संगठन प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. यदि समाज में बुराई है तो संघ भी किसी न किसी रूप में प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. मैंने अपने कई लेखों में संघ की कमियों की ओर ध्यान आक्रिस्ट कराने की कोशिश की है. तथापि संघ अपने दोषरहित विचारों, जीवन में शुचिता और राष्ट्रवादी विचारों के कारण सराहनीय है. देश में संघ के बराबर का कोई भी राष्ट्रवादी संगठन नहीं है. कुलदीप नैयर ने भी राष्ट्रवादी पार्टी की अपरिहार्यता का उल्लेख किया है. दीपा जी मै पुनः आपके कलम की सराहना करता हूँ.

    • shishir chandra

      प्रवक्ता में तिवारी जी आपके विचार पढ़ के ख़ुशी हुई. आपने अपने आप को अलग हटा ke चर्चा की यह मुझे नहीं जंचा. हो सकता है आप से सब डरते हों लेकिन हम जैसे कमजोर लोग भी हैं जो रोज परेशानियाँ फेस करते हैं. आपकी जाति का उल्लेख अनावश्यक था. हिन्दू धर्म की समस्याओं के लिए संघ जिम्मेदार नहीं. और इसे ठीक करने की जवाबदारी हम सब की है. भौतिकतावाद सभी जगह हावी है. इस समस्या को tackle करना काफी कठिन kam है. iske लिए सभी को aage aana hoga

      Reply
  35. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    शिरीष जी जिन विकराल समस्याओं का सामना आप कर रहे हैं, भारतीयों के सामने उनकी ठीक से प्रस्तुती समाधान की दिशा में एक अति उत्तम प्रयास है. तथ्यों को और धारदार भाषा व ढंग से उठाने का प्रयास करना उचित ,उपयोगी होगा.
    आपकी पीड़ा में मुझ जैसे करोड़ों भागीदार हैं. आप उन सब तक और वे सब आप तक अपनी संवेदनाएं पहुंचाने में समर्थ नहीं हो रहे. औरन्ग्ज़ेब के काल जैसी यातना का अनुमान केवल उन्हीं को है जो मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी में रहने के लिए अभिशप्त हैं.
    तथाकथित सेकुलरिस्टों से मेरा एक सरल और सीधा सा प्रश्न है की भारत की वे बस्तियां बतलाएं जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और वहां कोई धोती वाला,चोटी वाला , कोई बहु-बेटी वाला हिन्दू सुरक्षित रह सकता हो, सम्मानजनक ढंग से रह सकता हो? पाकिस्तान तथा दूसरे मुस्लिम देशों की तरह सिख ,जैन, बौध, ईसाईयों की दुर्दशा मुस्लिम बहुल भारतीय बस्तियों में शरेआम, हर रोज़ होती है जिसकी अनदेखी मीडिया और हमारे ढोंगी धर्म निर्पेक्षतावादी करते हैं. इन बस्तियों में रहना तो क्या, इनमें से सुरक्षित गुज़रना तक आतंक कारी, भयावह अनुभव होता है.
    किसी मुस्लिम भाई को हिन्दू बहुसंख्यक शहर, गाँव, बस्ती में कोई मुश्किल आई कभी? सच पर परदे डालने का काम, कहते हैं न ‘जूतों सहित आँखों में घुसाने का प्रयास’ हो रहा है.
    कितने पकिस्तान, कितने काश्मीर और बनेंगे? कितने छोटे पकिस्तान बन चुके हैं भारत में? इस सच को उजागर करने के हर प्रयास की ह्त्या कर दी जाती है. ऐसे व्यक्ती और संगठन को बुरी तरह बदनाम,प्रताड़ित करने का प्रत्येक उचित(?),अनुचित प्रयास करने में कोई कसर नहीं छोडी जाती. हमारे द्वारा चुनी पर विदेशियों के इशारे पर,विदेशियों के हित में काम करने वाली सरकार की सारी सरकारी मशीनरी की ताकत देश विरोधियों के हित में खडी रहती है. राष्ट्र भक्तों व राष्ट्र हितों की दुश्मन ताकतों को सत्ता की ताकत दुबारा नहीं मिलने देनी है, इसके लिए जुटना ही पडेगा.
    # संघ से आपकी उम्मीदें बहुत हैं और जायज़ हैं. संघ व संघ के लोग आसमान से उतरे फ़रिश्ते नहीं है. सारे समाज में होरहे पतन से पूरी तरह अछूता कैसे रहा जासकता है? आज जो हालात हैं उन में संघ की भूमिका औरों की तुलना में कैसी है, इस आधार पर संघ का मूल्यांकन करेंगे तो आपको शायद इतनी शिकायत नहीं रह जायेगी. कई बातें प्रशंसा के योग्य भी नज़र आने लगेंगी. इतना तो नज़र आ ही रहा है कि अतीत में संघ द्वारा किये गए अभूतपूर्व बलिदानों व कार्यों की जानकारी और उसके कारण संघ के लिए श्रद्धा भावना आपकी है. तभी तो अपेक्षाएं भी हैं. पर यह भी सोचें कि संघ को कमजोर बनाने,मिटाने की कितनी कोशिशें प्रत्यक्ष और परोक्ष की जाती होंगी? उन सबके चलते अगर हम संघ की अधिक आलोचना करेंगे, जाने-अनजाने उसे बदनाम करने में कहीं हम भी भागीदार होजाएंगे तो किसका फायदा होगा? जानता हूँ कि आप बुद्धिमान हैं, सब ध्यान में आ गया होगा.
    एक बार फिर, काश किसी तरह मैं प्रत्यक्ष आपकी पीड़ा में भागीदारी, उसके समाधान में कुछ कर पाता. सादर,सप्रेम आपका अपना,

