जैव विविधता लील रहा ऑस्ट्रेलिया का दावानल

प्रमोद भार्गव

ऑस्ट्रेलिया के वनों में लगी आग से जंगली वन्य जीवों, वनस्पतियों और इस आग के बढ़ते तापमान से छोटे जलस्रोतों के विलुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। करीब तीन माह पहले सुलगी चिंगारी से दावानल में बदली आग 63 लाख हेक्टेयर जंगल की वनस्पतियों करीब 1 अरब जानवर व पशु-पक्षियों और 33 लोगों को लील चुकी है। लाखों लोगों को अपने मूल निवास स्थलों से विस्थापित होना पड़ा। आग इतनी भयानक है कि आग बुझाने के तमाम आधुनिक उपकरण बौने साबित हो रहे हैं। इससे पता चलता है कि आग, तूफान, भूकंप, ज्वालामुखी, बवंडर हो या फिर अतिवृष्टि या अनावृष्टि इन प्राकृतिक प्रकोपों के आगे हम असहाय नजर आते हैं। जबसे ग्लोबल वार्मिंग की शुरूआत हुई है, तब से एक तो इन प्रकोपों की आवृत्ति बढ़ गई है, दूसरे ये जीव-जगत के लिए ज्यादा हानिकारक साबित हो रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि हम उन उपायों को नियंत्रित करें, जिनकी वजह से धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है।ऑस्ट्रेलिया की आग में अब हृदयविदारक दृश्य देखने में आ रहे हैं। ऐसा ही एक मर्मस्पर्शी दृश्य दक्षिण पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में देखने में आया है। एक स्वयंसेवी साराह प्राइस को कंगारू का बच्चा चारों ओर लगी आग के बीच अंतिम सांसें ले रही अपनी मां की झोली में तड़पता हुआ मिला। ये बच्चा भयभीत था क्योंकि कुछ समय पहले ही उसकी मां की मौत हो गई थी। प्राइस ने इस बच्चे का नाम ‘चांस‘ रखा। ये धीरे-धीरे अब स्वस्थ हो रहा है। इसे नियमित भेजन-पानी दिया जा रहा है। इसे प्राकृतिक आवास का अनुभव हो इसलिए एक अंधेरे कमरे में झोली में रखा गया है। यह इस भयावह आपदा में किसी जीव के इस तरह से बचा लेने की दुर्लभ कहानी है। इस आग में अबतक एक अरब से भी ज्यादा वन्य जीवों के मर जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। वन्य जीव सुरक्षा समूह ‘वाइर्स‘ के साथ काम करने वाली प्राइस ने बताया है कि ‘हमें लगता है कि आग में बहुत कुछ ऐसा नष्ट हो चुका है, जिसे फिर से पाने में सैंकड़ों साल लग जाएंगे।‘ आग के चलते जानवरों के झुलसे हुए शरीर, जले हुए पंजे और लाखों कंगारुओं के शवों की भयावह तस्वीरें देखने में आ रही है। मेंढक, कीट-पतंगे, अकशेरुकी और सरीसृप जैसे कम नजर आने वाले जंतुओं का भी आग के चलते विनाश हो गया है। इस विनाश से यहां का पारिस्थितिकी तंत्र नष्टप्रायः हो गया है। इसे सामान्य होने में हजारों साल लग सकते हैं। यह तंत्र जबतक सामान्य नहीं हो जाता, तबतक यहां फिर से जीव-जंतुओं की ये प्रजातियां पनपेंगी ही नहीं।पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि जो पेड़ नष्ट हो गए, उन्हें जंगल के रूप में अब विकसित करना असंभव है। जो जीव किसी तरह बच गए हैं या घायल अवस्था में हैं, उन्हें भी इस संकटपूर्ण स्थिति से उबारना मुश्किल है। क्योंकि ऐसे जीवों की एक तो संख्या बहुत है, दूसरे इस जंगल में स्थित जिन ग्रामों में पशु चिकित्सालय थे, वे भी नष्ट हो गए हैं। इसलिए उपचार सामग्री भी नष्ट हो गई है। जंगल की भयानक आग के कारण आस्ट्रेलिया के अनेक हिस्सों में तापमान की भीषण वृद्धि हो गई है। ऐसे में जो गरम हवाएं चल रही हैं, वे हालात को और बिगाड़ने के साथ इस आग को विस्तार दे रही हैं। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया, न्यू साउथ वेल्स, दक्षिण ऑस्ट्रेलिया और पश्चिम ऑस्ट्रेलिया राज्यों को आग के चलते लगातार नए-नए खतरों का सामना करना पड़ रहा है। अभी भी 158 जंगली क्षेत्रों में दावाग्नि लगी हुई है, जिसपर काबू पाना मुश्किल हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया की यह आग अमेजन के जंगलों से दोगुनी ज्यादा जंगल में लगी हुई है।
ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में मुख्य रूप से नीलगिरी (यूकल्पिटस) और बबूल के वृक्ष पाए जाते हैं। इसी नीलगिरी को भारत में यूकलिप्टस के नाम से जाना जाता है। यह अधिक वर्षा वाली भूमि या दलदली भूमि में पनपता है। इन्हीं जंगलों में एक स्थानीय फली की प्रजाति पाई जाती है, जो शुष्क व कम पोषण वाले क्षेत्रों में पाई जाती है। यह आग बहुत तेजी से पकड़ती है। यहां झाड़ीदार फूलों के पेड़ों की अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। ये सभी पेड़ व झाड़ियां तीव्र ज्वलनशील होते हैं। इस आग को फैलाने में सबसे ज्यादा यही जिम्मेवार हैं। दरअसल नीलगिरी़ के पत्तों में एक विशेष किस्म का ज्वलनशील पदार्थ होता है। इसकी पत्तियां पतझड़ के मौसम में आग में घी का काम करती हैं। गर्मियों में पत्तियां जब सूख जाती हैं तो इनकी ज्वलनशीलता और बढ़ जाती है। इसी तरह फूलों की झाड़ियां आग को भड़काने का काम करती हैं।इसबार इन पत्तियों का भयावह दावाग्नि में बदलने के कारणों में ऑस्ट्रेलिया में वर्षा की कमी, जाड़ों का कम पड़ना और तापमान का बढ़ जाना है। इन वजहों से यहां पतझड़ की मात्रा बढ़ी, उसी अनुपात में मिट्टी की नमी घटती चली गई। ये ऐसे प्राकृतिक संकेत थे, जिन्हें आस्ट्रेलिया के वनाधिकारियों को समझने की जरूरत थी। जंगल में आग लगने के कई कारण होते हैं। जब पहाड़ियां तपिश के चलते शुष्क हो जाती हैं और चट्टानें भी खिसकने लगती हैं तो अक्सर घर्षण से आग लग जाती है। तेज हवाएं चलने पर जब नीलगिरी के पेड़ों के तने परस्पर टकराते हैं तो इस टकराव से पैदा होने वाले घर्षण से भी आग लग जाती है। बिजली गिरना भी आग लगने के कारणों में शामिल है। ये कारण प्राकृतिक हैं, इनपर विराम लगाना नामुमकिन है। किंतु मानव-जनित जिन कारणों से आग लगती है, वे खतरनाक हैं। इसमें वन संपदा के दोहन से अटूट मुनाफा कमाने की होड़ शामिल है। भू-माफिया, लकड़ी माफिया और जंगली जानवरों के तस्कर शामिल रहते हैं। आग लगने की मानवजन्य अन्य वजहों में बीड़ी-सिगरेट भी है, तो कभी शरारती तत्व भी आग लगा देते हैं। कभी ग्रामीण पालतू पशुओं के चारे के लिए सूखी व कड़ी पड़ चुकी घास में आग लगाते हैं। ऐसा करने से धरती में जहां-जहां नमी होती है, वहां-वहां घास की नूतन कोंपलें फूटने लगती हैं, जो मवेशियों के लिए पौष्टिक आहार का काम करती हैं। पर्यटन वाहनों के साइलेंसरों से निकली चिंगारी भी आग की वजह बनती है।मनुष्य का जन्म प्रकृति में हुआ और उसका विकास भी प्रकृति के सानिध्य में हुआ। इसीलिए प्रकृति और मनुष्य के बीच हजारों साल से सह-अस्तित्व की भूमिका बनी चली आई। गोया, मनुष्य ने सभ्यता के विकासक्रम में मनुष्येतर प्राणियों और पेड़-पौधों के महत्व को समझा तो कई जीवों और पेड़ों को देव-तुल्य मानकर उनके सरंक्षण के व्यापक उपाय किए। किंतु जब हमने जीवन में पाश्चात्य शैली और विकास के लिए पूंजी व बाजारवादी अवधारणा का अनुसरण किया तो यूरोप की तर्ज पर ऑस्ट्रेलिया में भी जंगलों में विलडरनेस की अवधारणा थोप दी। विल्डरनेस के मायने हैं, मानवविहीन सन्नाटा, निर्वात अथवा शून्यता ! जंगल के वासियों को विस्थापित करके जिस तरह वनों को मानव विहीन किया गया है, उसी का परिणाम है ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग। यदि इन वनों में मानव आबादियां रह रही होती तो इस भीषण दावानल का सामना नहीं करना पड़ता। क्योंकि जंगलों के साथ जो लोग सह-अस्तित्व का जीवन जी रहे थे, वे आग लगने पर आग बुझाना भी जानते थे। हालांकि ऑस्ट्रेलिया के जिन भूखंडों में आग लगी है, उनमें गिनी-चुनी बस्तियां शेष हैं, लेकिन वे इतनी बड़ी संख्या में शेष नहीं रह गई है कि जंगल के किसी एक बड़े हिस्से में लगी आग को बुझा सकें। लिहाजा ये हालात इस बात का संकेत देते हैं कि जो मानव बस्तियां जंगलों से विस्थापित की गई हैं, उनका पुनर्वास किया जाए, तभी वन और वन संपदा सुरक्षित रह पाएंगे।(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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