लेखक परिचय

कीर्ति दीक्षित

कीर्ति दीक्षित

उत्तरप्रदेश के हमीरपुर जिले के राठ की निवासी। छह साल तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों में नौकरी की। वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकारिता एवं लेखन कार्य कर रही हैं। जीवन को कामयाब बनाने से ज़्यादा उसकी सार्थकता की संभावनाएं तलाशने में यकीन रखती हैं कीर्ति।

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कीर्ति दीक्षित

विरासतों, प्रतीकों को समाप्त कर देना इतिहास को मृत्यु देना है, और जब इतिहास की मृत्यु हो जाती है तो अस्तित्व समाप्त हो जाया करते हैं । कुछ लोगों का तर्क है, श्री राम जन्मभूमि पर विद्यालय, अस्पताल बना दिया जाए! किन्तु क्या स्कूल, अस्पताल से राम के अस्तित्व की मृत्यु नहीं होगी? फिर एक तर्क होगा जब राम कण कण में हैं तो उन्हें किसी मंदिर में परिभाषित क्यों करना ? हाल ही में कुछ बच्चों से मिली थी, राम के पिता का नाम नहीं जानते, उनके विषय में कुछ भी नहीं जानते जबकि विदेशी इतिहास रटा हुआ है, कारण, कुछेक विद्यालयों को छोड़ दें तो हमें पता ही नहीं चला और राम किताबों से गायब होते चले गये,! मात्र सांप्रदायिक मानकर राम ही क्यों कितने त्याग बलिदान के गुणों को पाठ्य से निकाल फेका गया। और हम आधुनिकता के नाम पर अपनी ही विरासतों की धीमी मौतों पर खुश हो रहे हैं जबकि हमारी तुच्छ मति इतना नहीं समझ पाती कि वस्तुतः जब किसी महापुरुष या महामानवी की बात होती है तो वह कोई व्यक्ति या धर्म नहीं अपितु गुण होता है ।

विरासतें इतिहास के संरक्षण के लिए होती हैं, कल जब आपकी अगली पीढ़ी पूछेगी ये राम कौन थे? कहाँ रहते थे? तब आपके पास किताबों के उत्तर सम्भवतः हों लेकिन दर्शन हेतु कुछ नहीं होगा, हालांकि ये किताबी ज्ञान भी धीरे धीरे विलुप्त हो जायेगा, फिर कैसा ज्ञान और कैसे राम! हम कितने ही विलुप्त इतिहास के गवाह हैं जो अब किसी पन्ने तक में दर्ज नहीं । आज जो आख्यान  हम किताबों में पढ़ते हैं और जब उन्हें देखने की जिज्ञाशा होती है किसी म्यूजियम में उनके होने का एहसास करने का प्रयास करते हैं लेकिन राम को हम कहाँ पायेंगे? किस अयोध्या को रामराज का साक्षी बतायेंगे ?

संरक्षण के आभाव में कितनी भाषायें, कितनी परम्पराएँ, कितने ज्ञान मर गये । राम जन्मभूमि पर बना विद्यालय और अस्पताल एक पीढ़ी हद से हद दो पीढ़ियों तक राम को याद रखेंगी,  उपरांत राम किसी ऐसी किताब के पन्ने के बंदी भर होंगे जिसे कोई पढना नहीं चाहता।

अब बात आती है कि संप्रदाय विशेष कहेगा विरासत तो हमारी भी है, बाबर, औरंगजेब उनके इतिहास हैं! बिल्कुल हैं, किन्तु अब ये जनमानस तय करे कि  उनकी नस्लें राम अनुरूप बनें या बाबर अथवा औरंगजेब ! दूसरा – राम भारत को परिभाषित करते हैं, ना कि बाबर ! राम की जड़ें भारत में हैं, बाबर की नहीं !

मंदिर केवल पूजा आराधना का स्थान नहीं होता वह उन बलिदानों की स्मरण स्थली होते हैं, जहाँ से नवीन प्रेरणा का, शिक्षा के सर्वोच्च गुणों का उदय होता है, राम मंदिर राम का नहीं मर्यादा का, त्याग का प्रेरक होगा, कृष्ण मंदिर कर्म का उदघोषक होता है, शिव का शिवालय  समाज के हेतु विषपान का प्रतीक होता है अतः मंदिरों को केवल देव आराधना स्थल नहीं अपितु उनके महान गुणों का प्रत्यक्ष शिक्षस्थल समझें। कितनी भाषायें, कितनी परम्पराएँ, कितने ज्ञान संरक्षण के आभाव में मर गये, अब राम के साथ उनके सर्वोच्च आदर्शों को मत मरने दीजिये।

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