प्रह्लाद सबनानी

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सेवा निवृत उप-महाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
ग्वालियर
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लेखक - प्रह्लाद सबनानी - के पोस्ट :

आर्थिकी राजनीति

भारतीय अर्थव्यवस्था में हो रहे बदलाव की ब्यार पर प्रश्नचिन्ह क्यों?

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भारत में पिछले एक दशक में, विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में, अतुलनीय सुधार दृष्टिगोचर है और भारतीय अर्थव्यवस्था आज विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के साथ ही विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था भी बन गई है। आगे आने वाले लगभग पांच वर्षों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी, ऐसा आंकलन विश्व के कई वित्तीय एवं आर्थिक संस्थान कर रहे हैं। आज विश्व के कई देश पूंजीवादी मॉडल से निराश होकर भारतीय आर्थिक मॉडल को अपनाने की बात करने लगे हैं क्योंकि सनातन संस्कृति पर आधारित भारतीय आर्थिक मॉडल पश्चिमी आर्थिक मॉडल की तुलना में बेहतर माना जा रहा है। परंतु, दुर्भाग्य से भारत में कुछ राजनैतिक दल एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हुए भारत में हाल ही के समय में हुई आर्थिक प्रगति को कमतर आंकते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था में हो रहे बदलाव की ब्यार पर ही प्रश्न चिन्ह लगाते दिखाई दे रहे हैं।   भारत आज अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में नित नई ऊंचाईयां छू रहा है। दिसम्बर 2023 के प्रथम सप्ताह में भारत ने फ्रान्स एवं ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए शेयर बाजार के पूंजीकरण के मामले में पूरे विश्व में पांचवा स्थान हासिल किया था। भारत से आगे केवल अमेरिका, चीन, जापान एवं हांगकांग थे। परंतु, अब दो माह से भी कम समय में भारत ने शेयर बाजार के पूंजीकरण के मामले में हांगकांग को पीछे छोड़ते हुए विश्व में चौथा स्थान प्राप्त कर लिया है। अब ऐसा आभास होने लगा है कि भारत अर्थ के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर खोई हुई अपनी प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करता हुआ दिखाई दे रहा है। एक ईसवी से लेकर 1750 ईसवी तक आर्थिक दृष्टि से पूरे विश्व में भारत का बोलबाला था। इस खंडकाल में विश्व के कुल विदेशी व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत से भी अधिक की रही है क्योंकि उस समय पर भारत में सनातन संस्कृति का पालन करते हुए व्यापार किया जाता था। भारत में कर्म एवं अर्थ के कार्यों को धर्म का पालन करते हुए करने की प्रथा का पुरातन शास्त्रों में वर्णन मिलता है। भारत में चूंकि आज एक बार पुनः सनातन संस्कृति का पालन करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में कार्य सम्पन्न हो रहे हैं अतः पूरे विश्व का भारत पर विश्वास बढ़ रहा है। विदेशी निवेश के साथ साथ आज लगभग 50 देश भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता करना चाहते हैं क्योंकि भारत वैश्विक स्तर पर विभिन्न उत्पादों के लिए एक बहुत बड़े बाजार के रूप में विकसित हो रहा है।   ऐसा कहा जाता है कि शेयर बाजार में निवेशक अपनी जमापूंजी का निवेश बहुत सोच विचार कर करता है एवं जब निवेशकों को यह आभास होने लगता है कि अमुक कम्पनी का भविष्य बहुत उज्जवल है एवं निवेशक द्वारा किए गए निवेश पर प्रतिफल अधिकतम रहने की सम्भावना है, तभी निवेशक अपनी जमापूंजी को शेयर बाजार में उस अमुक कम्पनी में निवेश करते है। इस प्रकार, जब किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर निवेशकों का भरोसा बढ़ता हुआ दिखाई देता है तो विशेष रूप से विदेशी निवेशक एवं विदेशी संस्थागत निवेशक उस देश में विभिन्न कम्पनियों के शेयर में अपनी निवेश बढ़ाते हैं। चूंकि विदेशी संस्थानों को आगे आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था पर एवं भारतीय कम्पनियों की विकास यात्रा पर भरपूर भरोसा है अतः भारतीय शेयर बाजार में निवेश भी रफ्तार पकड़ रहा है।   किसी भी देश की आर्थिक प्रगति में शासन द्वारा बनाई गई नीतियों का विशेष प्रभाव रहता है। पिछले 10 वर्षों के खंडकाल में भारत न केवल आर्थिक क्षेत्र बल्कि सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रों में भी मजबूत हुआ है और भारत ने पूरे विश्व में अपनी धाक जमाई है। आज भारतीय मूल के लगभग 3.20 करोड़ लोग विश्व के अन्य देशों में निवास कर रहे हैं। भारतीय मूल के इन नागरिकों ने भारतीय सनातन संस्कृति का पालन करते हुए इन देशों के स्थानीय नागरिकों को भी प्रभावित किया है जिससे विदेशी नागरिक भी अब सनातन संस्कृति की ओर आकर्षित होने लगे हैं। विशेष रूप से विकसित देशों में तो सामाजिक तानाबाना इतना अधिक छिन्न भिन्न हो चुका है कि अब ये देश आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याओं के हल हेतु आशाभारी नजरों से भारत की ओर देख रहे हैं। अंतरिक्ष के क्षेत्र में आज भारत एक वैश्विक ताकत बनाकर उभरा है। भारत आज न केवल अपने लिए सेटेलाईट अंतरिक्ष में भेज रहा है बल्कि विश्व के कई अन्य देशों के लिए भी सेटेलाईट अंतरिक्ष में स्थापित करने में सक्षम हो गया है। योग एवं आध्यात्म के क्षेत्र में तो भारत अनादि काल से विश्व गुरु रहा ही है, परंतु हाल ही के समय में भारत एक बार पुनः योग एवं आध्यात्म के क्षेत्र में विश्व का मार्गदर्शन करने की ओर अग्रसर है। योग को सिखाने के लिए तो यूनाइटेड नेशन्स ने प्रति वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग दिवस मनाने का निर्णय लिया है और इसे पूरे विश्व में लगभग सभी देशों द्वारा बहुत ही उत्साह से मनाया जाता है। इसी प्रकार विज्ञान के क्षेत्र में भी भारत ने पूरे विश्व में अपना एक अलग मुकाम बना लिया है। किसी भी देश के लिए आर्थिक प्रगति तभी सफल मानी जानी चाहिए जब उस देश के अंतिम पंक्ति में खड़े नागरिक को भी उस देश की आर्थिक प्रगति का लाभ मिलता दिखाई दे। इस दृष्टि से विशेष रूप से गरीबी एवं आय की असमानता को कम करने में भारत ने विशेष सफलता पाई है। जिसकी अंतरराष्ट्रीय मुद्रकोष एवं विश्व बैंक ने भी जमकर सराहना की है। भारत में वर्ष 1947 में 70 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे, और अब वर्ष 2020 में देश की कुल आबादी का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है। आज भारत डिजिटल इंडिया के माध्यम से क्रांतिकारी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। पिछले 10 वर्षों के दौरान भारत ने डिजिटलीकरण के क्षेत्र में अतुलनीय प्रगति की है एवं आज भारत में 120 करोड़ से अधिक इंटरनेट, 114 करोड़ से अधिक मोबाइल एवं 65 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ता हैं। इस प्रकार भारत ने एक नए डिजिटल युग में प्रवेश कर लिया है। शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी डिजिटल इंडिया ने कमाल ही कर दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाई गई है। अब तो ड्रोन के लिए भी नए डिजिटल प्लेटफार्म का उपयोग हो रहा है एवं ड्रोन के माध्यम से कृषि को किस प्रकार सहयोग किया जा सकता है इस पर भी कार्य हो रहा है। ड्रोन के माध्यम से बीजों का छिड़काव आदि जैसे कार्य किए जाने लगे हैं।  कृषि क्षेत्र, रक्षा उत्पादों, फार्मा, नवीकरण ऊर्जा, डिजिटल व्यवस्था के साथ ही प्रौद्योगिकी, सूचना तकनीकी, आटोमोबाईल, मोबाइल उत्पादन, बुनियादी क्षेत्रों का विकास, स्टार्ट अप्स, ड्रोन, हरित ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भी  भारत अपने आप को तेजी से वैश्विक स्तर पर एक लीडर के रूप में स्थापित करने की ओर अग्रसर हो गया है। इस प्रकार आर्थिक प्रगति के बल पर भारत एक बार पुनः अपने आप को विश्व गुरु के रूप में स्थापित करने जा रहा है। भारत विश्व में विकास के इंजन के रूप में उभर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि वर्ष 2024 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में भारत का योगदान 16 प्रतिशत से भी अधिक का रहने वाला है। जब अन्य देशों की विकास दर कम हो रही हैं तब भारत में आर्थिक विकास दर तेज हो रही हैं। केंद्र सरकार द्वारा देश में लागू की जा रही आर्थिक नीतियों एवं देश में मंदिर अर्थव्यवस्था एवं धार्मिक पर्यटन के बढ़ते आधार के चलते ही यह सम्भव हो पा रहा है। प्रहलाद सबनानी 

