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    Homeसाहित्‍यकवितामंदिर बनाने के पहले दिल से राम बन जाना

    मंदिर बनाने के पहले दिल से राम बन जाना

    —–विनय कुमार विनायक
    लाशों की ढेर पर
    मंदिर बनाने के पहले अच्छा है हमें
    दिल-दिमाग से राम बन जाना
    बन जाओ आज्ञाकारी पुत्र
    राम सा कि माता का आदेश है!

    बन जाओ निस्पृह-त्यागी
    राम सा कि पिता की इच्छा है!

    छोड़ दो सिंहासन सुख
    कि लघु जनों को मिले अवसर!
    बनो ऐसा मर्यादावादी राम सा
    कि बची रहे सबकी मर्यादा!

    कि तुम्हारी ब्याहता
    तुम्हारे विश्वास पर
    अग्नि में कूदकर भी ना जले!

    कि तुम्हारी बहन
    भाई शब्द उच्चार कर
    बहशी दरिंदों से बच निकले!

    कि त्यागी बनो ऐसा
    कि तुम दबे-कुचले जन की
    समझने लगो जुबान की भाषा!

    जन आस्था की रक्षा में
    त्याग करो सर्वस्व जीवन-धन
    सत्य हरिश्चन्द्र वंशी राम बनकर!

    कि लाशों की ढेर पर मंदिर
    बनाने के पहले अच्छा है
    हमें दिल-दिमाग से राम बन जाना!

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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