राजनीति एक ही थाली के चटटे-बट्टे ……………………… August 20, 2015 | 4 Comments on एक ही थाली के चटटे-बट्टे ……………………… रविन्द्र प्रताप सिंह सियासतदारों की जिद्द के आगे संसद का पूरा मानसून-सत्र धूल गया। हर किसी की जुबान पर इनकी करतूत के चर्चे हैं। लेकिन ,इनको इसका कोई पछतावा नहीं। हो भी क्यों…..क्योकि इनकी पुरानी फितरत है वादे करके, भूल जाना। लगता है अब भारतीय राजनीति की यही परम्परा बन गई है। जिस वंदनीय संसद […] Read more » एक ही थाली के चटटे-बट्टे
राजनीति सियासी भंवर में फंसी जीएसटी August 14, 2015 / August 14, 2015 | Leave a Comment केशव झा इसे देश का दुर्भाग्य ना कहें तो क्या कहें की हमारे सियासतदान देशहित जैसे अतिमहत्वपूर्ण मसलों पर भी सियासत करने पर उतारूँ हैं। सियासत के हालिया संदर्भ को देखें तो आर्थिक एकीकरण करने वाली विधेयक जीएसटी पर भी सियासी खिंचतान और जोराजमाइश चरम पर है। जीएसटी पर सरकार और विपक्ष खेमों में बटीं […] Read more » जीएसटी
विविधा कैंसर की चिकित्सा सरल है August 13, 2015 | Leave a Comment वैद्य राजेश कपूर अनेक कैंसर रोगी केवल निर्विष फलाहार से ठीक होगये, अनेक गेहूं के ज्वारों के रस से, कई पंचगव्य के प्रयोग से और अनेक रोगी योग व प्राणायाम साधना व प्रकृतिक चिकित्सा से भी पूर्ण स्वस्थ हुए हैं। पर कीमोथिरेपी करवाने के बाद इन उपायों को करने वालों का निरोग होने का प्रतिशत […] Read more » कैंसर की चिकित्सा
राजनीति …. लिपटे रहत भुजंग! August 3, 2015 | 1 Comment on …. लिपटे रहत भुजंग! शोध-प्रबंध : देवेश शास्त्री ‘‘जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।’’ रहीमदास के इस सूक्ति-परक दोहे को प्रयोग कर नीतीश कुमार चन्दन और विषधर भुजंग के प्रतीकात्मक पात्रों की खोज की जिज्ञासा जगाई, जब खुद (नीतीश कुमार) को चन्दन और सहयोगी (लालू यादव) को भुजंग के […] Read more »
कविता गन्दी बस्ती July 31, 2015 | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार अन्त:विचारों में उलझा न जाने कब मैं एक अजीब सी बस्ती में आ गया । बस्ती बड़ी ही खुशनुमा और रंगीन थी । किन्तु वहां की हवा में अनजान सी उदासी थी । खुशबुएं वहां की मदहोश कर रहीं थीं । पर एहसास होता था घोर बेचारगी का टूटती सांसे जैसे फ़साने बना […] Read more » गन्दी बस्ती
टॉप स्टोरी राजनीति राष्ट्र के दिल में रहेंगे कलाम July 27, 2015 | Leave a Comment पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का निधन सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए एक अपूर्णीय क्षति है l केंद्र सरकार ने भी 7 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित कर दिया है l बहुमुखी प्रतिभा के धनी और “मिसाइल मैन” के नाम से विख्यात अब्दुल कलाम देश के सर्वोच्च पद पर भी आसीन रहे l कई सम्मान […] Read more »
राजनीति अरविंद केजरीवाल : एक विवादित मुख्यमन्त्री July 13, 2015 | Leave a Comment रविन्द्र शर्मा अतीत की उम्मीद और भविष्य -वर्तमान के भरोसे का टूटना, कुछ ऐसी ही धुंधली तस्वीर बन चुकी है आज AAP की। नवंबर 2013 में AAP आम आदमी के लिए लांच की गई लेकिन आज विवादों के शो पीस के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा। मिडिल क्लास के लिए magni show के […] Read more » अरविंद केजरीवाल एक विवादित मुख्यमन्त्री
कविता आने दो दुनिया में July 13, 2015 / July 13, 2015 प्रतिमा शुक्ला बन रहा हैं एक जीवन आने को तैयार है एक जीवन सोच रहीं है उस पल को जब लेगी मां हाथों में जाग्रत होगा उसका मातृत्व बन जायेगी वह ममता की मूरत अचानक हुई कुछ हलचल शायद थी मशीनों की ध्वनि सहम गयी वह टूट गया उसका सपना पूछ रही है वह मां […] Read more »
विविधा व्यापमं बनाम यमराज July 11, 2015 | Leave a Comment गंगा प्रसाद मरते पत्रकार… निडर होते अपराधी हर रोज कही ना कही कोई ना कोई और किसी ना किसी की डोर टूट ही जाती है…जमाने में जीना है तो जमाने के हिसाब से जीना होगा… अगर जमाने के हिसाब से नहीं जिया तो किसी ना किसी दिन जिंदगी की डोर तोड़ दी जाएगी…और ये भी […] Read more » व्यापमं बनाम यमराज
राजनीति समाज अच्छे दिन की कल्पना और सामाजिक विद्रूपताएं July 8, 2015 | 2 Comments on अच्छे दिन की कल्पना और सामाजिक विद्रूपताएं घनश्याम भारतीय- प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेन्द्र मोदी ने जिस अच्छे दिन की कल्पना की थी और देश वासियों को उसके सपने दिखाये थे उन्हें साकार होने में सामाजिक विदू्रपताएं बाधक बनी हुई है। जिन्हें दूर किये बिना अच्छे दिन की कल्पना बेमानी होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि व्यक्तियो की एक लम्बी श्रृंखला से बनने वाला […] Read more » सामाजिक विद्रूपताएं
विविधा समाज जीवन का पुनर्मूल्यांकन और जर्जर समाज July 8, 2015 | 1 Comment on जीवन का पुनर्मूल्यांकन और जर्जर समाज घनश्याम भारतीय भारत गांवो का देश है, क्योंकि देश की अधिकांश आबादी गांवो में बसती है। इसलिए गांवो और ग्रामीणो की दशा सुधारने के लिए सरकार द्वारा कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से प्रयास तो किये जा रहे है परन्तु वह परिणाम सामने नही आ पा रहा है जो आना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि […] Read more » जर्जर समाज जीवन का पुनर्मूल्यांकन
मीडिया खतरे में खबरनवीसों की आजादी June 29, 2015 | 2 Comments on खतरे में खबरनवीसों की आजादी हर लोकतान्त्रिक देश की तरह भारत भी देश के तमाम पत्रकारों के पूर्ण रूप से आजाद होकर ख़बरें लिखने व छापने का दम्भ भरता है। लेकिन बीते कुछेक हफ़्तों से चल रहे भारतीय खबरनवीसों पर हमलों से इस दम्भ पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। विगत एक महीनें में कई भारतीय पत्रकारों पर हुए […] Read more » खतरे में खबरनवीसों की आजादी