मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

मोदी सरकार में आर्थिक विकास से सामाजिक विकास

ऐसे ही स्वीडन की कंपनियाँ मानती हैं कि भारत में भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार आने तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बनने के बाद से लगातार यहाँ का व्‍यापारिक माहौल अच्‍छा हुआ है। यही कारण है कि पिछले साल में स्वीडिश कंपनियों और निवेशकों के रोजगार में 20 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। स्वीडिश चैंबर ऑफ कामर्स का भारत-स्‍वीडन व्यावसायिक माहौल सर्वे जिसमें कि कुल 170 कंपनियों में से 160 ने भाग लिया, सभी एक स्‍वर में कहती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी बहुत अच्‍छा कार्य कर रहे हैं। स्वीडन को भारत में उर्जा, पर्यावरण, स्मार्ट सिटी, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटाइजेशन, स्वास्थ्य और जीव विज्ञान के क्षेत्र में काम रही कंपनियों के लिये काफी संभावनाएं दिखाई देतीं हैं। दूसरी तरफ नीति आयोग के अपने आंकड़े हैं, जो आज यह बता रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था 2030 तक 7 हजार 250 अरब डॉलर या कहें कि 469 लाख करोड़ रुपए की हो जाएगी। यह आंकलन उसने देश में 8 प्रतिशत सालाना वृद्धि दर के हिसाब से किया है।

प्रो.रामदेव भारद्वाज, चुनौतियां कम नहीं, संदर्भ हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय

: डॉ. मयंक चतुर्वेदी अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय को आखिरकार नए कुलपति प्रो.रामदेव भारद्वाज…

भारत-अमेरिका के नए दौर के संबंध

प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के पहले ही भारत को दो मोर्चों पर बड़ी कूटनीतिक सफलता मिली है। दोनों को लेकर भारत सरकार लंबे समय से राजनयिक स्तर पर अमेरिका पर दबाव बना रही थी। जिसमें कि पहला यह कि अमेरिका ने भारत को 22 अमेरिकी ‘गार्जियन ड्रोन’ के सौदे को मंजूरी दे दी है। ये ड्रोन अभी सिर्फ अमेरिकी सेना इस्तेमाल करती है, जिसेकि प्राप्‍त करने के लिए भारत लम्‍बे समय से प्रयासरत था। इस सौदे को लेकर ट्रंप के पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन ने वादा भी किया था। किंतु अपने कार्यकाल के दौरान ओबामा अपना किया वादा पूरा नहीं कर पाए थे जो अब जाकर ट्रम्‍प काल में पूरा होने जा रहा है।

बाबरी ढांचा का गिरना साजिश कैसे हो गया ?

1992 विवादित ढंचे के भस्‍मिभूत हो जाने के बाद जिस तरह का फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को सुनाया था, उसमें भी विवादित स्थल के दो हिस्से निर्मोही अखाड़ा और रामलला के ‘मित्र’ को दिए गए और एक हिस्सा मुसलमानों को, दिया गया था जिनका प्रतिनिधित्व उत्तर प्रदेश का सुन्नी सेंट्रल बोर्ड करता है। जब हाईकोर्ट के इस फैसले में यह माना गया है कि हिंदू मान्यताओं के अनुसार मस्जिद के गुंबद के नीचे की जगह रामलला की जन्मस्थली है, इसलिए वह हिंदुओं को मिलनी चाहिए। एक बड़ा प्रश्‍न यह भी है कि अयोध्‍या के जिस स्‍थान को भारत की बहुसंख्‍यक जनता अपने आराध्‍य श्रीराम का जन्‍म स्‍थल मानती है, वहां उनका भव्‍य मंदिर नहीं होगा तो कहां होगा ?

कांग्रेस का एक ही गलती को बार-बार दोहराना ?

कांग्रेस की नई राजनीतिक अलोचना की शुरूआत यहीं से होती है। जब भाजपा एवं अन्‍य राजनीतिक-सामाजिक संगठनों ने इस विषय को लेकर कांग्रेस को घेरा तो उसने सफाई दी कि यह प्रिंट की गलती है। क्‍या कांग्रेस जैसी देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी से यह अपेक्षा की जा सकती है‍ कि वह इस प्रकार की ग‍लतियां करने की गुंजाइश अपने यहां रखे, जबकि उसे पता है कि उसके एक नेता पं. नेहरू की गलती जम्‍मू-कश्‍मीर मामले पर इतनी भारी पड़ी है कि देश आजतक उसे भुगत रहा है।

औरत, तलाक, इस्‍लाम और केंद्र सरकार

इसी तरह बलात्कार हुई महिला की स्थिति बहुत दयनीय है । किसी महिला का बलात्कार होने की स्थिति में आरोपी को दण्ड तभी दिलाया जा सकता है जब वह आरोपी स्वयं अपना अपराध मान ले या चार पुरूष गवाह मिलें । सामान्यतः ये दोनों ही बातें असम्भव है इसी कारण मुस्लिम देशों में महिलाओं को ही जिना का आरोपी मानकर पत्थर मारकर मारने की सजा सुनाई गयी है । स्पष्ट है कि यह कानून मूर्खता की पराकाष्ठा है लेकिन शरीयत के इस कानून को मुसलमान श्रेष्ठ मानते हैं ।

असलम साहब, अकेले राष्ट्रीय कांग्रेस स्वयंसेवक संघ बनाने से काम नहीं चलेगा

वैसे भी देखा जाए तो कांग्रेस को इस वक्‍त सबसे ज्‍यादा शु्द्ध हवा की जरूरत है जोकि कठोर सेवा-श्रम के बूते उसके शरीर को मिलेगी और इसके लिए कांग्रेस में कोई स्‍वयंसेवक संघ होना ही चाहिए था, जिसकी जरूरत लम्‍बे समय से महसूस भी की जा रही है। किंतु इसी के साथ जो प्रश्‍न उठ रहा है वह यह है कि क्‍या नया कांग्रेसी संघ आरएसएस जैसा त्‍याग, समर्पण और सादगीभरे जीवन का भाव भी अपने स्‍वयंसेवकों में संचारित कर पाएगा ? प्रतिक्रिया स्‍वरूप कोई कार्य खड़ा किया जाए तो कहीं इसका भी हश्र पूर्व में कांग्रेस द्वारा किए गए प्रयोगों की तरह ही न हो?