बवाल-ए-जमात बनाम मौलाना शाद


अनिल अनूप
कोरोना का पहला केस चीन के वुहान शहर से पिछले साल नवंबर माह में ही सामने आ गया था, इसके बाद यह वायरस अधिक तेजी से चीन से निकलकर दूसरे देशों तक पहुँच गया और इस वायरस को भारत में आने में भी देर नहीं लगी। हालाँकि, इस वायरस के भारत में आने से पहले ही सरकार ने कई तरह की तैयारियाँ और बहुत सी गाइडलाईन देश वासियों के लिए जारी कर दी थीं।
इसका परिणाम मार्च के माह तब दिखाई दिया कि जब देश के सभी बड़े नेताओं ने होली के त्यौहार से दूरी बना ली थी। इन सब के बाद भी दिल्ली के निजामुद्दीन में मजहबी सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। गौर करने वाली बात यह कि दिल्ली में 50 से अधिक लोगों के एकत्र होने की पाबंदी के बाद भी मजहबी सम्मेलन में 2000 से अधिक मुस्लिम देश-विदेश से एकत्र हो जाते हैं।
अब आपको बताते हैं देश भर में फैले जमातियों के खुलासे की शुरूआत कब और कहाँ से होती है। सबसे पहली खबर बिहार के पटना से आती है, जहाँ लोगों ने पटना के कुर्जी इलाके की दीघा मस्जिद में 12 विदेशी मुल्लों (मुल्ला शब्द का प्रयोग मजहबी शिक्षकों को लिए होता है) के होने की सूचना दी। सूचना पर पहुँची पुलिस ने 23 मार्च को हिरासत में लेकर सभी को क्वारंटाइन कर दिया। ये सभी तजाकिस्तान से भारत में इस्लाम का प्रचार करने के लिए आए थे। जानकारी के मुताबिक, ये सभी विदेशी पहले दिल्ली, फिर मुंबई में थे। इसके बाद 4 मार्च को पटना पहुँचे थे।
इसके बाद झारखंड की राजधानी राँची के एक जिले में स्थित मस्जिद से 11 विदेशी मौलवियों को पुलिस प्रशासन ने हिरासत में लिया था। तमाड़ जिले स्थित राड़गाँव मस्जिद में छिपे इन 11 विदेशी मौलवियों में से 3 मौलवी चीन से, जबकि 4-4 किर्गिस्तान और कजाकिस्तान से थे। दरअसल, कोरोना वायरस के लगातार बढ़ते कहर के बाद कुछ स्थानीय लोगों ने इन्हें एक मस्जिद में देखा और शक होने पर पुलिस प्रशासन को जानकारी दी, जिसके बाद पुलिस ने सभी विदेशी मौलवियों के पासपोर्ट को जब्त कर लिया। अब तक राँची के अलग-अलग भाग से 28 विदेशी मुस्लिम पकड़े जा चुके हैं।
इसके बाद मेरठ जिले की कई मस्जिदों से दूसरे प्रदेश या फिर दूसरे देशों के जमातियों को छापेमारी के दौरान हिरासत में लिया, साथ ही सभी को क्वारंटाइन किया। इसके तहत मेरठ के काशी में एक मौलाना के घर से पकड़े गए 14 जमातियों को पुलिस ने हिरासत में लिया, जोकि एक एक मस्जिद से निकलने के बाद एक मौलाना के घर में छिपे हुए थे, जिसमें नेपाल, बिहार, दिल्ली और महाराष्ट्र के निवासी बताए जा रहे हैं।
वहीं पुलिस ने मेरठ के मवाना स्थित बिलाल मस्जिद से 30 मार्च को 10 और सरधना में आजाद नगर स्थित मस्जिद में 9 विदेशी मौलवियों को पकड़ा, जो इंडोनेशिया के रहने वाले थे। इन सभी के कागजात और पासपोर्ट कब्जे में ले लिए गए। ये सभी 17 मार्च से यहाँ रह रहे हैं। पुलिस ने इनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली है। बिलाल मस्जिद में यह जमात 17 मार्च को सूडान और केन्या से आई थी। किसी को पता न चले, इसलिए मस्जिद के बाहर ताला लगा रखा था।
