लेखक परिचय

अनिल अनूप

अनिल अनूप

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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-अनिल अनूप
बॉलीवुड के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना की आज ७४वां जन्मदिवस है। 2012 में अपने निधन से कुछ ही दिन पहले उन्होंने अपने फैन्स के लिए एक ऑडियो मैसेज रिकॉर्ड किया था। उनके परिवार ने इसे बाद में जारी किया। फिल्म आनंद में भी राजेश खन्ना ने अपनी मौत से पहले एक ऑडियो मैसेज रिकॉर्ड किया था। कुछ उसी तरह का था काका का ये संदेश।
‘मेरे प्यारे दोस्तों, भाइयों और बहनों, नॉस्टैल्जिया में रहने की आदत नहीं है मुझे। हमेशा भविष्य के बारे में ही सोचना पड़ता है। जो दिन गुजर गए हैं, बीत गए हैं, उस का क्या सोचना। लेकिन जब जाने-पहचाने चेहरे अनजान सी एक महफिल में मिलते हैं तो यादें बाविस्ता हो जाती हैं। यादें फिर दोबारा लौट आती हैं।’
‘कभी-कभी मुझे ऐसे लगता है जैसे सौ साल पहले जब मैं दस साल का था, तब से हमारी मुलाकात है। मेरा जन्म थिएटर से हुआ। मैं आज जो कुछ भी हूं, ये स्टेज, ये थिएटर की बदौलत। मैंने जब थिएटर शुरू किया तो मेरे थिएटरवालों ने मुझे जूनियर आर्टिस्ट का रोल दिया था। एक इंस्पेक्टर का, जिसका सिर्फ एक ही डायलॉग था कि खबरदार नंबरदार भागने की कोशिश की, पुलिस ने चारों तरफ से घेर रखा है तुम्हें। ये डायलॉग था। तो उसमें मैं जैसे सेकेंड एक्ट में गया तो मैंने जाकर कहा, नंबरदार खबरदार, तुमने भागने की… उसके बाद डायलॉग भूल गया। तो वीके शर्मा जो थे, हीरो थे, उन्होंने कहा, हां-हां, इंस्पेक्टर साहब का यह कहना है कि भागने की कोशिश न करना, पुलिस ने चारों तरफ से तुम्हें घेर रखा है।‘
‘जो डायलॉग मुझे बोलना था, उन्होंने पूरा किया क्योंकि मैं डायलॉग भूल गया। उसके बाद मुझे बहुत डांट पड़ी, मैं बहुत रोया भी। मैंने कहा कि भई राजेश खन्ना तुम एक्टर बनना चाहते हो और एक लाइन तो तुमसे बोली जाती नहीं है। शर्म की बात है, लानत है तुमपे। मैंने बहुत कोसा अपने आप को और मैंने कहा कि कभी एक्टर नहीं बन सकता।‘
‘लेकिन फिर भी भगवान की मुस्कान समझ लीजिए, जिद समझ लीजिए। मैंने कहा, कुछ न कुछ तो करूंगा, करके बताऊंगा। मैं जब फिल्मों में आया तो मेरा कोई गॉडफादर नहीं था। मेरी फिल्म में कोई रिश्तेदार या कोई सर पर हाथ रखने वाला नहीं था। मैं आया थ्रू द यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स फिल्मफेयर टैलेंट कॉन्टेस्ट। कॉन्टेस्ट छपा फिल्मफेयर में, टाइम्स ऑफ इंडिया में, हमने कैंची लेकर उसे काटा, उसे भरा और वहां लिखा था प्लीज सेंड थ्री फोटोग्राफ्स। हमने तीन फोटो भेजीं। हमको बुलाया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया में था’
‘यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स। वहां पर बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स थे। चाहे वह चोपड़ा साहब थे, बिमल रॉय थे, एसएस द्रविड़ थे… शक्ति सामंत थे, बहुत सारे थे।’
‘उन्होंने कहा कि हमने आपको डायलॉग भेजा है, वो याद किया आपने? तो मैं सामने कुर्सी पर बैठा था और वे एक बड़ी सी टेबल में लाइन में। इतने बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स थे, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोर्ट मार्शल हो रहा है। जैसे ये बंदूक निकालेंगे और मुझे मार डालेंगे, गोली चला देंगे… क्योंकि सामने अकेली एक कुर्सी थी बस। तो मैंने कहा कि डायलॉग तो मैंने पढ़ा है लेकिन यह जो डायलॉग है, आपने यह नहीं बताया कि इसका कैरक्टराइजेशन क्या है? कि हीरो अपनी मां को समझाता है कि मैं एक नाचनेवाली से प्यार करता हूं लेकिन मैं उसको तेरे घर की बहू बनाना चाहता हूं। दिस वाज द डायलॉग जिसका मेन रोल था। मैंने कहा, आपने न कैरेक्टर बताया मां का, न बताया हीरो का कि भई अमीर है, गरीब है, मां सख्त, कड़क है, नरम है, क्या है, मिडिल क्लास है, यह आदमी पढ़ा-लिखा, अनपढ़ है या कुछ भी नहीं, तो चोपड़ा साहब ने मुझे झट से कहा कि तुम थिएटर से हो? मैंने कहा – जी….’
