सदा मनस्वी रहे अटल जी, सरल निष्कपट वर्चस्वी ।
दृढ़-संकल्प औ’ कर्मठता से,बने सदा वे परम यशस्वी।।
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आजीवन ब्रह्मचर्य था साधा, देश के हित संलग्न था जीवन।
मन में सेवा-भाव भरे थे, किया समर्पित तन, मन, धन ।।
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हँसकर संघर्षों को झेला, कभी लेखनी रुकी नहीं ।
साहसपूर्वक प्रेरणा भी दी, कविताएँ ऐसी थीं लिखीं ।।
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उच्चतम पद पर रहे थे लेकिन, नहीं अहं था छू पाया ।
विनम्र-भाव से रहे सदा ही, भारत को गौरव दिलवाया।।
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आज हमारे बीच नहीं हैं, वे पार्थिव शरीर से अपने ।
यादों में वे सदा रहेंगे, पूरे होंगे उनके सपने ।।
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– शकुन्तला बहादुर ,

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