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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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एस. गुरूमूर्ति

स्वीडन के पूर्व पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रॉम ने हाल ही अपने इंटरव्यू में फिर से बोफोर्स घोटाले के मुद्दे को गरमा दिया। उन्होंने ही इस सनसनीखेज घूसकांड के साक्ष्य उपलब्ध कराए थे। लिंडस्ट्रॉम ने फिर कुख्यात इतालवी दलाल ओट्टावियो क्वात्रोच्चि का नाम लिया है, जो इस मामले का मुख्य सूत्रधार था। भाजपा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने बिना समय गंवाए संसद में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को घेरते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांग लिया। भाजपा का आरोप है कि क्वात्रोच्चि को इसलिए बचाया गया, क्योंकि वह राजीव गांधी के नजदीकियों में था, लेकिन क्या किसी को भी यह बताने की जरूरत है कि वह राजीव गांधी के निकट इसलिए था, क्योंकि वह सोनिया गांधी का नजदीकी था। सीबीआई ने सोनिया गांधी के परिवार और क्वात्रोच्चि परिवार के बीच असामान्य नजदीकी के टनों साक्ष्य एकत्र कर रखे हैं, जो सप्ताहान्त और वार्षिक छुटि्टयां एक साथ मनाने और एक-दूसरे के बच्चों के एक-दूसरे के घर पर रहने से जुड़े हैं। अब तुरन्त जांच-पड़ताल की जरूरत है कि क्वात्रोच्चि को क्यों बचाया गया, जबकि यह मामला पिछले दो दशक से अधिक समय से लगातार कायम है।

अव्वल तो चंद्रशेखर सरकार ने ही अभियोग को खत्म करने के लिए अपने वकीलों को सीबीआई के खिलाफ दलील देने के संकेत दिए थे, लेकिन सीबीआई अधिकारी के. माधवन, जो इस घूसकांड जांच के अगुआ थे, ने मामले और सरकार की करतूत को अदालत में उजागर कर दिया। मामले को दबाने के प्रयास सफल नहीं हुए और चंद्रशेखर सरकार भी चली गई। इसके बाद प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने 10 जनपथ से राजनीतिक संधि के बदले समझौता करते हुए क्वात्रोच्चि को भारत छोड़ने की इजाजत दे दी। तदन्तर, तत्कालीन विदेश मंत्री माधवसिंह सोलंकी ने भारत सरकार के नाम से स्विस सरकार को फर्जी पत्र लिखने की विफल कोशिश की कि मामले को खारिज कर दिया जाए। 1996-98 के बीच की यूनाइटेड फ्रंट सरकार भी कांगे्रस का छद्म रूप ही थी, इस सरकार ने बोफोर्स मामले में न्याय के लिए कुछ नहीं किया। कांग्रेस के समर्थन खींच लेने से सरकार गिर गई। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 272 सांसदों के समर्थन का दावा किया था और प्रधानमंत्री बनने का जोखिम उठाया था, लेकिन मुलायम सिंह यादव ने उनकी मंशा पर पानी फेर दिया था।

1997 के शुरूआती दिनों में सोनिया गांधी पार्टी अध्यक्ष बन गई। बताया जाता है, तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष सीताराम केसरी टॉयलेट गए हुए थे। सोनिया गांधी के आसानी से चार्ज लेने तक केसरी को टॉयलेट में बंद रखा गया। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने पहला काम क्वात्रोçच्च को क्लीनचिट देने का किया। इतना ही नहीं, उन्होंने भाजपा से क्वात्रोच्चि के खिलाफ सबूत भी मांग डाले! 1998 में वह विपक्ष की नेता बन गईं। कांग्रेस अध्यक्ष से विद्वेष टालने की दिलचस्पी के साथ एनडीए ने भी क्वात्रोच्चि के प्रति नरम रूख रखने को प्राथमिकता दी। सोनिया के साथ एनडीए के रिश्ते तब बेहतर थे। बाद में मामले की लीपापोती को लेकर की जा रही कोशिशों पर सरकारें मौन रहीं। 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह ने इस बात को खेद योग्य बताया कि पिछले एक दशक से अधिक समय से किस तरह रेड कॉर्नर नोटिस क्वात्रोच्चि के पीछे लगा रहा है और इससे विदेश में भारत की छवि को कितना नुकसान पहुंच रहा है! जैसा पूर्वानुमान था, चुनावों के बाद रेड कॉर्नर नोटिस वापस ले लिया गया। अंतिम रूप से क्वात्रोच्चि के खिलाफ मामला वापस ले लिया गया। क्वात्रोच्चि की गिरफ्तारी, हिरासत में पूछताछ और अभियोग चलने का भय खत्म हो गया। नतीजतन, बोफोर्स की कहानी अब भी अनकही है।

