खतरे में खबरनवीसों की आजादी

journalistहर लोकतान्त्रिक देश की तरह भारत भी देश के तमाम पत्रकारों के पूर्ण रूप से आजाद होकर ख़बरें लिखने व छापने का दम्भ भरता है। लेकिन बीते कुछेक हफ़्तों से चल रहे भारतीय खबरनवीसों पर हमलों से इस दम्भ पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। विगत एक महीनें में कई भारतीय पत्रकारों पर हुए हमले से पूरे विश्व में भारतीय पत्रकारों की आजादी के साथ-साथ सुरक्षा पर भी चर्चाओं के साथ ऊँगली उठने लगी है। इसके साथ ही भारत के तमाम स्वतंत्र रूप से काम करने  वाले पत्रकारों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किये जाने लगे हैं।

 

जून माह की पहली तारीख को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में बतौर स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने वाले जगेंद्र सिंह की जलाकर हत्या कर दी गयी थी। ठीक इसके कुछ दिनों बाद ही ऐसी ही घटना मध्य प्रदेश के स्वतंत्र पत्रकार संदीप कोठारी के साथ भी घटी। स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने वाले दोनों ही पत्रकारों की हत्याओं में दो समानता पहली ही नज़र में दिखाई पड़ती है। जहाँ एक ओर दोनों ही पत्रकारों की हत्याएं प्रदेश के माफियाओं के खिलाफ खबर लिखने व उससे समबन्धित सच को उजागर करने पर हुई थी तो वहीँ संदीप व जगेंद्र दोनों को जला कर बेहद बेदर्दी से से मार डाला।

 

बेहद बेदर्दी से की गयी दोनों पत्रकारों की हत्याओं के बाद देश के भीतर कई जगह इसका विरोध भी शुरू हो गया है। पत्रकार समूह के साथ-साथ देश के तमाम नेता, आम जनता आदि पत्रकारों पर हो रहे हमले के खिलाफ कमोबेश खड़े होते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। बहरहाल, संदीप की हत्या पर काफी बवाल मचने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जगेंद्र सिंह के परिवार वालों को तीस लाख रुपये, दोनों बेटों को भविष्य में सरकारी नौकरी के साथ साथ जांच को पूर्णतः निष्पक्षता के साथ कराने का आश्वासन देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। दोनों पत्रकारों के परिवारों को सरकारों की तरफ से मिले आश्वासन के बाद अब भी देश  के तमाम पत्रकारों की सुरक्षा के लिए किसी भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

अगर हम मौजूदा वक़्त में हो रहे पत्रकारों पर हमले की संख्या के बारे में बात करें तो बीते कुछेक वर्षों में पत्रकारों की हत्याओं के मामले में काफी तेज़ी आई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, जगेंद्र सिंह व संदीप कोठारी को मिलाकर बीते 22 सालों में 58 भारतीय खबरनवीसों की जान जा चुकी है। सौम्या विश्वनाथन, जे. डे. आदि जैसे कुछेक नाम हैं जिनकी हत्या के बाद भारतीय पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर नए तरीके से बात शुरू हुई लेकिन कई सालों के बीत जाने के बाद भी अभी तक सुरक्षा से सम्बंधित किसी भी प्रकार का कोई निर्णय केंद्र सरकार के द्वारा नहीं लिया गया है।

निष्पक्ष पत्रकारिता के के लिए भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में कई पत्रकारों पर भी हत्याओं के द्वारा रोक लगायी जा चुकी है। पूरे विश्व में हाल ही में हुए पत्रकारों की हत्यों पर एक नज़र डाले तो पाएंगे कि पिछले दो वर्ष में लगभग 150 खबरनवीसों की आजादी पर हत्या के जरिये रोक लगाई गयी है। इस आंकड़े में एक दिलचस्प व् अचंभित करने वाला सच यह है कि मारे गए इन लगभग 150 पत्रकारों में से लगभग 60 के आस पास ऐसे खबरनवीस हैं जिनकी हत्या आतंकी गढ़ में रिपोर्टिंग करते हुए की गयी है। सच को उजागर करने व जनता से सीधे सरोकार की भावना की ही वजह से अब कहीं न कहीं देश, विदेश के तमाम पत्रकारों के ऊपर अपनी जान से हाथ धोने का संकट मंडराता हुआ प्रतीत हो रहा है।