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आर्थिकी राजनीति

भारत शेयर बाजार पूंजीकरण के मामले में विश्व में चौथे स्थान पर पहुंचा

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भारत आज अर्थ के विभिन्न क्षेत्रों में नित नई ऊंचाईयां छू रहा है। दिसम्बर 2023 के प्रथम सप्ताह में भारत ने फ्रान्स एवं ब्रिटेन को पीछे छोड़ते हुए शेयर बाजार के पूंजीकरण के मामले में पूरे विश्व में पांचवा स्थान हासिल किया था। भारत से आगे केवल अमेरिका, चीन, जापान एवं हांगकांग थे। परंतु, अब दो माह से भी कम समय में भारत ने शेयर बाजार के पूंजीकरण के मामले में हांगकांग को पीछे छोड़ते हुए विश्व में चौथा स्थान प्राप्त कर लिया है। भारतीय शेयर बाजार का पूंजीकरण 4.35 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से भी अधिक का हो गया है। अब ऐसा आभास होने लगा है कि भारत अर्थ के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करता हुआ दिखाई दे रहा है। एक ईसवी से लेकर 1750 ईसवी तक आर्थिक दृष्टि से पूरे विश्व में भारत का बोलबाला था। इस खंडकाल में विश्व के कुल विदेशी व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत से भी अधिक की रही है क्योंकि उस समय पर भारत में सनातन संस्कृति का पालन करते हुए व्यापार किया जाता था। भारत में कर्म एवं अर्थ के कार्यों को धर्म का पालन करते हुए करने की प्रथा का पुरातन शास्त्रों में वर्णन मिलता है। भारत में चूंकि आज एक बार पुनः सनातन संस्कृति का पालन करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में कार्य सम्पन्न हो रहे हैं अतः पूरे विश्व का भारत पर विश्वास बढ़ रहा है अतः न केवल विदेशी वित्तीय संस्थान बल्कि विदेशी नागरिक भी भारत के पूंजी (शेयर) बाजार में अपने निवेश को लगातार बढ़ाते जा रहे हैं। भारत में नैशनल स्टॉक एक्स्चेंज पर लिस्टेड समस्त कम्पनियों के कुल बाजार पूंजीकरण का स्तर 2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर जुलाई 2017 में पहुंचा था और लगभग 4 वर्ष पश्चात अर्थात मई 2021 में 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया था तथा केवल लगभग 2.5 वर्ष पश्चात अर्थात दिसम्बर 2023 में यह 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को भी पार कर गया था और आज यह 4.35 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर से भी आगे निकल गया है। इस प्रकार भारत शेयर बाजार पूंजीकरण के मामले में आज पूरे विश्व में चौथे स्थान पर आ गया है।   प्रथम स्थान पर अमेरिकी शेयर बाजार है, जिसका पूंजीकरण 50.86 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक है। द्वितीय स्थान पर चीन का शेयर बाजार है जिसका पूंजीकरण 8.44 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक है। वर्ष 2023 में चीन के शेयर बाजार ने अपने निवेशकों को ऋणात्मक प्रतिफल दिए हैं। तीसरे स्थान पर जापान का शेयर बाजार है जिसका पूंजीकरण 6.36 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक है। चौथे स्थान पर भारत का शेयर बाजार है जिसका पूंजीकरण 4.35 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक है। पांचवे स्थान पर हांगकांग का शेयर बाजार है जिसका पूंजीकरण 4.29 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर है। जिस तेज गति से भारतीय शेयर बाजार का पूंजीकरण आगे बढ़ रहा है, अब ऐसी उम्मीद की जा रही है कि कुछ समय पश्चात ही भारतीय शेयर बाजार का पूंजीकरण जापान शेयर बाजार के पूंजीकरण को पीछे छोड़ते हुए पूरे विश्व में तीसरे स्थान पर आ जाएगा।  भारतीय शेयर बाजार आज विदेशी निवेशकों के लिए एक आकर्षण का केंद्र बन गया है क्योंकि भारतीय शेयर बाजार अपने निवेशकों को भारी लाभ दे रहा है। हाल ही में सम्पन्न किए गए एक सर्वे में यह बात उभरकर सामने आई है कि विश्व के 100 बड़े निवेशक फंड जिनकी संपतियां 26.25 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की हैं, ने चीन के स्थान पर भारत में अपने निवेश बढ़ाने की बात की है। भारत के बाद ब्राजील एवं चीन में ये फंड अपने निवेश की बात कर रहे हैं। वर्ष 2023 में विभिन्न विदेशी निवेशक फंडों ने 2000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश भारत के शेयर बाजार में किया है। पिछले लगातार 8 वर्षों के दौरान भारतीय शेयर बाजार ने अपने निवेशकों को लाभ दिया है जबकि विश्व के कई बड़े बाजार यथा चीन, हांगकांग एवं  जापान जैसे बाजार भी लगातार यह लाभ नहीं दे पाए हैं। भारतीय शेयर बाजार ने वर्ष 2023 में अपने निवेशकों को 10 प्रतिशत से अधिक का लाभ दिया है।  भारत विश्व में विकास के इंजन के रूप में उभर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि वर्ष 2024 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में भारत का योगदान 16 प्रतिशत से भी अधिक का रहने वाला है। जब अन्य देशों की विकास दर कम हो रही हैं तब भारत में आर्थिक विकास दर तेज हो रही हैं। यह सब केंद्र सरकार द्वारा देश में लागू की जा रही आर्थिक नीतियों के कारण सम्भव हो पा रहा है। देश में मंदिर अर्थव्यवस्था एवं धार्मिक पर्यटन के बढ़ते आधार के चलते ही यह सम्भव हो पा रहा है। जब भारत की विकास दर बढ़ रही है तो भारत में कार्य कर रही विनिर्माण एवं अन्य क्षेत्रों में कार्यरत कम्पनियों का व्यापार भी बढ़ रहा है और भारतीय पूंजी बाजार में इन कम्पनियों के शेयरों की कीमत भी बढ़ रही है। अतः विदेशी संस्थान सहित विदेशी नागरिक भी अपने निवेश पर अधिक लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। विदेशी निवेशक एवं विदेशी संस्थान जो माह सितम्बर 2023 तक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे थे, अब अचानक भारी मात्रा में भारतीय शेयर बाजार में पैसा लगा रहे हैं। आज कई बार तो एक दिन में 5000 करोड़ रुपए से भी अधिक की राशि का निवेश इन विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार में किया जा रहा है।  केंद्र सरकार पर विपक्षी दलों द्वारा कई बार यह आरोप लगाया जाता है कि भारत में सरकारी उपक्रमों को समाप्त किया जा रहा है। जबकि पिछले 27 माह के खंडकाल के दौरान सरकारी उपक्रमों का पूंजीकरण शेयर बाजार में दुगना होकर 46.40 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक का हो गया है। सरकारी उपक्रमों ने अपने बाजार पूंजीकरण में इस अवधि में अतुलनीय वृद्धि दर्ज की है। बॉम्बे स्टॉक एक्स्चेंज का सेन्सेक्स पिछले 27 माह में 60,000 के स्तर से 70,000 के स्तर को पार कर गया है। इन सरकारी उपक्रमों के कोरपोरेट गवर्नन्स में भारी सुधार हुआ है, जिसके चलते न केवल विदेशी निवेशकों का बल्कि भारत के संस्थागत निवेशकों एवं खुदरा निवेशकों का भी विश्वास इन सरकारी उपक्रमों पर बढ़ा है।  केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक क्षेत्र में लगातार लागू किए जा रहे विभिन्न सुधार कार्यक्रमों के चलते विदेशी संस्थागत निवेशक, विदेशी खुदरा निवेशक एवं विदेशों में निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिक भी भारतीय कम्पनियों में भारी मात्रा में शेयर बाजार के माध्यम से निवेश कर रहे हैं। हाल ही के समय में भारतीय कम्पनियों की लाभप्रदता में भी अतुलनीय वृद्धि दृष्टिगोचर हुई है जिससे इन कम्पनियों के विभिन्न वित्तीय अनुपात बहुत आकर्षक बन गए हैं। जबकि चीन, हांगकांग, ब्रिटेन, जापान जैसे शेयर बाजार अपने निवेशकों को ऋणात्मक अथवा बहुत कम रिटर्न दे पा रहे हैं। कई विदेशी संस्थान निवेशक तो चीन, हांगकांग आदि देशों से अपना पूंजी निवेश निकालकर भारतीय शेयर बाजार में कर रहे हैं। इससे आगे आने वाले समय में भी भारतीय शेयर बाजार में वृद्धि दर आकर्षक बनी रहेगी, इसकी भरपूर सम्भावना व्यक्त की जा रही है।  ऐसा कहा जाता है कि शेयर बाजार में निवेशक अपनी जमापूंजी का निवेश बहुत सोच विचार कर करता है एवं जब निवेशकों को यह आभास होने लगता है कि अमुक कम्पनी का भविष्य बहुत उज्जवल है एवं निवेशक द्वारा किए गए निवेश पर प्रतिफल अधिकतम रहने की सम्भावना है, तभी निवेशक अपनी जमापूंजी को शेयर बाजार में उस अमुक कम्पनी में निवेश करते है। इस प्रकार, जब किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर निवेशकों का भरोसा बढ़ता हुआ दिखाई देता है तो विशेष रूप से विदेशी निवेशक एवं विदेशी संस्थागत निवेशक उस देश में विभिन्न कम्पनियों के शेयर में अपनी निवेश बढ़ाते हैं। चूंकि विदेशी संस्थानों को आगे आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था पर एवं भारतीय कम्पनियों की विकास यात्रा पर भरपूर भरोसा है अतः भारतीय शेयर बाजार में निवेश भी रफ्तार पकड़ रहा है।

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आर्थिकी राजनीति

पूंजीगत खर्च बढ़ाने के बावजूद वित्तीय घाटे को कम करना बजट की सफलता है

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वर्ष 2024 में लोक सभा चुनाव होने जा रहे हैं, अतः केंद्र सरकार ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए पेश किए गए बजट में भारी भरकम घोषणाओं से बचते हुए दिनांक 1 फरवरी 2024 को लोकसभा में वोट ओन अकाउंट पेश किया। लोक सभा चुनाव के सम्पन्न होने के पश्चात एक बार पुनः वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए पूर्ण बजट माननीया वित्त मंत्री महोदया द्वारा लोक सभा में पेश किया जाएगा। इस तरह से परम्परा का निर्वहन ही किया गया है। वित्तीय वर्ष 2024-25 वर्ष के लिए पेश किए किए गए बजट की मुख्य विशेषता यह है कि पूंजीगत व्यय को बढ़ाने के बावजूद वित्तीय घाटे को कम करने का सफल प्रयास किया गया है।  वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए पेश किए गए केंद्रीय बजट में 7.5 लाख करोड़ रुपए के पूंजीगत व्यय का प्रावधान किया गया था। इसे वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए पेश किए गए बजट में बढ़ाकर 10 लाख करोड़ रुपए का कर दिया गया था और अब वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए पेश किए गए बजट में 11.11 लाख करोड़ रुपए के रिकार्ड पूंजीगत व्यय का प्रावधान किया गया है। यदि किसी देश में पूंजीगत व्यय की मात्रा बढ़ाई जाती है तो इससे उस देश के लिए आय के साधन भी बढ़ते हैं। यह तथ्य भारत के मामले में भी उजागर होता दिखाई दे रहा है। पिछले दो वर्षों के दौरान लगातार भारी भरकम राशि के पूंजीगत व्यय के कारण अब देश की सकल आय में भी वृद्धि दृष्टिगोचर है। न केवल अप्रत्यक्ष कर, वस्तु एवं सेवा कर, की औसत मासिक वसूली 1.66 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक की हो गई है बल्कि प्रत्यक्ष करों में भी 25 प्रतिशत से भी अधिक की वृद्धि दर्ज हो रही है। जिसके चलते केंद्र सरकार को पूंजीगत व्यय को बढ़ाने के साथ ही वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने में भी सफलता मिल रही है।  वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों से 23.24 लाख करोड़ रुपए की कुल आय अनुमानित है और कुल खर्च 44.90 लाख करोड़ रुपए का अनुमान लगाया गया है, जबकि वित्तीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का, 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों से कुल आय बढ़कर 30.80 लाख करोड़ रुपए रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है तो कुल व्यय 47.66 लाख करोड़ रुपए रहने की सम्भावना है। इस प्रकार वित्तीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का, 5.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय घाटे को वित्तीय वर्ष 2025-26 में 4.5 प्रतिशत तक नीचे लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। वित्तीय घाटा कम होने का सीधा सा अर्थ है कि केंद्र सरकार को बाजार से कम ऋण लेने की आवश्यकता होगी क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा पूंजीगत खर्च में बढ़ौतरी के चलते आय के साधन बढ़ रहे हैं। इससे भारतीय बैकों को निजी क्षेत्र को ऋण उपलब्ध कराने हेतु अधिक राशि उपलब्ध होगी। वैसे भी, पिछले दो वर्षों के दौरान केंद्र सरकार द्वारा किए गए भारी भरकम पूंजीगत खर्च के चलते देश के आर्थिक चक्र में जो गति आई है उसके कारण उत्पादों की मांग में वृद्धि दर्ज हुई है एवं विभिन्न विनिर्माण इकाईयां अपनी उत्पादन क्षमता का 75 प्रतिशत से अधिक उपयोग करने लगी हैं। इस स्थिति के बाद सामान्यतः विनिर्माण इकाईयों के लिए अपनी उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना आवश्यक हो जाता है। अतः अब उद्योग क्षेत्र को अधिक पूंजी की आवश्यकता होगी जिसे बैकों से ऋण लेकर पूरा किया जा सकता है। अतः केंद्र सरकार अपने संसाधनों का उचित उपयोग करते हुए अभी से यह प्रयास कर रही है कि उसे स्वयं कम ऋण की आवश्यकता हो ताकि यह राशि उद्योग क्षेत्र को ऋण के रूप में उपलब्ध करायी जा सके। इस प्रकार, केंद्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने इस बजट के माध्यम से पूंजीगत खर्च को बढ़ाने के बावजूद वित्तीय घाटे को कम करने का सफल प्रयास किया है। पिछले 10 वर्षों के दौरान भारत के नागरिकों ने वित्तीय क्षेत्र में कई सकारात्मक बदलाव देखे हैं। केंद्र सरकार द्वारा प्रयास किया गया है कि भारत में सर्वसमावेशी, सर्वांगीण एवं सर्वस्पर्शी  विकास हो। देश में खाद्यान की चिंता दूर हुई है। ग्रामीण इलाकों के प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से लगभग एक करोड़ नए मकान निर्मित किए गए हैं, हर घर नल योजना के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में घरों तक पीने का पानी उपलब्ध कराया गया है एवं मातृशक्ति को कूकिंग गैस उपलब्ध कराई गई है। 50 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए हैं ताकि केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा चलायी जा रही विभिन्न योजनाओं का लाभ सीधे ही इन बैंक खातों के माध्यम से हितग्राहियों के हाथों में पहुंचे। 80 करोड़ नागरिकों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया जा रहा है।  प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के अंतर्गत 11.8 करोड़ किसानों को 6,000 रुपए प्रतिवर्ष सम्मान निधि सीधे उनके खातों में जमा की जा रही है। 4 करोड़ किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ मिल रहा है। फसलों की विभिन्न पैदावार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य के माध्यम से किसानों की आय को बढ़ाने के प्रयास किए गए हैं। कुल मिलाकर, पिछले 10 वर्षों के दौरान 25 करोड़ नागरिकों को गरीबी रेखा के ऊपर लाने में सफलता मिली है। इससे अब भारतीय नागरिकों की अपेक्षाएं भी बढ़ गई है। अतः नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का प्रयास करते हुए माननीया वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए पेश किए गए बजट में घोषणा की है कि एक करोड़ नागरिकों को, जो सोलर पेनल का उपयोग करेंगे, 300 यूनिट बिजली मुफ्त में प्रदान की जाएगी ताकि भारत में सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके और पेट्रोल, डीजल एवं कोयले के उपयोग को कम किया जा सके। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत अगले 5 वर्षों में 2 करोड़ अतिरिक्त नए मकान बनाए जाएंगे ताकि देश के प्रत्येक परिवार के पास अपनी छत उपलब्ध हो सके। आगे आने वाले कुछ वर्षों में लखपति दीदी बनाने के उद्देश्य से 9 करोड़ महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़े जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है ताकि मातृशक्ति रोजगार देने वाली बनें। देश में अभी तक एक करोड़ महिलाओं को स्वयं सहायता समूह के माध्यम से लखपति दीदी बनाया जा चुका है। इस लक्ष्य को अब 2 करोड़ से बढ़ाकर 3 करोड़ किया जा रहा है।  देश में अधोसंरचना को विकसित करने के उद्देश्य से रेल्वे के तीन नए कोरिडोर बनाए जाने का प्रावधान भी किया गया है। प्रथम, ऊर्जा, खनिज एवं सीमेंट गलियारा। द्वितीय, पत्तन गलियारा एवं तृतीय अधिक यातायात वाला गलियारा। यह तीन गलियारे पूर्व में ही विकसित किए जा रहे समर्पित माल गलियारे के अतिरिक्त होंगे। इन तीन गलियारों के विकसित होने के बाद देश में रेल्वे की सुविधाओं में और अधिक सुधार होगा। इसी प्रकार देश में हवाई अड्डों की संख्या भी बढ़कर 149 हो गई है एवं अब कई 2 एवं 3 टायर शहरों में भी हवाई अड्डों का निर्माण किया जा चुका है। भारत में कार्य कर रही विभिन्न विमानन कम्पनियों द्वारा 1000 नए विमानों को खरीदने का ऑर्डर दिया जा चुका है। कुल मिलाकर देश में अधोसंरचना के क्षेत्र में, रोड, रेल, हवाई मार्ग एवं जल मार्ग सहित, अतुलनीय सुधार हुआ है।  केंद्र सरकार रेवड़ियां बांटने के स्थान पर देश में आधारभूत संरचना को विकसित करने पर अधिक जोर दे रही है। इससे देश की सकल आय में वृद्धि हो रही है और युवा, महिला, किसान एवं गरीब वर्ग के हितार्थ नई नई योजनाएं चलाने में आसानी हो रही है। देश के समस्त परिवारों के लिए अपनी छत, जल, शिक्षा, स्वास्थ्य की व्यवस्था किए जाने के भरपूर प्रयास किए जा रहे हैं। इससे देश के नागरिकों में विश्वास पैदा हो रहा है।    प्रहलाद सबनानी 

