लेखक परिचय

अलकनंदा सिंह

अलकनंदा सिंह

मैं, अलकनंदा जो अभी सिर्फ शब्‍दनाम है, पिता का दिया ये नाम है स्वच्‍छता का...निर्मलता ...सहजता...सुन्दरता...प्रवाह...पवित्रता और गति की भावनाओं के संगम का।।। इन सात शब्‍दों के संगमों वाली यह सरिता मुझे निरंतरता बनाये रखने की हिदायत देती है वहीं पाकीज़गी से रिश्तों को बनाने और उसे निभाने की प्रेरणा भी देती है। बस यही है अलकनंदा...और ऐसी ही हूं मैं भी।

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कहते हैं कि जो समाज अपने इतिहास से सबक नहीं लेता, उसके वर्तमान और भविष्‍य दोनों को ही निन्दित होना पड़ता है। विविधताओं से भरा पड़ा हमारा इतिहास एक ओर जहां बड़े-बड़े युद्ध, महान योद्धा, चाणक्‍य जैसे शिक्षक, राजसत्‍ता, राज्‍य, धर्मों के उत्‍थान व अवसान तथा अपने होने और न होने का कारण बताता है वहीं दूसरी ओर देश के कथित ”उदारवाद, धर्मनिरपेक्ष व साम्‍यवाद” से कुछ न सीखने वालों का चरित्र व कालखंडों पर आक्षेप लगाकर अपनी बौद्धिक क्षमता की कंगाली दर्शाने वालों की कहानी भी सुनाता है।
एक दो दिन पहले किसी वामपंथी महिला ने सफलता के रिकॉर्ड तोड़कर इतिहास रच रही बाहुबली-2 के लिए अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा, ”बाहुबली-2 में किसी मुस्‍लिम किरदार का ना होना दर्शाता है कि भगवा आतंक कितने जोर-शोर से हमारे दिलो-दिमाग पर छा रहा है”, इस कथित महान शख्‍सियत का नाम लिखकर मैं उन्‍हें महिमामंडित नहीं करना चाहती मगर उन्‍हें और उनके जैसों को अपने देश के विराट और वैभवशाली इतिहास की कुछ तस्‍वीर जरूर पेश करना चाहती हूं।