‘मैंने कहा, डायलॉग तो आपने लिखके भेज दिया कि इस तरह मां को कनविंस करना है। डायलॉग बोलिए लेकिन आपने कैरक्टराइजेशन नहीं बताया। यह कोई स्टेज का एक्टर ही बोल सकता है। तो बोले अच्छा ठीक है भई, तुम कोई भी अपना एक डायलॉग सुनाओ। अब काटो तो खून नहीं, पसीना छूट रहा था। मैंने कहा, क्या डायलॉग बोलूं… और ये सब बड़े-बड़े लोग। इनकी पिक्चरें हमने 10-10 बार देखी हुईं, प्रोड्यूस-डायरेक्ट की हुईं।’
‘मुझे भगवान के आशीर्वाद से एक ऐसे राइटर का डायलॉग याद आया। मुझको यारों माफ करना। उस प्ले का डायलॉग क्योंकि मैंने वह प्ले किया हुआ था। तो मुझे वह डायलॉग याद आया और मैंने उनसे कहा कि मैं इस कुर्सी से उठ सकता हूं। तो कहा, हां-हां, जो करना है करिए लेकिन आप करके बताएं कि क्या करेंगे। तो थोड़ा नर्वस भी हुआ। जिस तरह से बोला, मुझे लगा डांट के बोल रहे हैं। जो डायलॉग है, जिसकी वजह से मैं फिल्मों में आया। मुझे जी पी सिप्पी ने चांस दिया 40 साल पहले, ‘हां, मैं कलाकार हूं, हां मैं कलाकार हूं, क्या करोगे मेरी कहानी सुनकर? आज से कई साल पहले होनी के बहकाने से एक ऐसा प्याला पी चुका हूं, जो मेरे लिए जहर था। औरों के लिए अमृत… एक ऐसी बात जिसका इकरार करते हुए मेरी जुबान पर छाले पड़ जाएंगे, लेकिन फिर भी कहता हूं कि जब मैं छोटा था, एक खौफनाक वाकया पेश आया क्योंकि मैं एक भयानक आग में फंस गया। जब जिंदा बचा तो मालूम हुआ कि मैं बदसूरत हो गया हूं। जैसे सुहानी सुबह डरावनी रात में पलट गई हो।’
‘मैं बाहर जाने से घबराने लगा और घर पर बैठकर गीत बनाने लगा। जितना भयानक था मेरा चेहरा, उतने मधुर थे मेरे गीत। दुनिया ने मुझे दुत्कारा लेकिन मेरे गीतों से प्यार करने लगे और मैं चिल्लाता रहा कि तुमने चांदनी रातों से मोहब्बत की और मैं आंखों से बरसाता हूं सितारे। मेरे गीतों ने हजारों को लूटा मेरी मुलाकात की मिन्नतें होती रहीं। पर मैं किसी से न मिलता। एक दिन एक खत आया, मैंने तुम्हारे गीतों में शांति पाई अगर मुलाकात न हुई तो न जाने क्या कर बैठूंगी। मुझे लगा यह खूबसूरत हसीना। इसे बुलाऊं। यह बदसूरत चेहरा दिखाकर पूरी ताकत से इंतकाम लूं। मैंने उसे बुलाया। वह आई। कितनी खूबसूरत और हसीन। शबनम से भी मुलायम और मैं जैसे, मासूम के सामने मायूसी… मैं चेहरा छुपा के बातें करता रहा, मेरे गीत शुभनमे थे। मैंने शादी का प्रस्ताव पेश किया। और वह खुशी से बोली, हां मुझे मंजूर है। मैं खुद सहम गया, मैंने चिल्ला के पूछा, कौन हो, कहां से आई हो तुम… उसने धीरे से आंसू बहाते हुए कह दिया कि मैं… मैं तो एक अंधी हूं। मैंने उसकी आंखों में देखा, उसकी आंखों में इश्क था। तब मैंने कहा कि जो तेरी निगाह का बिस्मिल नहीं, वह कहने को दिल तो है मगर दिल नहीं…’
‘फिल्मों में आ तो गया लेकिन आने के बाद वह खूबसूरत कामयाबी कि सीढ़ी चढ़ने का मौका, यह सेहरा तो आपके सर है… कि आप हैं, जिन्होंने मुझे एक्टर से स्टार बनाया। स्टार से सुपर स्टार बनाया। किन अल्फाजों में आपका शुक्रिया अदा करूं, मुझे समझ में नहीं आता। प्यार आप मुझे भेजते रहें, प्यार वह मुझे मिलता रहा… लेकिन उस प्यार को मैं कभी वापस लौटा नहीं पाया। लेकिन जो भी कहना चाहूंगा, जिन अल्फाजों में भी आपका शुक्रिया अदा करना चाहूंगा… वह मेरी दिल की सच्चाई होगी। मेरी ईमानदारी होगी। मेरा जमीर होगा। आज मेरा दिल हल्का हुआ, आपसे गुफ्तगू करके, बात करके और आपका मैंने शुक्रिया अदा किया। मुझे खुद को अच्छा लग रहा है कि चलिए इस बहाने आपसे मुलाकात हुई। किसे अपना कहें, कोई इस काबिल नहीं मिलता, किसे अपना कहें… कोई इस काबिल नहीं मिलता, यहां पत्थर तो बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता।’