    Reply
  36. Saurabh Tripathi

    संजीव जी नमस्कार
    आपने जो कहा एकदम सही कहा संघ को इस फैलाये जा रहे पोपोगंडा की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए
    हाथी चले बाज़ार में कुत्ते भुकें हजार
    साधून को दुर्भाव नहीं जो नींदे संसार

    Reply
  37. shishir chandra

    डॉ राजेश कपूर जी आपके लेख के लिए धन्यवाद. मैं आज संघ से निराश हो चला हूँ. बीजेपी पॉवर में आयी तो भी यक्ष प्रश्न ज्यों के त्यों मुहं बांयें कड़ी है. आरक्षण आर्थिक आधार पर क्यों नहीं, जाती आधार पर क्यों? जातिवाद को मिटने के लिए कोई आन्दोलन नहीं दीखता. मस्जिदों में loudspeaker पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाया जाता? मेरे यहाँ यह रोजमर्रा का हिस्सा है. क्या मुट्ठी भर मुसलमान यह निर्णय करेंगे की हमको क्या सुनना है? आमिर हिन्दू पाश इलाके में घर ले लेते हैं जिससे उनको मस्जिदों से निजात मिल जाती है , लेकिन हम जैसे नास्तिकों का क्या? क्या loudspkear को मस्जिदों से हटाया नहीं जा सकता? यदि नहीं तो क्यों नहीं मुझ जैसे लोगों को अलग देश दे दिया जाता? संघ ही एकमात्र संस्था है जिसकी तरफ सभी आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं. संघ को कमान लेकर कारवां आगे बढ़ाना होगा.

    Reply
  38. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    शिरीष जी, आप जैसों की संवेदनाएं अभी जीवित हैं जिनके कारण आप जैसे सब लोग अन्याय, अत्याचार के विरोध में आंदोलित होते हैं, कुछ करना चाहते हैं. यह मानवीय भावनाएं, ये संवेदनशीलता ही तो संसार की व्यापारी और दानवी ताकतों के रास्ते की रुकावट है, उनकी समस्या है. अतः इसे समाप्त करने की एक अंतरराष्ट्रीय गुप्त योजना चल रही है.