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आर्थिकी लेख

आवासीय निर्माण के क्षेत्र में आगे बढ़ता भारत

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भारत में किसी परिवार के पास रहने के लिए यदि अपनी छत है तो इसे उस परिवार की समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। आर्थिक समृद्धि के शुरुआती दौर में केवल अपनी छत होने को ही उस परिवार विशेष के लिए आर्थिक सफलता का एक पैमाना माना जाता है। परंतु, धीरे धीरे वह परिवार आर्थिक तरक्की करते करते इस स्तर पर पहुंच जाता है कि उसे इस छोटे से मकान के स्थान पर सर्वसुविधा युक्त एक बड़े मकान की आवश्यकता महसूस होने लगती है। इस प्रकार का आर्थिक विकास किसी भी देश के लिए शुभ माना जा सकता है। हाल ही के समय में भारत में भी यह सब होता हुआ दिखाई दे रहा है। अभी हाल ही में दिल्ली के पास गुरुग्राम में एक सर्वसुविधा युक्त आवासीय प्रोजेक्ट की घोषणा की गई थी। इस आवासीय प्रोजेक्ट में 7,200 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले 1113 फलैट्स मात्र 3 दिन में ही बिक गए थे। यह भारत की आर्थिक सम्पन्नता को दर्शाता है। वैसे भी भारत में मकान खरीदने को एक ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में देखा जाता है और इसे भावनात्मक अनुभव एवं वित्तीय सुरक्षा की गारंटी माना जाता है। इस दृष्टि से भारत में आवासीय निर्माण  के लिए वर्ष 2023 एक अति सफल वर्ष साबित हुआ है और इसके आधार पर यह कहा जा रहा है कि वर्ष 2024 इससे भी अधिक बढ़िया वर्ष साबित होने जा रहा है।  विदेशी आक्रांताओं एवं अंग्रेजों द्वारा भारत को पिछले 1000 से अधिक वर्षों के दौरान लूटा खसोटा गया है। अब जाकर भारत का पुनर्निर्माण काल प्रारम्भ हुआ है। अभी तक भारतीय नागरिकों का लक्ष्य अपने सर पर छत होना अधिक महत्वपूर्ण कार्य था परंतु अब इसे सर्वसुविधा युक्त आवास के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। भारत को मिली राजनैतिक स्वतंत्रता के बाद के समय से विभिन्न सरकारों द्वारा देश में पब्लिक हाउसिंग प्रोजेक्ट प्रारम्भ किए गए थे। इन प्रोजेक्ट के माध्यम से विभिन्न सरकारों द्वारा नागरिकों के लिए घर बनाकर उपलब्ध कराए जाते रहे हैं। साथ ही, बाद के खंडकाल में सरकारों द्वारा देश में भूमि सुधार कार्यक्रम भी लागू किए गए ताकि खाली पड़ी जमीन को शहरों में रिहायशी इलाकों के तौर पर विकसित किया जा सके। इन भूमि सुधार कार्यक्रमों को लागू करने के बाद निजी क्षेत्र में भी रिहायशी मकानों को बनाने की अनुमति प्रदान की गई। इसके बाद से तो देश में सर्व सुविधा युक्त आवासीय प्रोजेक्ट की जैसे बाढ़ ही आ गई। इन विभिन्न प्रोजेक्ट के अंतर्गत निर्मित होने वाले सर्व सुविधा युक्त मकान हाथो हाथ बिकने भी लगे। अब तो देश में बड़े बड़े रिहायशी मकान के प्रोजेक्ट, सूचना प्रौद्योगिकी पार्क, शॉपिंग माल्स आदि भारी मात्रा में विकसित किए जा रहे हैं। अब तो अति महंगे एवं बड़े आकार के फलैट्स भी भारत में आसानी से हाथों हाथ बिकने लगे हैं। वर्ष 2024 आते आते भारत का रियल एस्टेट बाजार अब पूरे विश्व में सबसे तेज गति से आगे बढ़ता बाजार बन गया है। आज भारत के समस्त बड़े महानगरों में एक बात सामान्य सी नजर आती है कि यहां  बहुमंजिला इमारतों का निर्माण कार्य बहुत तेजी से चल रहा है। वर्ष 2023 में भारत का रियल एस्टेट बाजार  लगभग 26,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर का था जो 2030 में बढ़कर एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो जाने वाला है और 2047 तक 5.8 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का।  वर्तमान में रियल एस्टेट बाजार भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 7 प्रतिशत का योगदान करता है एवं इस क्षेत्र में 5 करोड़ नागरिकों को रोजगार उपलब्ध हो रहा है। रियल एस्टेट क्षेत्र के आगे बढ़ने से विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े अन्य कई उद्योगों को भी बढ़ावा मिलता है। जैसे सीमेंट उद्योग, स्टील उद्योग, ग्लास उद्योग, आदि। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2047 तक रियल एस्टेट बाजार का भारत के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 15 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।  भारत में वर्ष 2022 में 3.27 लाख करोड़ रुपए की कीमत के मकान बेचे गए थे एवं वर्ष 2023 में 4.5 लाख करोड़ रुपए की कीमत के मकान बेचे गए। इस प्रकार वर्ष 2023 में इस क्षेत्र में 38 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की गई है। इस क्षेत्र में मांग बहुत अधिक तेज बनी हुई है। भारत में रिहायशी मकानों की दृष्टि से सबसे बड़े 7 बाजार हैं – मुंबई, दिल्ली एनसीआर, बंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता, एवं पुणे। यह भारत के सबसे बड़े महानगर भी माने जाते हैं।  भारत में रिहायशी मकानों के बिक्री में इतनी अधिक वृद्धि दर इसलिए दर्ज हो रही है क्योंकि भारत में आर्थिक विकास ने तेज गति पकड़ ली है। गरीब वर्ग, मध्यम वर्ग बन रहा है तो मध्यम वर्ग अमीर वर्ग। इसलिए महंगे महंगे फलैट्स की मांग अधिक तेजी से बढ़ रही है। दूसरे, भारतीय रिजर्व बैंक ने भी ब्याज दरों को पिछले लम्बे समय से स्थिर रखा हुआ है। साथ ही, भारत में मुद्रा स्फीति की दर भी अब घटने लगी है। भारत के मध्यम वर्ग की आय बढ़ी है और वे रियल एस्टेट में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं। केंद्र सरकार भी नागरिकों को इस क्षेत्र में निवेश के लिए प्रोत्साहन दे रही है। आय कर की दरें कम की गई हैं। नए मकान खरीदने वालों को केंद्र सरकार की ओर से सब्सिडी दी जा रही है। “स्कीम फोर अफोर्डबल हाउस” लागू की गई है। परंतु, भारत में  केवल अफोर्डबल मकान ही नहीं खरीदे जा रहे हैं बल्कि अब नागरिक सर्वसुविधा युक्त महंगे मकानों में भी निवेश कर रहे हैं। किसी मकान की कीमत 1.5 करोड़ रुपए से अधिक होने पर उसे सर्वसुविधा युक्त मकान की श्रेणी में गिना जाता है एवं मुंबई में 2.5 करोड़ रुपए से अधिक की कीमत वाले मकान को सर्व सुविधा युक्त श्रेणी के मकान में गिना जाता है। भारत में वर्ष 2023 में सर्वसुविधा युक्त मकानों की बिक्री 130 प्रतिशत बढ़ गई हैं। भारत में वर्ष 2022 में 3000 सर्वसुविधा युक्त मकानों की बिक्री हुई थी जबकि वर्ष 2023 में 6900 सर्वसुविधा युक्त मकानों की बिक्री हुई है।  जिन रिहायशी मकानों की कीमत 40 करोड़ रुपए से अधिक होती है उन्हें अल्ट्रा सर्वसुविधा सम्पन्न रिहायशी मकान की श्रेणी में गिना जाता है। वर्ष 2023 में इन मकानों की बिक्री 200 प्रतिशत बढ़ गई है। देश के 7 महानगरों में लगभग 600 अल्ट्रा सर्वसुविधा सम्पन्न मकान भारत में बिके हैं। यह दर्शाता है कि भारत में अति समृद्ध नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। भारत में करोड़पति (मिलिनायर) नागरिकों की जनसंख्या 69 प्रतिशत बढ़ गई है। अल्ट्रा हाई नेटवर्थ (3 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की आय) नागरिकों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार भारत में अगले तीन वर्षों में अल्ट्रा हाई नेटवर्थ नागरिकों की संख्या 19000 होने जा रही है। इस श्रेणी के नागरिक अल्ट्रा सर्वसुविधा सम्पन्न मकान चाह रहे हैं। इसी प्रकार कार्यालय के लिए स्थान, मॉल के लिए स्थान, ई-कामर्स कम्पनियों को अपना स्टॉक रखने के लिए बहुत बड़े आकर के गोडाउन की आवश्यकता भी भारत में अब लगातार बढ़ रही है। इस तरह के निर्माण में विदेशी निवेशक भी अपना निवेश बढ़ा रहे हैं। वर्ष 2023 के प्रथम 6 माह में विदेशी निवेशकों ने 400 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निजी निवेश भारत में किया है। इसमें से आधा यानी 200 करोड़ अमेरिकी डॉलर रियल एस्टेट के क्षेत्र में किया गया है। विदेशी निवेशक अब चीन में अपना निवेश घटाते हुए भारत में अपना निवेश बढ़ा रहे हैं। भारत में विदेशी निवेशकों को तेजी से विकास करती अर्थव्यवस्था मिल रही है, युवाओं की अधिक संख्या के चलते मांग अधिक मिलती है एवं स्थिर केंद्र सरकार के चलते आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है।     प्रहलाद सबनानी 

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राजनीति

प्रभुश्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण के बाद उत्तर प्रदेश में विकास का एक नया दौर शुरू होने जा रहा है

