निर्भय कर्ण

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार

नेपाल एक बार फिर गृहयुद्ध की ओर

नेपाल में मानवाधिकार बार-बार आरोपों के घेरे में घिरती रही है। और एक बार फिर सप्तरी कांड से मानवाधिकार के ऊपर प्रश्नचिह्न खड़ा हुआ है। सप्तरी कांड में जिस प्रकार शहीदों व घायलों को गोली लगी है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि नेपाली पुलिस नियम-कानून जानती ही नहीं है। या जानती है तो नियम-कानून को ताक पर रखकर वहां काम करती है। अधिकतर को कमर के ऊपर पेट, छाती, गर्दन, मस्तिश्क में गोली व चोट लगा है।

पर्यावारण शिक्षा को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता

-निर्भय कर्ण- पर्यावरण शिक्षा के बिना पर्यावरण संरक्षण की कल्पना नहीं की जा सकती। पर्यावरण शिक्षा से न केवल इसके संरक्षण के बारे में विशेष ज्ञान प्राप्त होता है बल्कि इससे संबंधित अनेक पहलूओं के बारे में भी जानकारीमिलती है। जिस प्रकार वातावरण में प्रदूषण विकराल रूप धारण करता जा रहा है उस हिसाब से पर्यावरण शिक्षा अतिआवश्यक और महत्वपूर्ण होती जा रही है। पिछले साल अमेरिका की राष्ट्रीय महासागर और वायुमंडलप्रशासन और स्क्रिप्स इंस्टीट्यूट आफ ओसिएनोग्राफी द्वारा जारी आंकड़ों में कहा गया कि वायुमंडल में कार्बनडाईआक्साइड का स्तर 400 पीपीएम (कण प्रति दस लाख) के स्तर पर पहुंच गया है। जबकि 1750 में औद्योगिकक्रांति के शुरुआत में यह स्तर 280 कण प्रति दस लाख थी। इन आंकड़ों से हम यह सहज ही समझ सकते हैं कि पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए किस कदर काम करने की जरूरत है और पर्यावरण शिक्षा को आगेबढ़ाने की भी।   पर्यावरण शिक्षा के माध्यम से इसके और प्रदूषण के बीच बढ़ती नजदीकियां के बारे में न केवल हम वाकिफ होते हैं बल्कि पर्यावरण को प्रदूषित होने से कैसे बचाया जाए, इसे प्रभावित करने वाले कारक संबंधी तमामजानकारी भी हासिल होती है जिससे हम मानव इसके प्रति जागरूक एवं संवेदनशील होते है। यह जगजाहिर है कि पर्यावरण एवं प्रदूषण के बीच अन्योन्याश्रय संबंध होता है जिसमें वनों की भूमिका उल्लेखनीय है और यहीसंबंध वन और जल के बीच है। वन पर्यावरण को बचाने के लिए जितना उत्तरदायी है उतना ही प्रदूषण के लिए भी। वनों के सिमटने से पर्यावरण को खतरा तो पहुंच ही रहा है साथ ही हमारे अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगाहै। इसके कारण जीवन के लिए आवश्यक हर तत्व एक-दूसरे को प्रभावित करते हुए जीवों के अस्तित्व को ललकार रहे हैं। दिन-प्रति-दिन तापमान में लगातार असमानता चिंतनीय विषय बन चुका है जिसके लिए मानवगतिविधियां जिम्मेदार है।   वनों का सृजन, प्रबंधन, उपयोग एवं संरक्षण की विधा को वानिकी कहा जाता है। वानिकी के सिमटने का मुख्य कारण है जनसंख्या वृद्धि। आबादी को आवास, भोजन के साथ तमाम बुनियादी चीजों की आवश्यकताहोती है। भोजन एवं अन्य चीजों की जरूरत के लिए उद्योगों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है और उद्योग के लिए जमीन सहित सभी संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। इन सब वजहों से एक तरफ तो वन सिमट रहा है तो दूसरीतरफ इससे हो रहा प्रदूषण विकराल रूप धारण करता जा रहा है चाहे वह वन प्रदूषण हो या फिर जल प्रदूषण या फिर भूमि प्रदूषण आदि। विकास के नाम पर पर्यावरण को अंधाधुंध क्षति पहुंचायी जा रही है। भारत में ही विगतनौ वर्षों