    # इस योजना या प्रयास को ‘ब्रेन कंट्रोल कान्स्पीरेसी’ के नाम से जाना जाता है. हमारी सोच, हमारे विचारों को नियंत्रित करने के लिए जिन अनेक उपायों का इस्तेमाल किया जाता है उनमें से कुछ का संकेत ये है—–
    * मीडिया के माध्यम से हमारी जानकारी के बिना हमें, हमारे विचारों को अपनी पसंद की किसी दिशा में संचालित कर देना. ठीक को गलत और गलत को ठीक मनवाने तक हमें मूर्ख बना देना.
    * अनेक रसायनों का प्रयोग करके हमारे स्नायु तंत्र को इतना कमजोर बना देना कि किसी विषय को समझने की, गहराई तक जाने की, कठिन विषय पर अपना ध्यान देर तक लगाने की हमारी क्षमता बहुत दुर्बल होजाए या फिर समाप्त होजाए. आप देख रहे हैं न कि हमारे कोमल छोटे बच्चों की मानसिक और शारीरिक क्षमताएं लगातार कम होती जा रही हैं. उनकी भूख कम है और चेहरे सफ़ेद या पीले हैं. जानते हैं क्यों ? बोतल बंद या पैकिट बंद आहार में हमें और उनको ‘मोनोसोडियम ग्लूटामेट’ नामक घातक रसायन खिलाया जा रहा है.
    इससे स्नायुकोश सबसे पहले नष्ट होने लगते हैं और फिर लीवर, गुर्दे, तिल्ली, ह्रदय आदी अंग भी बुरी तरह खराब होने लगते हैं. इसके इलावा एसपारटेम, ,स्प्लेंडा , कौर्न उत्पाद, सुगंध, रंग, प्रिज़र्वेटिव आदि अनेक घातक रसायन डाले होते हैं.
    हमारा-आपका ‘बी बी बी ( ब्लड-ब्रेन बैरियर) बन चुका है, इसलिए हम बड़ों को नुक्सान तो होता है पर कुछ कम. हमारे कोमल बच्चों का यह सुरक्षा तंत्र अभी बना नहीं होता इसलिए उन्हें गंभीर, अपूर्णीय नुक्सान होता है.
    *एक और बड़ा ही अमानवीय प्रयोग हमारी संवेदनाओं को समाप्त करने के लिए हमपर (निसंदेह हमें बताये बिना) किया जा रहा है. तनाव, उत्तेजना, उच्च-रक्तचाप
    की चिकित्सा के लिए ‘बीटाब्लाकर प्रोपेनैलोल’ नमक साल्ट अनेक वर्षों से हमें खिलाया जा रहा है. इसके प्रभाव से हमारी सारी मानवीय संवेदनाएं समाप्त होजाती हैं और हम नीरे पशु बन जाते हैं. करुना, दया, ममता, प्रेम जैसे भावों की ह्त्या करने जैसा गंभीर अपराध इन दवा कम्पनियों द्वारा, सरकार के सहयोग से, संसार को नियंत्रित, संचालित करने वाली ताकतों के इशारे पर हो रहा है.
    * इसी प्रकार और भी आनेक जैविक. रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करके हमारे दिल, दिमाग, शरीर को कमज़ोर बनाने और मनमर्जी से चलाने का काम बड़े व्यापक स्तर पर, गुप-चुप, बड़ी चालाकी से चल रहा है. मज़े की बात ये है कि सबसे अधिक रासायनिक और जैविक हथियारों का प्रयोग करने वाली ये शक्तियां हम सबका ध्यान बंटाने के लिए ईराक, इरान के उन परमाणु व रासायनिक-जैविक हथियारों का डर फैलाते रहते हैं जो कि शायद ही हों. अगर हुए भी तो इतने कम कि इन दानवों के आगे उनकी कोई गिनती नहीं.
    ## बड़े आनंद और प्रसन्नता की बात है कि असाध्य समस्या समझे जानेवाले इन रसायनों का सरल समाधान मुझे अपनी प्राचीन ऋषी परम्परा में केवल ६-७ मास के अध्ययन-मनन के बाद मिलगया. महीनों तक परेशान रहा था कि क्या करें, कैसे करें? वह समाधान मैं विनम्र भाव से और इस निवेदन के साथ रख रहा हूँ कि
    यह मेरी खोज, मेरी स्थापना नहीं है. यह उद्भासित हुआ है ईश्वर कृपा से और भारत के तपस्वी मनीषियों की कृपा से. आप-हम रसायनों से बचने का प्रयास केवल एक सीमा तक ही कर सकते हैं. जो रसायन हमारे अन्दर अनचाहे चले जाते हैं, उन्हें निकालने और अपनी क्षमताओं को बढाने के लिए —–
    १, रोज़ प्रातः और रात को सोते समय अपने नाक, कान, गुदा, नाभी में शुद्ध सरसों या नारियल या बादाम का तेल लगाएं. सर्वोत्तम है भारतीय गो का घी जो मिट्टी के बर्तन में दही जमाकर प्राप्त किया हो. हमने तो अजमाया है , आप आजमालें. अनेक रोग ठीक होने के इलावा अंदर जमे धातु विष तक निकल जाते हैं. सरवाईकल-स्पांडेलाईटिस जैसा असाध्य रोग भी हमने १-२ दिन में ठीक होते देखा है.
    २. हम जितना तनाव से भरे होते हैं उतना ही रोग तथा विजातीय पदार्थ (Foreign-matter) हामारे अन्दर मजबूती से जमे रहते हैं. निदान सही होगया तो फिर इलाज भी आसान होगया. तन और मन को शिथिल करदें. आपके अंतर मन, स्नायुकोश,
    नस-नाड़ियों के शिथिल होते ही सारे विष पदार्थ श्वास,मल, मूत्र, पसीने द्वारा बहार निकलने लगेंगे. बस पानी अधिक पीयें. प्राणायाम करें, क्योंकि सबसे अधिक मल पदार्थ सांस में ही बाहर निकलते हैं. याद रहे कि दस्त, जुकाम,सर दर्द होने पर समझ जाएँ कि सफाई होरही है. एलोपैथिक दवा खाने की भूल न करें. बहुत ज़रूरी होने पर कोई आयुर्वैदिक या होमियोपैथिक दवा लें. वैसे तो ऊपर कहे रोग आपके सारे रोगों की जड़ काटने वाले सिद्ध होंगे. किसी अनुभवी की सलाह तो ले लेनी पड़ेगी.
    ३. अपामार्ग, पुनर्नवा, भुई आमला, तुलसी, नीम, गिलोय, बील्ब, पीपल,सिरस आदि का शीत निर्यास या क्वाथ हर रोज़ एक बार लेते रहें. जीवन में डाक्टर से शायद ही वास्ता पड़े.
    ४. हर दाल-सब्जी में तडका देते समय थोड़ी राई ज़रूर डालें या राई पीस कर सब्जी के ऊपर डाल दें. कैंसर सहित कई रोग घर से दूर ही रहेंगे.
    ५. स्वदेशी गो के गोबर का १-२ इंच का टुकडा लें और इसपर थोड़ा स्वदेशी गो-घृत लगाकर धुप की तरह प्रातः-सायं धूप की तरह जलादिया करें. इसके ऊपर २-४ दाने किशमिश,मुनक्का, दाख या गुड के डाल कर जलने दें. विश्व के अनेक वैज्ञानिकों की खोजों के अनुसार ऐसा करने से लगभग हर प्रकार के, प्लेग, हैजा, टीबी तक के रोगाणु मर जाते हैं. आधे घंटे में ९०% से अधिक कीटाणु- रोगाणु समाप्त होने के इलावा एक असंभव काम और संपन्न होगा. आपके आस-पास की रेडियेशन, रेडिओ धर्मिता भी समाप्त होजायेगी. अर्थात मोबाईल, कम्प्यूटर, रेफ्रीजीरेटर, गीज़र आदि के दुशप्रभाव भी अनायास समाप्त हो जायेंगे. है न कमाल पर याद रखें कि यह कमाल केवल ‘ए-२’ प्रोटीन वाले यानी भारतीय गोवंश के गोबर, गोमूत्र, घी, दूध से ही संभव होगा.
    मैकाले के मानस पुत्रों, नाटकबाज़ सेक्युलरिस्टों और भारत-भारतीयता से चिढने वालों को इस सूचना से होसकता है कि काफी परेशानी हो. पर अमेरीकन गोवंश यानी ‘ए-१’ प्रोटीन वाली इन गौओं के उत्पाद विषैले होने की खोज आकलैंड में हुई है, जो कि भारत के एजेंट बिलकुल नहीं हैं. तो कुल मिलाकर रसायनों की ये विपदा कोई ख़ास बात नहीं है, निपट लेंगे. बस ज़रा अपने स्वदेशी गोवंश और अपने बीजों को बचाना होगा. सरसों का तेल ‘जीएम्’ यानी ज़हरीला होगा तो मुश्किल होजायेगी.
    ६. *अंत में* : केवल १०-१५ मिनेट ॐ बोलने से अनेकों असाध्य रोग ठीक होते हैं. अमेरीका के एम्.डी.चिकित्सक डा.जे.मोर्गन ने ४५०० (२००महिलाये+२५००पुरुष)
    रोगियों की चिकित्सा केवल ॐ बुलवाकर, बिना दवाओं से की थी. ये सभी मानसिक और ह्रदय रोगों के असाध्य मान लिए गए रोगी थे. तो बस हर रोज़ कुछ देर ॐ बोले और उसका कमाल देखें. केवल १९-१२ दिन में अचा-खासा असर हो जाता है. बच्चों पर तो ३-४ दिन में ही असर नज़र आने लगेगा. !! इती शुभम !!

