आखिर कब जड़ेगा उत्तर प्रदेश में “मधुशाला पर ताला”??

अवैध धंधो की तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी की नजर टेढ़ी होते ही महिलाओं ने भी शराब बंदी का पुरजोर समर्थन , कहीं तोड़फोड़ तो कहीं मारपीट से किया. उन महिलाओं की नजर में यह एक ऐसा जहर है जो पूरे परिवार की खुशियों को उनसे छीन रहा है पर वर्तमान परिदेश्य के मुताबिक अब सरकार को शराब बंदी की अच्छाइयों के प्रति समाज में जागरूकता फ़ैलाने की आवश्यकता है. स्कूल कॉलेजों में कार्यक्रम आयोजित कर इससे होने वाली परेशानियों से अवगत कराने की जरूरत है तभी इस धीमे जहर से कुछ हद तक राहत पाई जा सकती है .

अपूर्व बाजपेयी

सत्ता बदलने के साथ ही वर्तमान समय में पूरे उत्तर प्रदेश में पूर्ण शराब बंदी को लेकर आवाजे काफी तेजी से उठने लगी हैं और कहीं कहीं ये आवाजें महिलाओं के द्वारा हिंशक रूप भी ले रही हैं. ये आवाजें पिछली सरकार में भी उठाई गयी थी पर शायद सत्ता की हनक में आम आदमी की “एक सामाजिक बुराई के प्रति” आवाज दब कर रह गयी. एक रिपोर्ट के मुताबिक शराब पीकर एक्सीडेंट, मारपीट के मामले उत्तर प्रदेश में पिछले कई सालों से लगातार वृद्धि कर रहे हैं. यह बात भी सही है कि शराब एकदम से राज्य भर में बंद नही की जा सकती पर सरकार एक स्तर पर शुरुआत तो कर ही सकती है. उत्तर प्रदेश से सटा “बिहार” राज्य में जब पिछले वर्ष नीतीश सरकार द्वारा शराब बंदी की गयी तो उत्तर प्रदेश में तत्कालीन सरकार द्वारा शराब के दाम काफी कम कर दिए गये थे. तात्कालिक सरकार की ये स्थिति साफ साफ बयाँ करती है कि कल्याणकारी राज्य का दंभ भरने वाली सरकारों के लिए शराब राजस्व जुटाने का एक अच्छा साधन बन चुकी थी.
राजस्व जुटाने का यह माध्यम लोगों की जाने लील रहा है, आपराधिक गतिविधियों को बढ़ा रह है. शराब तो राजनेताओं की हर जरूरत में शामिल हो चुकी है. चुनाव से लेकर सरकार चलाने तक शराब एक मुख्य साधन बन चुकी है.
संविधान के मुताबिक भी नागरिकों को अच्छा भोजन, आहार मिले ताकि उसका स्वास्थ्य ठीक रहे, ये उस राज्य की जिम्मेदारी है, इसमें शराब दूर दूर तक शामिल नही है. किसी भी धर्म, ग्रन्थ में इसका समर्थन नही किया गया है. फिर भी सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित न होना कहीं न कहीं ये इशारा करता है कि राजस्व जुटाने की होड़ में शराब लोगों के जीवन, उनके घरों को बर्बाद कर दे, इससे उन्हें तनिक भी प्रभाव नही पड़ता.

हालाँकि शराब बंदी से कुछ खास हासिल नही होता है बल्कि अवैध शराब का धंधा तेजी से पसारने लगता है , इसका ताजा उदाहरण बिहार जोकि उत्तर प्रदेश से सटा हुआ है एवं गुजरात जोकि राजस्थान, मध्य प्रदेश से सटा हुआ है. इन दोनों प्रदेशो में शराब पर पाबन्दी होने के बाबजूद पडोसी राज्यों से अवैध रूप से शराब लाकर महेंगे दामों में बेचने पर यहाँ काफी बढ़ोतरी हुई है. शराब बंदी जैसी घोषणा जयराम पेशा लोगों के लिए एक वरदान समान हो जाती है और बंद की स्थिति में इनको होने वाला मुनाफा काफी हद तक बढ़ जाता है. पर कुल मिलाकर सरकार का पहला कदम अपनी प्रजा के जन स्वास्थ्य पड़ने वाला प्रभाव, आपराधिक घटनाएँ है जिन पर शराब बंदी के बाद काफी स्तर तक कमी आ सकती है.

अवैध धंधो की तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी की नजर टेढ़ी होते ही महिलाओं ने भी शराब बंदी का पुरजोर समर्थन , कहीं तोड़फोड़ तो कहीं मारपीट से किया. उन महिलाओं की नजर में यह एक ऐसा जहर है जो पूरे परिवार की खुशियों को उनसे छीन रहा है पर वर्तमान परिदेश्य के मुताबिक अब सरकार को शराब बंदी की अच्छाइयों के प्रति समाज में जागरूकता फ़ैलाने की आवश्यकता है. स्कूल कॉलेजों में कार्यक्रम आयोजित कर इससे होने वाली परेशानियों से अवगत कराने की जरूरत है तभी इस धीमे जहर से कुछ हद तक राहत पाई जा सकती है .
खैर कुल मिलाकर इतना कहा जा सकता है कि शराब बंदी सरकार के लिए इतना आसान भी नही है जितना जनता समझ और सोच रही है लेकिन फिर भी जनता के स्वास्थ्य, जनता के द्वारा शराब के नशे में किये जाने वाले अपराध, के मद्देनजर रखते हुए शराब बंदी “एक वरदान” साबित होगी. अब बस इन्तेजार है योगी सरकार के उन आदेशो का जो कि वर्तमान में “अवैध खानों” के ऊपर लगातार जारी है.

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