-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

टेलीविजन युग की यह खूबी है कि जो टीवी पर्दे पर दिखता है वही सत्य है। जो पर्दे पर नहीं दिखता उसका अस्तित्व भी दर्शक मानने को तैयार नहीं होते। इस तरह के दर्शकों की अनेक प्रतिक्रियाएं मेरे बाबा रामदेव पर केन्द्रित लेखों पर सामने आयी हैं। वे टेलीविजन निर्मित यथार्थ और प्रचार पर आंखें बंद करके विश्वास करते हैं। वे यह सोचने को तैयार नहीं हैं कि बाबा रामदेव और योग की टीवी निर्मित इमेज फेक इमेज है।

जो लोग बाबा रामदेव को टीवी पर देख रहे हैं वे यह मानकर चल रहे हैं बाबा ही योग के जनक हैं। योग का तो सिर्फ स्वास्थ्य से संबंध है। बाबा के टीवी दर्शकों की यह भी मुश्किल है कि उन्हें ज्ञान-विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। वे टीवी इमेजों के जरिए यह भी मानकर चल रहे हैं कि बाबा रामदेव जो बोलते हैं, सच बोलते हैं,सच के अलावा कुछ नहीं बोलते। वे टीवी प्रचार से इस कदर अभिभूत हैं कि बाबा रामदेव के बारे में किसी वैज्ञानिक बात को भी मानने को तैयार नहीं हैं। यहां तक कि वे अपने प्राचीन ऋषियों-मुनियों की योग के बारे में लिखी बातें मानने को तैयार नहीं हैं। वे भीड़ की तरह बाबा रामदेव का वैसे ही अनुकरण कर रहे हैं जैसे कोई साबुन के विज्ञापन को देखकर साबुन का उपभोग करने लगता है। उसके बारे में वह कुछ भी जानना नहीं चाहता।

बाबा रामदेव कोई ऐसी हस्ती नहीं हैं कि उनके बारे में सवाल न किए जाएं। जो लोग नाराज हैं हमें उनकी बुद्धि पर तरस आता है। वे बाबा के विज्ञापनों और प्रौपेगैण्डा चक्र में पूरी तरह फंस चुके हैं।

बाबा रामदेव ने योग के उपभोग का लोकतंत्र निर्मित किया है। यहां योग करने वालों में स्वास्थ्य संबंधी असमानताएं हैं। इस असमानता को मिटाना बाबा का लक्ष्य नहीं है। वे इस असमानता को बनाए रखते हैं। यौगिक क्रियाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन करके योग के उपभोग का वातावरण और फ्लो बनाए रखना चाहते हैं। वे योग के नियमित उपभोग के माध्यम से अपने ग्राहक को बांधे रखते हैं। इस क्रम में वे योग को बनाए रखते हैं लेकिन अन्य चीजें वे ठीक नहीं कर पाते।

मसलन वे एडस या कैंसर ठीक नहीं कर सकते। किसी भी बड़ी बीमारी को ठीक नहीं कर सकते। प्राणायाम से आराम मिलता है और इस आराम से अनेक सामान्य समस्याएं कम हो जाती हैं जैसे रक्तचाप वगैरह।

बाबा रामदेव जब योग का प्रचार करते हैं तो योग से सुख मिलेगा, आराम मिलेगा, शांति मिलेगी और शरीर निरोगी बनेगा आदि वायदे करते हैं। ये वायदे वैसे ही हैं जैसे कोई माल अपनी बिक्री के लिए विज्ञापन में करता है। मजेदार बात यह है कि साधारण आदमी यदि प्रतिदिन आधा-एक घंटा व्यायाम कर ले तो वह सामान्यतौर पर चुस्त-दुरूस्त रहेगा। यदि व्यक्ति सुबह जल्दी उठे और व्यायाम करे तो वह सामान्य तौर पर स्वस्थ हो जाएगा। लेकिन अब मुश्किल यह है कि बाबा रामदेव से हम ये बातें पैसा देकर सुन रहे हैं, और पैसा देकर खरीद रहे हैं, पैसा देकर मान रहे हैं।