    Reply
    • Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

      संग्रहनीय जानकारी! इसके लिए पाठक और मानव के रूप में आपका आभारी हूँ! इस जानकारी को अधिकाधिक प्रसारित और प्रचारित किये जाने की जरूरत है! मैं आशा करता हूँ की आपकी जानकारी के स्त्रोतों की विश्वसनीयता भी आपने अवश्य जांच ली होगी!

      Reply
    • shishir chandra

      dr rajesh kapoor ji apki vivid jankari ke liye apko dhanyavad. sure you have focused on the darken portion of westernization. this is subject of debate and research. i see there is no serious effort to stop such nonsense items from indian market and life. there is a lot of trouble and drawbacks of our current system. therefore no responsible person is interested to rectify the problems of concerning area. indian bureaucrats are busy in making money and indian politicians are not such competent to understand or rectify the problem. The racket of politician and bureaucrats must be attacked and must severe try to bring a responsible machinary and political system for sake. bjp also failed to bring such transparent system. the major concern for india is transparency.

      Reply
  39. shishir chandra

    संजीव जी आपने सही फ़रमाया है. लेकिन संघ के सामने अपने सिमटते आधार को बनाये रखने की कठिन चुनौती आन पड़ी है. स्वदेशी आन्दोलन लुप्तप्राय होने लगी है. यदि प्रोपेगेंडा वर से छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी दशकों तक शासन कर सकते हैं तो फिर सच्चाई की ताकत इतनी कमजोर क्यों पड़ने लगी? मुझको लगता है संघ अपने अधिकतम ऊंचाई को छू चूका है. अब संघ वापिस नीचे आने लगा है. संघ माने या न माने बीजेपी की असफलता या सफलता संघ को अन्दर तक प्रभावित करती है. बीजेपी की गलत नीतियां ही राष्ट्रवादी सोच को आमजनमानस से दूर ले जा रही है. अपने मुख्या मुद्दों से इस कदर समझौता ने संघ और बीजेपी की साख को धक्का पहुँचाया है. बीजेपी को यदि मंदिर नहीं बनवाना था तो उसे इसे मुद्दा ही नहीं बनाना था. आज देश के कट्टरपंथी मुसलमानों ने तसलीमा नसरीन का जीना दूभर कर दिया है. क्या बीजेपी और संघ का दायित्व नहीं बनता की वे खुलकर लेखिका के समर्थन में सामने आयें. सिर्फ इसलिए की वो संघ की ideology में यकीन नहीं करती, इसलिए समर्थन नहीं किया जा सकता. वो वापिस कोल्कता नहीं जा सकती क्योंकि मुसलमानों ने शहर को बंधक बना रखा है? क्या कोलकाता बंगलादेश में शामिल नहीं कर देना चाहिए? क्या भारतीयों को अरबी लोग बतायंगे की हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं. कट्टरपंथी मुसलमानों की इतनी हिम्मत की वो इतने बड़े शहर को जब चाहे तब बंधक बना ले. संघ को इन कट्टरपन्थियो से लोहा लेना को आगे आना चाहिए. खून का पहला कतरा बहाने को मैं तैयार हूँ. जय हिंद

    Reply
    • दीपा शर्मा

      Deepa sharma

      Kolkata ko b.desh me milane ki baat karna acha nahee lagta? Aur upaay bi kiye ja sakte hen. Itna ugar hona he hinduo ko bdnam kar raha he. Kirpiya dhyan rakhen