वजीराबाद की जामा मस्जिद में 12 विदेशी नागरिक मौजूद थे। इसको लेकर मस्जिद के मौलवी के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। इसी तरह भरत नगर की मस्जिद से आठ विदेशी मिले हैं। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के 5 मस्जिदों से 48 विदेशी मुस्लिम मिले हैं। बताया जा रहा है कि इन विदेशी नागरिकों ने भी निजामुद्दीन में तबलीगी मरकज के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। छत्तीसगढ़ से भी 100 से ज्यादा लोग जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। राज्य सरकार ने इनकी पहचान कर लिए जाने का दावा किया है। इनमें 32 को क्वारंटाइन और 69 को होम आइसोलेशन में रखा गया है।
बिहार मधुबनी जिले के अंधराठाढ़ी ब्लॉक के गीदड़गंज गाँव की एक मस्जिद में मंगलवार (31 मार्च 2020) को सामूहिक नमाज रुकवाने पहुॅंची पुलिस टीम पर स्थानीय लोगों ने हमला कर दिया। दरअसल, पुलिस को सूचना मिली थी कि 100 से अधिक जमाती मस्जिद में ठहरे हुए हैं। पुलिस कार्रवाई पर स्थानीय लोगों ने पत्थरबाजी और फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। इस दौरान मस्जिद में ठहरे जमाती भाग निकलने में कामयाब हो गए। घटना के बाद से इलाके में तनाव बना हुआ है।
उधर निजामुद्दीन में कानून को ताक पर रख हुए मजहबी सम्मेलन के बाद वहाँ छिपे जमातियों को पुलिस प्रशासन ने 36 घंटे चलाए गए अभियान के बाद पूरी तरह से खाली करा लिया, दिल्ली सरकार के मुताबिक 6 मंजिला इमारत से 2361 लोगों को बाहर निकाला गया है, जिनमें से 617 जमातियों को संदिग्ध अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जबकि शेष सभी को क्वारंटाइन किया गया है।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने द हिंदू को बताया कि दक्षिण दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में तबलीगी जमात के मुख्यालय अलमी मरकज बंग्लेवाली मस्जिद में इस महीने की शुरुआत में देश भर से लगभग 8,000 लोग शामिल हुए थे, जिसमें 16 देशों के इस्लामी प्रचारकों ने हिस्सा लिया था। इनमें से 800 इंडोनेशियाई प्रचारकों को भारत ब्लैकलिस्ट करने जा रहा है, ताकि भविष्य में वे देश में प्रवेश न कर सकें।
वहीं एबीपी की रिपोर्ट के मुताबिक अब तक इनमें से 10 जमातियों की मौत हो चुकी है, जिनमें 6 तेलंगाना, 1 जम्मू-कश्मीर के भी जमाती शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मरकज में शामिल होने वाले 55 मुस्लिम हैदराबाद, 45 कर्नाटक, 15 केरल, 109 महाराष्ट्र, 5 मेघालय, 107 मध्यप्रदेश, 15 ओडिशा, 9 पंजाब, 19 राजस्थान, 46 राँची, 501 तमिलनाडु, 34 उत्तराखंड, 156 उत्तर प्रदेश, 73 पश्चिम बंगाल, 456 असम से थे। इसके साथ ही कार्यक्रम मे 281 विदेशी शामिल हुए थे, जिनमें से 1 जिबूती, 1 किर्गिस्तान, 72 इंडोनेशिया, 71 थाईलैंड और 34 श्रीलंका, 19 बांग्लादेश, 3 इग्लैंड, 1 सिंगापुर, 4 फिजी, 1 फ्रांस, 2 कुवैत के विदेशी मुसलमान थे। (हालाँकि, राज्यवार आँकड़े थोड़े अलग भी हो सकते हैं, क्योंकि अलग-अलग जगहों पर राज्यों से जाने वाले लोगों, और जिनकी पहचान हो गई है, उनकी संख्या में अंतर है। अतः इसे ही अंतिम और सही संख्या न माना जाए।)
अब सवाल खड़ा होता है कि दिल्ली मजहबी सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद ये जो जमाती पूरे देश में फैले इन्होंने जागरूकता के नाते पहले अपनी जाँच क्यों नहीं कराई और जब ये लोग दूर क्षेत्रों की मस्जिदों में पहुँचे या वहाँ रुके भी तो इस दौरान वहाँ के स्थानीय मुसलमानों ने इसके संबंध में पुलिस प्रशासन को क्यों अवगत नहीं कराया?