बाबा रामदेव ने योग को ग्लैमर का रूप दिया है। उसे दिव्य-भव्य बनाया है। इसके कारण सभी वर्ग के लोगों में इसकी सामान्य अपील पैदा हुई है। बाबा रामदेव अपने योग संबंधी व्याख्यानों में व्यक्ति ‘क्या है ’ और ‘क्या होना चाहता है’ के अंतर्विरोध का बड़े कौशल के साथ इस्तेमाल करते हैं। वे इस क्रम में व्यक्ति को स्वास्थ्य और शरीर के प्रति जागरूक बनाते हैं। शरीर स्वस्थ रखने के प्रति जागरूकता पैदा करते हैं।

बाबा रामदेव अपने स्वस्थ शरीर के जरिए बार-बार टीवी पर लाइव शो करके जब योग दिखाते हैं तो योग को ग्लैमरस बनाते हैं। सुंदर शरीर की इमेज बार-बार सम्प्रेषित करते हैं। सुंदर शरीर के प्रति इच्छाशक्ति जगाते हैं। स्वस्थ शरीर का दिवा-स्वप्न परोसते हैं और यही उनके व्यापार की सफलता का रहस्य भी है। वे आम टीवी दर्शक की इच्छाशक्ति और अनुभूति के बीच के अंतराल को अपनी यौगिक क्रियाओं के जरिए भरते हैं। उसके प्रति आकर्षण पैदा करते हैं।

जो लोग यह सोच रहे हैं कि बाबा रामदेव का योग का अभ्यास उन्हें भारतीय संस्कृति का भक्त बना रहा है वे भ्रम में हैं। विज्ञापन और टेलीविजन के माध्यम से योग का प्रचार-प्रसार मूलतः योग को एक माल बना रहा है। आप पैसा खर्च करें और योग का उपभोग करें। यहां भोक्ता की स्व-निर्भर छवि ,निजता और जीवनशैली पर जोर है। वे योग का प्रचार करते हुए योग की विभिन्न वस्तुओं और आसनों की बिक्री और सेवाओं को उपलब्ध कराने पर जोर दे रहे हैं। वे योग संबंधी विभिन्न सूचनाएं दे रहे हैं। योग की सूचनाओं को देने के लिए वे जनमाध्यमों का इस्तेमाल कर रहे हैं। क्योंकि लोकतंत्र में जनमाध्यमों के अलावा किसी और तरीके से सूचनाएं नहीं दी जा सकतीं।

बाबा रामदेव की खूबी यह है कि उन्होंने योग को फैशन के पैराडाइम में ले जाकर प्रस्तुत किया है। आज योग-प्राणायाम जीवनशैली का हिस्सा है। फैशन स्टेटमेंट है। यह मासकल्चर की एक उपसंस्कृति है। योग पहले कभी संस्कृति का हिस्सा था। लेकिन इनदिनों यह मासकल्चर का हिस्सा है। बाबा रामदेव की सुंदर देहयष्टि एक परफेक्ट मॉडल की तरह है जो योग का प्रचार लाइव टेलीकास्ट के जरिए करते हैं।

बाबा रामदेव की बारबार टीवी पर प्रस्तुति और उसका प्रतिदिन करोड़ों लोगों द्वारा देखना योग को एक सौंदर्यपरक माल बना रहा है। बार-बार एक ही चीज का प्रसारण योग के बाजार को चंगा रखे हुए है। वे योग के जरिए स्वस्थ भारत का सपना बेचने में सफल रहे हैं।

बाबा रामदेव अपने प्रचार के जरिए स्वस्थ और श्रेष्ठ जीवन का विभ्रम पैदा कर रहे हैं। योग को सर्वोत्कृष्ट बता रहे हैं। जीवनशैली के लिए श्रेष्ठतम बता रहे हैं। वे बार-बार यह भी कहते हैं कि लाखों-करोड़ों लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं तुम भी इस्तेमाल करो।