      Reply
      • shishir chandra

        प्रिय दीपा शर्मा जी मुझे खेद है कि मेरे लेख से आपकी भावनाएं आहत हुईं. यह मेरा हिन्दू बहुल कोलकाता पर कटाक्ष था. बंगाल की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियाँ मुस्लिमों के जरदोश गुलाम हैं. 25 प्रतिशत मुस्लिम जनसँख्या ने बंगाल को मुसलामानों का बंधक बना रखा है. क्या अल्पसंख्यक ही शासन करने के लिए बने हैं? 75 प्रतिशत की कोई विचारधारा नहीं है? यदि ऐसा है तो सभी मुसलमान क्यों नहीं बन जाते? तसलीमा नसरीन मेरी आदर्श हैं. और उनके सम्मान की रक्षा के लिए मुझसे चुप रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती…………………………………… आज कोलकाता शहर का हृदय पाषाण की तरह कठोर हो गया है. मैं तो देख कर ही सहम जाता हूँ. आज कोलकाता बेजान है, जो अपनों का न हो सका, भला दूसरों का क्या होगा. इस मृत शहर के लिए मुझे अपने उदबोधन पर कोई खेद नहीं है. यदि यह शहर तसलीमा नसरीन को वापिस पा सका तभी मैं अपने शब्द वापिस लूँगा अन्यथा नहीं.

        Reply
        • दीपा शर्मा

          Deepa sharma

          Mahoday. Pura desh hindu bahul he. Voto ki rajniti me minority ka kya dosh? Unko kya fayda hota he. Aap khud samajh sakte hen. Vese bhi könsi jagah minority raaj kar rahi he? Bhagwan ne hamko sahi galat dekhne ko aankhen di he. Vichar karen. Minority ki position kya he. Fir bole? Taslima koi dudh ki dhuli nahi he. Khud ko charcha me lane k lye galat likhna bura hota he. Jese me likh dun ki ram-krishn ka astitv nahi. Naam(bdnaam) ho jayga. Lekin kya aap mujhe maaf karenge. Kirpiya sarthak behas karen khud ko gussa dilakar apna dimag ashant na karen. Isse aapka nuksaan hoga.

          Reply
          • shishir chandra

            sorry deepa sharmaji mai aap se sahmat nahi hoon. kaun sahi hai aur kaun galat iska faisla kanoon karta hai. aap kaise certificate de sakti hain. manniya calcutta high court ne unki sabhi books par se pratibandh utha diya hai. apne lajja ya dwikhandita padhi hai? please padhne ke baad aap nasreen ka mulyankan karen. kripaya satahi tippni se bachen. aapne sabhi hinduon ko ek hi taraju se taula hai. jabki unme matantar hai. hindu jati me bante hain. aur secular parties mandal ki rajniti se unme phoot dalne me kamyab ho rahe hain. aapne meri bangal ki chintaon ko sathi taur par nahi liya hai. votebank bade samuh par bhari padti hai. aur 25 % muslims secular parties ka votbank hain. ye rajya ki neetiyon ko apne is hoonar ke dwara gambhir roop se prabhavit karte hain. apne to kolkatta me hue dange tak ke baare me chuppi saadh li hai jaise kuch bhi galat nahi hua. nasreen par janleva hamla kalkatta aur hyderabad me kaise sahi thahra sekti hain. kya galat lekhakon ko maar dena chahie? please reply me

  40. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    शिशिर जी–http://www.hssus.org/content/view/230/1/ वेब साइट आप देख लें, तो आपकी बहुत सारी शंकाओंका समाधान हो सकता है।
    कुछ आपके सवाल भारतमें किसी “संघ कार्यालय” में जाकर पूछना पडेंगे,मैं उत्तर न दे पाउंगा।कुछ अन्य बिंदू रखता हूं।
    (१)संघ आज त्रिनिदाद, सुरीनाम, गयाना, कॅनडा, अमरिका,U K, अफ्रिका इत्यादि ३५ देशोमें फैला हुआ है। USA का गणवेष अलग और आकर्षक है।
    (२)गण वेष,हर कोई को न्यूनतम मूल्यपर(मुफ्त नहीं)बेचा जाता है।दैनिक शाखामें आवश्यक नहीं है।(३)आज्ञाएं/प्रार्थना संस्कृतमें इसलिए हैं, कि संघको सारे(दक्षिण में भी)भारतमें,और बाहर भी काम करना हैं।पहले हिंदीमें थी।गीत हर भाषामें है। प्रार्थना मराठी->हिंदी->अंतमें संस्कृत हुयी।(४)शाखामें खेल,गीत,और कहीं कहीं घोष (Band)वादन, लेझिम,दंड इत्यादि शिक्षा होती है, यह सारे कुछ सीमातक रंजक ही होते हैं।(५)सारे संघवाले प्रचारक नहीं हैं।१५-२० शाखाओंपर एक प्रचारक,(मेरा अनुमान)है।फिर कुछ लोगोंको प्रचारक होना पडेगा।सारे प्रचारक अविवाहित नहीं है, पर बिना वेतन काम करते हैं।किसीको विवश नहीं किया जाता, श्वेच्छासे ३ या ५, १० साल, या फिर आजीवन प्रचारक होते हैं।
    (६)इस संस्थाके O T C (Training Camp)सभी प्रदेशोमें लगते हैं। जहां ३ से ४ सप्ताह तक हजारों (१०+ हजार) शिक्षार्थी, हर वर्ष,अपना शुल्क भरकर आते हैं।
    इस वर्ष सारे राज्योंमे O T C लगे थे।
    BBC का Statement है, कि संसारकी सबसे बडी स्वयंसेवी संस्था R S S है। संघ की तुलना किसी और स्वयंसेवी संस्थासे करें। राजकीय पार्टीसे ना करें।
    मेरी जानकारी से उत्तर दिएं हैं। मैं कोई संघका प्रवक्ता नहीं हूं। पर प्रामाणिक उत्तर दिए हैं।
    संघ मानता है, मै भी सहमत हूं, कि **राज्य सत्ता काबिज़ करनेसे खास कुछ नहीं हो सकता; मात्र सहायता हो सकती है।राष्ट्रीय समाज Critical Mass में तैय्यार हो,तो अंतर आनेकी संभावना बढ जाती है।सत्त्ता अपने आपमें कुछ नहीं कर सकती। क्या यह हमारा ६३ वर्षॊंका अनुभव नहीं है?
    यह आपको समझने में कठिन लग सकता है,पर अशक्य नहीं है।
    कई प्रश्न अनुत्तरित रहें है। भारतमें आप किसी कार्यालयसे संपर्क करें। और विशेष “एकात्म मानव दर्शन” और अन्य “विचार नवनित” पढें।जानकारी के लिए,भारतमें आप किसी कार्यालयसे संपर्क करें।
    शुभेच्छा।

