बुरा वक्त भी बहुत कुछ सिखाता है


साल 2020 काफी चुनोतियों भरा है। इस साल जो घटनाएं घटित हुई है वो न ही कभी गुजरे जमाने मे देखी गई होगी और न ही आने वाले वक्त में फिर कभी कोई इस तरह की घटनाओं की कल्पना कर रहा होगा। ये सच है कि बीते कुछ महीनों में ज़िन्दगी की रफ्तार पर ब्रेक लग गया था। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ पल जरूर मिले जब हम अपने और अपनों के लिए सोच सके। ये अलग बात है कि सभी के लिए ये पल अच्छे नहीं रहे, लेकिन इन चंद पलो ने ही हमे यह एहसास करा दिया कि हर काम हमारे मन मुताबिक हो यह जरूरी नही है। फिर चाहे कोई कितनी भी अच्छी प्लांनिग क्यों न कर ले? यहां इस बात का यह मतलब कतई नही है कि इंसान कल की परवाह करना ही छोड़ दे। 
     साल 2020 ने जो यादे और अनुभव दिए है वो जीवन मे कभी न भूलने वाले पलो की तरह हमेशा साथ रहेंगे, क्योंकि समय चाहे अच्छा रहा या फिर बुरा रहा लेकिन ये वही पल थे, जब इस भागती जिंदगी में लोग अपने लिए रुक से गए थे। जिसे घर-परिवार के लिए समय नही था। उसे घर मे कैद होकर रह जाना अपनो के बीच समय गुजारना वक्त की जरूरत बन गया था।अब शायद फिर कभी ये पल न आये,  लेकिन आज ये कहावत जरूर सच सी लगने लगी है कि बुरा वक्त कुछ अच्छा जरूर सीखा कर ही जाता है। वक़्त चाहे जैसा भी हो गुजर ही जाता है। रह जाती है सिर्फ यादें। जो हमें यह अहसास कराती है कि गुजरे पलो में हमने क्या गलतियां की है।
कोरोना महामारी ने हमारी आदतें और जीवनशैली को बदल दिया है। जिस भारतीय संस्कृति में हाथ जोड़कर प्रणाम करने की जिस परंपरा को हमने बिसार दिया था। आज फिर देश उस परम्परा की ओर लौट रहा है। पहले से कही ज्यादा अब लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे है। योग प्राणायाम को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना रहे है। अब समय आ गया है जब हम  हदों में रहना सीख ले। प्रकृति के साथ जो निर्दयी व्यवहार किया है उस पर अब लगाम लगा दे। वर्ना प्रकृति के प्रकोप से बच पाना मानव के लिए बहुत कठिन हो जाएगा। आज तापमान बढ़ने की वजह मानव द्वारा प्रकृति का दोहन करना है। आज बाढ़ भूकम्प जैसी घटनाएं जो वर्षों के अंतराल में घटित होती थी अब ऐसा लगता है मानो ये घटनाएं हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गयी है। क्या ये घटनाएं मानव को आईना दिखाने के लिए काफी नही है?
      एक कल्पना करें कि प्रकृति यदि अनाज उगाना बन्द कर दे। नदियां अपने जलाशय का पानी इंसान को न दे , जिन पेड़ो की इंसान अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए बलि चढ़ा रहा वह यदि फल न दे, अपनी शीतलता देना छोड़ दे, तो इस स्वार्थी इंसान का क्या होगा? स्वाभाविक सी बात है, कि मानव-जीवन ख़तरे में पड़ जाएगा। जब प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना ही निराधार है तो मानव क्यों अपने विनाश के बीज स्वयं रोप रहा है? आज कोरोना महामारी है, बाकी महामारियों की तरह इसका भी तोड़ मानव एक दिन शायद ढूंढ ही लेगा लेकिन कल फिर कोई और महामारी होगी। इन महामारियों की जड़ में जाए तो यह साफ पता चल ही जायेगा कि कही न कही ये मानव की भूल के परिणामस्वरूप ही पैदा हुई है। 

     कोरोना महामारी भी बाकी महामारियों की तरह एक दिन खत्म हो ही जाएगी। साथ ही हमारी जीवन जीने की पद्धति को भी बदल देगी। आज हम घरों में रहकर अपने जरूरी काम कर रहे है। देश ऑनलाइन शिक्षा की ओर बढ़ रहा है। यहां तक की दफ्तरों के काम भी ऑनलाइन हो रहे है। कल जब परिस्थिति सामान्य होगी तो ये परिवर्तन हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गए होंगे। हमे इन बदलावों को सहज स्वीकार करना होगा। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमे अपने जीवन मूल्यों को भी ध्यान रखना होगा। तभी मानव-जीवन निरंतर गतिशील रह पाएगा।

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