दरअसल, इसके पीछे की एक बड़ी वजह यह भी है कि जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद से भारत की पाकिस्तान से बातचीत बंद है और इसके चलते पाकिस्तान के जमातियों को भारत आने के लिए वीजा भी नहीं मिल पा रहा है। इसके बाद से भारत में अपना काम करने के लिए पाकिस्तान इन देशों के जमातियों को भारत में भेज रहा है, जिन देशों के जमाती पर्यटन वीजा पर भारत में पकड़े गए हैं।
अब गौर करने वाली बात यह है कि भले ही ये जमाती इस्लाम का प्रचार करने का दावा करते हों, लेकिन हकीकत तो यह है कि ये लोग धर्मांतरण और मजहब के नाम पर कट्टरता पैदा करने के लिए मस्जिदों में शरण लेते हुए घूमते हैं। जानकारी के मुताबिक पाकिस्तान की जमात सबसे ज्यादा कट्टर और मजबूत है, बताया तो यह भी जाता है कि भले ही पाकिस्तान भुखमरी के कगार पर हो, लेकिन यहाँ के जमातियों के पास भरपूर पैसा है।
सवाल यह भी है कि यह लोग आखिर चाहते क्या हैं? क्योंकि देश के कोने-कोने में स्थित मस्जिदों या मौलानाओं के घर में छिपे इन जमातियों के बारे में स्थानीय मुसलमान आखिर चेतावनी के बाद भी पुलिस प्रशासन को क्यों नहीं बता रहा और यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश की मस्जिदों में हो रही लगातार छापेमारी के बाद से तो मुसलमानों ने जमातियों को घरों में छिपाना शुरू कर दिया है।
गौर करने वाली बात यह कि ये लोग वाकई में कोरोना जैसी बीमारी से अनजान हैं या फिर कि इनके अंदर भरी गई कट्टरता का ही यह परिणाम है कि अल्लाह के घर में (मस्जिद) कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता, क्योंकि मुसलमानों में जमाती मजहब के प्रति सबसे कट्टर मुसलमान माना जाता है। मरकज़ के मौलवी साद की बात मानें तो उसने तो साफ कह दिया कि बीमारी में मस्जिद आना चाहिए, कोरोना से अगर अल्लाह के फरिश्ते नहीं बचा सकते तो डॉक्टर कैसे बचा लेगा, ये इस्लाम और मुसलमानों के खिलाफ एक साजिश है, ये प्रोग्राम बनाया गया है।
एक तरफ व्यक्ति को लक्षण आते ही वह तुरंत अस्पताल या फिर डॉक्टर के पास जा रहा है और दूसरी ओर ऐसे जमाती मुस्लिम जानबूझकर पूरे देश के कोने-कोने में फैल रहे हैं और अधिक से अधिक लोगों से मिलने की कोशिश भी कर रहे हैं। इसका जवाब शायद आपको यहाँ मिल जाए कि हाल ही में फ्रांस ने अपने देश में विदेशी इमामों के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया था। साथ ही फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा था कि इस निर्णय के बाद देश में आतंकी घटनाओं में कमी आएगी।
मौलाना शाद कौन हैं

कोरोना वायरस से पूरा देश जहां एक तरफ एकजुट होकर जंग लड़ रहा है। वहीं देश में बैठे कुछ लोग इस पर राजनीति कर रहे हैं और लोगों को भड़काने का काम कर रहे हैं है।
जिस तरह से कोरोना वायरस फ़ैलाने में दिल्ली के तबलीगी जमात का नाम सामने आया है। वो एक चिंता की बात है लेकिन उससे भी ज्यादा हैरान कर देने वाली बात उसके मुखिया मौलाना साद का वायरल हो रहा एक आडियो क्लिप हैं, जिसमें वे लोगों से कहते सुनाई देते हैं कि ये ख्याल बेकार है कि मस्जिद में जमा होने से बीमारी पैदा होगी, मैं कहता हूं कि अगर तुम्हें यह दिखे भी कि मस्जिद में आने से आदमी मर जाएगा तो इससे बेहतर मरने की जगह कोई और नहीं हो सकती। आइये आपको बताते हैं आखिर कौन हैं मौलाना साद और आखिर में वे अचानक से चर्चा में क्यों बने हुए है।