    Reply
  41. दीपा शर्मा

    Deepa sharma

    Sangh rajnitik party nahi he aur tulna thik nahee hogi. Sangh ne jb se rajniti me paroksh dakhal dena shuru kiya he. Iski maanyata ghat rahe he aap utsah me ye dhyan dena bhul gaye. Iske atirikt ab sangh uttejit karyvahee kar raha hai or thakray’s k raste par ja raha hai. Ye afsos ki baat he

    Reply
  42. shishir chandra

    धन्यवाद मधुसुधन जी. मै समझाता हूँ कि संघ आज पुनः पिछड़ गया है. संघ समाया के साथ कदम ताल नहीं कर प् रहा है. यदि संघ या इसका अनुसांगिक संगठन एक बार दिल्ली में काबिज हो सकते हैं तो फिर क्या कारन है कि दुबारा संघर्ष करना पद रहा है? मै संघ कि साखा में कुछ दिन गया था. आज लोग साखा में जाने से कतरा रहे हैं तो उसके पीछे वाजिब कारन है. लोगों के पास समयाभाव है. हिन्दू शायद ही कभी मंदिर जाता है. बच्चों को अपना भविष्य देखना है. संघ कि कार्य प्रणाली भी अप्रचलित है. संघ का ड्रेस नयी पीढ़ी पचा नहीं पाती. मै सोचता हूँ कि संघ को क्लिष्ट संस्कृत शब्दों के बजाये सामान्य हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग करना चाहिए. संघ की शाखाओं का माहौल बोरिंग होने के बजाये मनोरंजक और ज्ञानवर्धक होना चाहिए. ड्रेस कोड में छुट देना चाहिए.अभिनव विचारों को प्रोत्साहन देना चाहिए. हमें पीछे ही नहीं आगे भी देखना चाहिए. धर्मं जैसे विषय पर ज्यादा स्ट्रेस नहीं देना चाहिए. शादी नहीं करने जैसे त्याग को प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए. जातिवाद जैसे बुरे अभी भी ज्यों की त्यों बनी हूई है. संघ को और कडाई से इस बुराई से लड़ना चाहिए. संघ के लोगों को अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करना चाहिए. अभी भी हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों से लड़ने के लिए मैदान खाली है. संघ को इस खाली जगह को भरना होगा. मै नहीं सोचता की संघ विदेशी कांग्रेस पार्टी को परस्त नहीं कर पायेगा. भ्रष्ट बीजेपी को कांग्रेस्सिकरण से बचने की महती जवाबदारी संघ के सिर में आन पड़ी है. यदि बीजेपी इस कदर मुद्दों से भटकता रहा तो इस पार्टी का नामलेवा भी कोई नहीं बचेगा. मेरे एरिया में एक भी बीजेपी कार्यकर्ता नहीं जो इमानदार हो. संघ को इससे सतर्क रहना होगा.

    Reply
  43. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    shishir chandra==>”sangh must control it’s auxiliery organizations”
    शिशिर जी यह सही नहीं है।संघ केवल परामर्शक रहे। संघ डिक्टेटर ना बने। नहीं तो फिर दूसरा USSR जिसमें सभीको कंट्रोल करते करते,सारा संघ भ्रष्ट हो सकता है।यह हिंदू विचारधारा भी नहीं है। संघ ठीक ही कर रहा है।हजार वर्षकी दास्यता और मतिभ्रम (Brain Washed Condition) निकालना इतना सरल नहीं।

    केवल आप जैसे भी उस कार्यमें सम्मिलित होने की आवश्यकता है। अलग संस्थाएं अलग ही ठीक है। यह आपको दीनदयालजी के एकात्म मानव दर्शन में वर्णित किया मिलेगा। आज T V, सिनेमा, और अन्य प्रलोभनोके कारण संघका कार्य मुझेभी कठिन लगता है।
    सारे हिंदू(और अन्य) समाजको भी, संघ समझना चाहिए,और उचित लगे तो,सहायक होना चाहिए। भारतका भविष्य इसीपर निर्भर करता है, ऐसी मेरी दृढ मान्यता है।