तो ”बाहुबली-2” अर्थात् ”बाहुबली द कन्‍क्‍लूजन” फिल्म में जिस महिष्मति रियासत की बात हुई है, वह चेदि जनपद की राजधानी ‘माहिष्मति’ है, जो नर्मदा के तट पर स्थित थी और उस पर हैहय वंश के क्षत्रियों का राज था। आजकल यह ज़िला इंदौर, मध्य प्रदेश में स्थित ‘महेश्वर’ के नाम से जाना जाता है और पश्चिम रेलवे के अजमेर-खंडवा मार्ग पर बड़वाहा स्टेशन से 35 मील दूर है।
महाभारत के समय यहाँ राजा नील का राज्य था, जिसे महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ते हुए सहदेव ने मारा।
पौराणिक-ऐतिहासिक काल का ये वर्णन इस तरह मिलता है-
‘ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ।
तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभ:।’
अब आइये बौद्धकालीन ऐतिहासिक तथ्‍यों की ओर-
बौद्ध साहित्य में माहिष्मति को दक्षिण अवंति जनपद का मुख्य नगर बताया गया है, जो न केवल समृद्धिशाली था बल्‍कि एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध था।
समय के साथ उज्जयिनी की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी और इस नगर का गौरव कम होता गया। फिर भी गुप्त काल में 5वीं शती तक माहिष्मति का बराबर उल्लेख मिलता है।
अब तत्कालीन साहित्‍य में देखिए-
कालिदास ने ‘रघुवंशम’ में इंदुमती के स्वयंवर का वर्णन करते हुए नर्मदा तट पर स्थित माहिष्मति का उल्‍लेख किया है और यहाँ के राजा का नाम ‘प्रतीप’ बताया है-
‘अस्यांकलक्ष्मीभवदीर्घबाहो
माहिष्मतीवप्रनितंबकांचीम् प्रासाद-जालैर्ज
लवेणि रम्यां रेवा यदि प्रेक्षितुमस्तिकाम:।’
इस श्‍लोक से पता चल जाएगा कि माहिष्मती नगरी के परकोटे के नीचे कांची या मेखला की भाति सुशोभित नर्मदा कितनी सुंदर दिखती हैं।
माहिष्मति नरेश को कालिदास ने अनूपराज भी कहा है जिससे ज्ञात होता है कि कालिदास के समय में माहिष्मति का प्रदेश नर्मदा नदी के तट के निकट होने के कारण ”अनूप” (जिसकी उपमा का वर्णन न किया जा सके) कहलाता था।
हैहय वंशीय कार्तवीर्य अर्जुन अथवा सहस्त्रबाहु की राजधानी माहिष्मति
पौराणिक कथाओं में माहिष्मति को हैहय वंशीय कार्तवीर्य अर्जुन अथवा सहस्त्रबाहु की राजधानी बताया गया है जिसे ‘महिष्मानस’ नामक चंद्रवंशी नरेश द्वारा बसाया गया। सहस्त्रबाहु इन्हीं का वंशज था।
किंवदंती है कि इसने अपनी सहस्त्र भुजाओं (अथवा सहस्र भुजाओं के बल के बराबर बल लगाकर) से नर्मदा का प्रवाह रोक दिया था। सहस्त्रबाहु ने रावण को भी हराया था और ऋषि जमदग्नि को प्रताड़ित करने के कारण उनके पुत्र भगवान परशुराम द्वारा मारा गया।
अब आइये वास्तुकला में महिष्‍मती के वर्णन पर-
महेश्वर में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने नर्मदा के उत्तरी तट पर अनेक घाट बनवाए थे, जो आज भी विद्यमान हैं। यह धर्म परायण रानी 1767 के पश्चात इंदौर छोड़कर प्राय: इसी पवित्र स्थल पर रहने लगी थीं। नर्मदा के तट पर अहिल्याबाई तथा होल्कर वंश के नरेशों की कई छतरियां आज भी शेष हैं। ये वास्तुकला की दृष्टि से प्राचीन हिन्दू मंदिरों के स्थापत्य की अद्भुत अनुकृति हैं।
आधुनिक इतिहासकालीन तथ्‍य ये भी है कि भूतपूर्व इंदौर रियासत की आदिराजधानी यहीं थी। महेश्वरी नामक नदी जो माहिष्मति अथवा महिष्मान के नाम पर प्रसिद्ध है, महेश्वर से कुछ ही दूर पर नर्मदा में मिलती है।
हरिवंश पुराण की टीका में नीलकंठ ने माहिष्मति की स्थिति विंध्य और ऋक्ष पर्वतों के बीच में विंध्य के उत्तर में और ऋक्ष के दक्षिण में बताई है।
अब बताइये इतने सुबूतों के बाद भी कौन समझाए इन आयातित सोच और विचारधारा पर पनपने वाल वामपंथियों को कि बाहुबली को जिस काल और जिस माहिष्‍मती राज्‍य की पटकथा में पिरोया गया है, उस समय मुस्‍लिम थे ही कहां?
और जब मुस्‍लिम थे ही नहीं तो फिल्‍म में मुस्‍लिम किरदार कैसे घुसाया जाता?
घुसा भी दिया जाता तो शायद वामपंथी इस बात पर सिर पीटते कि मुस्‍लिमों को बदनाम करने के लिए इतिहास से छेड़छाड़ की गई है क्‍योंकि मुस्‍लिम शासकों का किरदार प्रशंसा के योग्‍य सिर्फ अपवाद स्‍वरूप ही मिलता है।
ये कोई बॉलीवुड की मसालेदार फिल्‍म नहीं थी जहां जबरदस्‍ती किरदारों को अपने हिसाब से हकीकतों से दूर रख ग्‍लैमराइज करने का प्रयोग किया जाता है। गौरतलब है कि जोधा अकबर, बाजीराव मस्‍तानी या रानी पद्मावती के मूलरूप को ध्‍वंसित करने पर फिल्‍मकारों को जनता का कोप किस प्रकार झेलना पड़ा था।
आजकल साहित्‍य में भी ऐसे अनूठे प्रयोग हो रहे हैं जो इतिहास की क्रूरता को महिमामंडित करते हैं और इस कोशिश में लगे हैं कि औरंगजेब जैसे शासकों को भी ”हीरो” बना दिया जाए।
बेसिरपैर की बात कर कथित मुस्‍लिमप्रेम जताने वाली ये वामपंथी विचारक महोदया क्‍या तथ्‍यों और हमारे समृद्धशाली इतिहास को भी अपनी सोच की तरह ही तोड़मरोड़ कर रख देने की कोशिश नहीं कर रही?
जो भी हो, बाहुबली की मेकिंग और उसके इफेक्‍ट्स के अलावा एक दक्षिण भारतीय डायरेक्‍टर-प्रोड्यूसर द्वारा इतिहास को इस तरह दिखाया जाना सचमुच सराहनीय है और उक्‍त धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ड्रामा करने वाले छद्म मुस्‍लिम प्रेमियों के लिए सबक भी जो अपने ही देश के इतिहास को भूल रहे हैं।

– अलकनंदा सिंह

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