‘तो दोस्तों, आपका एक हिस्सेदार मैं भी हूं। और जैसे मैंने पहले भी कहा कि आपने अपना कीमती वक्त निकाला, आपका ये प्यार था कि आप मौजूद हुए और इतनी भारी संख्या में… तो मैं यही कहूंगा कि बहुत-बहुत शुक्रिया, थैंक यू और मेरा बहुत-बहुत सलाम।’
29 दिसम्बर 1942 को जतिन अरोरा नाम से जन्में बच्चे का पालन पोषण लीलावती चुन्नीलाल खन्ना ने किया था। जतिन के माता पिता भारत विभाजन के पश्चात पाकिस्तान से आकर अमृतसर में बस गये थे। खन्ना दम्पत्ति जो जतिन के वास्तविक माता-पिता के रिश्तेदार थे इस बच्चे को गोद ले लिया और पढ़ाया लिखाया। जतिन ने तब के बम्बई स्थित गिरगाँव के सेण्ट सेबेस्टियन हाई स्कूल में दाखिला लिया। उनके सहपाठी थे रवि कपूर जो आगे चलकर
जितेन्द्र के नाम से फिल्म जगत में मशहूर हुए।
स्कूली शिक्षा के साथ साथ जतिन की रुचि नाटकों में अभिनय करने की भी थी अत: वे स्वाभाविक रूप से थियेटर की ओर उन्मुख हो गये। स्कूल में रहते हुए उन्होंने कुछ नाटक भी खेले। केवल इतना ही नहीं, कॉलेज के दिनों उन्होंने नाटक प्रतियोगिता में कई पुरस्कार भी जीते।
थियेटर व फिल्मों के लिये काम खोजने वे उस समय भी अपनी स्पोर्टस कार में जाया करते थे। यह उन्नीस सौ साठ के आस पास का वाकया है। दोनों दोस्तों ने बाद में तत्कालीन बम्बई के के०सी० कॉलेज में भी एक साथ तालीम हासिल की। .जतिन को राजेश खन्ना नाम उनके चाचा ने दिया था यही नाम बाद में उन्होंने फिल्मों में भी अपना लिया। यह भी एक हकीकत है कि जितेन्द्र को उनकी पहली फिल्म में ऑडीशन देने के लिये कैमरे के सामने बोलना राजेश ने ही सिखाया था। जितेन्द्र और उनकी पत्नी राजेश खन्ना को “काका” कहकर बुलाते थे।
राजेश खन्ना एक भारतीय
बॉलीवुड अभिनेता, निर्देशक व निर्माता थे।उन्होंने कई हिन्दी फिल्में बनायीं और राजनीति में भी प्रवेश किया। वे नई दिल्ली लोक सभा सीट से पाँच वर्ष 1991-96 तक कांग्रेस पार्टी के सांसद रहे। बाद में उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया।
उन्होंने कुल 180 फिल्मों और 163 फीचर फिल्मों में काम किया, 128 फिल्मों में मुख्य भूमिका निभायी, 22 में दोहरी भूमिका के अतिरिक्त 17 छोटी फिल्मों में भी काम किया।व तीन साल 1969-71 के अंदर १५ solo हिट फिल्मों में अभिनय करके बॉलीवुड का सुपरस्टार कहे जाने लगे।  उन्हें फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिये तीन बार
फिल्म फेयर पुरस्कार मिला और १४ बार मनोनीत किया गया। बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा हिन्दी फिल्मों के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी अधिकतम चार बार उनके ही नाम रहा और २५ बार मनोनीत किया गया । 2005 में उन्हें फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेण्ट अवार्ड दिया गया। राजेश खन्ना हिन्दी सिनेमा के पहले सुपर स्टार थे।
