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सियासी भंवर में फंसी जीएसटी

केशव झा

इसे देश का दुर्भाग्य ना कहें तो क्या कहें की हमारे सियासतदान देशहित जैसे अतिमहत्वपूर्ण मसलों पर भी सियासत करने पर उतारूँ हैं। सियासत के हालिया संदर्भ को देखें तो आर्थिक एकीकरण करने वाली विधेयक जीएसटी पर भी सियासी खिंचतान और जोराजमाइश चरम पर है। जीएसटी पर सरकार और विपक्ष खेमों में बटीं नजर आ रही हैं, जबकि व्यक्तिगत मसलों जैसे वेतन और भत्ते बढ़ौतरी, राजनीतिक दलों के आरटीआई के दायरे में आने एवं वित्तीय श्रोत की जानकारी देना, पर अभूतपूर्व एकजुटता हो जाती है। क्या पक्ष- क्या            विपक्ष,क्या दोस्ती-क्या दुश्मनी , बिना लागलपेट के एक ही दिन में कानून पारित हो जाती है। मसलन देखा जाये तो जीएसटी पर पूरी लड़ाई क्रेडिट की है। बीजेपी विपक्ष में रहते हुए तत्कालीन संप्रग सरकार द्वारा प्रस्तावित जीएसटी का विरोध कर रही थी, आज वही जब सत्ता में है तब जीएसटी को पारित कराना चाह रही है और काँग्रेस विरोध पर उतारू है। देखा जाये तो इन परिदृश्यों में बस मोहरे बदले हैं पर पटकथा वही है। जीएसटी के इतिहास पर गौर करें तो 2003 में तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने जीएसटी की जरूरत और प्रासंगिकता को लेकर केलकर कमिटी का गठन किया था । तत्पश्चात 2006 मे संप्रग सरकार के वित्तमंत्री पी॰ चितंबरम ने संसद में इसकी जरूरत को सदन के समक्ष उद्दत किया था। 2011 मे इसे संसद में लाया गया परंतु केंद्र और राज्यों के बीच आम सहमति ना हो पाने के कारण यह बिल अधर मे लटक गयी । उसके बाद gstराजग सरकार द्वारा प्रस्तावित किया गया और मई 06, 2015 को लोकसभा द्वारा पारित किया गया और आज यह राज्यसभा में लंबित है।

भारत का मध्यम वर्ग ” कर आतंकवाद” से काफी त्रस्त है, ऐसे में अगर जीएसटी कानून का शक्ल ले लेगी तो इससे आमजन को काफी राहत मिलेगी ।  हाँ जीएसटी कर कितना प्रतिशत होगा इस पर अभी शंसय की स्थिति है। संविधान की 122वीं संशोधन के लिए सरकार को दो तिहाई बहुमत चाहिए जो की उसके पास लोकसभा में तो है परंतु राज्यसभा में वह अल्पमत में है। जीएसटी के आने से समूचे देश में एक मुक्त व्यापार की सपना साकार हो सकेगी और व्यापार बाधा दूर हो जाएगी। वर्तमान हालात को देखते हुए तो सरकार के पास एक ही मौजू विकल्प बची है जिससे जीएसटी को पारित किया जा सकता है, वह है संसद का संयुक्त सत्र। सिर्फ संसद से इसके पारित हो जाने से सरकार की राह आसान नही होने वाली है , सरकार को आधे से ज्यादा राज्य विधानसभा द्वारा भी इसे पारित करवानी होगी ,जोकि टेढ़ी खीर है।

जीएसटी के मूलतत्व या यौं कहें इसके फायदे पर नजर गड़ाएँ तो बुनियादी फायदे इस प्रकार हैं जो हमें काफी परेशान करती हैं  वह है लाल फीताशाही में कमी, साफ सूत्री उत्पाद कीमत, आयात स्पर्धा में बढ़ौतरी ,पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त कर प्रणाली ,व्यापार लागत में कमी ,पर्दे के पीछे की व्यापारिक और कर क्रियाकलाप में कमी, आसान कर प्रणाली। इन सारी चीजों के कारण वस्तु उत्पाद लागत काफी बढ़ जाती थी। जाहीर सी बात है अगर व्यापार और उत्पाद लागत में उछाल होगी तो फिर हमें सामान कैसे सस्ता मिल पाएगी । आखिर क्या कारण है की हर राज्य में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अंतर पाया जाता है और जाहीर है अगर पेट्रोल डीजल ही मंहगा हो और दाम अलग -अलग् होंगे तो वस्तु लागत और दाम भी अलग अलग होंगे ही।

आपने , हमसब ने राज्य सीमाओं के पास ट्रकों की लंबी कतार देखी है, वो कतार ट्रकों के खराब या फिर सड़क के टूटने के कारण नहीं लगीं हैं बल्कि ये एक्साइज ड्यूटी, कस्टम्स ड्यूटी, सेल्स टैक्स, कई प्रकार के सेल्स, सर्विस टैक्स, ऑक्टरॉय यानी चुंगी सरीखों टैक्स के चुकता करने हेतु हर कदम,हर सीमा पर खड़ी हो जाती हैं , जिसके आड में अवैध वसूली का गोरखधंधा  खूब फलता फूलता है। इसलिए ये नेता और दल इस मुख्य श्रोत को खत्म नहीं होने देना चाहती हैं। खैर सियासी पार्टियां जो कर रहीं है करें परन्तु देश देख रहा है कि कैसे उसी का जनप्रतिनिधि उसका जीना मुहाल कर रखा है. जीएसटी भारत को वैश्विक स्वरुप प्रदान करेगा और भारत को विश्व अर्थव्यवस्था के समकक्ष खड़ा करने में मदद करेगा। आने वाले दिन देश अर्थवयस्था के लिए काफी महत्वपूर्ण होने वाले हैं।  क्या देश की अर्थव्यवस्था को जीएसटी के पास होने से रफ़्तार मिलेगी या फिर इसके लटकने से निवेशकों में निराशा का माहौल व्याप्त हो जाएगा..

 

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