राकेश सिंह की नियुक्ति और शिवराज की चुनौतियां

राकेश सिंह की नियुक्ति और शिवराज की चुनौतियां

जावेद अनीस

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में कुछ ही महीने शेष बचे हैं और इसी के साथ ही दोनों प्रमुख पार्टियों में मुकाबले से पहले अंदरूनी उठापटक का आखिरी दौर भी शुरू हो चूका है. लंबे समय से दोनों ही पार्टियों में सांगठनिक बदलाव की सुगबुगाहट चल रही थी. भाजपा की तरफ से शिवराजसिंह चौहान के रूप में मुख्यमंत्री पद का चेहरा तो पहले से ही मैदान में मौजूद है और अब निष्प्रभावी नंदकुमार सिंह चौहान की जगह उसे राकेश सिंह के रूप में नया अध्यक्ष तो मिला ही है साथ ही है केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के नेतृत्व में  प्रदेश चुनाव अभियान समिति का गठन भी कर दिया गया है.

लेकिन राकेश सिंह की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति इतनी सहज भी नहीं है दरअसल यह एक तरह से राजनीतिक समझौता है जो राष्ट्रीय नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी, अमित शाह और शिवराज सिंह चौहान के बीच हुआ है. शिवराज सिंह चौहान लम्बे समय से राज्य में पार्टी का सबसे विश्वसनीय चेहरा बने हुये है वे एक तरह से मध्यप्रदेश में भाजपा का पर्याय बन चुके हैं लेकिन 2014 के बाद से पार्टी में शिवराज की पुरानी वाली स्थिति नहीं रह गयी है, इधर लगात्तर कई उपचुनाव में हुयी हार को सूबे में उनकी ढ़ीली पड़ती पकड़ के रूप में देखा जा रहा है, मुंगावली और कोलारस के उपचुनाव में हार से पहले उसे चित्रकूट और  अटेर विधानसभा के उपचुनाव में भी मात मिल चुकी है. जबकि पार्टी की तरफ से इन चुनावों में पूरी ताकत और तमाम तरह के संसाधनों को झोंक दिया गया था. चुनाव के मुहाने पर खड़े मुख्यमंत्री और लगातार अपनी तीसरी पारी पूरी करने जा रही सत्ताधारी पार्टी के लिये ये हारें खतरे की घंटी की तरह हैं जिसके  बाद से संगठन में बदलाव की आवाजें मुखर होने लगी थीं और अंत में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपने विश्वासपात्र अध्यक्ष को बदलने के लिए राजी होना पड़ा.

लेकिन इस बदलाव के लिये राष्ट्रीय नेतृत्व और शिवराजसिंह के बीच लंबी खींचतान चली है, शिवराजसिंह चौहान चाहते थे कि उनके किसी विश्वस्त नेता को ही प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी मिले और इस मामले में उनकी पसंद गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ नरेंद्र सिंह तोमर थे जबकि राष्ट्रीय नेतृत्व नरोत्तम मिश्रा या कैलाश विजयवर्गीय को कमान देना चाहता था. चूंकि यह चुनावी साल है इसलिए दोनों तरफ से बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की गयी और फिर राकेश सिंह के नाम पर सहमति बनी. इस तरह से मध्यप्रदेश भाजपा के दोनों चौहानों में से एक नंदकुमार सिंह चौहान की विदाई हो गयी लेकिन दुसरे चौहान शिवराज सिंह अपनी जगह पर डटे हुये हैं.इस पूरी परिघटना में राष्ट्रीय नेतृत्व ने सूबे में शिवराज के सियासी रकीबों को निराश किया और शिवराज एक बार फिर यह सन्देश देने में कामयाब हुये है कि अभी भी यह नौबत नहीं आई है कि मध्यप्रदेश भाजपा में कोई भी फैसला उनकी मर्जी के खिलाफ किया जा सके.

महाकौशल से आने वाले राकेश सिंह तीन बार से सांसद रहे हैं, इसके अलावा लोकसभा में बीजेपी के मुख्य सचेतक ,महाराष्ट्र बीजेपी के प्रभारी और कईसंसदीय समितियों के सदस्य हैं. वे पिछड़े वर्ग से आते हैं और उनकी पहचान एक मजबूत संगठनकर्ता के रूप में है. उनके भाजपा संगठन से बहुत मजबूत रिश्ते है. हालांकि विपक्षी कांग्रेस उन्हें मजबूरी का सौदा मानती है कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का बयान है कि “भाजपा ने समझौते के तहत राकेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान दी है वे इस पद के हिसाब से हलके हैं.”

राकेश सिंह को भले ही सूबे में पार्टी का कमान मिल गया हो लेकिन इसी के साथ ही नरेंद्र सिंह तोमर को चुनाव अभियान समिति की कमान भी सौंप दी गयी है इस समिति में नरोत्तम मिश्रा , कैलेश विजयवर्गीय, प्रह्लाद  पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे नेता सदस्य के तौर पर शामिल हैं. भाजपा में चुनाव अभियान समितियों का बड़ा महत्त्व होता है और जाहिर है राकेश सिंह को सिर्फ संगठन की जिम्मेदारी मिली है चुनाव अभियान की नहीं. इन सबके बीच अध्यक्ष के तौर उन्हें ख़ुद को साबित करने की चुनौती होगी. मुख्यमंत्री के साथ उन्हें चुनाव अभियान समिति से  तालमेल बिठाना होगा साथ ही उन्हें इस चुनावी साल में सत्ता विरोधी माहौल और पार्टी के अन्दर गुटबाजी जैसी चुनौतियों का भी सामना करना होगा. लेकिन असली चुनौती तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की होगी मध्यप्रदेश में लगातार चौथी बार भाजपा की सरकार बनाने का असली दायित्व उन्हीं का होगा और उन्हीं के चेहरे और मुख्यमंत्री के तौर पर उनके परफॉरमेंस से साथ ही भाजपा चुनाव लड़ेगी. लेकिन राज्य में इस बार का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए उतना आसान नहीं माना जा रहा है.बहरहाल इधर लम्बे समय से चली आ रही विपक्षी कांग्रेस में भी असामंजस्यता की स्थिती भी समाप्त हो गयी है पार्टी ने कमलनाथ को सूबे में पार्टी का कमान और ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बना दिया है. इस धोषणा के साथ ही अब लम्बे समय बाद भाजपा को कांग्रेस से गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है .

कुल मिलाकर शिवराजसिंह चौहान का पार्टी संगठन और सरकार पर नियंत्रण बना हुआ है, भाजपा का मौजूदा शीर्ष नेतृत्व अपने अलावा किसी और को मजबूत शक्ति केंद्र के रूप में देखना पसंद नहीं करता है और ना ही समझौते में यकीन करता है लेकिन शिवराज उसे समझौते के स्तर पर लाने में कामयाब हुये हैं. राज्य इकाई आज भी उन्हें चुनौती देने की स्थिति में कोई  नहीं है आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि कमलनाथ और सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस की नयी टीम भाजपा को चौथी बार सत्ता में वापसी से रोकने में किस तरह की रणनीति अपनाती है . फिलहाल पार्टी के अंदर वे चुनौती-विहीन नजर आ रहे हैं लेकिन चुनाव के बाद अगर भाजपा जीतती है तो पक्के से नहीं कहा जा सकता कि यही स्थिति बनी रहेगी और फिर लगातार सत्ता में रहने अपने खतरे भी तो है जो खुली आँखों से तो नजर नहीं आते हैं लेकिन ऐन मौके पर पासा पलट सकते हैं .

 

 

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