1966 में उन्होंने आखिरी खत नामक फिल्म से अपने अभिनय की शुरुआत की। राज़, बहारों के सपने, आखिरी खत – उनकी लगातार तीन कामयाब फ़िल्में रहीं और बहारों के सपने पूर्णतः असफल हुई। उन्होंने 1966-1991 में 74 स्वर्ण जयंती फ़िल्में की। (golden jubilee hits)। उन्होंने 1966-1991 में 22 रजत जयंती फिल्में किया। उन्होंने 1966-1996 में 9 सामान्य हित्त फिल्म किया। उन्होंने 1966-2013 में 163 फिल्म किया और 105 हिट रहे।
राजेश खन्ना ने 1966 में पहली बार 23 साल की उम्र में “आखिरी खत” नामक फिल्म में काम किया था। इसके बाद राज़, बहारों के सपने, आखिरी खत – उनकी लगातार तीन कामयाब फिल्म किया। तब फिर बहारों के सपने पूर्णतः असफल हुआ लेकिन उन्हें असली कामयाबी 1969 में “आराधना” से मिली जो उनकी पहली प्लेटिनम जयंती सुपरहिट फिल्म थी। आराधना के बाद हिन्दी फिल्मों के पहले सुपरस्टार का खिताब अपने नाम किया। उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार 15 solo सुपरहिट फिल्में दिया – आराधना, इत्त्फ़ाक़, दो रास्ते, बंधन, डोली, सफ़र, खामोशी, कटी पतंग, आन मिलो सजना, ट्रैन, आनन्द, सच्चा झूठा, दुश्मन, महबूब की मेंहदी, हाथी मेरे साथी। बहुकलाकार फिल्में 1969-72 का अंदाज़, मर्यादा सुपरहिट रहा। मालिक पूर्णतः असफल रहा।
1966-72 के दशक में एक फैशन डिजाइनर व अभिनेत्री अंजू महेन्द्रू से राजेश खन्ना का प्रेम प्रसंग चर्चा में रहा। बाद में उन्होंने डिम्पल कपाड़िया से मार्च 1973 में विधिवत विवाह कर लिया। विवाह के ८ महीने बाद डिम्पल की फिल्म बॉबी रिलीज हुई। डिम्पल से उनको दो बेटियाँ हुईं।बॉबी की अपार लोकप्रियता ने डिम्पल को फिल्मों में अभिनय की ओर प्रेरित किया। बस यहीं से उनके वैवाहिक जीवन में दरार पैदा हुई जिसके चलते दोनों पति-पत्नी 1984 में अलग हो गये। फिल्मी कैरियर की दीवानगी ने उनके पारिवारिक जीवन को ध्वस्त कर दिया।कुछ दिनों तक अलग रहने के बाद दोनों में सम्बन्ध विच्छेद हो गया।
1984-1987 में एक अन्य अभिनेत्री टीना मुनीम के साथ राजेश खन्ना का रोमांस उसके विदेश चले जाने तक चलता रहा।.काफी दिनों तक अलहदा रहने के बाद, 1990 में डिम्पल और राजेश में एक साथ रहने की पारस्परिक सहमति बनती दिखायी दी। रिपोर्टर दिनेश रहेजा के अनुसार उन दोनों में कटुता समाप्त होने लगी थी और दोनों एक साथ पार्टियों में शरीक होने लगे। यही नहीं, डिम्पल ने लोक सभा चुनाव में राजेश खन्ना के लिये वोट माँगे और उनकी एक फिल्म जय शिवशंकर में काम भी किया।1990 से 2012 तक साथ मे दोनों त्यौहार मनाते थे| दोनों की पहली बेटी ट्विंकल खन्ना एक फिल्म अभिनेत्री है। उसका विवाह फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार से हुआ। दूसरी बेटी रिंकी खन्ना भी हिन्दी फिल्मों की अदाकारा है उसका विवाह लन्दन के एक बैंकर समीर शरण से हुआ।

जून 2012 में यह सूचना आयी कि राजेश खन्ना पिछले कुछ दिनों से काफी अस्वस्थ चल रहे हैं।23 जून 2012 को उन्हें स्वास्थ्य सम्बन्धी जटिल रोगों के उपचार हेतु लीलावती अस्पताल ले जाया गया जहाँ सघन चिकित्सा कक्ष में उनका उपचार चला और वे वहाँ से 8 जुलाई 2012 को डिस्चार्ज हो गये। उस समय “वे पूर्ण स्वस्थ हैं”, ऐसी रिपोर्ट दी गयी थी।
14 जुलाई 2012 को उन्हें मुम्बई के लीलावती अस्पताल में पुन: भर्ती कराया गया। उनकी पत्नी डिम्पल ने मीडिया को बतलाया कि उन्हें निम्न रक्तचाप है और वे अत्यधिक कमजोरी महसूस कर रहे हैं।
अन्तत: 18 जुलाई 2012 को यह खबर प्रसारित हुई कि सुपरस्टार राजेश खन्ना नहीं रहे।

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