अस्तित्वहीन एक प्राणी : किन्नर

शोभा अनूप
आम समाज से अलग माने जाने वाले किन्नरों के बारे में कई धारणाएं और भ्रम आम लोगों के बीच देखने को मिलते हैं। किन्नर समुदाय समाज से अलग ही रहता है और इसी कारण आम लोगों में उनके जीवन और रहन-सहन को जानने की जिज्ञासा बनी रहती है। किन्नरों का वर्णन ग्रंथों में भी मिलता है। लेकिन उनकी असलियत या फिर कहें उनके पीछे तथ्य क्या हैं, कम ही लोग इस बारे में कुछ बता पाते है। यहां जानिए किन्नर समुदाय से जुड़ी कुछ खास बातें। हमें इनसे जुड़े भ्रम और सच्चाई के बारे में भी जानना जरूरी है।
भ्रम – आम लोगों के बीच किन्नरों को लेकर सबसे बड़ी धारणा यही होती है कि उनका शारीरिक बनावट पुरुष जैसा होता है या फिर स्त्री?
सच्चाई- अक्सर किन्नरों की शारीरिक बनावट पुरुष जैसी होती है। पूरी तरह किन्नर का रूप लेने के लिए ब्रेस्ट सर्जरी कराई जाती है, ताकि उनके समाज से लेकर आम लोगों के बीच भी उन्हें किन्नर के तौर पर देखा जाए। पुरुषों की तरह शरीर पर आने वाले बालों को हटाने के साथ-साथ बन-ठनकर रहना किन्नरों की इच्छा होती है।
भ्रम – कुछ इसी तरह यह भी आम लोगों में सुनने को मिलता है कि किन्नर की दुआ और बद्दुआ दोनों ही लगती हैं।
सच्चाई- किन्नर समुदाय के लोगों का कहना है कि किन्नर भगवान में असीम विश्वास रखते हैं। हम मानते हैं कि हमारा सीधा संपर्क भगवान से होता है। बचपन से लेकर बड़े होने तक वे दुख ही झेलते हैं। ऐसे में दुखिया दिल से निकली दुआ या बद्दुआ लगना स्वाभाविक है।
भ्रम – एक यह भी सवाल आम लोगों के जहन में रहता है कि कैसे किन्नर जान जाते हैं कि छोटा सा बच्चा बड़ा होकर किन्नर बन जाएगा। दरअसल, आम लोगों में यह अफवाह सुनने को मिलती है कि बच्चा किन्नर होने पर घर में आए किन्नर उन्हें ले जाते हैं।
सच्चाई- किन्नरों को पता लग जाता है कि किसी घर में किन्नर बच्चे का जन्म हुआ है। लडक़े के जन्म पर वे पता लगा लेते हैं, लेकिन लडक़ी के बारे में अक्सर नहीं जान पाते। बच्चा किन्नर पैदा होता है, तो किन्नर उसे घर से ले जाते हैं और मां-बाप को समझाते हैं कि यह बच्चा आपके लिए नहीं है। लडक़ी को बड़ा होकर ही पता चलता है कि वह असल में लडक़ी है या किन्नर। शुरुआती दौर में उसे लडक़ा बनने की इच्छा होती है। वैसे सेक्स से जुड़ी मानसिकता और रवैये से ही इस बारे में पता लग सकता है।
दक्षिण कोरिया में किन्नरों के ऊपर किए गए एक शोध से पता चला है कि किन्नर सामान्य लोगों की तुलना में ज्यादा दिनों तक जीवित रहते हैं। शोधकर्ताओं ने कोरियाई प्रायद्वीप में सैंकड़ों सालों से रहने वाले किन्नरों के जीवन से जुड़े घरेलू दस्तावेजों का अध्ययन किया। इस अध्ययन से ये नतीजा निकला कि बधियाकरण के कारण किन्नर ज्यादा दिनों तक जिंदा रहते है। शोध के अनुसार दूसरे लोगों की तुलना में किन्नर लगभग 20 साल अधिक जीवित रहते है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पुरूषों का हार्मोन उनकी उम्र को कम कर देता है। शोधकर्ताओं के अनुसार अगर बचपन की शुरुआत में ही बालकों के अंडकोष को काट दिया जाए तो उससे उनका विकास बाधित होता है और वे बालक कभी भी पूरी तरह से पुरुष नहीं बन पाते। इस शोध से जुड़े एक वैज्ञानिक डॉक्टर शीयोल कू ली का कहना था कि- कोरिया में रहने वाले किन्नरों के बारे में शोध से पता चला कि उनमें महिलाओं जैसे कुछ लक्षण पाए जाते थे जैसे उन्हें मूंछें नहीं होतीं थीं, उनके नितम्ब और छाती बहुत बड़े होते थे और उनकी आवाज काफी भारी होती थी। वैज्ञानिकों ने चोसुन वंश के शासन के दौरान शाही दरबार में काम करने वाले किन्नरों के बारे में उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन किया तो पता चला कि उस समय कुल 81 किन्नर शाही दरबार में काम करते थे। उन किन्नरों का जन्म सन 1556 से लेकर सन 1861 के बीच हुआ था। इन किन्नरों की औसत आयु 70 वर्ष थी और उनमें से तीन