निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

उपेक्षाओं के मध्य ‘दलित उड़ान’

दलित समाज को जागृत करने के नाम पर मायावती तथा रामविलास पासवान जैसे और भी कई नेताओं को राजनैतिक रूप से काफी अवसर भी मिले। परंतु इन लोगों ने भी सिवाय अपनी कुर्सी व सत्ता सुरक्षित रखने,धन-संपत्ति संग्रह करने, अपने वारिसों को अपना उत्तराधिकारी बनाने के, और कुछ नहीं किया। हां इतना ज़रूर किया कि यह नेता भी महज़ अपनी राजनैतिक रोटी सेेंकने के लिए दलित समाज को उनके उपेक्षित होने का हमेशा एहसास कराते रहे जबकि इनके अपने रहन-सहन शाही अंदाज़ व शान-ो-शौकत से भरपूर हैं।

पैमान-ए-क़ाबिलियत: जनप्रतिनिधि बनाम लोक सेवा अधिकारी

कहीं शौचालय बनाए जा रहे हैं तो कहीं खुले में शौच करने पर जुर्माना लगाया जा रहा है। परंतु देश की मध्यप्रदेश 1994 बैच की एक काबिल प्रशासनिक अधिकारी दीपाली रस्तोगी ने अपने एक लेख में प्रधानमंत्री की स्वच्छ भारत योजना पर कुछ सवाल खड़े किए हैं। सरकार ने दीपाली रस्तोगी के सवालों का जवाब देने के बजाए उन्हें अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम 1968 के उन प्रावधानों का उल्लेख करते हुए एक नोटिस जारी की है जिसके तहत सरकार की नीति योजना तथा सरकारी निर्णयों की कोई भी अधिकारी आलोचना नहीं कर सकता।

ध्वनि प्रदूषण न हिन्दू न मुस्लिम,केवल हानिकारक

धर्मस्थलों पर नियमित रूप से निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार होने वाले इस शोर-शराबे से लगभग पूरा देश दु:खी है। ध्वनि प्रदूषण बच्चों की पढ़ाई खासतौर पर परीक्षा के दिनों में उनकी परीक्षा की तैयारी में अत्यंत बाधक साबित होता है। मरीज़ों तथा वृद्ध लोगों के लिए ध्वनि प्रदूषण किसी मुसीबत से कम नहीं। आए दिन होने वाले जगराते,कव्वालियां या दूसरे शोर-शराबे से परिपूर्ण धार्मिक आयोजन यह सब हमारे समाज के स्वास्थय पर बुरा असर डालते हैं।

देश का शराब मुक्त होना ज़रूरी

देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य बिहार इस समय शराबबंदी को लेकर पूरे देश के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करने की स्थिति में पहुंच चुका है। गत् वर्ष 21 जनवरी को नितीश सरकार ने शराबबंदी के समर्थन में लगभग 12 हज़ार किलोमीटर की विश्व कीर्तिमान स्थापित करने वाली एक अद्भुत मानव श्रृंखला बनाई। इस मानव श्रृंखला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लंबाई नहीं बल्कि शराब के विरोध में एक-दूसरे का हाथ थामे हर आयु-वर्ग के सभी धर्मों व जातियों के तथा सभी प्रकार की आर्थिक हैसियत रखने वाले वह लोग शामिल थे जो वास्तव में भारतीय समाज का दर्पण कहे जाते हैं।

ख़तरे सोशल मीडिया के

भारतवासियों को खासतौर पर बड़ी गंभीरता से सोशल मीडिया के विषय पर यह चिंतन करने की ज़रूरत है कि हम इस माध्यम पर कितना विश्वास करें और कितना न करें?

जनप्रतिनिधि: लाईसेंस समाज सेवा का या गुंडागर्दी का?

क्या हमारे देश की राजनीति जो कभी महात्मा गांधी,पंडित जवाहरलाल नेहरू,सरदार पटेल,लाल बहादुर शास्त्री,डा० राममनोहर लोहिया,बाबा साहब भीमराव अंबेडकर तथा मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे देश के महान नेताओं को आदर्श मानकर चलती थी वही राजनीति अब गुंडों,बदमाशों,अपराधियों,मवालियों तथा समाज में दंगा-फ़साद फैलाने ,हिंसा का मार्ग अपनाने तथा दूसरों को अपमानित करने में अपनी शान समझने वाले लोगों के हाथों जा चुकी है?

लोकतांत्रिक चुनाव व्यवस्था पर ‘लोक विश्वास’ सबसे ज़रूरी

लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में यह ज़रूरी नहीं कि इसमें लोक विश्वास भी शामिल हो? तर्क जब कुतर्क पर उतर आए तो ऐसे जवाब दिए जा सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी जब यूपी व उत्तराखंड में धांधली करा सकती थी तो उसने पंजाब में क्यों नहीं कराया?

मायावती की ‘माया’ और बहुजन समाज पार्टी

जिस भाजपा को मायावती मनुवादियों की पार्टी बताया करती थीं तथा तिलक तराजू और तलवार,इनको मारो जूते चार जैसे असभ्य नारे पार्टी में लगवाकर अपने मतदाताओं में जोश पैदा किया करती थीं आखिरकार जब 2005 में मुलायम सिंह यादव की सरकार गिराकर वे भाजपा की गोद में जा बैठीं उसी समय इस बात का अंदाज़ा हो चला था कि बसपा भी अन्य दलों से अलग कतई नहीं है।