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    बेफिक्र रहें, लापरवाह ना बनें

    मनोज कुमार

    70 साल गुजर जाने के बाद देश में यह पहला अवसर है जिसे हम उत्सव की तरह मना रहे हैं. उत्सव का अवसर है कोरोना के विदाई के टीके का स्वागत. स्नेहिल स्वागत. ऐसा स्वागत जो पहले कभी किसी इंजेक्शन के लगाने के लिए ना हुआ हो. गर याद हो तो बचपन क्या छप्पन की उम्र में भी टीका लगवाने में आंसू निकल आते हैं. इस बार भी नैनों से आंसू छलके हैं लेकिन ये आंसू खुशी के आंसू हैं. मौत जब दस्तक दे रही हो. और उम्मीद की किवाड़ बंद होने का अहसास हो और तभी चुपके से जिंदगी दस्तक देने लगे तब सारे सवाल बेमानी हो जाते हैं. बेकार हो जाते हैं. दुनिया में पहली बार कोरोना की विदाई के टीके हिन्दुस्तान की गांव-गलियों से शहरों के मोहल्लों में लगने की शुरूआत हो चुकी है. हर कोई इस टीके को लेकर उत्साहित है. कहीं थोड़ा भय है तो कहीं झिझक लेकिन मौत की शर्त के सामने सारे तर्क बेमानी साबित हो रहे हैं. यकीन दिलाने के लिए लाखों लोग आगे आकर टीका लगा रहे हैं. बता रहे हैं कि संदेह की दीवार को लांघ लो और कोरोना की विदाई का टीका लगवा लो.

    उम्मीद का टीका है जो भरोसा उपजाता है. भीतर बैठे डर को खत्म करने के लिए टीका आ चुका है. इसका स्वागत किया जाना चाहिए. कब सांस टूट जाए, इसका अंदेशा खत्म होने के लिए टीका आ चुका है. जिंदगी के प्रति यह आश्वस्ति है. निश्चित रूप से करीब करीब साल भर से जिंदगी जहां ठहर गयी थी, उससे आगे चलने के लिए एक रास्ता प्रशस्त हुआ है. अब जिंदगी वापस पटरी पर लौटेगी. समाज में पहले की तरह रौनक होगी. स्कूल और कॉलेज पहले की तरह थोड़े दिनों के अंतराल में पुराने ढर्रे पर लौट आएंगे. इन बच्चों के आने से जीवन में वेग आ जाता है. बाजार अभी खुले हैं लेकिन रौनक नहीं है. वेक्सीनेशन के बाद बाजार भी गुलजार हो जाएगा. रेलगाडिय़ां पटरी पर दुगुने गति से दौडऩे के लिए तैयार है. अस्पतालों से घर वापसी का सिलसिला बढ़ जाएगा. अब कोई वापस अस्पताल जाएगा, इसकी आशंका कम हो जाएगी. सिनेमा हॉल मनोरंजन के लिए शुरू हो गए हैं लेकिन पूरी शिद्दत के साथ अभी शुरू होना बाकि है. टीका से जिंदगी की टिकटिक शुरू हो जाएगी और किटकिट खत्म होने के आसार बढ़ रहे हैं.

    बीते बरस लगभग पूरा साल दुआ ही दवा बन गई थी. जाने कितने लोगों ने अपने और अपनों को गंवा दिया. रोज सुबह अखबार के पन्ने पलटने में शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती थी कि जाने क्या पढऩे को मिले. टेलीविजन से भी दर्शक मुंह मोडऩे लगे थे. चिंता और परेशानी जैसे जीवन का हिस्सा बन गई थी. यह पहला मौका रहा होगा जब अखबार के पन्ने पलटते और टेलीविजन को देखते हुए हम मौत के आंकड़ें गिन रहे थे. जिंदगी जैसे बेरहम हो चली थी. तंत्र भी इस बीमारी से लडऩे और लोगों की सुरक्षा करने में जुट गया था. देश भर में इस कोरोना से जूझते लोगों के साथ पुलिस का दोस्ताना व्यवहार था. खुद की जान की परवाह किए बिना लोगों की जान बचाते कई जवान अपनी जान गंवा बैठे. इस संकट के समय में डॉक्टरों ने जो हौसला दिया. जो मेहनत की, उसका कर्ज समाज पर जीवन भर रहेगा. आपस में दुख बांटने का जो एक अनुभव इस आपदा ने लोगों को दिया, वह अपनेपन का था. जैसे पूरा समाज एक-दूसरे की चिंता में खो गया था. 
    