तो 100 साल से भी ज्यादा दिनों तक जिंदा रहे थे। किन्नरों की तुलना में कुलीन घरानों के पुरुषों की औसत उम्र 50 से थोड़ी ज्यादा थी जबकि शाही घरानों के पुरुषों की औसत उम्र तो केवल 45 वर्ष थी। सभी समाज में किन्नरों की उम्र पुरुषों से ज्यादा पाई गई है। हालांकि उस समय की महिलाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं है जिससे उनकी तुलना किन्नरों से की जा सके। आम समाज में मान्यता ये है कि लगभग सभी वर्ग में महिलाओं की उम्र पुरूषों के मुकाबले ज्यादा होती है लेकिन अभी तक इसका कोई स्पष्ट कारण पता नहीं चल सका है। एक राय यह है कि ऐसा पुरूषों में पाए जाने वाले हार्मोन टेस्टोस्टरोन के कारण होता है। करंट बायोलॉजी नाम की पत्रिका में प्रकाशित शोध के शोधकर्तताओं के अनुसार ये पक्के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन ऐसे काफी प्रमाण मिले हैं जिनके आधार पर ये कहा जा सकता है कि पुरूषों के शरीर में पाया जाना वाला हार्मोन टेस्टास्टरोन उनकी उम्र को कम कर देता है। शोधकर्ताओं के अनुसार हार्मोन में पाए जाने वाले रसायन से प्रतिरक्षा तंत्र और ह्रदय को नुकसान पहुंचता है। लेकिन बधियाकरण से टेस्टास्टरोन की प्रक्रिया के बाद शरीर में ये हार्मोन पैदा ही नहीं होता जिससे ना सिर्फ उनके शरीर में होने वाला नुकसान कम हो जाता है बल्कि किन्नरों की उम्र भी लंबी हो जाती है। ब्रिटेन में बुढ़ापे पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरिया में किया गया ये शोध बहुत रोचक है लेकिन किन्नरों की लंबी आयु की एक वजह उनके जीवन यापन का तरीका भी हो सकता है। लैन्कैस्टर विश्वविद्यालय के डॉक्टर डेविड क्लैन्सी का कहना है कि शोध के नतीजे कुछ सुझाव जरूर देते हैं लेकिन निश्चित तौर पर ये नतीजे निर्णायक नहीं हैं।
समाज में इस समुदाय को थर्ड जेंडर, ट्रांस जेंडर जैसे नामों से जाना जाता है. बात करें इनके रीति-रिवाज और संस्कारों के बारे में तो शायद ये बात बहुत कम लोग ही जानेते होंगे कि जब किन्नरों की मौत होती है तो किन्नरों का अंतिम संस्कार कैसे किया जाता है?उनकी शव यात्रा को किस तरह से निकाला जाता है?
किन्नर की मौत के बाद अंतिम संस्कार बहुत ही गुप्त तरीके से किया जाता है। किन्नरों की शव यात्रा दिन के वक्त नहीं बल्कि रात के वक्त निकाली जाती है। जब भी किसी किन्नर की मौत होती है तो उसे समुदाय के बाहर किसी गैर किन्नर को नहीं दिखाया जाता। इसके पीछे किन्नरों की ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से मरने वाला अगले जन्म में भी किन्नर ही पैदा होगा। किन्नरों के समुदाय में शव को अग्नि नहीं देते बल्कि उसे दफनाते हैं। शव यात्रा को उठाने से पहले शव को जूते-चप्पलों से पीटा जाता है। समुदाय में किसी भी किन्नर की मौत के बाद पूरा समुदाय एक हफ्ते तक भूखा रहता है। किन्नर समुदाय भी इस तरह की रस्मों से इंकार नहीं करता है। किन्नर समाज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी भी किन्नर की मौत के बाद ये लोग मातम नहीं मनाते हैं। इनकी मान्यता है कि मरने के बाद उस किन्नर को इस नर्क रूपी जीवन से छुटकारा मिल जाता है। इसलिए मरने के बाद ये लोग खुशी मनाते हैं। इतना ही नहीं ये लोग खुद के पैसों से दान कार्य भी करवाते हैं, ताकि फिर से उन्हे इस रुप में पैदा न होना पड़े।
किन्नर की पहचान
अब बात करते है हिजडों कि पहचान के बारे में कैसे पता लगता है कि ये हिंजडा है। चिकित्सकों की माने तो पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी हिजड़ा होती हैं। शिशु के जन्म के समय लडक़े के जननांग देखकर यह पता लगाया जाता है कि वह कहीं हिजड़ा तो नहीं, लेकिन लड़कियों से दस बारह वर्ष की आयु में जब तक उनमें मासिक धर्म न शुरू हो सामान्यत: इससे पहले पता लगा पाना संभव नहीं होता है। अधिकांश महिला हिजड़ों का इस समाज में रहकर भी पता नहीं चल पाता है, उनकी शादियां भी हो जाती हैं भले ही उनके बच्चे न हों। ऐसी लड़कियां जिनके आंतरिक जननांग न होने के कारण उनमें मासिक धर्म न हो, उनके स्तन विकसित न हों तथा उनमें स्त्री के लक्षण के बजाय पुरुष लक्षण जैसे दाढ़ी, मूंछ या आवाज का भारी होना पाए जाएं, वह महिला हिजड़ा कहलाती है।
