जावेद अनीस

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े पत्रकार है ।

मुख्यमंत्री शिवराज के ग्यारह साल

2014 में दिल्ली में मोदी की सरकार बनने के बाद आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ गये और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ईश्वर की भारत को दी गई भेंट बताने लगे. दरअसल शिवराज की यही सबसे बड़ी ताकत है कि वे बदलते वक्त के हिसाब से अपने आप को ढाल लेते हैं .

तीन तलाक,समान नागरिक संहिता और मोदी सरकार

मुस्लिम महिलाओं की तरफ से समान नागरिक संहिता नहीं बल्कि एकतरफा तीन तलाक़, हलाला व बहुविवाह के खिलाफ आवाज उठायी जा रही है उनकी मांग है कि इन प्रथाओं पर रोक लगाया जाए और उन्हें भी खुला का हक मिले.

समाजवादी पार्टी अपने इस संकट के लिए अभिशप्त है

अनुभवी मुलायम सिंह यादव इस बात को समझते हैं कि अगला विधानसभा चुनाव अखिलेश के चेहरे के सहारे ही लड़ा जा सकता है लेकिन उन्हें यह भी पता है कि अकेले यही काफी नहीं होगा. इसके लिए शिवपाल की सांगठनिक पकड़ और अमर सिंह के “नेटवर्क” की जरूरत भी पड़ेगी. इसलिये चुनाव से ठीक पहले मुलायम का पूरा जोर बैलेंस बनाने पर है. लेकिन संकट इससे कहीं बड़ा है और बात चुनाव में हार-जीत के गुणा-भाग से आगे बढ़ चुकी है. अब मामला पार्टी और इसके संभावित वारिसों के आस्तित्व का बन चूका है.

बीसीसीआई के गले में सुप्रीम कोर्ट की घंटी

हमारे देश में इस खेल के सबसे ज्यादा दर्शक हैं और यही बात इस खेल को कण्ट्रोल करने वाली संस्था बीसीसीआई को दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड बना देती है. यहाँ बहुत सारा पैसा है और इसके साथ राजनीति भी. देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों के प्रमुख नेता बीसीसीआई और राज्यों के बोर्डों पर काबिज है. उनके बीच काफी सौहार्द है और वे एक दुसरे की मदद करते हुए नजर आते हैं. यह ऐसे लोग है जिनका सीधे तौर पर क्रिकेट से कोई वास्ता नहीं है. लेकिन भले ही वे क्रिकेट की बारीकियों को ना समझते हों पर इसे नियंत्रण करना बखूबी जानते हैं. अनुराग ठाकुर,शरद पवार,अमित शाह,राजीव शुक्ला,ज्योतिरादित्य सिंधिया फारुख़ अब्दुल्ला जैसे नेता इस देश की राजनीति के साथ-साथ यहाँ के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट को भी चलते हैं .

मुनाफे की शिक्षा

भारत में शिक्षा की व्यवस्था गंभीर रूप से बीमार है इसकी जड़ में हितों का टकराव ही है. प्राथमिक शिक्षा से लेकर कॉलेज शिक्षा तक पढ़ाई के अवसर सीमित और अत्यधिक मंहगें होने के कारण आम आदमी की पहुँच से लगभग दूर होते जा रहे हैं. शिक्षा के इस माफिया तंत्र से निपटने के लिए साहसिक फैसले लेने की जरूरत है. हालत अभी भी नियंत्रण से बाहर नहीं हुए है और इसमें सुधार संभव है.