वैसे जनता क्वात्रोच्चि के तथ्यों से वाकिफ है। क्वात्रोçच्च ने सितम्बर 1985 में बोफोर्स को भरोसा दिया था कि यदि उसे 3 फीसदी सुविधा शुल्क (अब लगभग 36 मिलियन डॉलर यानी 180 करोड़ रूपए) दिया जाए, तो वह 31 मार्च 1986 से पहले राजीव सरकार से उनेक पक्ष में आपूर्ति के लिए सौदा करा देगा। राजीव गांधी ने 24 मार्च 1986 को बोफोर्स सौदे पर दस्तखत किए। यदि क्वात्रोच्चि की पैठ न होती, तो वह 31 मार्च 1986 से पहले सौदा कराने की गारंटी देने का साहस कैसे कर सकता था। फिर लिंडस्ट्रॉम ने लगातार यह क्यों कहा है – बोफोर्स मामले में एक संदिग्ध के रूप में सोनिया से सूचना लेनी चाहिए। फिर भी कांग्रेस अतिसाहसिकता के साथ लिंडस्ट्राम के ही एक बयान को पकड़े हुए कह रही है कि सौदे में राजीव गांधी के रिश्वत लेने के कोई सबूत नहीं हैं। भाजपा ने भी संसद में रहस्यमय तरीके से सोनिया गांधी को छोड़ दिया और सिर्फ क्वात्रोçच्च को ही निशाना बनाया।

इसके एक दिन बाद खुद भाजपा भी घिर गई। उसके पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक स्टिंग ऑपरेशन में कथित रक्षा सौदे के लिए एक लाख की दलाली लेते दिखाया गया था। कोर्ट ने बंगारू को इस आधार पर दोषी ठहराया कि उन्होंने रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए घूस ली। हालांकि उस प्रभाव का इस्तेमाल नहीं हुआ। बंगारू चाहे कानूनी तरीके से गलत हैं, फिर भी और तहकीकात की जरूरत है। स्टिंग ऑपरेशन ने उन्हें नैतिक तौर पर गलत तो सिद्ध कर ही दिया। उन्हें भाजपा अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा, उनका राजनीतिक जीवन खत्म हो गया, पर क्वात्रोच्चि का क्या हुआ?

अब बंगारू की क्वात्रोçच्च से तुलना करें। क्वात्रोच्चि ने 36 मिलियन डॉलर की राशि तो सुरक्षित कर ली। उसके बैंक खाते में 7.2 मिलियन डॉलर की राशि भी आ गई। दूसरी ओर, बंगारू को एक लाख की रकम नगद दी गई, चार लाख भविष्य में देने का वादा किया गया। अब देखिए, बंगारू बड़े अपराधी हैं या क्वात्रोच्चि? क्वात्रोच्चि को संरक्षण मिला, उसका बचाव किया गया और वह प्रधानमंत्रियों, चंद्रशेखर, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह द्वारा संरक्षित हुआ। क्वात्रोच्चि की तुलना में काफी छोटे अपराधी बंगारू लक्ष्मण के बचाव या संरक्षण के लिए कोई आगे नहीं आया, उनकी बहुत बुरी गत हुई है। फिर भी कांग्रेस शर्मनाक तरीके से संत की तरह भाजपा को आत्मविश्लेषण करने को कहती है और भाजपा रहस्यमय ढंग से कांग्रेस अध्यक्ष के नाम पर चुप्पी साधे बैठी है! (राजस्‍थान पत्रिका से साभार)

2 Responses to “बंगारू बनाम क्‍वात्रोच्चि”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    rajesh kapoor

    धन्य है सोनिया जी की माया. भाजपा पर भी उसकी छाया ? क्या डा. सुब्रमण्यम के इलावा किसी में भी सोनिया का सच उजागर करने का साहस नहीं.

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  2. mahendra gupta

    सब मिली जुली रचना है.इस हमाम में यह सब नंगे हैं,इसलिए किसे क्या दोष देंगे.सोनिया के मित्र होने के कारण उन्हें लाभ नहीं मिलेगा तो क्या आम आरोपित अपराधियों को मिलेगा?अब इन लोगों लो कोई दोष देना फालतू है.

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