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अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न हो गई है और अब अयोध्या विश्व के अति महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों के पटल पर आ गया है। इसका अब भारत की आर्थिक प्रगति पर भी बहुत बड़ा असर होने जा रहा है। स्थानीय स्तर पर तो अब भारत के नए भविष्य की एक नई शुरुआत होने जा रही है। प्राण प्रतिष्ठा के बाद भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी अपने उदबोधन में कहा है कि  प्रभु श्रीराम सभी के है अतः यह भारत के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत होने जा रही है। प्रत्येक भारतीय रामायण पढ़ता है एवं अयोध्या के महत्व को भी समझता है। यह प्रभु श्रीराम का जन्म स्थल है और यह प्रभु श्रीराम की 500 वर्षों के बाद एक तरह से घर वापसी ही मानी जानी चाहिए। प्रभु श्रीराम भारत के कण कण में बसते हैं अतः अब ऐसी आशा की जानी चाहिए कि भारत में निवासरत विभिन्न मत पंथ मानने वाले नागरिक एक होकर भारत के विकास की गति को आगे बढ़ाने में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करेंगे।  प्रभु श्रीराम केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कई अन्य देशों में भी पूज्य है। कई देशों ने तो रामायण को अपनी भाषा में भी लिखा है। इस दृष्टि से रामायण के कई रूप हैं। थाईलैंड, कम्बोडिया, लाओस, चीन, म्यांमार, इंडोनेशिया, वियतनाम, आदि देशों में रामायण के स्थानीय रूप मिलते हैं। पूरे विश्व में कुल मिलाकर 300 भाषाओं में रामायण उपलब्ध है। उत्तरी थाईलैंड में एक शहर का नाम ही अजोध्या है। यह प्राचीन काल में एशियन थाई राज्य की राजधानी रहा है। कालांतर में जिन देशों में भारतीय मूल के नागरिक गए हैं वहां रामायण भी पहुंचा है। जैसे केरेबीयन देशों में, अफ्रीकन देशों में, फीजी आदि देशों में प्रभु श्रीराम विद्यमान रहे हैं और यहां के नागरिक, भारतीय मूल के नागरिकों सहित, प्रभु श्रीराम की पूजा करते हैं। अब भारत इन सभी देशों के साथ अपने राजनैतिक एवं सामरिक रिश्तों को मजबूत कर सकता है और इन देशों में रह रहे नागरिकों को भारत एक तरह से अपने देश की तरह दिखाई देने जा रहा है।   दूसरे, अब भारत में धार्मिक पर्यटन बढ़ने की अपार सम्भावनाएं बन गई हैं। भारत में अभी तक सबसे अधिक पर्यटक पड़ौसी देश बंगला देश से आते हैं, इसके बाद पश्चिमी देशों से पर्यटक भारत आते हैं, जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, रूस, आस्ट्रेलिया, फ्रान्स, जर्मनी आदि। इसके बाद एशिया के अन्य देशों से पर्यटक भारत आते है, जैसे मलेशिया, श्रीलंका एवं थाईलैंड। जबकि इन एशियाई देशों में प्रभु श्रीराम में आस्था रखने वाले नागरिकों की बहुत बड़ी संख्या निवास करती है। अतः अब इन एशियाई देशों से भारत में पर्यटकों का आना बढ़ना चाहिए। इन समस्त देशों के नागरिक प्रभु श्रीराम के बचपन की कहानियां पढ़कर बड़े हुए हैं, अब ये लोग निश्चित ही भारत में अयोध्या आकर प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर के दर्शन करने के लिए आना चाहेंगे।  धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने धरातल पर काम करना शुरू भी कर दिया है। एक रामायण सर्किट रूट को विकसित किया जा रहा है। इस रूट पर विशेष रेलगाड़ियां भी चलाए जाने की योजना बनाई गई है। यह विशेष रेलगाड़ी 18 दिनों में 8000 किलो मीटर की यात्रा सम्पन्न करेगी, इस विशेष रेलगाड़ी के इस रेलमार्ग पर 18 स्टॉप होंगे। यह विशेष रेलमार्ग प्रभु श्रीराम से जुड़े ऐतिहासिक नगरों अयोध्या, चित्रकूट एवं छतीसगढ़ को जोड़ेगा। अयोध्या में नवनिर्मित प्रभु श्रीराम मंदिर वैश्विक पटल पर इस रूट को भी  रखेगा।  विश्व के कई अन्य देश धार्मिक पर्यटन के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्थाएं सफलतापूर्वक मजबूत कर रहे हैं। सऊदी अरब धार्मिक पर्यटन से प्रति वर्ष 22,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर अर्जित करता है। सऊदी अरब इस आय को आगे आने वाले समय में 35,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक ले जाना चाहता है। मक्का में प्रतिवर्ष 2 करोड़ लोग पहुंचते हैं, जबकि मक्का में गैर मुस्लिम के पहुंचने पर पाबंदी है। इसी प्रकार, वेटिकन सिटी में प्रतिवर्ष 90 लाख लोग पहुंचते हैं। इस धार्मिक पर्यटन से अकेले वेटेकन सिटी को प्रतिवर्ष लगभग 32 करोड़ अमेरिकी डॉलर की आय होती है, और अकेले मक्का शहर को 12,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की आमदनी होती है। अयोध्या में तो किसी भी धर्म, मत, पंथ मानने वाले नागरिकों पर किसी भी प्रकार की पाबंदी नहीं होगी। अतः अयोध्या पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 5 से 10 करोड़ प्रतिवर्ष तक जा सकती है। फिर अकेले अयोध्या नगर को होने वाली आय का अनुमान तो सहज रूप से लगाया जा सकता है। अभी अयोध्या आने वाले श्रद्धालु अयोध्या में रूकते नहीं थे प्रात: अयोध्या पहुंचकर प्रभु श्रीराम के दर्शन कर शाम तक वापिस चले जाते थे परंतु अब अयोध्या को इतना आकर्षक रूप से विकसित किया गया है कि श्रद्धालु 3 से 4 दिन रुकने का प्रयास करेंगे। एक अनुमान के अनुसार, प्रत्येक पर्यटक लगभग 6 लोगों प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से रोजगार उपलब्ध कराता है इस संख्या के हिसाब से तो लाखों नए रोजगार के अवसर अयोध्या में उत्पन्न होने जा रहे हैं। अयोध्या के आसपास विकास का एक नया दौर शुरू होने जा रहा है। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अब अयोध्या के रूप में वेटिकन एवं मक्का का जवाब भारत में खड़ा होने जा रहा है। जेफरीज नामक एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज कम्पनी ने बताया है कि अयोध्या में निर्मित प्रभु श्रीराम के मंदिर से भारत की आर्थिक सम्पन्नता बढ़ने जा रही है। दिनांक 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में सम्पन्न हुए प्रभु श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद स्थानीय कारोबारी अपना उज्जवल भविष्य देख रहे हैं। अयोध्या अब धार्मिक पर्यटन का हब बनाने जा रहा है। अयोध्या अब दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ क्षेत्र बन जाएगा। धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से अब अयोध्या दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बनने जा रहा है। जेफरीज के अनुसार अयोध्या में प्रति वर्ष 5 करोड़ से अधिक पर्यटक आ सकते हैं। अभी अयोध्या में केवल 17 बड़े होटल हैं इनमें कुल मिलाकर 590 कमरे उपलब्ध हैं। लेकिन, अब 73 नए होटलों का निर्माण किया जा रहा है।  इनमें से 40 होटलों का निर्माण कार्य प्रारम्भ भी हो चुका है। अभी तक नए एयरपोर्ट, रेल्वे स्टेशन, टाउनशिप और रोड कनेक्टिविटी में सुधार जैसे कामों पर 85,000 करोड़ रुपए का निवेश किया गया है। इस निवेश का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर दिखाई देने जा रहा है। शीघ्र ही अयोध्या वैश्विक स्तर पर धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में उभरेगा। इससे होटेल, एयरलाईन, हॉस्पिटलिटी, ट्रैवल, सिमेंट जैसे क्षेत्रों को बहुत बड़ा फायदा होने जा रहा है। भारत के विभिन्न शहरों से 1000 के आसपास नई रेल अयोध्या के लिए चलाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। पूरे देश से दिनांक 23 जनवरी 2024 से धार्मिक पर्यटक अयोध्या पहुंचना शुरू हो गए हैं। यह हर्ष का विषय है कि पहिले दिन ही 5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने प्रभु श्रीराम के दर्शन किये हैं।  इस प्रकार कुल मिलाकर भारत भी अब वैश्विक पटल पर अपनी धाक जमा सकता है। इस धार्मिक आयोजन में 100 से अधिक देशों के विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित किया गया था। इनमे से कई विशिष्ट अतिथियों ने अपनी शुभकामनाएं व्यक्त करते हुए लिखा है कि वे शीघ्र ही प्रभु श्रीराम मंदिर के दर्शन के लिए अयोध्या जाएंगे।  प्रहलाद सबनानी

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लेख शख्सियत समाज

अमर शहीद हेमु कालाणी सिंध के नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना जगाते रहे

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ऐसा कहा जाता है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गर्म दल के स्वतंत्रता सेनानियों का भी भरपूर योगदान रहा है। इस दृष्टि से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के वीर सेनानियों ने, मां भारती को अंग्रेजों के क्रूर शासन से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से,  देश के कोने कोने से भाग लिया था। इन वीर सेनानियों में से भारत के कई वीर सपूतों ने तो मां भारती के श्री चरणों में अपने प्राण भी न्योशावर कर दिए थे। भारत के इन्हीं वीर सपूतों में अमर शाहीद श्री हेमू कालाणी का नाम भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है क्योंकि उन्हें बहुत ही कम उम्र, मात्र 19 वर्ष की आयु में दिनांक 21 जनवरी 1943 को क्रूर अंग्रेजी शासन द्वारा फांसी दे दी गई थी।   दिनांक 23 मार्च 1923 को श्री हेमू कालाणी का जन्म सिन्ध प्रांत के सक्खर जिले में सवचार स्थान पर श्री पेसूमल जी कालाणी एवं माता श्रीमती जेठी बाई कालाणी के घर पर हुआ था। श्री हेमू कालानी बचपन में ही सर्वगुण संपन्न व होनहार बालक थे, जो अपनी पढ़ाई लिखाई में तेज तर्रार होने के साथ साथ एक अच्छे तैराक, तीव्र साईकिल चालक तथा अच्छे धावक भी थे। वह कई बार तैराकी में भी कई पुरस्कार प्राप्त कर चुके थे। बचपन में ही श्री हेमू कालाणी “स्वराज्य सेना” नामक छात्र संगठन में सम्मिलित होकर इस संगठन के नेता बन गए थे। इन सभी विशेषताओं के ऊपर, श्री हेमू कालाणी अपने बचपन काल से ही राष्ट्रवाद की भावना से भी ओतप्रोत थे और आपने अंग्रेजों की क्रूर हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प ही ले लिया था और राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रियाकलापों में भी भाग लेना शूरू कर दिया था। अत्याचारी अंग्रेजों द्वारा संचालित सरकार के विरुद्ध छापामार गतिविधियों में भाग लेकर उनके वाहनों को जलाने में श्री हेमू कालाणी अपने साथियों का नेतृत्व भी करने लगे थे। साथ ही, अमर शहीद हेमू कालाणी द्वारा सिंध प्रांत के नागरिकों में स्वावलम्बन का भाव जगाने का प्रयास भी किया जा रहा था। यह भी एक अजीब संयोग ही कहा जाएगा कि श्री हेमू कालानी की जन्मतिथि एवं अमर शहीद श्री भगतसिंह जी की पुण्यतिथि एक ही है, अर्थात 23 मार्च। वर्ष 1942 में मात्र 19 वर्ष की अल्पायु में श्री हेमू कालाणी ने “अंग्रेजो भारत छोड़ो” के नारे को पूरे सिंध में गूंजायमान कर दिया था। श्री हेमू कालाणी के अदम्य साहस एवं उत्साह ने तो पूरे सिंधवासियों में ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए जोश भर दिया था। श्री हेमू कालाणी द्वारा अपनी किशोरावस्था में ही विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का आग्रह सिंधवासियों से किया जाता था। मां भारती के प्रति तो उनके मन में एक विशेष भाव था एवं अंग्रेजों की हुकूमत उन्हें बिलकुल भी रास नहीं आती थी इसलिए अल्पायु में ही वे सिंधवासियों का आह्वान करते नजर आते थे कि वे केवल देश में निर्मित वस्तुओं का ही उपयोग करें जिससे भारतीय नागरिकों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया जा सके।  अंग्रेजी शासन द्वारा भारतीयों पर किए जा रहे अत्याचारों के खिलाफ मात्र 19 साल की उम्र में श्री हेमू कालाणी ने जो किया, इस पर पूरे देश को आज भी गर्व है। वर्ष 1942 में “करो या मरो”, “अंग्रेजों भारत छोड़ो”, के नारों में एक आवाज श्री हेमू कालाणी की भी थी। सिंध प्रांत के सक्खर शहर में देश की आजादी के लिए कार्य कर रही संस्था “स्वराज्य सेना” के एक युवक ने श्री हेमू कालाणी को यह जानकारी दी कि आजादी के लिए प्रयासरत आंदोलनकारियों को कुचलने और उनका दमन करने के लिए रोहड़ी (सिंध) से अंग्रेज सैनिकों एवं हथियारों से भरी एक विशेष रेलगाड़ी सक्खर से होकर बलूचिस्तान की ओर जाने वाली है। यह सुनकर श्री हेमू कालाणी और उनके जाबांज साथी रेल ट्रैक पर गए और रेल की पटरी के नट बोल्ट खोलने लगे, परंतु श्री हेमू कालाणी पर अंग्रेज सिपाहियों की नजर पड़ गई और उसे पकड़कर लिया गया कर फिर जेल भेज दिया गया।  आजादी के दीवाने मात्र 19 साल के इस जवान का हौसला ही था कि पकड़े जाने व घोर यातनाओं को सहन करने के बाद भी उसने अंग्रेजों को यह राज नहीं बताया कि पटरियों के नट बोल्ट खोलने में उसके और कौन कौन साथी थे। श्री हेमू कालाणी के हौसले एवं उसकी देश भक्ति के आगे हार कर अंग्रेजों द्वारा 21 जनवरी 1943 को प्रातः सक्खर (सिंध) के केंद्रीय कारागार में श्री हेमू कालाणी को फांसी पर चढ़ा दिया गया। इससे पूरा देश गमगीन हो गया। देश के युवाओं में बदले का भाव जगा और वे भी अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हो गए एवं इस प्रकार अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन और अधिक तेज हो गया।    कालांतर में आजादी के मतवाले अमर शहीद श्री हेमू कालाणी को श्रद्धांजलि प्रदान करने के उद्देश्य से श्री हेमू कालाणी जी की माताजी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज के सेनानियों द्वारा स्वर्ण पदक प्रदान कर सम्मानित किया गया था। 14 अक्टोबर 1983 को भारतीय डाक व तार विभाग द्वारा अमर शहीद श्री हेमू कालाणी की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया गया था एवं भारत के संसद भवन में 21 अगस्त 2003 को श्री हेमू कालाणी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। इस प्रतिमा का लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री माननीय श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी द्वारा किया गया था। केंद्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा आजादी के दीवाने अमर शहीद श्री हेमू कालाणी का जन्म शताब्दी समारोह (दिनांक 23 मार्च 2022 से 23 मार्च 2023 तक) को, विशाल रूप में मनाया गया ताकि देश के युवा अमर शहीद श्री हेमू कालाणी के बलिदान से प्रेरणा लेकर समय आने पर मां भारती के लिए अपने प्राण भी न्यौशावर करने को तैयार रहें।   प्रहलाद सबनानी 