में 2.79 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र विकास की भेंट चढ़ गये जबकि 25 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रत्येक साल घट रहा है। यहां यह उल्लेख करना दिलचस्प है कि भारत में ही अभी 27.5 करोड़ लोग वनों से होने वाली आय परनिर्भर हैं। वहीं वनों पर आश्रित पानी की बात करें तो बढ़ती जरूरतें और घटता पानी भारत ही नहीं संपूर्ण दुनिया की समस्या बन चुकी है। भारत में दुनिया की 18 फीसदी आबादी है और जल स्त्रोत केवल चार फीसद। एकअध्ययन के मुताबिक, 2050 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता वर्तमान के लगभग 1500 घनमीटर प्रति साल से घटकर 1140 घनमीटर प्रति साल रह जाएगी। इन आंकड़ों से हम सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि वनों केसिमटने से हमारे जीवन पर कितना असर पड़ रहा है और आने वाले समय में और इसका कितना व्यापक असर पड़ेगा। उपरोक्त संकटों को देखते हुए पर्यावरण शिक्षा को स्कूलों, विश्वविद्यालयों आदि जगहों में शामिल कराना दुनिया के एजेंडे में 1992 में ही आ गया था। 2005 में यूनेस्को ने अगले 10 सालों के लिए पर्यावरण के टिकाऊविकास हेतु शिक्षा नाम से नया अभियान भी शुरू किया लेकिन कुछ विशेष सफलता अब तक हाथ नहीं लगी है। यूनेस्को के टिकाऊ विकास कार्यक्रम के लिए जर्मनी की राष्ट्रीय समिति के प्रमुख गेरहार्ड डे हान का कहना था किहालांकि यह सब मुख्य रूप से स्वैच्छिक रूप से ही हो रहा है और यह शिक्षकों-स्कूलों पर निर्भर है। ये विषय स्कूलों के अधिकारिक पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए। यह साफ है कि पर्यावरण शिक्षा को दुनियाभर के स्कूलों मेंअनिवार्य करना ही एक विकल्प रह गया है तभी जाकर सकारात्मक असर देखने को मिलेगा।   पर्यावरण संरक्षण का कार्य विभिन्न व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा लंबे समय से किया जाता रहा है लेकिन अब तक सफलता नहीं मिली है। इसी क्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पर्यावरणविद एम सी मेहता ने भारत केसमस्त विद्यालयों, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय एवं अन्य शिक्षण संस्थानों में पर्यावरण का अनिवार्य पाठ्यक्रम लागू करने के लिए एक याचिका  उच्चतम न्यायालय में दाखिल की थी ताकि बचपन से ही विद्यार्थियों केमन में पर्यावरण संरक्षण की सोच विकसित हो सके। अंततः उच्चतम न्यायालय ने 18 दिसंबर 2003 में इस याचिका पर ऐतिहासिक निर्णय सुनाया जिसके अन्तर्गत एआईसीटीई, एनसीईआरटी, यूजीसी को पर्यावरण काअनिवार्य पेपर 2004-05 सत्र से लागू करने का आदेश दिया और पालन न करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही। लेकिन इन आदेशों का हश्र क्या है, यह सभी जानते हैं वरना प्रदूषण बढ़ने के बजाए दिन-प्रति-दिनघटता ही जाता। पर्यावरण शिक्षा से संबंधित कई कोर्सेज भी उपलब्ध हैं। इन कोर्सों को करके पर्यावरण में  विशेषज्ञता हासिल करके इसमें एक उज्जवल करिअर का स्कोप है जिसे बस भूनाने की आवश्यकता है। इस हेतु युवाओं कोमागदर्शन कर प्रशिक्षण देकर पर्यावरण की बेहतरी के लिए तैयार करना होगा। समय इस बात की ओर इंगित करती है कि पर्यावरण शिक्षा को सख्ती और अनिवार्य रूप से लागू किया जाए और जीवनदायिनी पर्यावरण कोसमय रहते बचा लिया जाए। इससे न केवल पर्यावरण और प्रदूषण के बीच संतुलन कायम होगा बल्कि हमारा अस्तित्व भी बरकरार रह सकेगा।