संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

बिहार से यूपी तक पिछलग्गू बनती कांगे्रस

दरअसल, 2009 के बाद से कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिर रहा है। कांग्रेस के हाथ से राज्यों की सत्ता छिटक रही है। लिहाजा यूपी में सत्ता में होना कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी माना जा रहा है। कांग्रेस सत्ता में तो आना चाहती है। इसके अलावा एक मकसद बीजेपी को यूपी की सत्ता से दूर रखना भी है। कांगे्रस की दुर्दशा के कारणों पर नजर डाली जाये तो जटिल जातीय समीकरण वाले इस सूबे में कांग्रेस के पास अपना परंपरागत वोट बैंक नही बचा है। ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम अब कांग्रेस के वोटर नहीं रह गये हैं।

यूपी की चर्तुभुज सियासत !

कहने को कांगे्रस ने ब्राहमण नेता और दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित को यूपी का भावी सीएम प्रोजेक्ट कर दिया है,लेकिन शीला जी को यही नहीं पता है कि अगर कांगे्रस का सपा से चुनावी तालमेल हो जायेगा तो चुनाव में उनकी क्या हैसियत रहेगी। इसके अलावा राहुल गांधी पीएम मोदी को भ्रष्टाचारी साबित करने के लिये कथित तौर पर जो कागज लिये घूम रहे हैं,उसमें शीला दीक्षित का भी नाम है, इससे भी शीला असहज महसूस कर रही है।

आजम के कारण सपा से दूरी बनाता हिन्दू वोटर

हिन्दुस्तान में शायद दो ही ऐसे नेता ( दिल्ली के सीएम अरिवंद केजरीवाल और आजम खान ) होंगे जो अपना वजूद बचाये रखने के लिये पूरी शिद्दत के साथ दिन-रात मोदी को कोसते रहते हैं, ताकि एक बार ही सही मोदी उनके खिलाफ मुंह खोल दें, जिससे उनको बैठे-बैठाये पब्लिक सिटी मिल जाये। अपने सामने सबको बौना और दोयम दर्जा का समझने वाले आजम खान की सियासी हैसियत इतनी भर है कि वह सपा नेता हैं और सपा से बाहर उनका कोई वजूद नहीं है।

सपा परिवार में फिर खिंची तलवारें

समाजवादी परिवार में जर्बदस्त कलह के बाद परिवार के छोटे-बड़े सदस्यों/नेताओं के बीच सुलह का जो माहौल दिखाई दे रहा था,वह बनावटी था। असल में किसी ने भी ‘हथियार’ नहीं डाले थे। समय का चक्र ऐसा घूम रहा था जिसने समाजवादी लड़ाकुओं को ऐसा करने के लिये मजबूर कर दिया था, अगर ऐसा न होता तो विधान सभा चुनाव में सपा की सियासत कौड़ी के भाव निलाम हो जाती।

यूपी चुनावः नोटबंदी से ‘मंदा’ पड़ा टिकट का ‘धंधा’

अतीत से निकल कर वर्तमान पर आया जाये तो यह साफ नजर आ रहा है कि 2012 से 2017 के बीच यूपी की सियासत काफी बदल चुकी है। कई पुराने सूरमा हासिये पर जा चुके हैं तो अनेक नये सियासी चेहरे क्षितिज पर आभा बिखेर रहे हैं। 2012 के विधान सभा चुनावों से प्रदेश को अखिलेश यादव के रूप में एक युवा और उर्जावान नेता मिला था, जिसकी चमक तमाम किन्तु-परंतुओं के साथ आज भी बरकरार है। पांच वर्ष पहले सपा की सियासत मुलायम सिंह यादव के इर्दगिर्द घूमती थी,लेकिन आज की तारीख में सपा के लिये मुलायम से अधिक महत्ता दिखाई पड़ रही है

यूपी कांग्रेस : राहुल से निराश, प्रियंका से आस

कांग्रेस आलाकमान प्रियंका में संभावनाएं तलाश रहा है तो प्रियंका भी आलाकमान के सुर में सुर मिला रही हैं। गत दिनों अपनी दादी इंदिरा गांधी के जन्मशती समारोह पर स्वराज भवन आईं प्रियंका गांधी ने सक्रिय राजनीति में आने के संकेत दे भी दिए। इससे पहले वह राजनीतिक आयोजनों और किसी भी तरह का बयान देने से बचती रहतीं थी, लेकिन इस बार कार्यकर्ताओं से मुलाकात के दौरान प्रियंका ने सिर्फ सियासी मुद्दों पर बात की, जो कार्यकर्ता स्वराज भवन में प्रवेश नहीं कर सके, वह बाहर से प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने की मांग को लेकर नारेबाजी करते रहे और जिनकी प्रियंका से मुलाकात हुई, उन्होंने सीधे तौर पर प्रियंका से यूपी में पार्टी की कमान संभालने की मांग की।

सपा में ‘अखिलेश युग’ का आगाज

ऐसा नहीं था कि इस दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव चुपचाप सब कुछ सहते रहे। उन्होंने ने भी खूब पलटवार किये। चचा शिवपाल यादव और उनके समर्थक कहलाये जाने वाले नेताओं को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया। शिवपाल के समर्थन में खड़े नजर आ रहे अमर सिंह को अंकल की जगह दलाल की उपमा दे डाली। शिवपाल के समर्थन में खड़े अमर सिंह शातिराना तरीके से सब कुछ चुपचाप देखते रहे ,लेकिन जब अखिलेश को समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा कर शिवपाल को अध्यक्ष बनाया गया तो इस खुशी में अमर सिंह ने दिल्ली में एक दावत दे दी।

माया की नजर, मोदी-महागठबंधन और मुसलमान पर

बात बसपा सुप्रीमों के बीजेपी के प्रति तल्खी की कि जाये तो माया मुसलमानों के अलावा सबसे अधिक हमला दलितों के उत्पीड़न को लेकर मोदी सरकार पर कर रही हैं। यह हमला इस लिये हैं ताकि 2014 में जो दलित वोटर बीजेपी के पाले में चले गये थे,उनको पुनः अपने पाले में खींच लाया जाये। जिस तरह माया सपा पर हमलावर हैं वैसे ही बीजेपी को भी कोस रही हैं। ज्यों जो चुनाव नजदीक आ रहे हैं त्यों तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और

माया ‘मोह’ में सपा का मुस्लिम वोटर

2007 के विधान सभा में बड़ी तादात में मुस्लिम वोटर बसपा का दामन थाम चुके हैं, जिसके बल पर मायावती सत्ता की दहलीज चढ़ने में सफल रहीं थीं। इसी बार भी मायावती मुस्लिमों को लुभाने के लिये सभी तरह के दांवपेंच चल रही है। इसी लिये जैसे ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महोबा की रैली में तीन तलाक को मुस्लिम महिलाओं के हितों के खिलाफ बताया मायावती ने प्रेस रिलीज जारी कर तीन तलाक का विरोध शुरू कर दिया।