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राजनीति लेख

भारत में सांस्कृतिक धरोहरों को दिलाया जा रहा है उचित स्थान

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22 जनवरी 2024 को प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा अयोध्या में सम्पन्न होने जा रही है। पिछले लगभग 500 वर्षों के लम्बे संघर्ष के पश्चात श्रीराम लला टेंट से निकलकर एतिहासिक भव्य श्रीराम मंदिर में विराजमान होने जा रहे हैं। पूरे देश का वातावरण राममय हो गया है। न केवल भारत के नागरिकों में बल्कि अन्य कई देशों में भी सनातन धर्म में आस्था रखने वाले नागरिकों में जबरदस्त उत्साह दिखाई दे रहा है। अमेरिका के कई बड़े शहरों में प्रभु श्रीराम के बहुत बड़े आकार के होर्डिंग लगाए गए हैं। पूरे विश्व में ही एक तरह से नई ऊर्जा का संचार हो रहा है। आज सनातनी हिंदुओं के लिए यह एक एतिहासिक एवं गर्व करने का पल है क्योंकि प्रभु श्रीराम का मंदिर भारतीयों के लिए सदियों से एक सांस्कृतिक धरोहर रहा है और अब पुनः प्रभु श्रीराम के मंदिर को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में उचित स्थान दिलाया जा रहा है, इसके लिए पिछले 500 वर्षों के दौरान लाखों भारतीयों ने अपने प्राण तक न्यौशावर किए हैं।    वर्ष 2014 के बाद से भारत में सांस्कृतिक धरोहरों को संवारने का कार्य बहुत सफल तरीके से सम्पन्न किया जा रहा है। इसी का प्रमाण आज प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर के रूप में दिखाई दे रहा है। इसी प्रकार के प्रयास भारत के अन्य सांस्कृतिक धरोहरों को विकसित करने के लिए भी किए गए हैं। बाबा अमरनाथ की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए कठोर मौसम बाधा न बन पाए, इस बात को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार द्वारा बाबा अमरनाथ गुफा तक 110 किलोमीटर लम्बी सड़क का निर्माण करवाया जा रहा है, इसमें 11 किलोमीटर लम्बी एक सुरंग भी शामिल है। अभी तक श्रीनगर से बाबा अमरनाथ गुफा तक यात्रा करने में लगभग 3 दिन का समय लगता था किंतु इस नए विकसित किए जा रहे सड़क मार्ग के पश्चात केवल 8 से 9 घंटे के बीच का समय लगेगा। इसी प्रकार, अभी कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को चीन अथवा नेपाल के रास्ते से होकर जाना होता है परंतु, अब कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने के लिए चीन अथवा नेपाल जाने की आवश्यकता ही नहीं होगी क्योंकि केंद्र सरकार उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के रास्ते से सीधे कैलाश मानसरोवर तक 80 किलोमीटर लम्बी सड़क का निर्माण करवा रही है। इस सड़क निर्माण का 90 प्रतिशत कार्य सम्पन्न हो चुका है और शेष 10 प्रतिशत निर्माण कार्य भी वर्ष 2024 में पूरा हो जाने की सम्भावना है।  वाराणसी में काशी विश्वनाथ कोरिडोर एवं उज्जैन में महाकाल लोक कोरिडोर को विकसित करने के बाद अब मथुरा में भव्य बांके बिहारी कोरिडोर विकसित किया जा रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बांके बिहारी मंदिर के चारों ओर कोरिडोर बनाने की मंजूरी दे दी है। इस कोरिडोर के निर्माण के पश्चात प्रतिदिन लगभग 50,000 श्रद्धालुगण बांके बिहारी मंदिर के दर्शनों के लिए जा सकेंगे। इस नए विकसित किए जा रहे कोरिडोर में तीन विभिन्न मार्ग बनाए जा रहे हैं। पहिला मार्ग, जुगलघाट से प्रारम्भ होगा, दूसरा मार्ग, विद्यापीठ चौराहे से प्रारम्भ होगा एवं तीसरा मार्ग जादौन पार्किंग से प्रारम्भ होकर बांके बिहारी मंदिर तक पहुंचेगा।  असम में गौहाटी से लगभग 8 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या देवी मंदिर का भी कायाकल्प किया जा रहा है। मां कामख्या देवी के मंदिर में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु दर्शन करने हेतु पहुंचते हैं। इन श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु मां कामाख्या कोरिडोर विकसित किया जा रहा है। इस नए कोरिडोर में एक लाख वर्ग फुट क्षेत्र की जगह उपलब्ध होगी, जिससे श्रद्धालुओं को मां कामाख्या देवी के दर्शन करने में सुविधा होगी।  उत्तरप्रदेश राज्य में प्रभु श्रीराम मंदिर एवं बांके बिहारी कोरिडोर के साथ ही मिर्जापुर में 331 करोड़ रुपए की लागत से मां विध्यवासिनी कोरिडोर विकसित किया जा रहा है। यह उत्तरप्रदेश राज्य के मुख्यमंत्री माननीय  श्री योगी आदित्यनाथ का ड्रीम प्रोजेक्ट भी है। 50 फीट चौड़ा एवं 2 मंजिला परिक्रमा स्थल तैयार हो चुका है। वर्ष 2024 में ही मां विध्यवासिनी कोरिडोर के पूरी तरह बनकर तैयार होने की पूरी उम्मीद है।  आज लाखों की संख्या में श्रद्धालु मां वैष्णो देवी के दर्शन करने हेतु मां वैष्णो देवी के दरबार में प्रतिवर्ष अपनी हाजिरी लगाने के लिए जाते हैं। इन श्रद्धालुओं की मां वैष्णो देवी यात्रा को आसान बनाने के उद्देश्य से 670 किलोमीटर लम्बे दिल्ली-अमृतसर-कटरा एक्सप्रेस वे का निर्माण कराया जा रहा है। इस एक्सप्रेस वे के रास्ते में पड़ने वाले सिक्ख पंथ के कई स्थलों को भी जोड़ा जा रहा है। इस एक्सप्रेस वे के बनने से पहिले दिल्ली अमृतसर तक का सफर जो पहिले 8 घंटे में सम्पन्न होता था वह अब इस एक्सप्रेस वे के बनने के बाद केवल 4 घंटे में ही सम्पन्न होगा। इसी प्रकार दिल्ली से कटरा तक का सफर जो पहिले 15 घंटे में सम्पन्न होता था वह अब केवल 6 घंटे में ही सम्पन्न होगा। इस एक्सप्रेस वे के बनने के बाद माता वैष्णो देवी के भक्त माता रानी के दर्शन बड़े आराम से कर सकेंगे।   इसी प्रकार यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ एवं बद्रीनाथ की चार धाम यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को भी केंद्र सरकार सुलभ मार्ग उपलब्ध कराने जा रही है जो मौसम की मार को बर्दाश्त कर सके। इस चार धाम यात्रा को श्रद्धालुओं के लिए सुलभ बनाने का उद्देश्य से 12,000 करोड़ रुपए की लागत से 899 किलोमीटर का सड़क मार्ग विकसित किया जा रहा है। इस सड़क मार्ग में दो सुरंग, 15 पुल, 18 यात्री सेवा केंद्र और 13 बाई पास विकसित किए जा रहे हैं।  भारतीयों द्वारा इंजीनियरिंग के उत्कृष्ट नमूने के रूप में तमिलनाडु के रामेश्वरम के पास एक नया पम्बन ब्रिज विकसित किया जा रहा है। इस पम्बन ब्रिज की विशेषता यह है कि इस मार्ग से रेल के गुजरने पर यह रेल की पटरी बिछा देगा और इस ब्रिज के नीचे से पानी के जहाज अथवा स्टीमर के गुजरने पर पुल ऊपर उठ जाएगा ताकि इस रास्ते से स्टीमर निकल सके। नया पम्बन ब्रिज उन श्रद्धालुओं के लिए वरदान साबित होगा जो रामेश्वरम धनुष्कोटि की यात्रा करना चाहते हैं।  सनातन हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले नागरिकों के लिए यह एक बहुत बड़ी खुशखबरी मानी जानी चाहिए कि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र में स्थित मां शारदा पीठ के दर्शन करने का सपना भी अब शीघ्र ही पूरा हो सकता है। हाल ही में पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र की एसेम्बली ने 5,000 वर्ष पुराने मां शारदा पीठ में भारत से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक कोरिडोर बनाने का प्रस्ताव पारित कर दिया है। वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर में स्थित मां शारदा मंदिर का उद्घाटन करते समय भारत के गृह मंत्री श्री अमित शाह ने भी कहा था कि आगे आने वाले समय में मां शारदा पीठ के लिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में एक गलियारा खोलने का प्रयास भारत सरकार द्वारा किया जाएगा।  प्रहलाद सबनानी

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आर्थिकी लेख

वित्तीयवर्ष 2024 में भारत की आर्थिक विकास दर का सही आंकलन नहीं कर पा रहे हैं विदेशी वित्तीय संस्थान

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वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद के बारे में विदेशी वित्तीय संस्थान अभी भी व्यावहारिक रूख नहीं अपना पा रहे हैं। विभिन्न वित्तीय संस्थानों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर 6 से 6.5 प्रतिशत रह सकती है। जबकि वित्तीय वर्ष 2023-24 की प्रथम तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है और द्वितीय तिमाही में 7.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। आगामी दो तिमाही में भारत की आर्थिक विकास दर यदि 5.5 प्रतिशत भी रहती है तो यह पूरे वित्तीय वर्ष के लिये 6.5 प्रतिशत से ऊपर रहने वाली है। परंतु, केंद्र सरकार एवं कुछ राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे पूंजीगत खर्चों, ग्रामीण इलाकों के बढ़ रही उत्पादों की मांग, विभिन्न कम्पनियों की लगातार बढ़ रही लाभप्रदता, वस्तु एवं सेवा कर संग्रहण एवं प्रत्यक्ष कर संग्रहण में वृद्धि दर को देखते हुए इस बात की प्रबल सम्भावना है कि आगामी दो तिमाही में भारत की विकास दर निश्चित रूप से 5.5 प्रतिशत से अधिक रहने वाली है। इस प्रकार वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर 7 प्रतिशत से ऊपर रहने की प्रबल संभावनाएं बनती दिखाई दे रही हैं।  अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक के अनुमानों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 6.3 प्रतिशत की वृद्धि दर रह सकती है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इकरा के अनुसार यह 6.5 प्रतिशत, एशिया विकास बैंक एवं बार्कलेस एवं प्राइस वॉटर कूपर्स के अनुसार यह 6.7 प्रतिशत, डेलाईट इंडिया द्वारा यह 7 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है। इसके विपरीत विभिन्न भारतीय वित्तीय संस्थान भारत की विकास दर के बारे में लगातार अपने अनुमानों को सुधारते हुए इसे पूरे वित्तीय वर्ष के लिए 7 प्रतिशत से अधिक बता रहे हैं। आर्थिक अनुसंधान विभाग, भारतीय स्टेट बैंक द्वारा वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत की आर्थिक विकास दर 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, भारतीय रिजर्व बैंक ने भी इसके 7 प्रतिशत से अधिक रहने की सम्भावना जताई है तथा अभी हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकीय संस्थान द्वारा इसके 7.3 प्रतिशत रहने की सम्भावना जताई गई है।  दरअसल, अभी हाल ही के समय में भारतीय अर्थव्यवस्था के बहुत तेजी से डिजिटलीकरण हुआ है। प्रत्यक्ष सुविधा हस्तांतरण योजना (डीबीटी) के अंतर्गत भारतीय नागरिकों के 50 करोड़ से अधिक जमा खाते विभिन्न बैकों में खोले गए हैं। इन जमा खातों के खुलने से भारत के इन नागरिकों का वित्तीय रिकार्ड बनता जा रहा है। उदाहरण के लिए, एक चाय वाला यदि दिन भर में चाय के 200 कप, 10 रुपए प्रति कप की दर से बेचता है तो वह दिन भर में 2000 रुपए की आय का अर्जन कर लेता है। भारत में लगातार बढ़ रहे डिजिटलीकरण के चलते वह दुकानदार अपने ग्राहकों से चाय के एवज में नकद रोकड़ राशि न लेकर अपने खाते में सीधे यह राशि जमा कराता है। उसके बैंक खाते में प्रति माह 60,000 रुपए की राशि जमा हो जाती है एवं पूरे वर्ष भर में 720,000 रुपए की उसके बैंक खाते में जमा हो जाती है। इससे, उस दुकानदार का क्रेडिट रिकार्ड बनता जा रहा है। एक चाय वाला दुकानदार यदि साल भर में 720,000 रुपए की बिक्री कर लेता है तो उसके इस रिकार्ड को बैंक द्वारा अच्छा रिकार्ड मानते हुए उसे ऋण प्रदान करने हेतु पात्र ग्राहक मानते हुए उसके व्यापार को और आगे बढ़ाने के उद्देश्य से आसानी से उस दुकानदार को ऋण प्रदान कर दिया जाता है। इस प्रकार, कई सूक्ष्म आकार के व्यवसायी लघु एवं मध्यम आकार के व्यवसायी बनते जा रहे हैं। छोटे छोटे व्यापारियों के व्यवसाय का आकार बढ़ने के कारण यह व्यवसायी रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित करने में सफल हो रहे हैं। दूसरे, भारत में धार्मिक पर्यटन में जबरदस्त उच्छाल देखने में आ रहा है। वाराणसी में भगवान शिव का कोरिडोर बनने के बाद से वाराणसी में 7 करोड़ से अधिक श्रद्धालु प्रभु शिव के दर्शन करने हेतु पहुंचे हैं। इसी प्रकार उज्जैन में महाकाल लोक के बनने के बाद से उज्जैन नगर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कई गुणा बढ़ गई है। गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल की आदम कद भव्य प्रतिमा स्थापित होने के बाद से उस स्थल पर प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में पर्यटक पहुंच रहे हैं। इसी प्रकार, हरिद्वार, वृंदावन, तिरुपति बालाजी, वैष्णो देवी आदि धार्मिक स्थलों के दर्शन करने हेतु करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिवर्ष इन स्थलों पर धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से पहुंचते हैं। अभी हाल ही में अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह एवं  लक्षद्वीप को भी पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा रहा है। इससे न केवल भारत से बल्कि विदेशों से भी पर्यटकों की संख्या में अपार वृद्धि होने जा रही है। किसी भी देश में पर्यटन के बढ़ने से छोटे छोटे व्यवसाय, होटेल एवं परिवहन आदि जैसे क्षेत्रों में कार्य करने वाले व्यापारियों के व्यवसाय में अपार वृद्धि होती है एवं इन क्षेत्रों में रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित होते हैं। इससे भी देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होती है।  तीसरे, यह भी केवल भारत की ही विशेषता है कि विभिन त्यौहारों एवं शादी जैसे समारोहों पर भारतीय नागरिक दिल खोलकर पैसा खर्च करते हैं। इससे त्यौहारों एवं शादी के मौसम में व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापार में अतुलनीय वृद्धि दृष्टिगोचर होती है। जैसे दीपावली त्यौहार के समय भारत में नागरिकों के बीच विभिन्न नए उत्पादों की खरीद के लिए जैसे आपस में होड़ सी लग जाती है। भारत में लाखों करोड़ रुपए का व्यापार दीपावली त्यौहार के समय में होता है। इसी प्रकार की स्थिति शादियों के मौसम में भी पाई जाती है।   संभवत: विदेशी वित्तीय संस्थान भारत में हो रहे इस तरह के उक्त वर्णित परिवर्तनों को समझ नहीं पा रहे हैं एवं केवल पारंपरिक विधि से ही सकल घरेलू उत्पाद को आंकने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए भारत की विकास दर के संबंच में विभिन्न विदेशी संस्थानों के अनुमान गलत साबित हो रहे हैं।      प्रहलाद सबनानी