 

मौजूदा वक़्त में महज सीरिया, इराक, अफगानिस्तान जैसे पश्चिम एशियाई देशों के साथ-साथ सूडान, सोमालिया जैसे अफ्रीकी देश भी युद्ध के दौर से गुजर रहे हैं। इसी कारणवश वहां पत्रकारिता करने गए खबरनवीसों की कई बार हत्या की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त एशिया के प्रमुख देशों में आने वाले पाकिस्तान में भी पत्रकारों के लिए हालात बदतर हैं। ऐसे में मौजूदा दौर में निष्पक्ष एवं विश्वसनीय पत्रकारिता के मूल्यों का निर्वहन करने वाले खबरनवीसों के लिए खतरे पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गए हैं।

निष्पक्षता पत्रकारिता का पहला नियम होने की वजह से तमाम पत्रकारों को न सिर्फ खबरों के प्रति निष्पक्षता बनाए रखनी होती है बल्कि जनता के समक्ष सच को उजागर करने की नीति भी कई बार उनकी जान जोखिम में डाल देती है। इसी कारणवश यह आवश्यक हो गया है कि सभी देशों की सरकारें मिलकर पत्रकारों के हित में ऐसे नियम व् कानून बनाये जिससे खबरनवीसों की जान को किसी प्रकार का कोई जोखिम न हो और वे खुलकर पाठकों तथा जनता के प्रति अपने कर्तव्य का सही रूप से निर्वहन कर सकें।

मदन तिवारी

1 thought on “खतरे में खबरनवीसों की आजादी

  1. तिवारी जी—
    बात आपकी सही भी है, और नहीं भी।
    समस्या अवश्य है। समाचार पत्र आज धंधा (व्यवसाय नहीं) बन चुके हैं। उसमें कोई नैतिकता के नियम नहीं पाले जाते।
    पत्रकार भी अपना दायित्व नहीं समझता। कितने समाचार पत्र ही बिक चुके हैं।

    यहाँ कोई राजदीप सरदेसाई, मोदी जी के मॅडिसन गार्डन के कार्यक्रम के समय, पहले से ही कुतर्कित, और कुत्सित प्रश्न पूछ कर ध्वनि मुद्रित कर रहा था।
    युवा लोगों को भारित प्रश्न पूछ कर मनचाहा अर्थ प्राप्त करना ऐसा उद्देश्य स्पष्ट पता चलता था। युवाओं को क्रोधित कर, उसी की चयनित सामग्री छापने का उसका धंधा लोगों को पता था।युवा को क्रोधित कर आंशिक उत्तरों के आधारपर मन चाहा अर्थ का निष्कर्श निकालना ही उसका उद्देश्य होता है।
    उस में भी जो पूर्वानुमानित दिशा स्पष्ट दिखाई देती थी।
    टिप्पणी लेखक को यह अनुभव हुआ है।
    वह स्वयं ही युवाओं को मारने दौडता दिखाई देता था। जो मुद्रित भी किया गया।
    —————————————
    पत्रकार भी उत्तर दायी है। समाचार पत्र भी।
    दोनों कोई चाणक्य या स्वामी रामदास नहीं जिनमें ब्राह्मण्य हो।
    ==>जब तक लाभालाभ की पत्रकारिता रहेगी, समाचार पत्र बिके रहेंगे और धन की ही प्रधानता रहेगी; यह समस्या रहेगी ही। आप लिखते रहें, समस्या सुलझेगी नहीं। न आगे भी अपेक्षा है।
    ऐसी प्रामाणिक मान्यता है।
    क्या उत्तर देंगे आप?

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