वे विज्ञापन कला का अपने प्रसारणों में इस्तेमाल करते हैं फलतः उनकी बातें अति-स्वाभाविक लगती हैं। उनकी यही अति-स्वाभाविकता योग और बाबा रामदेव के प्रति किसी भी आलोचनात्मक विवेक को अपहृत कर लेती है। अति-स्वाभाविकता का गुण है कि आप सवाल नहीं कर सकते। वे अपनी प्रस्तुतियों के जरिए योग और स्वयं को सवालों के दायरे के बाहर ले जाते हैं। वे इसे शुद्ध ‘कॉमनसेंस’ बना देते हैं।

इसके कारण दर्शक को योग के पीछे सक्रिय विचारधारा,व्यवसाय आदि नजर नहीं आते। वह इसके मकसद के बारे में भी सवाल नहीं उठाता बल्कि होता उलटा है जो सवाल उठाते हैं बाबा रामदेव के भक्त उस पर ही पिल पड़ते हैं। वे बाबा रामदेव की टीवी निर्मित इमेज के अलावा और कोई इमेज देखने, सुनने और मानने को तैयार नहीं हैं। इस अर्थ में बाबा रामदेव की इमेज के गुलाम हैं। यह वैसे ही है जैसे आप लक्स साबुन खरीदते हुए करिश्मा कपूर या ऐश्वर्याराय की इमेज के गुलाम होते हैं,उसका अनुकरण करते हैं और बाजार से जाकर लक्स साबुन खरीद लेते हैं और नहाने लगते हैं।

बाबा रामदेव का योग को कॉमनसेंस के आधार पेश करना और उसका बार-बार प्रसारण इस बात का भी प्रमाण है कि वे योग को बाजारचेतना की संगति में लाकर ही बेचना चाहते हैं। कॉमनसेंस का वे योग के लिए फुसलाने की पद्धति के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

20 thoughts on “बाबा रामदेव की इमेजों का जादू

  1. पहले तो मई ये सोच के हैरान रह जाता था की मुठ्ठी भर अँगरेज़ इतने बड़े भारत पर राज़ कैसे कर गए….लेकिन ४ जून २०११ की रात को जो हुआ उसके बाद सब समझ मे आ गया…अँगरेज़ तो सिर्फ कमांड देते थे …हमारे ही बाप दादा फौज और पुलिस में होते थे और हमारे ही आन्दोलन कारियों को पीटते थे …जैसे की ४ जून की रात को हुआ… और इतना कुछ होने के बावजूद भी चतुर्वेदी जैसे लोग अपने लेख लिख लिख कर लोगो को गुमराह करते है….काले अँगरेज़ है आज के राजनेता और लेखक जैसे लोगो की नासमझी कि वजह से ये देख आज भी आज़ाद होके भी गुलाम है. बाबा रामदेव जैसे लोगो का व्यक्तिगत रूप कैसहाई ये सोचने की जरूरत ही नहीं है …अगर बाबारामदेव चोर है और ठग है …और एक चोर या भ्रष्ट आदमी अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त क़ानून बनाने की मांग करता है तो दिक्कत किसको हो सकती है ….सीधी सी बात है भ्रष्ट सर्कार को दिक्कत होगी या फिर चतुर्वेदी जैसे नासमझ लोगो को जिनको भगवन ने लिखने का हुनर तो दिया लेकिन सही दिशा में लिखने के लिए उनका दिमाग ही नहीं चलता…लेखक जी मेरा आपसे अनुरोध है आप अपने देश के लिए कुछ करने के बारे में जरूर सोचिये….इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ आवाज़ उठा के तो देखिये सबसे पहले मै आपका साथ दूंगा …मई कोई बाबा रामदेव का अनुयायी नहीं हु….न ही मई उसके योग सिविर में गया हु आज तक…लेकिन जो आदमी मेरी भारत माँ के लिए आवाज़ उठाएगा …मै उसका साथ दूंगा…जय हिंद