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आर्थिकी लेख

भारतीय नागरिकों के बीच कम हो रही है आय की असमानता

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भारत के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि विशेष रूप से कोरोना महामारी के बाद से भारत के आर्थिक क्षेत्र में K आकार का विकास हो रहा है। आर्थिक दृष्टि से K आकार के विकास से आश्य यह है कि देश की अर्थव्यवस्था में गरीब अधिक गरीब हो रहा है और अमीर और अधिक अमीर हो रहा है। हालांकि हाल ही के समय में भारत में आय, बचत, उपभोग एवं खर्च आदि के सम्बंध में इस प्रकार की नीतियां बनाई जाती रही हैं कि देश के गरीब वर्ग को अधिकतम लाभ मिले। इसके लिए कई विशेष योजनाएं, जैसे, गरीब अन्न कल्याण  योजना, उज्जवला योजना, आयुषमान भारत योजना, आवास योजना एवं प्रत्यक्ष लाभ अंतरण योजना आदि चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं के अंतर्गत सब्सिडी आदि की राशि लाभार्थियों के खातों में सीधे ही हस्तांतरित कर दी जाती है। इससे गरीब वर्ग के लाभार्थियों को सहायता की राशि 100 प्रतिशत तक मिल जाती है और इसमें भ्रष्टाचार की सम्भावना लगभग शून्य हो जाती है।   भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग द्वारा भारत के आयकर विभाग द्वारा जारी किए गए आयकर विवरणियों सम्बंधी आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करते हुए यह बताया है कि भारत में नागरिकों के बीच आय की असमानता कम हो रही है। देश में वित्तीय वर्ष 2014 में व्यक्तिगत आयकर रिटर्न फाइल करने वाली कुल संख्या में 36.3 प्रतिशत संख्या निम्न आय वर्ग की श्रेणी के नागरिकों की थी, और यह वर्ग अब वित्तीय वर्ष 2021 में मध्यम आय वर्ग की श्रेणी में आ गया है तथा इस बीच इस वर्ग की आय 21.1 प्रतिशत बढ़ी है। इस कारण के चलते 3.5 लाख रुपए वार्षिक आय वाले नागरिकों की संख्या वित्तीय वर्ष 2014 में 31.8 प्रतिशत से घटकर वित्तीय वर्ष 2021 में 15.8 प्रतिशत रह गई है। इसी प्रकार, सबसे अधिक आयकर अदा करने वाले 2.5 प्रतिशत नागरिकों का कुल आय में योगदान 2.81 प्रतिशत से घटाकर 2.28 प्रतिशत हो गया है। अतः देश में मध्यम आय वर्ग के नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आय कर दाखिल करने वाले नागरिकों की प्रति व्यक्ति औसत आय वित्तीय वर्ष 2014 में 3.1 लाख रुपए से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2021 में 11.6 लाख रुपए हो गई है और वित्तीय वर्ष 2022 में यह 12.5 से 13 लाख रुपए के बीच रहने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है।  भारत के आर्थिक विकास में भारतीय महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ रही है। कुल श्रमिक तंत्र में महिलाओं की संख्या 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 37 प्रतिशत हो गई है। महिलाएं आज कृषि के क्षेत्र में भी अपना योगदान लगातार बढ़ाती जा रही हैं। आयकर विवरणियां फाइल करने में भी महिलाओं की संख्या अब 15 प्रतिशत हो गई है।  भारत में लगातार तेज गति से हो रही आर्थिक प्रगति के चलते आज भारत में दोपहिया वाहनों की तुलना में चार पहिया वाहनों के बिक्री में अधिक वृद्धि दर हासिल हो रही है। वित्तीय वर्ष 2019 में 2.12 करोड़ दोपहिया वाहनो बिक्री हुई थी, जबकि उस वर्ष कृषि क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद में केवल 2.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई थी और मानसून में भी लगभग 14 प्रतिशत की कमी रही थी। वर्तमान वित्तीय वर्ष में दोपहिया वाहनों की बिक्री 1.8 करोड़ की रही है। इसके पीछे मुख्य कारण यह बताया जा रहा है कि एक तो मध्यम वर्ग अपने लिए मकानों की खरीद अधिक मात्रा में कर रहा है और दूसरे मध्यम वर्ग आज दोपहिया वाहनों के स्थान पर चार पहिया वाहन खरीदने की ओर आकर्षित हुआ है। इसी प्रकार, आज अर्द्धशहरी क्षेत्रों में लगभग 2 करोड़ परिवार खाद्य पदार्थों को खरीदेने हेतु “जोमटो ऐप” का उपयोग कर रहे हैं। अतः आज भारत के मध्यम वर्ग का टेस्ट बदल रहा है।  भारतीय अर्थव्यवस्था में नागरिकों का उक्त व्यवहार यदि आगे आने वाले समय में भी जारी रहता है तो एक अनुमान के अनुसार, अगले दशक की समाप्ति पर 50 प्रतिशत उत्पादों का उपभोग (लगभग 16 लाख करोड़ रुपए) गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले नागरिकों में से 90 प्रतिशत नागरिको द्वारा किया जाने लगेगा। आज गरीब वर्ग को केंद्र सरकार द्वारा बहुत बड़े स्तर पर मुफ्त अनाज, मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं एवं मकान आदि उपलब्ध कराए जा रहे हैं (अभी तक 4 करोड़ परिवारों को रहने के लिए मकान उपलब्ध कराए जा चुके हैं), जिसके कारण इस वर्ग की 8.2 लाख करोड़ रुपए के अतिरिक्त उपभोग कर सकने की क्षमता बढ़ी है।  वित्तीय वर्ष 2013-14 से वित्तीय वर्ष 2021-22 के बीच 5 लाख से 10 लाख रुपए की आय वाले वर्ग में आय कर विवरणियां फाइल करने वाले नागरिकों की संख्या 295 प्रतिशत से बढ़ी है। इसी प्रकार, 10 लाख रुपए से 15 लाख रुपए की आय वाले वर्ग में आय कर विवरणियां फाइल करने वाले नागरिकों की संख्या 291 प्रतिशत से बढ़ी है। वित्तीय वर्ष 2022 में 7 करोड़ नागरिकों द्वारा आय कर विवरणियां फाइल की गई थी, यह संख्या वित्तीय वर्ष 2023 में बढ़कर 7.4 करोड़ हो गई और अब वित्तीय वर्ष 2024 में 8.5 करोड़ हो जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। यह संख्या देश में औपचारिक क्षेत्र में कुल श्रमिकों की संख्या का 37 प्रतिशत है। पारम्परिक रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली एवं कर्नाटक राज्यों से आयकर विवरणियां फाइल करने वाले नागरिकों की संख्या अधिक रहा करती थी परंतु अब कुछ नए राज्य तेजी से इन राज्यों को पीछे छोड़ने के प्रयास में आगे बढ़ रहे हैं। इनमे प्रथम स्थान पर उत्तर प्रदेश राज्य है। इसके बाद आंध्र प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश एवं हरियाणा राज्य आते हैं। अब इन राज्यों से भी आय कर विवरणियां फाइल करने वाले नागरिकों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है।   व्यक्तिगत आय कर अदा करने वाले नागरिकों के अतिरिक्त सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी की इकाईयों में भी लगभग इसी प्रकार के परिवर्तन दिखाई दिए हैं। वित्तीय वर्ष 2014 से वित्तीय वर्ष 2021 के बीच सूक्ष्म आकार की 19.5 प्रतिशत इकाईयों की आय बहुत तेज गति से बढ़ी है और अब सूक्ष्म आकार की ये इकाईयां छोटी, मध्यम एवं बड़ी श्रेणी की इकाईयों में परिवर्तित हो गई हैं। इन सूक्ष्म इकाईयों में से 4.8 प्रतिशत इकाईयां छोटी श्रेणी की इकाईयों में, 6.1 प्रतिशत इकाईयां मध्यम श्रेणी की इकाईयों में एवं 9.3 प्रतिशत इकाईयां बड़ी श्रेणी की इकाईयों में परिवर्तित हो गई हैं। विशेष रूप से भारत में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के लागू होने के बाद से सूक्ष्म आकार की इकाईयां, छोटे आकार, मध्यम आकार एवं बड़े आकार की इकाईयों में परिवर्तित होती जा रही हैं। हाल ही के समय में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी की इकाईयों को बैंकों द्वारा प्रदान किए गए ऋण की राशि में भी अभूतपूर्व वृद्धि देखने में आई है। वित्तीय वर्ष 2023 में उक्त वर्ग की इकाईयों के 2.13 करोड़ खातों में 22.6 लाख करोड़ रुपए का ऋण प्रदान किया गया था और जो औसत रूप से प्रति ऋण खाता लगभग 10.6 लाख रुपए बैठता है।  प्रहलाद सबनानी