    Reply
  44. shishir chandra

    sangh must reunite itself. now this is demand of time to rethink about itself. the shrinking support of sangh is major concern for this organization. they must come with different weapons to save india’s culture and heritage. if sangh fails then entire patriatic vision will be failed and this will be destructive for india. sangh must control it’s auxiliery organizations and never compromise its ideaology. sangh must avoid cheap politics. it must keep hightech itself because this is need of time. it’s political win must keep distance with oppurtunist and such parties. latest example is mr Nitish kumar who humiliate it’s ideaology such people must be kick off from it’s fold. he is not helping sangh but only it is helping bjp to enjoy power. sangh must composite review its idealogy, it’s plannig and think about it’s failure. you can see bjp is much bigger than sangh and it means if bjp will break up with sangh then sangh will not able to sustain this loss

    Reply
  45. kaushalkishor

    Sangh ke bare men Aapne Satya hi likha hea. Men Swyam bhi sangh ka swyamsevak hon. lekin aajkal Sangh men bhi Aadambar ki Aadhikata Hoti Ja Rahi Hea . Sangh ke Pracharak bhi Aaramtalab Hote ja Rahe hen. Shakhayen jo ki Sangh ka Aadhar Hen Aaj Kagzon per chal Rahi hen. Vidyabharti ke Aacharya hi Mano Sangh ka Paryay rah Gaye Hen. Aapka Is Bare men Kya Kahna He?

    Reply
    • shishir chandra

      निस्संदेह कौशल किशोर जी संघ में भी बहुत सारी बुराइयाँ घुस आईं हैं. संघ के लोगों में भी सकारात्मक कम और नकारात्मक सोच ज्यादा देखने को मिल रहीं हैं. जैसे वो हिन्दू धर्म की बुराइयों पर कम और दूसरों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं. कितने संघी हैं जिन्होंने जाति व्यवस्था का परित्याग किया है? संघ यदि हिन्दू धर्म को सच्चे मायने में आधुनिक बना सके तो यह इस समाज की सबसे बड़ी सेवा होगी. संघ से सहानुभूति रखने वाले ही अक्सर दकियानुस होते हैं. लोगों का यह दोहरा रवैया ही संघ को कमजोर बनता हैं. संघ की शक्ति जिन लोगों में nihit है unhen aaj से ही kamar kasni होगी बुराइयों के khilaf. mai संघ को इस desh का ab tak का सबसे achchhat sangthan pata hoon.

      Reply
      • Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

        “संघ के लोगों में भी सकारात्मक कम और नकारात्मक सोच ज्यादा देखने को मिल रहीं हैं. जैसे वो हिन्दू धर्म की बुराइयों पर कम और दूसरों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं.”

        “संघ यदि हिन्दू धर्म को सच्चे मायने में आधुनिक बना सके तो यह इस समाज की सबसे बड़ी सेवा होगी. संघ से सहानुभूति रखने वाले ही अक्सर दकियानुस होते हैं.”

        उक्त दोनों बातें संघ के लिए अत्यधिक उपयोगी हो सकती है.

        Reply
        • shishir chandra

          निरंकुश जी मेरे विचारों के समर्थन और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद. आप का title “निरंकुश” मुझे काफी प्रभावित किया. मैं पाता हूँ कि हिन्दू धर्म की कुरीतियों पर कोई प्रहार नहीं करता. वो सिर्फ दूसरों की कमियों पर खुश होते रहते हैं. ये हमें याद रखना चाहिए कि उन्ही लोगों ने अधिक धर्म परिवर्तन किया, जो हिन्दू व्यवस्था में निचले पायदान पर थे. हिन्दू व्यवस्था में समानता, अभी भी व्यावहारिक कम और सैद्धांतिक अधिक है. हिन्दू व्यवस्था में और लचीलापन लाने कि जरुरत है. जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए एक आन्दोलन कि जरुरत है. आज भी अलग अलग जातियों में शादी दूर कि कौड़ी बनी हुई है. आरक्षण व्यवस्था अन्याय का प्रतीक बन गया है. जाति आधारित आरक्षण को तुरंत समाप्त करने कि जरुरत है. इसके जगह में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण दिया जा सकता है, जिसमे सभी जातियों और धर्म के गरीबों को शामिल किया जा सकता है.

          Reply
  46. कोदू परौहा

    सर्वप्रथम तो आपने संघ की तुलना कांग्रेस या कम्युनिस्ट आंदोलन से की समझ से परे है। संघ तो एक सांस्कृतिक संगठन है, फिर भला आपने कांग्रेस जैसे राजनीतिक संगठन एवं वामपंथी संगठनों से संघ की तुलना कितनी उचित है….