  2. किसी भी लेख को पढने से पहले उस पर जारी टिप्पणियाँ पढ़ लेने का बहुत फायदा होता है, कम से कम समय तो बचता ही है , लेखक (मै अपने हाथ से उनका नाम लिखना भी घ्रणित समझता हूँ) आदरणीय बाबा रामदेव से ना जाने क्यों खार खाए बैठा है उसको न जाने क्यों यह समझ नहीं आ रहा की बिना विशाल जनशक्ति के कोई भी क्रांती सफल नहीं हो सकती अतः उन्हें योग का सहारा लेना पडा ताकि भारतियों का आत्म सम्मान जाग जाए, यदी उन्होंने योग को इस हेतु एक उत्पाद बनाया भी है तो भी मेरे जैसे करोडो-अरबों लोग उनकी बातों से अभिभूत होते रहेंगे, क्योंकि उनका उद्देश्य देशभक्ति पूर्ण है, लेखक क्या दुनिया का कोई भी व्यक्ति बिना पहचान के ज़िंदा नहीं रह सकता लेकिन बाबा रामदेव के कारण जो लोग भारतीयता को त्यागना ही शान समझते थे वे भी अब भारतीयता पर गर्व अनुभव करने लगे हैं भले ही उन्होंने योग को व्यापार बनाया हो लेकिन साथ ही साथ करोडो-अरबों को भारतीयता में गर्व करने का एहसास भी जगाया है, ऐसे लेखों को सिरे से खारिज कर देना चाहिए.

  3. श्रीमान श्रीराम तिवारीजी आप तो पहुंचे हुए लोगों में से लग रहे हैं ऐसे महान विभूति के बारे में अल्प जानकारी( जो की प्रवक्ता में व्यक्त आपकी श्रीमान जगदीश्वर चतुर्वेदी की चाटुकारिता तक सीमित है ) मेरी अल्प ज्ञानता दर्शाती है.अपना विस्तृत परिचय देकर मुझे अनुग्रहित करने का कष्ट करे तो मेरे जैसे तुच्छ प्राणी पर आपका बड़ा अहसान होगा.कुछ और आपका विस्तृत परिचय के बाद.

  4. समन्वय जी आपने सही विश्लेषण करने का अधुरा प्रयास किया …इस आलेख को और जगदीश्वर जी चतुर्वेदी के और भी अन्य आलेखों की रौशनी में आप उस समष्टि वेदना का साक्षात्कार करने की कोशिश अवश्य करें जो इन आलेखों का केंद्र vindu hai .आप apne आप hi चतुर्वेदी जी के चिंतन और दर्शन को अपना वना लेंगे .बाकी टिप्पणियाँ सिर्फ छपास पिपासा की देओतक हैं .

  5. जगदीश्वर चतुर्वेदी जी मूल रूप से साहित्यकार हैं । साहित्यकार कल्पनाशील होता है और जो वह लिखता है उसका तथ्यों के साथ कोई संबंध नहीं होता । इसलिए पंडित जी जो लिख रहे हैं वह उनकी कल्पना है और तथ्यों से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है । मैं प्रवक्ता के निय़मित पाठक के नाते चतुर्वेदी जी की कल्पनाशीलता की प्रशंसा करता हूं । उनकी कल्पनाशीलता जबरदस्त है तथा भाषा का प्रवाह भी अत्यंत बढिया है । लेकिन उनके लेखों में तथ्य ढूंढना शायद चतुर्वेदी के साथ अन्याय करना होगा । अतः मेरा मानना है कि पाठकों को उनके लेख में तथ्य नहीं ढूंढने चाहिए तथा उनके द्वारा लिखे गये लेखों को तथ्यों की दृष्टि से गंभीरता से नहीं लेना चाहिए ।

    चतुर्वेदी जी की योग, प्राणायमों पर टिप्पणी करना भी वैसे ही है जैसे पुरातत्व का कखग न जानने वाले बाबरी एक्शन कमेटी के वकील गिलानी की पुरातात्विक मामलों में टिप्पणी करना है ।

    इसलिए पंडित जी की कल्पनाशीलता का पुनः प्रशंसा करता हूं और पाठकों से उनके लेखों में तथ्य ढूंढने का प्रयास कर उनके साथ अन्याय न करने की अपील करता हूं ।