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लेख

भारत को भारत बनाएं – चलें गांव की ओर

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प्राचीन काल में भारत का पूरे विश्व में साम्राज्य था। आज ऐसे कई प्रमाण मिल रहे हैं, जिससे सिद्ध हो रहा है कि सनातन संस्कृति का अनुपालन करने वाले लोग इंडोनेशिया तक फैले थे। यह तो हम सब जानते ही हैं कि अफगनिस्तान, ईरान, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, बांग्लादेश अखंड भारत का ही हिस्सा रहे हैं। आज एक बार पुनः वैश्विक स्तर पर कई देशों का भारत की सनातन संस्कृति की ओर विश्वास बढ़ रहा है क्योंकि ये देश विभिन्न प्रकार की समस्याओं से ग्रस्त हैं और उनकी इन समस्याओं का हल ये देश निकाल नहीं पा रहे हैं। प्रत्येक भारतीय वसुद्धैव कुटुम्बकम की भावना पर भरोसा करता है अतः पूरे विश्व को ही अपने कुटुंब का हिस्सा मानते हुए चलता है। और, यह भावना हाल ही में पूरे विश्व ने देखी भी है। कोरोना महामारी के दौरान भारत में भारत सरकार एवं राज्य सरकारों के कर्मचारियों के अतिरिक्त समाज से भी लाखों लोग घर से बाहर निकले एवं समाज में कोरोना बीमारी से ग्रसित नागरिकों की सेवा की। यह केवल भारत में ही हुआ है, विश्व में अन्य देशों के बीच इस प्रकार की भावना नहीं देखी गई थी। और तो और, भारत ने विभिन्न देशों में दवाईयों एवं टीकों को पर्याप्त मात्रा में पहुंचाया भी। भारत की वास्तविक जीवन दृष्टि यही रही है। इस जीवन दृष्टि के चलते भारत को अन्य देशों से कुछ अलग माना जाता है। भारतीय एक दूसरे के साथ आत्मीय सम्बंध स्थापित करते हैं। प्रत्येक भारतीय की नजर में चर और अचर दोनों में ईश्वर व्याप्त है। इसीलिए भारत के नागरिक पूरे विश्व को आपस में जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। अनेकता में एकता, यह भारत की दृष्टि है। भारत में अनेकता को भी एक त्यौहार की तरह देखा जाता है। केवल भारत में ही इस्लाम के समस्त फिर्के, इसाईयों के विभिन्न मत, पारसी, यहूदी आदि भी बड़ी मात्रा में भारत के अन्य समाज बन्धुओं के साथ भाईचारा रखते हुए खुशी खुशी निवास करते हैं। दरअसल, भारत समाज आधारित इकाई है, पश्चिम की तरह यह राज्य आधारित इकाई नहीं है।   यह भी केवल भारत की विशेषता है कि विदेशों में पले बढ़े, रचे बसे भारतीय मूल के नागरिक भारी संख्या में भारत वापिस आकर यहां पुनः भारत के ही बन जाते हैं। इनमें से भारतीय मूल के कई नागरिक तो अपने शेष बचे जीवन को जीने के लिए भारत के गांवों को चुनते हैं। भारत के गांवों में नैसर्गिक जीवन है। गांवों में निवास कर रहे नागरिकों के बीच आपस में प्रतिस्पर्धा नहीं है। आज भारत के गांव पक्की सड़कों के माध्यम से शहरों के साथ जुड़ गए हैं। 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहती है। इंटरनेट जैसी समस्त आधुनिक सुविधाएं भी भारतीय गावों में उपलब्ध हैं।  कुल मिलाकर आज भारत के गांवों में समस्त प्रकार की आधारभूत संरचना विकसित हो चुकी है। गांवों में तुलनात्मक रूप से खर्च भी कम होता है। इसके ठीक विपरीत आज शहरों पर अत्यधिक जनसंख्या का दबाव है एवं शहरों का पर्यावरण बिगड़ रहा है।    पश्चिमी सभ्यता ने मानव जाति का सबसे अधिक नुक्सान किया है। आर्थिक विकास के नाम पर नागरिकों के आपसी भाईचारे को खत्म किया है। प्रत्येक नागरिक केवल अपने बारे में ही सोचता है और चाहता है कि मैं जल्दी से जल्दी किस प्रकार अमीर बनूं, चाहे इसके लिए उसे कुछ गलत कार्य भी क्यों न करना पड़े। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए खाद एवं बीज के नाम पर रासायनिक पदार्थों का उपयोग अत्यधिक मात्रा में किया गया है, इससे जमीन बांझ बन गई है। आज पूरे विश्व में किसान जैविक खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं एवं जैविक खेती के माध्यम से उगाए गए फल, सब्जियां महंगे दाम पर भी खरीदने को नागरिक लालायित हो रहे हैं। प्राचीन काल में भारत में कृषि कार्य केवल जैविक खेती के माध्यम से ही क्या जाता था। इसलिए उस खंडकाल में नागरिक बीमारियों से ग्रस्त भी नहीं होते थे। नागरिक ग्रामों में ही हृष्ट पुष्ट, स्वस्थ एवं हंसी खुशी से आपसी भाईचारे से रहते थे।अन्य देशों के साथ साथ आज भारतीय शहरों में भी ग्रामीण नागरिकों के बीच पाई जाने वाली विशेषताओं का अभाव दिखाई देता है।  उक्त कारणों के बीच यदि भारत को एक बार पुनः भारत बनाना है तो हमें गांवों की ओर लौटना होगा। इसकी शुरुआत शहरों में रह रहे युवाओं द्वारा की जा सकती है। आज भारत का युवा तकनीक के क्षेत्र में बहुत आगे निकाल आया है। वे यदि शहरों के स्थान पर अपनी विनिर्माण इकाईयों की स्थापना ग्रामों में करते हैं तो इससे ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन रुकेगा क्योंकि रोजगार के अवसर ग्रामीण इलाकों में ही निर्मित होंगे। ग्रामों में रहकर नैसर्गिक जीवन का आनंद भी उठाया जा सकेगा। प्राचीन भारत में भी छोटे छोटे उद्योग ग्रामीण इलाकों में स्थापित किए जाते थे और उत्पादित वस्तुओं का बाजार भी इन्हीं इलाकों में आसानी से उपलब्ध रहता था। इसके कारण वस्तुओं के दाम तो बढ़ते ही नहीं थे बल्कि उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता के चलते वस्तुओं के दाम सदैव नियंत्रण में रहते थे और कई बार तो कम ही होते रहते थे। मुद्रा स्फीति की समस्या प्राचीन भारत में थी ही नहीं।  युवा वर्ग के ग्रामों की ओर रूख करने से ग्रामीण नागरिकों के शिक्षा के स्तर को सुधारा जा सकता है। स्वास्य सेवाओं को सुधारा जा सकता है। यदि 10 ग्रामों के एक समूह में एक भी अच्छा डॉक्टर उपलब्ध हो जाता है तो कम से कम इस समूह के ग्रामीणों की स्वास्थ्य सेवाओं में तो सुधार होने ही लगेगा। आज गांवों से नागरिकों को अपने इलाज के लिए शहरों की ओर रूख करना होता है। अच्छे युवा डॉक्टरों को गांवों की ओर मुड़ना चाहिए। असली भारत तो आज भी गांवों में ही बसा है। भारत की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी आज भी ग्रामों में ही निवास करती है। आज की युवा पीढ़ी ग्रामों की ओर रूख करने के सम्बंध में गम्भीरता से विचार करे।  भारत में कार्य कर रही विभिन्न आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थानों को भी इस ओर विशेष ध्यान देने की आज आवश्यकता है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान केवल 16 प्रतिशत के आसपास रहता है जबकि देश की 60 प्रतिशत आबादी ग्रामों में निवास कर रही है। इस वर्ग की प्रति व्यक्ति आय तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। इस वर्ग को यदि मध्यम वर्ग में बदला जा सके तो भारत में ही उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ने लगेगी इससे देश के आर्थिक विकास को पंख लग सकते हैं।    भारत की युवा पीढ़ी के विशेष रूप के वे नागरिक जो विदेश में अपनी पढ़ाई सम्पन्न कर भारत लौटे हैं एवं वे भारत में अपना नया कारोबार प्रारम्भ करना चाहते हैं, उन्हें अपना नया कारोबार भारत के गांवों में प्रारम्भ करने के बारे में गम्भीरता से विचार करना चाहिए। इससे भारत को पुनः भारत बनाने में बहुत बड़ी मदद मिलेगी। ऐसा कहा भी जाता है कि भारत की आत्मा आज भी गांवों में ही निवास करती है। युवा उद्यमी यदि गांव की ओर रूख करेंगे तो निश्चित ही भारत के आर्थिक विकास को अगले लेवल पर पहुंचाया जा सकेगा, और भारत की आर्थिक विकास दर 10 प्रतिशत से भी आगे निकल सकती है।  

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आर्थिकी राजनीति

वैश्विक बाजार शक्तियां भारत के बैकिंग, बीमा क्षेत्र एवं शेयर बाजार को प्रभावित करने के प्रयासों में रही हैं असफल

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भारत की आर्थिक प्रगति कुछ विघन संतोषी देशों, विशेष रूप से चीन एवं पाकिस्तान, को रास नहीं आ रही है। हालांकि भारत के कुछ मित्र बने देश भी कभी कभी भारत विरोधी इस मुहिम में शामिल पाए जाते हैं। कुल मिलाकर वैश्विक बाजार शक्तियां आज सक्रिय हो चुकी हैं जो भारत की आर्थिक प्रगति को प्रभावित करने का भरपूर प्रयास कर रही हैं। भारत के सामाजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न करने के साथ साथ भारत की सांस्कृतिक एकता पर भी प्रहार करने के प्रयास इन शक्तियों द्वारा किए जा रहे हैं, ताकि भारत की सामाजिक समरसता में छेद करते हुए भारत को आर्थिक क्षेत्र के साथ ही राजनैतिक रूप से भी अस्थिर किया जा सके।  उक्त वर्णित परिस्थितियों के बीच भी चीन जैसे देशों की कुछ कम्पनियां एवं वैश्विक बाजार शक्तियां भारतीय बैंकिंग प्रणाली, बीमा प्रणाली एवं शेयर बाजार को भी प्रभावित करने के प्रयास करती रहती हैं। हाल ही में चीन की वीवो नामक एक कम्पनी ने भारत से भारी भरकम राशि को अनुचित तरीके से चीन के अपने प्रधान कार्यालय को हस्तांतरित किया है। इस भारी भरकम राशि पर टैक्स अदा न करते हुए मनी लौंडरिंग के माध्यम से उक्त राशि हस्तांतरित की गई है। इसकी कार्य प्रणाली को निम्न प्रकार बताया गया है।  चीन की वीवो नामक एक कम्पनी जो स्मार्ट फोन का निर्माण करती है ने अपने कुल टर्नओवर का 50 प्रतिशत अर्थात 62,476 करोड़ रुपए की राशि को अवैध तरीके से चीन में अपने प्रधान कार्यालय को हस्तांतरित कर दिया है। इस कम्पनी द्वारा इस राशि पर भारतीय नियमों के अनुसार टैक्स का अपवंचन करते हुए टैक्स की राशि अदा नहीं की गई है। प्रवर्तन निदेशालय ने इस भारी भरकम राशि के गबन की विस्तार से जांच प्रारम्भ कर दी है एवं इस कम्पनी के कुछ मुख्य अधिकारियों को गिरफ्तार भी कर लिया है। प्रवर्तन निदेशालय ने कम्पनी के 119 खातों को ब्लाक कर दिया है, इन खातों में 495 करोड़ रुपए की राशि जमा है। वीवो कम्पनी ने भारत में 23 सहायक कम्पनियों की स्थापना की है। वीवो कम्पनी का मत है कि चूंकि उसकी कुछ सहायक कम्पनियां हानि दर्शा रही थीं अतः इन कम्पनियों द्वारा दर्शाई जा रही हानि के विरुद्ध वीवो कम्पनी के लाभ का समायोजन करते हुए टैक्स अदा नहीं किया गया है। जबकि इन सहायक कम्पनियों की स्थापना में भी कई प्रकार की गडबड़ियाँ पाई गईं हैं। विदेशी ताकतों द्वारा, इस प्रकार, भारत में व्यापार करते हुए कमाए गए लाभ पर देश के कानून के अनुसार, कर अदा न किया जाकर भारत के आर्थिक हितों को चोट पहुंचाई जा रही है।  इसी प्रकार, अप्रेल 2023 माह में भी प्रवर्तन निदेशालय ने चीन की ही शाओमी नामक एक अन्य कम्पनी की 5,551 करोड़ रुपए की राशि को जब्त करने सम्बंधी कार्यवाही की थी, क्योंकि इस कम्पनी ने विदेशी विनिमय से सम्बंधित नियमों का उचित तरीके से पालन नहीं किया था।  भारत में 45 विदेशी बैंक कार्यरत हैं, जबकि सरकारी क्षेत्र, निजी क्षेत्र के बैंकों, भुगतान बैंक एवं छोटे वित्त बैंकों की संख्या 137 है। परंतु, विदेशी बैंकों के भारत के समस्त बैकों की कुल जमाराशि में केवल लगभग 5 प्रतिशत का योगदान है और भारत के समस्त बैकों की कुल ऋणराशि में केवल 3.8 प्रतिशत का योगदान है। भारत के सरकारी क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र के बैकों से विदेशी बैंक प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पा रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की सजगता के कारण विदेशी बैंकों को भारत में लागू कड़े नियमों का पालन करते हुए अपना बैकिंग  व्यवसाय करना होता है, जो इन बैकों को शायद रास नहीं आता है। इसके परिणामस्वरूप एवं अपने व्यवसाय को विस्तार देने में असफल रहने के कारण, वर्ष 2022-23 में सिटी बैंक अपने कंजूमर बैंकिंग व्यवसाय को भारतीय एक्सिस बैंक को बेचने को मजबूर हुई थी। वर्ष 2021 में साऊथ अफ्रीका की बैंक फर्स्ट रांड ने भारत में अपने व्यवसाय को बंद कर दिया था तथा वर्ष 2016 में रोयल बैंक आफ स्कोटलैंड ने भी भारत में अपने व्यवसाय को बंद कर दिया था। वर्ष 2015-16 में एचएसबीसी ने भारत में अपनी कई शाखाओं को बंद कर दिया था। वर्ष 2012 में ब्रिटेन की एक बैंक बार्कलेस ने अपने रिटेल व्यवसाय को भारत में समाप्त कर दिया था।  दरअसल आज भारत का बैकिंग, बीमा एवं शेयर बाजार क्षेत्र बहुत मजबूत स्थिति में पहुंच गया है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इन तीनों क्षेत्रों में क्रमशः भारतीय बैकिंग संस्थानों, भारतीय बीमा संस्थानों एवं भारतीय निवेशकों का बोलबाला है। विदेशी संस्थागत निवेशक यदि भारत के शेयर बाजार से विदेशी निवेश निकालते भी हैं तो भारतीय शेयर बाजार पर विपरीत प्रभाव लगभग नहीं के बराबर होता दिखाई देता है क्योंकि भारतीय संस्थागत निवेशक एवं विभिन्न भारतीय म्यूचूअल फंड विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार से निकाली गई राशि की भरपाई तुरंत शेयर बाजार में अपना निवेश बढ़ाकर कर ली जाती हैं। वरना, वैश्विक बाजार शक्तियां भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित कर इसे नीचे गिराने के कोई कसर नहीं छोड़ती हैं।  इसी प्रकार, बैंकिंग के क्षेत्र में भी आज भारत के सरकारी क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र के बैंकों की हिस्सेदारी 95 प्रतिशत से अधिक है एवं बीमा के क्षेत्र में भारत के सरकारी क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र के बीमा कम्पनियों की हिस्सेदारी लगभग 90 प्रतिशत है। दूसरे, भारत ने विदेशी कम्पनियों की भारतीय बैंकिंग कम्पनियों में हिस्सेदारी को 24 प्रतिशत तक सीमित किया हुआ है, हालांकि, भारतीय बीमा कम्पनियों में, विदेशी कम्पनियां 74 प्रतिशत तक का विदेशी निवेश कर सकती है। तीसरे, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विभिन्न वित्तीय संस्थानों से निगमित अभिशासन सम्बंधी नियमों का कड़ाई से पालन कराया जाना भी विदेशी बैकों एवं बीमा कम्पनियों पर लगाम लगाने में अपनी प्रभावी भूमिका अदा करता है।  चीन जैसे देशों सहित वैश्विक बाजार शक्तियां भारत के वित्तीय क्षेत्र को अस्थिर करने के प्रयास तो लगातार करती तो हैं परंतु भारतीय बैंकिंग, बीमा एवं शेयर बाजार के नियामक संस्थानों की सजगता के चलते विदेशी  वित्तीय संस्थानों सहित वैश्विक बाजार शक्तियां इन तीनों ही क्षेत्रों को प्रभावित करने में असफल ही रही हैं। प्रहलाद सबनानी