मौलाना साद का पूरा नाम मौलाना मुहम्मद साद कंधलावी है। वह भारतीय उपमहाद्वीप में सुन्नी मुसलमानों के सबसे बड़े संगठन तबलीगी जमात के संस्थापक मुहम्मद इलियास कंधलावी के पड़पोते हैं।
विवादों से पुराना नातामौलाना साद का जन्म 10 मई 1965 को दिल्ली में हुआ। साद ने हजरत निजामुद्दीन मरकज के मदरसा काशिफुल उलूम से 1987 में आलिम की डिग्री ली। मौलाना साद का विवादों से पुराना नाता है। जब उन्होंने खुद को तबलीगी जमात का एकछत्र अमीर घोषित कर दिया तो जमात के वरिष्ठ धर्म गुरुओं ने उनका जबर्दस्त विरोध किया।
हालांकि, मौलाना पर इसका कोई असर नहीं पड़ा और सारे बुजुर्ग धर्म गुरुओं ने अपना रास्ता अलग कर लिया। बाद में साद का एक ऑडियो क्लिप भी शामिल हुआ जिसमें वह कहते सुने गए, ‘मैं ही अमीर हूं… सबका अमीर… अगर आप नहीं मानते तो भांड़ में जाइए।’
मौलाना साद पहले भी विवादों में फंस चुके हैंतब्लीगी जमात प्रमुख मौलाना साद लॉकडाउन के उल्लंघन के कारण विवादों में फंस गये हैं। ये पहली बार नहीं है जब मौलाना साद विवादों में आए हैं। इससे पहले भी उनके खिलाफ दारुल उलूम देवबंद से फतवा जारी हो चुका है।
1965 में दिल्ली में जन्मे मौलाना की पहचान मुस्लिम धर्मगुरु के तौर पर होती है। उनका पारिवारिक संबंध तब्लीगी जमात के संस्थापक मौलान इलियास कांधलवी से जुड़ता है।
साद ने अपनी पढ़ाई 1987 में मदरसा कशफुल उलूम, हजरत निजामुद्दीन और सहारनपुर से पूरी की। 1990 में उनकी शादी सहारनपुर के मजाहिर उलूम के प्रिसिंपल की बेटी से हुई।
तब्लीगी जमात के पहले अमीर (अध्यक्ष) मौलाना इलियास थे। उनके निधन के बाद उनके बेटे मौलाना यूसुफ को इसका अमीर बनाया गया है। मौलाना यूसुफ के अचानक निधन के बाद मौलाना इनामुल हसन को इसका अमीर बनाया गया।
मौलाना इमानुल हसन 1965 से 1995 तक इसके अमीर रहे। उनके तीस साल के कार्यकाल में जमात का फैलाव दुनियाभर में हुआ। 1995 में उनके निधन के बाद जमात में विवाद छिड़ गया और किसी को भी अमीर नहीं बनाया गया।
बल्कि चंद लोगों की कमेटी बना दी गई। बीते 25 साल में उस कमेटी के ज्यादातर सदस्य की मौत हो गई और उसमें मौलाना साद अकेले जिंदा हैं। ऐसे में मौलाना साद ने खुद को जमात का अमीर घोषित कर रखा है, हालांकि, इसे लेकर काफी विवाद भी हुआ. दो साल पहले निजामुद्दीन में झगड़े भी हुए।
मुस्लिम समाज में उपदेशक के तौर पर पहचानइन सब विवाद के बीच मुस्लिम समाज में मौलाना साद के उपदेश काफी धार्मिक महत्व के होते हैं जिनको बड़ी संख्या में लोग सुनते हैं। मौलाना साद की देखरेख में तब्लीगी जमात के कई आलीमी जलसे का आयोजन हुआ।
25 फरवरी 2018 को ‘डॉन’ ने तब्लीगी जमात के दो गुटों में मतभेद पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जिसमें मौलाना साद पर विद्वानों को अपमानित करने का आरोप लगाया गया।
साथ ही ये भी बताया कि इस्लाम धर्म की गलत व्याख्या के चलते दारुल उलूम देवबंद मौलाना के खिलाफ फतवा जारी कर चुका है। हालांकि उनके समर्थकों का दावा है कि मौलाना साद कुरान और हदीस के हवाले से ही कोई बात कहते हैं।

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