  6. जगदीश्वर चतुर्वेदी जी मूल रूप से साहित्यकार हैं । साहित्यकार कल्पनाशील होता है और जो वह लिखता है उसका तथ्यों के साथ कोई संबंध नहीं होता । इसलिए पंडित जी जो लिख रहे हैं वह उनकी कल्पना है और तथ्यों से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं है । मैं प्रवक्ता के निय़मित पाठक के नाते चतुर्वेदी जी की कल्पनाशीलता की प्रशंसा करता हूं । उनकी कल्पनाशीलता जबरदस्त है तथा भाषा का प्रवाह भी अत्यंत बढिया है । लेकिन उनके लेखों में तथ्य ढूंढना शायद चतुर्वेदी के साथ अन्याय करना होगा । अतः मेरा मानना है कि पाठकों को उनके लेख में तथ्य नहीं ढूंढने चाहिए तथा उनके द्वारा लिखे गये लेखों को तथ्यों की दृष्टि से गंभीरता से नहीं लेना चाहिए ।

    उनकी योग, प्राणायमों पर टिप्पणी करना भी वैसे ही है जैसे बाबरी मामले के वकील गिलानी जो पुरातत्व का क, ख, ग नहीं जानते हैं उनका पुरातात्विक मामलों में टिप्पणी करना जैसी है ।

    इसलिए पंडित जी की कल्पनाशीलता का पुनः प्रशंसा करता हूं और पाठकों से उनके लेखों में तथ्य ढूंढ कर उनके साथ अन्याय न करने की अपील करता हूं ।

  7. अंततः ये बात साबित हो गयी की लेखक प्रचार का घोर पिपासु है ! वो ये सोच कर हैरान परेशान है के जहाँ उनके पुराने लेख १०० पाठकों का आंकड़ा पार नहीं कर पाए थे! स्वामी रामदेव जी पर लिखे हर लेख की पाठक संख्या १०० से ऊपर जा रही है! तभी दनादन बकवास लिखते जा रहे हैं उनकी विकृत सोच पर सिर्फ अफ़सोस जताया जा सकता है! इस लेख में टिप्पणीकारों से निवेदन है की उनके आने वाले लेखों पर कम से कम टिप्पणी कर उनकी बुद्धि को सही राह पर लाने का सफल प्रयास अवश्य करें!

  8. इन वामपंथियों की कुंठा है कि बाबा के औषध निर्माण शाला मे इनकी union क्यों नहीं, वृंदा ने भी इसीलिए झूठे आरोप लगाए थे और बाद मे मुँह छुपा कर भाग खडी हुई, यह भी भागेगे।

  9. श्री जगदीश्वर जी स्वामी रामदेवजी के ऊपर हाथ धोकर पड़ गए है. लगता है आपको स्वामी रामदेव जी से कुछ खास लगाव है.

    स्वामी रामदेव जी द्वारा किये जा रहे पावन कार्य पूरी दुनिया मान रही है और इसमें कोई शक नहीं है की अगर इलेक्ट्रिक वोटिंग मशीन का उपयोग नहीं हुआ और श्री स्वामी रामदेव जी की भारत स्वाभिमान पार्टी चुनाव में उतरी तो ४०० से ५०० सीट पर संसद में कब्ज़ा कर लेंगी.

    बाजार में उपभोक्ता निर्णायक होता है. एक बार तो कोई वास्तु विज्ञापन के द्वारा खरीदी जा सकती है किन्तु बार बार वाही वास्तु खरीदी जाय तो मान लेना चाइये की वास्तु में वाकई दम है. पतंजलि संसथान के हर वास्तु उच्च स्तरीय और बहुत कम कीमत पर मिलती है.

    हमारी देश की जनता का स्वाभिमान ख़त्म होने को आया था जिसे स्वामी रामदेवजी ने अपने ओजेस्वी भाषन द्वारा फिर से नव जीवनदान दिया है. कसरत व्ययायाम द्वारा सरीर की मांसपेसियो को तो कठोर बनाया जा सकता है किन्तु प्राणायाम और योग द्वारा अन्दर और बाहर और चारो तरफ से सरीर स्वस्थ बनता है.