    एक बड़ा कठिन समय अभी खत्म तो नहीं हुआ है लेकिन राहत की ओर हम सब बढ़ रहे हैं. कोरोना की विदाई का टीका लगवाकर हम बेफ्रिक हो सकते हैं और होना भी चाहिए लेकिन लापरवाह कतई नहीं. आने वाला समय कैसा होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. वैक्सीनेशन बचाव का एक जरिया है लेकिन दूसरों की जान की सलामती के लिए हम सबका सर्तक रहना समय की मांग है. हमारी थोड़ी सी भी लापरवाही जानलेवा हो सकती है. किसी किस्म की लापरवाही से पहले हमें उस कू्रर समय का स्मरण कर लेना चाहिए जब हर किसी के चेहरे पर दहशत थी. सरकार अपना काम कर रही थी. स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की लेकिन सावधानी हमें बरतनी थी. घर से बाहर निकलते ही पहले भी मुंह और नाक मास्क से ढके रहने की हिदायत दी गई है तो अभी भी यही अपेक्षा है कि मास्क का उपयोग अपने जीवन का हिस्सा बना लें. घर से बाहर हों तो साथ में सेनेटाइजर लेकर चलें और समय-समय पर इसका उपयोग करते रहें. घर पर हैं तो घंटे-दो घंटे के अंतराल में साबुन से हाथ धोते रहे. शारीरिक दूरी बनाये रखने की हमारी पुरानी परम्परा है जिसे इस बीमारी ने जिंदा कर दिया है. अब हम अपनी पुरानी परम्परा को जीते रहें और निरोगी जीवन की ओर बढ़ें. 

    किसी के पास इस बात का जवाब नहीं है कि कोरोना हमार पीछा कब छोड़ेगा या छोड़ेगा या नहीं. कोरोना के दूसरे बिगड़े चेहरे की आमद की सूचना हमारे भय को और बढ़ा देती है. अब ज्यादा और ज्यादा सम्हलने की जरूरत है. अभी हम आप सम्हल गए तो आने वाली पीढ़ी सुरक्षित और सेहतमंद हो जाएगी. यह कितना कठिन समय था कि हम निगेटिव होकर स्वस्थ्य थे और पॉजिटिव होकर बीमार. कोरोना के आने के साथ बीते सौ सालों में ऐसी महामारी के आने की खबरों में इजाफा हुआ. दुनिया सुंदर है, इसे सुंदर ही बने रहने दें. बीती बातों में उन खूबसूरत पलों को याद करें और आने वाले दिन को बेहद खुश्रुमा बनाएं. कोरोना के दौरान जो कुछ बुरा हुआ, वह इतिहास के पन्ने में दफन हो जाएगा लेकिन इस संकट में जो मानवीयता के साथ काम हुए, उसे जरूर अपनी नयी पीढ़ी के साथ बांटें. यह अनुभव समाज में शुचिता का संदेश देगा. आपस में हो रही दूरियां और मनमुटाव को खत्म करेगा. ऐसी पॉजिटिव खबरें इस बात का सबब बनेगी कि जिंदगी सचमुच में खूबसूरत है और रहेगी. हां, इस बात को जरूर याद रखें कि हम बेफ्रिक हो जाएं टीका लगवाकर लेकिन लापरवाह ना हो जाएं टीका लगवाकर.

    मनोज कुमार
    मनोज कुमार
    सन् उन्नीस सौ पैंसठ के अक्टूबर माह की सात तारीख को छत्तीसगढ़ के रायपुर में जन्म। शिक्षा रायपुर में। वर्ष 1981 में पत्रकारिता का आरंभ देशबन्धु से जहां वर्ष 1994 तक बने रहे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समवेत शिखर मंे सहायक संपादक 1996 तक। इसके बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य। वर्ष 2005-06 में मध्यप्रदेश शासन के वन्या प्रकाशन में बच्चों की मासिक पत्रिका समझ झरोखा में मानसेवी संपादक, यहीं देश के पहले जनजातीय समुदाय पर एकाग्र पाक्षिक आलेख सेवा वन्या संदर्भ का संयोजन। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रकारिता विवि वर्धा के साथ ही अनेक स्थानों पर लगातार अतिथि व्याख्यान। पत्रकारिता में साक्षात्कार विधा पर साक्षात्कार शीर्षक से पहली किताब मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 1995 में पहला संस्करण एवं 2006 में द्वितीय संस्करण। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता शोध परियोजना के अन्तर्गत फेलोशिप और बाद मे पुस्तकाकार में प्रकाशन। हॉल ही में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा संचालित आठ सामुदायिक रेडियो के राज्य समन्यक पद से मुक्त.

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