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लेख

गाय पालन से देश के आर्थिक विकास को दी जा सकती है अतुलनीय गति

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सनातन संस्कृति के अनुसार भारत में गाय को माता का दर्जा प्रदान किया गया है। माता अपने बच्चों का लालन पालन करती है, इसी प्रकार की संज्ञा गाय माता को भी दी गई है क्योंकि प्राचीन काल में भारत के ग्रामीण इलाकों में कई परिवारों का लालन पालन गाय माता के सौजन्य से ही होता रहा है। आज के खंडकाल में न्यूजीलैंड, डेनमार्क एवं स्विजरलैंड जैसे कुछ देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को गाय के दूध से निर्मित विभिन्न डेयरी पदार्थों का भारी मात्रा में पूरे विश्व को निर्यात कर अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विकसित श्रेणी की अर्थव्यवस्था में बदल दिया है।  विश्व के एक कोने में बसा एक देश है न्यूजीलैंड, जिसकी कुल आबादी केवल 52 लाख है। इस देश का प्रत्येक नागरिक भारत के नागरिक से 25 गुना अधिक अमीर है। यह अलग थलग बसा हुआ देश है फिर भी इनके पास कुछ ऐसा है जो इन्हें इतना अमीर एवं विकसित देश बनाता है और वह पदार्थ है गाय माता का दूध। दुग्ध से निर्मित उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों में पहुंचाकर न्यूजीलैंड आज विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है। न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था को केवल मानव नहीं बल्कि गाय माता भी चलाती है। न्यूजीलैंड में मानव से ज्यादा गाय की संख्या है। न्यूजीलैंड में गाय की कुल आबादी 61 लाख से अधिक है।  भारत जनसंख्या की दृष्टि से आज विश्व में प्रथम स्थान पर पहुंच गया है और न्यूजीलैंड आकार में भारत से 12 गुना छोटा है एवं जनसंख्या की दृष्टि से 260 गुना छोटा है। परंतु, भारत केवल 597,000 टन डेयरी उत्पाद का निर्यात करता है और न्यूजीलैंड 18,772,000 टन डेयरी उत्पाद का निर्यात करता है। डेयरी उत्पाद के निर्यात से ही न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था चलती है, इस देश के नागरिकों को अमीर बनाती है और देश को विकसित अवस्था में ले जाती है। न्यूजीलैंड में फोंटेरा नामक एक सबसे बड़ी कम्पनी है और यह कम्पनी कोआपरेटिव के क्षेत्र में किसानों द्वारा बनाई गई कम्पनी है। जिस प्रकार भारत में अमूल कम्पनी को विकसित किया गया है। न्यूजीलैंड की फोंटेरा नामक कम्पनी दुनियाभर के 30 प्रतिशत डेयरी उत्पाद का निर्यात करती है। इस कम्पनी के उत्पाद दुनिया के 140 देशों में बिकते हैं और यह कम्पनी 10,000 नागरिकों को सीधा रोजगार प्रदान करती हैं।  पूरे विश्व में आज भारत सबसे अधिक दूध उत्पादन करने वाला राष्ट्र बन तो गया है। परंतु, दुग्ध पदार्थों से निर्मित उत्पादों का निर्यात करने में भारत आज भी बहुत अधिक पीछे है। भारत में प्रतिवर्ष 20.90 करोड़ टन दूध का उत्पादन हो रहा है। अमेरिका में 10.27 करोड़ टन, चीन में 4.12 करोड़ टन, ब्राजील में 3.66 करोड़ टन, जर्मनी में 3.32 करोड़ टन, रूस में 3.23 करोड़ टन, फ्रान्स में 2.58 करोड़ टन और न्यूजीलैंड में 2.19 करोड़ टन दूध का उत्पादन हो रहा है। पूरे विश्व में 100 करोड़ से अधिक पशुधन है और भारत में 30.8 करोड़, ब्राजील में 23.2 करोड़, चीन में 10.2 करोड़ एवं अमेरिका में 8.9 करोड़ पशुधन है। भारत में पशुधन से दूध निकालने की क्षमता बहुत कम है जबकि अन्य विकसित देशों में नई तकनीकी को अपनाए जाने के कारण इस क्षेत्र में उत्पादकता तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक है।   न्यूजीलैंड के कुल निर्यात में डेयरी उत्पादों के निर्यात का हिस्सा 23 प्रतिशत है। इसी प्रकार डेनमार्क की अर्थव्यवस्था भी डेयरी उत्पादों पर निर्भर है। डेनमार्क में कृषि के क्षेत्र से निर्यात किए जाने वाले उत्पादों में  डेयरी उत्पादों का हिस्सा 20 प्रतिशत है। डेनमार्क से मक्खन, पनीर एवं अन्य डेयरी उत्पाद 150 देशों को भारी मात्रा में निर्यात किए जाते हैं। स्विजरलैंड में भी कुल कृषि उत्पाद में डेयरी उद्योग का हिस्सा 20 प्रतिशत है।   ऐसा सामान्यतः कहा जाता है कि जो देश कृषि प्रधान होते हैं वे अन्य देशों जो उद्योग एवं सेवा क्षेत्र पर अधिक निर्भर होते हैं की तुलना में कम विकसित रहते हैं। परंतु, न्यूजीलैंड, डेनमार्क एवं स्विजरलैंड जैसे देशों के नागरिकों ने कृषि क्षेत्र पर अपनी निर्भरता बनाए रखते हुए और अधिकतम डेयरी उत्पादों के दम पर अपने देश को विकसित देश बना लिया है। न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान केवल 7 प्रतिशत है, परंतु न्यूजीलैंड से निर्यात किए जाने वाले प्रथम 10 उत्पादों में से 6 उत्पाद कृषि क्षेत्र से आते हैं, इनमे डेयरी उत्पादों का निर्यात सबसे अधिक है। कुल निर्यात का 60 प्रतिशत हिस्सा डेयरी उत्पाद सहित कृषि क्षेत्र से होता है। न्यूजीलैंड, डेनमार्क एवं स्विजरलैंड की अर्थव्यवस्था को गति देने में वहां के नागरिकों के साथ साथ गाय माता का भी अत्यधिक योगदान है।  केवल गायों की संख्या अधिक होने से अर्थव्यवस्था को बल नहीं मिलता है। इन गायों को हृष्ट पुष्ट रखना भी आवश्यक है। यह तभी सम्भव है जब किसानों को गाय पालन के लिए प्रोत्साहित किया जाए। 200 वर्ष पूर्व तक न्यूजीलैंड में एक भी गाय नहीं थी। परंतु, न्यूजीलैंड में चारा भरपूर मात्रा में उपलब्ध था। चूंकि न्यूजीलैंड भी एक ब्रिटिश कोलोनी बन गया था, अतः न्यूजीलैंड में चारे की भरपूर उपलब्धि को देखते हुए ब्रिटेन से गायें  लाकर यहां बसाई गई। इसके बाद से तो न्यूजीलैंड ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कालांतर में वहां गाय सहित पशुधन की संख्या अपार गति से बढ़ती गई। वर्ष 1900 आते आते रेफ्रिजरेटर के अविष्कार के बाद से तो न्यूजीलैंड डेयरी उत्पादों का निर्माण करने लगा, हालांकि इसके पूर्व इस देश की निर्भरत कृषि उत्पादों पर ही अधिक थी, इन कृषि उत्पादों को यूरोपीयन देशों को बेचा जाता था। प्रथम विश्व युद्धकाल के दौरान ब्रिटेन के सैनिकों को डेयरी उत्पादों की अत्यधिक आवश्यकता थी और ब्रिटेन ने न्यूजीलैंड में डेयरी उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा दिया, इसके बाद से तो यहां के डेयरी उत्पाद लगभग पूरे विश्व में ही बेचे जाने लगे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी न्यूजीलैंड ने भारी मात्रा में डेयरी उत्पादों का ब्रिटेन को निर्यात किया था। उस समय ब्रिटेन के सहयोग से न्यूजीलैंड से निर्यात होने वाले कुल उत्पादों में डेयरी उत्पाद एवं भेड़ों का हिस्सा 90 प्रतिशत तक पहुंच गया था। न्यूजीलैंड में निर्मित डेयरी उत्पादों के लिए ब्रिटेन एक भरोसेमंद सबसे बड़ा बाजार था जहां न्यूजीलैंड के उत्पादों को बाजार मूल्य भी अच्छा मिलता था क्योंकि ब्रिटेन को उस समय पर खाद्य पदार्थों की सख्त आवश्यकता थी।  वर्ष 1955 में ब्रिटेन में न्यूजीलैंड के डेयरी उत्पादों का बाजार मूल्य कम होने लगा। इसके बाद न्यूजीलैंड के किसानों ने अपने डेयरी उत्पादों को बेचने के लिए नए बाजार की तलाश प्रारम्भ की। लेकिन इसके बाद से तो न्यूजीलैंड की आर्थिक स्थिति भी हिचकोले खाने लगी थी। परंतु, वर्ष 1984 आते आते न्यूजीलैंड में आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू किए गए। नागरिकों के लिए आय कर की दरें लगभग आधी, 66 प्रतिशत से 33 प्रतिशत कर दी गईं। कृषि क्षेत्र में विभिन्न उत्पादों को प्रदान की जाने वाली 4 प्रतिशत सब्सिडी को भी समाप्त कर दिया गया ताकि किसान अपने पैरों पर खड़े हो सकें एवं देश की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके।  न्यूजीलैंड के किसानों ने कृषि उत्पादों पर प्रदान की जाने वाली सब्सिडी को हटाए जाने की चुनौती को स्वीकार किया एवं न्यूजीलैंड के डेयरी उद्योग एवं ऊन के उद्योग को अपनी मेहनत के दम पर एवं सरकारी नीतियों के चलते फिर से खड़ा करने में सफलता अर्जित की। 1983 में लाए गए आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के बाद मीट एवं डेयरी उत्पादों पर मात्रा के बजाय गुणवत्ता पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में न्यूजीलैंड के उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाया गया और एक बार पुनः पूरे विश्व में डेयरी उत्पादों के निर्यात के न्यूजीलैंड ने महारत हासिल कर ली। भारत के किसानों को भी इस संदर्भ में न्यूजीलैंड के किसानों द्वारा प्राप्त की गई उक्त सफलता से सीख लेनी चाहिए। आज भारत की देशी गाय के दूध की महिमा पूरा विश्व समझ रहा है। भारत में भी गौ संवर्धन और गौशालाओं  का निर्माण किया जा रहा है। किंतु, गौ माता के प्रति श्रद्धा का नितांत अभाव दिखाई दे रहा है। भारत में एक बार पुनः गौ माता को ऊंचा स्थान देते हुए नई तकनीकी का उपयोग किया जाकर गाय के दूध के उत्पादों को पूरे विश्व में पहुंचाना होगा  ताकि भारत के आर्थिक विकास को और अधिक गति मिल सके एवं भारत के ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अधिकतम अवसर निर्मित हो सकें।   प्रहलाद सबनानी 

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