    ऐश्वर्या राय और करिश्मा कपूर की इमेज का स्वामी रामदेव से तुलना करना वाकई लेखेक जी की छोटी मानसिकता को दर्शाता है. तुलना बेमेल है जैसे की “बमूर में भाता (बेगन) लगाना”. इसमें कोई शक नहीं की दोनों अभिनत्री भारत में ही नहीं विश्व में एक स्थान रखती हैं किन्तु स्वामी रामदेव जी का स्थान उनसे बहुत बहुत बहुत ऊपर है. जय भारत जय स्वामी रामदेव जी.

  10. सभी की टिप्पणियां ठीक निशाने पर लगने वाली हैं. ख़ास कर मिहिर जी की टिप्पणी तो सबसे सही सन्देश देने वाली लगी. डा. चतुर्वेदी जी का लेख पढने में समय गंवाना मुझे भी उचित नहीं लगा. इन लेखक महोदय पर टिप्पणी करने में ऊर्जा गंवाने का भी कोई अर्थ नहीं. इतने कट्टरपंथी, अवैज्ञानिक लोगों का आप कर भी क्या सकते हैं, एक उपेक्षा के इलावा. हमारा बहुत बड़ा उद्देश्य पूरा हो गया है – साम्यवादियों की संकीरण और भारत विरोधी सोच व अपरोच डा. चतुर्वेदी जी की कृपा से स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आई है. यह भी स्पष्ट हुआ की भारत विरोधी षड्यंत्रों में कम्युनिस्टों और विदेशी चर्च यानी ईसाईयों की मिली-भगत है.

  11. आदरणीय आर. सीघ, भाई मिहिर भोज जी, श्री अज्ञानी जी की पोस्ट पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया. भाई अनिल सहगल जी का प्रयास भी पसंद आया. बे सर पैर के लेख को पढने में आज मैंने समय नहीं गंवाया. छपी हुई पोस्टों पर कुछ कहने के उत्साह को मैं नहीं छोड़ सकी. मिहिर भोज जी की टिप्पणी पर हम काफी देर हंसते रहे कि जिस विषय पर लेखक कुछ भी नहीं जानते, उस पर भी पूरे अधिकार के साथ लिखते हैं. पोस्ट प्रेषित करने वाले विद्वानों को मेरा प्रणाम.

  12. चतुर्वेदीजी ठेठ हिंदी में एक शब्द आता है थेथर.आप उसका मतलब तो समझते ही होंगे क्योंकि आप हिंदी के प्राध्यापक है.भर्तृहरि के नीतिशतक में एक श्लोक भी आता है.चूँकि आप संस्कृत के भी ज्ञाता हैं इसलिए उस श्लोक को आपने अवश्य पढ़ा होगा.मैं तो संस्कृत बहुत ही कम जानता हूँ अतः श्लोक के उद्धृत करने में कोई त्रुटी रह गयी तो आप सुधि जन खासकर चतुर्वेदीजी मुझे माफ़ कर देंगे.श्लोक कुछ इस प्रकार है:अज्ञः सुखम आराध्यते सुख्तारामाराध्यते विशेषज्ञः ज्ञान लव दुर्विदग्द्हम तं नरं ब्रह्मापि न रंजयते.श्लोक उद्धृत करने में शायद कुछ खामियां रह गयी हो पर मेरे अनुसार उसका अर्थ कुछ इस प्रकार है:मूर्ख को आसानी से समझाया जा सकता है,उससे से भी आसानी से बुद्धिमान को समझाया जा सकता है पर उस मुर्ख को जो स्वयं को बुद्धिमान समझता है ब्रह्मा भी नहीं खुश कर सकते हैं.चतुर्वेदीजी महाराज,क्या इसके बाद भी कुछ कहने की आश्यकता रह जाती है?
    ऐसे एक बात और है.स्टालिन के हवाले कहा जाता है की एक झूठ को सौ बार दुहराओ तो वह भी सत्य लगने लगता है. हो सकता है की आप यही कर रहे हों.क्योंकि स्टालिन आपके आराध्यों में से है. .अगर ऐसा है तो भर्तृहरि वाली बात शायद आप पर लागू न हो.

  13. बाबा रामदेव की इमेजों का जादू – by – जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

    (१) समझ नहीं आता कि क्या महाराज जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी अपने पाठकों को योगिक क्रियाओं को करने से मना कर रहे हैं ?

