अलकनंदा सिंह

मैं, अलकनंदा जो अभी सिर्फ शब्‍दनाम है, पिता का दिया ये नाम है स्वच्‍छता का...निर्मलता ...सहजता...सुन्दरता...प्रवाह...पवित्रता और गति की भावनाओं के संगम का।।। इन सात शब्‍दों के संगमों वाली यह सरिता मुझे निरंतरता बनाये रखने की हिदायत देती है वहीं पाकीज़गी से रिश्तों को बनाने और उसे निभाने की प्रेरणा भी देती है। बस यही है अलकनंदा...और ऐसी ही हूं मैं भी।

वैचारिक हिंसा का प्रायोजित प्रदर्शन #NotInMyName

आत्‍ममुग्‍धता के शिकार एनडीटीवी के कथित बुद्धिजीवी  पत्रकार रवीश कुमार प्रदर्शन में भाग लेने वाली रामजस कॉलेज की छात्राओं से पूछ रहे थे कि  क्‍या आपको डर लगता है? रवीश को कौन समझाए कि डरे हुए लोग घरों की चारदीवारी के अंदर दरवाजे बंद करके रहते  हैं न कि सरकार विरोधी तख्तियों के साथ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की पिकनिक में शामिल होते  हैं।

पौधों को वृक्ष बनने के लिए किसी मार्केटिंग की जरूरत नहीं

दूसरी शोध रिपोर्ट कहती है कि अच्‍छी नींद से वजन कम होता है, ये बिल्‍कुल नाक को घुमाकर पकड़ने वाली बात है। अच्‍छी नींद के लिए बहुत आवयश्‍क है शारीरिक मेहनत करना और जब व्‍यक्‍ति शारीरिक तौर पर मेहनत करेगा तो पूरे शरीर की मांसपेशियां थकेंगीं, निश्‍चित ही मानसिक तौर पर भी थकान होगी और नींद अच्‍छी आएगी। नींद अच्‍छी आएगी तो मोटापा हावी नहीं होगा। हास्‍यास्‍पद लगता है कि जब ऐसी रिपोर्ट्स को ”शोधार्थियों की अनुपम खोज” कहा जाता है।

सहारनपुर: हर इक फ़साद ज़रूरत है अब सियासत की

घटनाक्रम के अनुसार करीब 600 दलितों और 900 ठाकुरों की आबादी वाले गांव शब्बीरपुर से हिंसक चक्र की जो शुरुआत हुई, उसमें जहां दलितों का कहना है कि ठाकुरों ने उन्हें गांव के रविदास मंदिर परिसर में बाबासाहिब अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित नहीं करने दी थी। वहीं बाद में राजपूत राजा महाराणा प्रताप की जयंती के उपलक्ष्य में ठाकुरों के एक जुलूस पर एक दलित समूह ने आपत्ति जतायी तो इससे हिंसा फूट पड़ी। इसमें एक व्यक्ति को अपनी जान गंवानी पड़ी और 15 लोग घायल हो गये।

पूर्वाग्रही राजनीति की भेंट चढ़ता संविधान का अनुच्‍छेद 48

जानवर कई बार बिकते हैं। कई हाथों से गुजरते हैं। हर खरीदार उनसे बदसलूकी करता है। जानवरों को ठीक से खाना-पानी नहीं मिलता क्योंकि हर खरीदार को पता होता है कि इसे आखिर में कत्ल ही होना है। कई बार तो जानवरों को फिटकरी वाला पानी दिया जाता है, जिससे उनके गुर्दे फेल हो जाएं। इससे उनके शरीर में पानी जमा हो जाता है। इससे जानवर हट्टे-कट्टे दिखते हैं। इससे उनकी अच्छी कीमत मिलती है। उन्हें पैदल ही एक बाजार से दूसरे बाजार ले जाया जाता है।

माहिष्‍मती के समृद्ध इतिहास को कौन नहीं बूझना चाहता

उस समय मुस्‍लिम थे ही कहां? और जब मुस्‍लिम थे ही नहीं तो फिल्‍म में मुस्‍लिम किरदार कैसे घुसाया जाता? घुसा भी दिया जाता तो शायद वामपंथी इस बात पर सिर पीटते कि मुस्‍लिमों को बदनाम करने के लिए इतिहास से छेड़छाड़ की गई है क्‍योंकि मुस्‍लिम शासकों का किरदार प्रशंसा के योग्‍य सिर्फ अपवाद स्‍वरूप ही मिलता है।