राजस्थान मारवाड़, पंजाब व हरियाणा में हिजड़े बच्चे पैदा होने की संख्या दूसरे प्रदेशों की तुलना में काफी अधिक है। प्रकृति के इस क्रूड मजाक के कारण ही हिजड़ों का पूरा जीवन सभी पारिवारिक सुखों से वंचित रह जाता है, न उनकी शादी ही होती है और न ही उनका वंश चलाने वाले बच्चे। जीवनभर खुशी की तलाश मेें वे अगर कोई जश्न मनाते हैं तो वह इस नारकीय जीवन से छुटकारा पाने के लिए ही मनाते है।
किन्नरों से वैसे तो हम हमेशा दूर भागते है. जब वह आपके पास आ जाते है और आप से बात करने लगते है तो हम लोगो को बेहद शर्म महसूस होती है. जो की अगर देखा जाये तो काफी गलत है. वे भी इस समाज का हिस्सा है और दुनिया में हमारी तरह ही जन्में है. यह भगवान् ही है जिसने हर आदमी को बनाया है, इसीलिए उसकी बनाई चीजों से शर्म महसूस करना काफी गलत है. कई विकसित देशो ने इसे एक श्रेणी का दर्जा दे दिया है. और भारत भी उन्ही देशो में से एक है.
आपको बता दे की किन्नरों की दुनिया एक अलग तरह की दुनिया होती है. ये हमारे समाज में तो रहते हैं लेकिन हम इनके बारे में सबकुछ ना तो जानते है और ना ही जानना चाहते है. ये भी अजीब बात है कि आज तक किसी ने भी किन्नारों पर ज्यादा शोध भी नहीं किया है।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में आज के समय में करीब बीस लाख से ज्यादा किन्नर है. लेकिन इनकी संख्या दिन प्रतिदिन ना जाने क्यों घटते ही जा रही है। आप को बता दे की किन्नरों के बारे में बताया जाए तो उनमें कई ऐसी प्रकार की रस्में हैं. जो आज के दिन भी भी हमारे समाज में मौजूद हैं, जैसे कि हिंजड़ों की शव यात्राएं आज भी रात्रि में निकाली जाती है।
शव यात्रा को उठाने से पूर्व जूतों-चप्पलों से उसे पीटा जाता है। ये भी माना जाता है कि दीवार तोड़कर तथा शव को घसीट कर निकला जाता है। माना जाता है की किन्नर के मरने के उपरांत पूरा हिंजड़ा समुदाय एक सप्ताह तक भूखा रहता है। एक वर्ग इन्हें भ्रांतियों भी मानता है। और इस संबंध में किन्नर का दूसरा वर्ग भी इन रस्मों से इंकार तो नहीं करते।
भारत के किन्नरों के इस दर्दनाक जीवन की अकांक्षाओं, संघर्ष और सदस्यों की अनदेखी करना काफी ज्यादती होगी। बताया जाता है कि कुछ किन्नर जन्मजात होते है, लेकिन कुछ अपनी मर्ज़ी से इनमे शामिल हो जाते है।
भेदभाव का इतिहास
ट्रांसजेंडरों के साथ दुनिया भर में भेदभाव होता है, लेकिन जहां अन्य देशों में इन्हें समाज के अंदर कहीं न कहीं जगह मिल जाती है, वहीं दक्षिण एशिया के हालात अलग हैं. ट्रांसजेंडरों के अलावा किन्नरों के साथ भी भेदभाव का लंबा इतिहास रहा है.
जानकारों का कहना है कि 300 से 400 ईसा पूर्व में संस्कृत में लिखे गए कामसूत्र में भी स्त्री और पुरुष के अलावा एक और लिंग की बात कही गई है.
हालांकि भारत में मुगलों के राज में किन्नरों की काफी इज्जत हुआ करती थी. उन्हें राजा का करीबी माना जाता था. और कई इतिहासकारों का यहां तक दावा है कि कई लोग अपने बच्चों को किन्नर बना दिया करते थे ताकि उन्हें राजा के पास नौकरी मिल जाए.
लेकिन आज हालात यह हैं कि किन्नरों को समाज से अलग कर के देखा जाता है. वे ना ही शिक्षा पा सकते हैं और न कहीं नौकरी कर सकते हैं.
गे राइट्स एक्टिविस्ट अंजली गोपालन अंग्रेजों के शासन को जिम्मेदार मानती हैं, “मेरा ख्याल है कि भारत में अब स्थिति अलग है क्योंकि अंग्रेजों के शासन के दौरान यहां इस तरह के कानून बनाए गए. हमारे कानून में स्वाभाविक और अस्वाभाविक की नई परिभाषा दी गई.”

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