    यदि ऐसा है तो सीधी सलाह दें कि योग अभ्यास मत करो, इसको करने से आपको हानि होगी.

    (२) टी.वी. से योग सीखने के लिए साधक को किसी प्रकार का शुल्क नहीं देना पडता.

    बाबा आजकाल देश भर में – शहर, कसबे, गाँव-गाँव – निशुल्क एक-दिवसीय योग शिविर लगा रहे हैं. इसमें आपको क्या इतराज है ?

    स्वाभिमान का नारा बुलंद कर रहे हैं.

    (३) गिलो, तुलसी, घीया, आदी के प्रयोग के लिए कहते रहते हैं.

    सभी को दवा से दूर रखने का प्रयत्न रहता है.

    आयुर्वेद और प्राकृतिक इलाज की सलाह भी होती है.

    गोली-मुक्त जीवन निर्वाह के लिए कहते हैं.

    (४) बाबा रामदेव आर्यसमाजी हैं. अत: स्वामी दयानंद सरस्वती के समाज सुधार कार्यकर्म का प्रसार भी करते हैं.

    (५) देश से corruption मिटे. इस पर उनके अपने तीव्र विचार हैं.

    काला धन समाप्त हो, विदेश में रखा काला धन देश के काम आये – उनके पास इसके इलाज है.

    (५) आपको बाबा रामदेव पसंद नहीं है. बाबा के काम करने का ढंग पसंद नहीं है.

    शरीफ बनो, बाबा में जो दोष आपको दिखें उन पर हाय तोबा मचाओ, पर स्वस्थ रहने के योगिक ढंग की तो ऐसी-तैसी मत करो.

    यह आपको शोभा नहीं देता. वाम पंथी योग के against कब से हो गए.

    भगवन सबको सद बुद्भी प्रदान कर. अन्धकार से प्रकाश में लाऐ.

    – अनिल सहगल –

  14. जगदीश्वर जी महामूर्ख हैं और इन्हें ये भी नहीं पता की मैं कहा क्या रहा हूँ ये चोर की बजाय उस व्यक्ति को डांट रहे हैं जिसने चोरी के लायक धन अपने पास या जेब में रखा है. चोरों को तो ये कुछ कह नहीं सकते वो इनके कुछ खास रिश्तेदार लगते होंगे. क्या कभी इनहोने लोगों द्वारा फ़िल्मी कलाकारों को सर आँखों पैर बैठने या उपभोग के अन्य साधनों के लिए मीडिया का इस्तेमाल कर रहे शराब, दवाइयों, विलाशिता की वस्तुओं, चेहरे चमकाने के साधनों के विज्ञापन से, फैशन शो के प्रसारण से जनता को बेवक़ूफ़ बनाने में मीडिया के प्रयासों की निंदा की है?
    बाबा राम देव ने योग विद्या की रचना नहीं की मगर उन्होंने योग व आयुर्वेद को आम जनता के दिमाग के अन्दर रचा है, बसाया है, विश्वास दिलाया है जो लोग सिर्फ एलोपैथी दवाइयों और डॉक्टर पर ही भरोसा करते थे. व्यवसाव करना तो एक मजबूरी और आवश्यकता है जो दवाई राम देव जी बताएं और वो अच्छी कुँलिटी की बाज़ार में न मिले तो लोग आयुर्वेद पर ही अविश्वास करने लगेंगे. वैसे काफी समय से इस विद्या पर कोई अनुसन्धान भी नहीं हुआ है और सरकार भी इस के प्रति आशावान नहीं दिखती आप जैसे लोगों के सानिद्ध्य में. इसलिए अनुसन्धान और अच्छी दवाइयों के लिए पैसे की आवश्यकता तो होगी ही और वो पैसा एडी लाभ पाने वाली जनता से लिया जाए तो क्या गलत है.
    वैसे टीवी पर बाबा राम देव को देखकर आप फ्री में ही सारे ज्ञान का फायदा उठा सकते हैं तो फिर शिकायत कैसी . बाबा ने योग को किताबों और ऋषियों के मस्तिष्क और पोथियों से बहार निकाल कर लोगों के स्मिरितियों में ऐसा बैठा दिया है की अनेक वर्षों तक नहीं भूल सकते.

    “इस अर्थ में बाबा रामदेव की इमेज के गुलाम हैं। यह वैसे ही है जैसे आप लक्स साबुन खरीदते हुए करिश्मा कपूर या ऐश्वर्याराय की इमेज के गुलाम होते” .

    “वे भीड़ की तरह बाबा रामदेव का वैसे ही अनुकरण कर रहे हैं जैसे कोई साबुन के विज्ञापन को देखकर साबुन का उपभोग करने लगता है”

  15. जगदीश्वर जी आपकी सबसे बङी खूबी ये है कि आप उन चीजों पर बङे अधिकार पूर्वक लिख पाते हैं जिन चीजों के बारे मैं आपको क ख ग भी पता नहीं होता…..बाबा रामदेव ने इस चीज का श्रेय कभी नहीं लिया कि योग को उन्होने इजाद किया पर इस बात को तो आप को मानना ही पङेगा कि सामान्य जन योग कर सकता है बिना योगाचोर्य की शरण में जाकर भी कर सकता है….योग को कालांतर मैं आम जन के लिए इतना दूभर बना दिया गया कि यदि योग किया तो कोई फायदा हो न हो पर नुकसान जरूर हो जायेगा तो लोगों ने योग से एक दूरी बना ली पर आज बाबा रामदेव के प्रभाव मैं विश्व की करोङों करोङों जनता योग प्राणयाम से स्वास्थ्य लाभ कर रही है ये बात आपको दिखाई नहीं देगी……इनकी प्रेरणा से आज आयुर्वेद का पुनरूद्भव हुआ हर छोटी बङी बीमारी का इलाज योग व आयुर्वेद से संभव हुआ ये बात आपको दिखाई नहीं देगी…..यदि फिर भी कोई शक है तो आप आज्ञा करें मैं अनेका नेक लोग जो असाध्य़ बीमारियों से पीङित हैं वो आराम से ये भारतीय पुरातन पद्धति अपना कर समाज मैं अपना योगदान दे रहे हैं उनसे मिलवा भी सकता हूं …..मगर अफसोस साम्यवाद की कालीपट्टी ने आपको स्वतंत्र दृष्टि से देखने लायक नहीं छोङा है…..आप मात्र वो ही देख या सुन सकते है जो आपकी विचारधारा पर फिट बैठता है……बुद्धीजीवी होने के नाते आपसे अपेक्षा है कि पूर्ण अध्ययन के बाद ही कुछ लिखा जाये……

  16. लेखक महोदय जिस विषय के बारे में आप रति भर भी ज्ञान नहीं रखते वहां अपना मुह खोलना जरा भी शोभा नहीं देता! लगता है आप प्रचार पाने के तीव्र इच्छुक हैं तभी आप ज्वलंत मुद्दे को उठाने का असफल प्रयास कर रहे हैं! आप अगर मुद्दे की तह तक जायेंगे तो आपको पता चलेगा की वास्तविकता क्या है! आप टीका टिप्पणी करिए कोई रोकने वाला नहीं हैं परन्तु सार्थक कीजिये ये महत्वपूर्ण है! मैंने आज तक बाबा रामदेव जी के उत्पादों का उपयोग किये बिना अपने आपको स्वस्थ रखा हुआ है तो सिर्फ योग और उनके द्वारा बताये गये देसी उपचारों से! आपके ज्ञान वर्धन के लिए ये बता दूं की मैंने इसके लिए १ भी रुपया रामदेव जी को नहीं दिया और पिछले १५ साल से एक भी अलोपथिक दवा का सेवन नहीं किया आप साल में kitne rupye अलोपथिक medicine par kharch dete हैं ये mujhe नहीं malum और jaan na भी नहीं chahta. apni aankhon par pda हुआ parda hataaiye और haan irshya mat करिए chinta chita smaan है और itni chinta karte रहे तो aapka ant nikat है kripa कर के अपना और अपने pariwaar का khyaal rkhiye योग करिए स्वस्थ और mast rahiye……………. prabhu आपको sadbudhi de !!!

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