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    Homeराजनीतिनीतीश दिखाएँ बड़ा दिल, भाजपा को सौंपे मुख्यमंत्री का तोहफ़ा

    नीतीश दिखाएँ बड़ा दिल, भाजपा को सौंपे मुख्यमंत्री का तोहफ़ा

                          प्रभुनाथ शुक्ल 

    बिहार में एक बार फ़िर प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी का जादू चला है। राज्य में नीतीश कुमार के नेतृत्व में चौथी बार सरकार बनने जा रहीं है। हालाँकि चुनाव परिणाम को लेकर कई सवाल भी उठे हैं। क्योंकि कई सीटों पर हारजीत का अंतर बेहद कम था। जिसकी वजह से राष्ट्रीय जनता दल और तेजस्वी यादव की तरफ़ से चुनाव आयोग पर गम्भीर सवाल भी उठाए गए हैं। राज्य में सबसे बड़े दल के रुप में एनडीए उभरी है। भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया है। चुनाव परिणाम आने तक पूरी तरह संशय बना रहा कि कब कौन बाजीमार ले जाय यह कहा नहीँ जा सकता था। 

    बिहार में पूरी मत मतगणना के दौरान नतीजे ऊपर नीचे हो रहे थे। फिलहाल राज्य में सबसे बड़े दल के रुप में नीतीश और मोदी की जोड़ी उभरी है। भाजपा ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। भाजपा को अगर उम्मीद से अधिक परिणाम आने की सम्भावना होती तो वह नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता कभी नहीँ मानती। लेकिन उसे पता नहीँ था कि उसका प्रदर्शन इतना बेहतर होगा। राज्य में एनडीए 125 , महागठबंधन 110 , एलजेपी 01 और बसपा 01 अन्य 07 सीट हासिल करने में कामयाब रहें हैं। 

    बिहार चुनाव में ओवैसी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने भी उम्मीद से अधिक प्रदर्शन किया है। कई दलों के गठबंधन के इस घटक ने 05 सीटें जीती हैं। इन दलों के आपसी तालमेल की वजह से चिराग पासवान भी चित्त हो गए। चिराग की तरफ़ से बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीँ हो पाया। वह पिता रामविलास की बनाई सियासी ज़मीन को भी नहीँ सम्भाल पाए। 2015 के चुनाव में उनकी पार्टी ने दो सीटों पर जीत हासिल किया था। चिराग ने नीतीश से बगावत कर अपना सियासी भविष्य खराब कर लिया है। भाजपा के लिए भी अब वह चुसे गन्ने की तरह हैं। लेकिन उन्होंने नीतीश को नुकसान पहुंचाकर भाजपा को फायदा पहुँचाया है। जबकि सुशील मोदी ने कहा है कि चिराग की वजह से 25 से 30 सीटों का नुकसान हुआ है। 

    बिहार में चुनाव पूर्व नीतीश कुमार को एनडीए का मुख्यमंत्री प्रमोट कर भाजपा फँस गई है। भाजपा को तनिक भी उम्मीद नहीँ थीं कि राज्य में आने वाला चुनाव परिणाम उसके लिए इतना बेहतर होगा। अगर इस बात का उसे पता होता तो वह मुख्यमंत्री का फैसला कभी नहीँ करती। क्योंकि एनडीए में वह सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी है। 2015 में भाजपा ने जहाँ 53 सीटों पर विजय हासिल किया था वहीँ इस पर उसने 74 सीटें जीती हैं। पाँच साल में उसका प्रदर्शन सुधरा है। वह 21 सीटें अधिक लायी है। चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री मोदी की तरफ़ से बिहार के लिए विकास की जिन बड़ी परियोजनाओं की घोषणाएँ हुई उसका लाभ भाजपा को सीधा मिला है। जबकि जदयू को इस बार 2015 के मुकाबले 28 सीटों का बड़ा नुकसान हुआ है। 2020 में उन्हें 71 के बजाय सिर्फ 43 सीटें मिल पायी हैं। बिहार की जनता निश्चित रुप से नीतीश से खफा थीं। 

    भाजपा नीतीश को छोड़ कर अन्यत्र जा भी नहीँ सकती है। क्योंकि उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीँ है। राज्य में राष्ट्रीय जनता दल, भाजपा और जदयू सबसे बड़े दल हैं। भाजपा नीतीश को उस हालत में बाय नहीँ कह सकती है। वह बिहार में महाराष्ट्र फॉर्मूला नहीँ लागू कर सकती है। क्योंकि अगर वह नीतीश से अलग होती भी है तो उसके पास कोई दूसरा सियासी विकल्प नहीँ बचता है। राष्ट्रीय जनता दल से मिल नहीँ सकती है फ़िर नीतीश के साथ हर-हाल में उसे बने रहना होगा।

    बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश का नैतिक दायित्व बनता है कि वह तीन बार लगातर राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। चौथी बार मुख्यमंत्री की ताजपोशी होगी। उन्हें खुद चाहिए कि मुख्यमंत्री का पद वह भाजपा के लिए अपनी स्वेच्छा से छोड़ दें। क्योंकि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान खुद कहा था कि उनका यह अंतिम चुनाव है। नीतीश को बड़ा दिल दिखाते हुए बिहार के सत्ता की चाबी भाजपा को सौंप देनी चाहिए। अगर यह सम्भव नहीँ है तो 20: 20 का फॉर्मूला अपना लें। क्योंकि भाजपा गठबंधन में सबसे बड़े दल के रुप हैं , उस हालात में नीतीश को इस पर विचार करना चाहिए। अगर नीतीश इस तरह का फैसला करते हैं तो भाजपा और नीतीश की दोस्ती और दूरगामी हो जाएगी। यह समय और सियासी दोस्ती की भी माँग हैं। 

    राजनीतिक लिहाज से देखा जाय तो बिहार में तेजस्वी का सियासी आधार कुछ खास नहीँ था। एनडीए के मुकाबले वह महागठबंधन के अकेले नेता थे। बिहार में उन्होंने अपनी एक अलग छबि बनाई। चुनावी पोस्टर से पिता लालू और माँ राबड़ी को हटा दिया। इस फैसले पर भी विरोधियों ने उन पर खूब हमला बोला, लेकिन वह अपनी रणनीतिक पर कायम रहे।  बिहार में तेजस्वी की पार्टी सबसे बड़े दल के रुप में उभरी है। युवाओं ने उन पर भरोसा जताया है। एनडीए के पास स्टार प्रचारकों की बड़ी फौज थीं। प्रधानमंत्री मोदी जैसा जादुवी चेहरा था नीतीश जैसा अनुभवी व्यक्तित्व। जबकि तेजस्वी यादव के पास ऐसा कुछ नहीँ था। पीएम मोदी जंगलराज की बार- बार चर्चा कर लालू यादव राज की याद दिला रहे थे। इस लिहाज से तेजस्वी सारे हमलों का जवाब देकर अपनी सियासी छबि बनाने में कामयाब रहें हैं। वह सफल नेता साबित हुए हैं महागठबंधन में जबकि राहुल गाँधी फेल हुए हैं। 

    हालाँकि राष्ट्रीय जनता दल को 2015 की मुकाबले उन्हें पाँच सीटों का नुकसान हुआ है। इस बार उन्हें सिर्फ 75 सीटें मिली हैं। इस सफलता की वजह भी महागठबंधन में सिर्फ तेजस्वी यादव हैं। कॉंग्रेस तो लगातर पिट रहीं हैं उसने तो पिछले चुनाव का प्रदर्शन भी नहीँ सहेज पायी है। राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर सिर्फ जुबानी हमला बोला है उसका असर काँग्रेस को राहुल गाँधी कहीँ नहीँ दिला पाए हैं। जबकि प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी को फायदे में पहुँचाया है। 2015 के मुकाबले बिहार में भाजपा ने 21 सीटें अधिक जीतीं हैं। वहीँ नीतीश, तेजस्वी और राहुल गाँधी ने अपनी ज़मीन खोई है। 

    बिहार में 2015 के चुनावों में भाजपा का वोट शेयर 24.42 फीसद था। लेकिन 2020 के चुनावों में भाजपा का वोट शेयर गिरकर 19.46 प्रतिशत हो गया। नीतीश का वोट शेयर लगातर गिरा है। लेकिन राजद की सीटें जरूर कम हुई हैं, लेकिन वोट शेयर बढ़ा है। 2020 में राजद का वोट शेयर 23.11 है। सबसे अधिक वोट शेयर के बाद भी राजद सत्ता से दूर है। लेकिन तेजस्वी बिहार में युवानेता के रुप में उभरे हैं। बिहार की जनता ने उन्हें बड़ा सम्मान दिया है। मोदी और नीतीश के राजनीतिक कौशल के आगे तेजस्वी कहीँ नहीँ टिकते हैं। 

    प्रभुनाथ शुक्ल
    प्रभुनाथ शुक्ल
    लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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