    Reply
  47. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    *********** भारतीय संस्कृति और संघ विरोधियों को सन्देश **********
    यही तो अंतर है सकारात्मक और नकारात्मक सोच का. पश्चिमी जगत सृष्टि में द्वन्द-संघर्ष, प्रतियोगिता देखता है, शत्रुता देखता है. भारतीय सोच इसके विपरीत प्रकृति में पूरकता, सहयोग, सामजस्य देखती है. घृणा और संघर्ष का कारन पश्चिमी विचारधाराएं हैं न की भारतीय सोच.
    सच की सच्ची चाहत है तो गहराई से अध्ययन करना ही पड़ेगा, उथली जानकारी के दम पर तो भटकते ही रह जायेंगे, कभी किनारे नहीं लगेंगे.
    पश्चिम की वामपंथी, दक्षिण पंथी विचारधाराएँ अनास्तिक और अमानवीय हैं. मनुष्य को पशुता की और लेजनेवाली हैं. पर सूडो-सेकुलर इसे नहीं मानेंगे. अतः अछा तो यही होगा कि कुछ साहित्य का अध्ययन कर लें. भारत और भारतीय संस्कृति को बहुत थोड़े में समझना हो तो दीनदयाल जी का ‘एकात्म मानव वाद’ बिना पूर्वाग्रह के ध्यान से पढ़ लें. बढ़ा समाधान मिलेगा,सुख मिलेगा, अनेकों अनसुलझे प्रश्न हल होजाएंगे.
    विश्ववास करिए कि भारतीय संस्कृति कि गहराइयों में उतरने लगेंगे तो सारे संसार के दर्शन फीके लेगने लगेंगे. हाद्दिक शुभ कामनाएं !

    Reply
    • Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

      आदरणीय कपूर साहब आपकी बात सच है, लेकिन दीनदयाल की विचारधारा के रक्षकों का चरित्र देखकर आपको क्या लगता है?

      Reply
  48. shishir chandra

    i am agree to this opinion. but there is a lot of failure of sangh. mr vaghela, kalyan singh, uma bharati, suresh soni are also from sangh. but what is their contribution for their parent organisation? mr nitin gadkari is not looking a capable leader. when you see the case of jharkhand, karnatika and bihar. why bjp is uncontrolled and behaving like a corporate? you can see the grass level of bjp workers mostly are totaly corrupt. it has now elminited the party with difference. why there is no clear stand on caste base reservation by sangh? i think rss is also confused like political parties. why Shibu soren has become cm on support of sangh’s man nitin gadkari? why reddi brothers hijacked the entire bjp in karnataka?
    they must try to give me answer why sangh is failed?

    Reply
  49. bhoopen

    sirf sangh ke andar hi jaatiwad ki baat nahi hoti hai ki wapas ghar aane ke baad bhi aisa hota hai………………………………..?

    Reply
  50. लोकेन्द्र सिंह राजपूत

    lokendra

    संघ के सारे काम प्रसंसनीय ही नहीं बल्कि अनुकरणीय हैं। मैंने संघ के कार्यकर्ताओं की जीवटता को देखा है। अच्छे पढ़े-लिखे लोग, उच्च जाति के लेकिन जाति बंधन से परे, घर छोड़ कर समाज सेवा में लगे रहते हैं। जाति को खत्म करने का सबसे बड़ा काम कोई कर रहा है तो वो संघ है, इतना ही नहीं पर्यावरण हो सामाजिक समरसता हो, पीछड़ों को स्वाबलंबी बना कर अंगड़ो के समकक्ष लाने का सार्थक प्रयास कोई कर रहा है तो वो संघ है। संघ यह सब बिना किसी शोर शराबे और प्रचार-प्रसार के करता है। जिनके विचार पवित्र और उच्च (संघ) होते हैं वे सदैव प्रगति करते हैं जिनके मन में मैल होता है (कम्यूनिष्ट व तथाकथित सेक्यूलर दल, पार्टिया व संगठन) वे घुट-घुट कर के ही मर जाते हैं।

    Reply
  51. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    apane bilkul sahi kaha,jaha ek or aj ke dour me yuva matr apane svarth ka chinatan kar,apani sankuchit soch me bethe he vahi sangh se jud kar lakho yuva na keval prtayksh rastrbhakti ka kam kar rahe he balki samaaj me vyapt anek bhedo ko mita kar ek samras samaj ka nirman kar rahe he.

    Reply
  52. संजय द्विवेदी

    SANJAY DWIVEDI

    संजीव जी, आपकी बात सही है। लेकिन आंखों पर अगर खास रंग का चश्मा लगा हो तो आप क्या कर सकते हैं। विरोधी भी आरएसएस के लोगों की प्रतिबद्धता, समर्पण और त्यागभावना का आदर करते हैं। उसके विचारों से भी प्रायः सहमत हैं लेकिन बंद कमरे में। बाहर आते ही वे अपने-अपने वोट बैंक को संबोधित करने लगते हैं। हिंदू समाज की एकता किसे प्रिय नहीं है। आप हिंदुस्तान का नक्शा उठाकर देखें जिस इलाके में हिंदू अल्पसंख्यक हुआ, उस इलाके में देशविरोधी ताकतें सिर उठाने लगीं। आप कश्मीर और पूर्वांचल के राज्यों से सेना और अर्द्धसैनिक बल हटाइए, फिर देखिए वहां भारतमाता की जय बोलने वाला कौन बचता है।जो विचार देश और राज्य की सीमा को नहीं मानते वे तो कम से कम संघ को देशभक्ति का पाठ न पढाएं। जो विचार से ही लोकतंत्र के विरोधी हैं वे हिंदुत्व की खामियां देखते हैं, जबकि हिंदुत्व अपने आप में सबसे बड़ा लोकतांत्रिक विचार है। भारत में इसलिए लोकतंत्र है क्योंकि यहां का बहुसंख्यक समाज हिंदू है। आप पूरी इस्लामी पट्टी में भारत के लोकतंत्र का समानांतर एक भी देश खोज सकें तो मुझे जरूर बता दें। हां, हिंदुत्व को गाली देने से दुकान चलती हो चलाइए, किसने रोका है।

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *