आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा तक पर एतराज क्यों ..?

धीरे-धीरे ही सही लेकिन चीजें बदलनी शुरू हुई हैं। दलित और पिछड़े समाज का शहरी युवा भी राजनैतिक दलों के इस गोरखधंधे को बखूबी समझने लगा है और समझने लगा है, कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रतियोगिता से ही पार पाया जा सकेगा। यही नहीं आरक्षण के बूते दलित और पिछड़े समाज के राजनैतिक मठाधीशों को लेकर भी समाज में माहौल अब बदल रहा है। लोग मानने लगें कि आरक्षण का यह लाभ जरूरतमंदों तक न पहँुचकर कुछ लोगों की जागीर बन रहा है। दलित और पिछड़े समाज के जागरूक युवाओं में भी यह धारणा बन रही है, कि आरक्षण व्यवस्था का लाभ जातिगत न होकर जरूरतमंदों को मिले तो समाज की तस्वीर ज्यादा तेजी के साथ बदलेगी।

संदीप त्यागी
केन्द्रीय राज्य मंत्री वी.के. सिंह के मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को हटाने संबंधी बयान एक बार फिर सुर्खियां बन रहा है। वैसे तो जातिगत आरक्षण व्यवस्था का समाज का एक वर्ग शुरू से ही विरोधी रहा है, लेकिन समय के साथ-साथ इस व्यवस्था को लेकर अब बहस के स्वर मुखर भी होने लगे हैं, कि आखिरकार इस व्यवस्था को लेकर सरकारों का रवैय्या इतना अड़ियल क्यों है? रही-सही कसर बीते दिनों देश भर में होने वाले विभिन्न चुनावों ने पूरी कर दी है, जिनमें जातिगत आरक्षण व्यवस्था को हटाना भी एक वर्ग विशेष में मुद्दा बनने लगा है। हालांकि मौजूदा व्यवस्था में जातिगत आरक्षण पर बोले गये बोल किस कदर नुकसान कर सकते हैं, यह बीते बिहार विधानसभा चुनाव में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान से समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की बात कही थी और उसके बाद बिहार विधानसभा चुनाव में विरोधियों ने इसे भाजपा के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा बनाते हुए भाजपा को चुनाव में करारी शिकस्त दे दी।

यह हालात तब हुए जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा के पूरे चुनावी अभियान के दौरान लगातार कहते रहे कि उनके रहते आरक्षण व्यवस्था में किसी तरह का कोई बदलाव संभव नहीं है। बहरहाल राजनैतिक दलों की अपनी मजबूरियां होती हैं, हालांकि यह भी एक बड़ा सच है, कि अपनी सहूलियतों और मतलब के लिए यह सभी राजनैतिक दल किसी भी परिवर्तन के लिए तैयार हो जाते हैं। समझ नहीं आता कि बीते सात दशक से चली आ रही एक व्यवस्था की समीक्षा करने में हर्ज क्या है? आखिरकार समय के साथ इस व्यवस्था के लाभ-हानि का आंकलन क्यों न किया जाये? आजादी के लगभग सात दशकों में हमने इस व्यवस्था से क्या पाया है, क्या यह व्यवस्था उस वर्ग तक वास्तव में लाभ पहुँचा पाई है, जिसके लिए इसे बनाया गया था, या इसमें किसी सुधार की जरूरत है? लेकिन यह ऐसे सवाल है, जिन पर सकारात्मकता के साथ कोई बात नहीं होती है, और बस व्यवस्था की समीक्षा की बात सुनते ही राजनैतिक दल विरोध का झंडा लेकर मैदान में आ खड़े होते हैं।

जातिगत आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ ‘मूवमेंट अगेंस्ट रिजर्वेशन’ की मुहिम चला रहे समाजसेवी व भाजपा नेता शांत प्रकाश जाटव कहते हैं, कि दरअसल आरक्षण को आज राजनैतिक दलों ने समाज को बांटने का हथियार बना लिया है। मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की बात को उचित ठहराते हुए जाटव कहते हैं, कि समीक्षा के नाम पर बवाल मचाने वाले दल अगर सचमुच दलितों या पिछड़ों के हिमायती हैं, और उन्हें लगता है, कि मौजूदा व्यवस्था अभी जारी रखने की जरूरत है, तो वह क्यूं नहीं समीक्षा के दौरान इसके प्रमाण रखते? और सबसे बड़ी बात समीक्षा के चलते यह तो पता चले कि आखिरकार यह व्यवस्था हमें सही दिशा में ले जा भी रही है या नहीं? जातिगत आरक्षण व्यवस्था का यह कड़वा सच इसके हिमायती क्यूँ नहीं देखना चाहते हैं, कि जिस आरक्षण व्यवस्था का मकसद समाज को जातिविहीन बनाना था, आज सात दशक के बाद देश की अधिकांश जातियां पिछड़ी जातियों में शामिल होने को कतार लगाये हुए हैं। फिर इस व्यवस्था का लाभ किसके हिस्से गया है? एक सवाल यह भी है, कि संविधान के अनुच्छेद 17 में स्प्ष्ट लिखा है, कि देश से अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिया गया है। अगर अस्पृश्यता का उन्मूलन हो चुका है, तो फिर किस आधार पर इन जातियों को अछूत बताकर जातिगत आरक्षण व्यवस्था लागू की जा रही है। जाटव कहते हैं, कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की हकीकत बस इतनी है, कि मुद्दों से भरे इस देश में यह भी राजनैतिक दलों के लिए वोट बटोरू सदाबहार मुद्दा है। जिसके चलते न तो कोई बुनियादी व्यवस्था में सुधार का पक्षधर है और न ही किसी जागरूक समाज का।
हालांकि जिस हद तक राजनैतिक दल समझ रहे हैं वस्तुस्थिति ऐसी ही है, ऐसा भी नहीं। शांत जाटव कहते हैं, कि शहरी युवा वर्ग इस धारणा को तोड़ रहा है। धीरे-धीरे ही सही लेकिन चीजें बदलनी शुरू हुई हैं। दलित और पिछड़े समाज का शहरी युवा भी राजनैतिक दलों के इस गोरखधंधे को बखूबी समझने लगा है और समझने लगा है, कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रतियोगिता से ही पार पाया जा सकेगा। यही नहीं आरक्षण के बूते दलित और पिछड़े समाज के राजनैतिक मठाधीशों को लेकर भी समाज में माहौल अब बदल रहा है। लोग मानने लगें कि आरक्षण का यह लाभ जरूरतमंदों तक न पहँुचकर कुछ लोगों की जागीर बन रहा है। दलित और पिछड़े समाज के जागरूक युवाओं में भी यह धारणा बन रही है, कि आरक्षण व्यवस्था का लाभ जातिगत न होकर जरूरतमंदों को मिले तो समाज की तस्वीर ज्यादा तेजी के साथ बदलेगी।

1 thought on “आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा तक पर एतराज क्यों ..?

  1. Article-17 ke ane ke bad bhi jo surat nahi badli uska jikr nahi kie..aur reservation ka jo msla he uspr itna kahunga ki, ek bar grade aur Govt service me niyuktiyo ka hakikt kya he aur samaj ki sachai kya heee..
    brhal kisi ko likhit to kisi ko prampragt, kisi ko tilak se to kisi ko daulat he reservation mil hi raha he….

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