त्याग, बलिदान, परमार्थ और पराक्रम की अनूठी परंपरा और खालसा-पंथ

जब राष्ट्राकाश गहन अंधकार से आच्छादित था, विदेशी आक्रांताओं एवं आतताइयों द्वारा निरंतर पदाक्रांत किए जाने के कारण संस्कृति-सूर्य का सनातन प्रकाश कुछ मद्धिम-सा हो चला था, अराष्ट्रीय-आक्रामक शक्तियों के प्रतिकार और प्रतिरोध की प्रवृत्तियाँ कुछ क्षीण-सी हो चली थी, जब पूरी दुनिया में धर्म और संस्कृति, उदारता और विश्व-बंधुत्व का गौरव-ध्वज फ़हराने वाले महान भारतवर्ष का पहली बार किसी क्रूर एवं बर्बर सुलतान से सीधे तौर पर  पाला पड़ा था, जब दिल्ली की तख़्त पर बैठा एक मज़हबी सुलतान पूरे देश को एक ही रंग में रंगने की ज़िद्द और जुनून पाले बैठा था, जब कतिपय अपवादों को छोड़कर शेष भारत ने उस अन्याय-अत्याचार को ही अपना भाग्य मान स्वीकार करना प्रारंभ कर दिया था, जब साहस और संघर्ष की गौरवशाली सनातनी परंपरा का परित्याग कर समाज के अधिसंख्य जनों ने भीरूता और पलायन-वृत्ति का सुरक्षित किंतु कायरतापूर्ण मार्ग ढूँढना प्रारंभ कर दिया था, तब ऐसे अँधेरे वक्त में राष्ट्रीय क्षतिज पर एक तेजस्वी-दैदीप्यमान व्यक्तित्व का उदय हुआ, जिसके तेज़ एवं ओज, त्याग एवं बलिदान, साहस एवं पराक्रम ने मुग़लिया सल्तनत की चूलें हिला कर रख दीं। जिसने ऐसी अनूठी परंपरा की नींव रखी, जिसकी मिसाल विश्व-इतिहास में ढूँढें नहीं मिलती। जिन्हें हम सब सिखों के दसवें गुरु- गुरु गोबिंद सिंह जी, दशमेश गुरु, कलगीधर, बाजांवाले, सरबंसदानी आदि नामों, उपनामों और उपाधियों से जानते-मानते और श्रद्धा से उनके श्रीचरणों में शीश नवाते हैं।
गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा स्थापित खालसा पंथ और उनकी बलिदानी परंपरा के महात्म्य को समझने के लिए हमें तत्कालीन धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि और परिस्थितियों पर विचार करना होगा। औरंगज़ेब के शासनकाल में समस्त भारतवर्ष में हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ने लगे। जम्मू-कश्मीर तथा पंजाब में यह अत्याचार बर्बरता और पाशविकता की भी सीमाएँ लाँघने लगा। विधर्मी शासकों  के अत्याचारों से पीड़ित कश्मीरी पंडितों का एक समूह गुरु तेग बहादुर साहब के दरबार में यह फ़रियाद लेकर पहुँचा कि उनके सामने यह शर्त रखी गई है कि यदि कोई महापुरुष इस्लाम न स्वीकार करके अपना बलिदान दे तो उन सबका बलात धर्म परिवर्तन नहीं किया जाएगा। उस समय नौ वर्ष की अल्प आयु में गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने पिता से कहा कि ‘आपसे बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है!’  उन कश्मीरी पंडितों को ज़ुनूनी एवं मज़हबी इस्लामी शासक औरंगज़ेब की क्रूरता एवं कहर से बचाने के लिए गुरु तेग बहादुर ने 11नवंबर 1675 को सहर्ष अपना बलिदान दे दिया। कदाचित उस सनकी शासक को यह लगता हो कि दिल्ली के चाँदनी चौक पर सार्वजनिक रूप से गुरु तेगबहादुर का सर क़लम करवाने के बाद मुगल साम्राज्य द्वारा चलाए जा रहे इस्लामिक अभियान को गति मिलेगी और प्रतिरोध के लिए कोई सम्मुख आने का साहस नहीं दिखाएगा। गुरु साहब के बलिदान के बाद उसी दिन गुरु गोबिंद सिंह जी सिखों के दसवें गुरु नियुक्त किए गए।
राष्ट्र के सांस्कृतिक उत्थान की दृष्टि से गुरु गोबिंद सिंह जी ने 30 मार्च, 1699 को बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में लगभग 80000 गुरुभक्तों के समागम में पाँच शिष्यों के शीश माँगें तो वहाँ उपस्थित भक्तों का समूह सन्न रह गया। पूरे वातावरण में सन्नाटा पसर गया। ऐसे शून्य वातावरण में लाहौर का खत्री युवक दयाराम खड़ा हो गया। गुरु जी उसका हाथ पकड़कर पीछे तंबू में ले गए। थोड़ी देर बाद गुरु जी ख़ून से लथपथ शमशीर लेकर पुनः संगत को संबोधित करते हुए बोले- ‘और शीश चाहिए।’ अब हस्तिनापुर का जाट धर्मदास शीश झुककर बोला ‘यह शीश आपका है।’  पुनः गुरु जी की वही पुकार, इस बार उनके आह्वान पर द्वारका(गुजरात) के छीपा समाज का मोहकम सिंह खड़ा हुआ, फिर बिदर (कर्नाटक) का नाई युवक साहिब चंद और सबसे अंत में  जगन्नाथपुरी का झीवर हिम्मतसिंह खड़ा हुआ। सभी पाँचों संगत को अंदर ले जाकर गुरु जी कुछ देर बाहर न आए। संगत के हर्ष एवं आश्चर्य का उस समय कोई ठिकाना न रहा, जब गुरुजी पाँचों सिखों को पूर्ण सिंह वेश शस्त्रधारी और सजे दस्तारों (पगड़ियों) के साथ बाहर लेकर आए और घोषणा की कि यही मेरे पंज प्यारे हैं। इनकी प्रतीकात्मक बलि लेकर गुरु जी ने एक नए खालसा पंथ की नींव रखी। उन्होंने खालसा पंथ को एक नया सूत्र दिया, ”वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फ़तेह।” उन्होंने खालसाओं को ‘सिंह’ का नया उपनाम देते हुए युद्ध की प्रत्येक स्थिति में तत्पर रहने हेतु पाँच चिह्न- केश, कड़ा, कृपाण, कंघा और कच्छा धारण करना अनिवार्य घोषित किया। खालसा यानी जो मन, कर्म और वचन से शुद्ध हो और जो समाज के प्रति समर्पण का भाव रखता हो। दरअसल गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की सिरजना कर एक ऐसे वर्ग को तैयार किया जो सदैव समाज एवं राष्ट्रहित के लिए सर्वास्वार्पन को तत्पर रहे। अमृत के चंद छीटों से उन्होंने मानव-मन में ऐसी प्रेरणा भर दी कि उसमें से विद्वान, योद्धा, शूरवीर, धर्मात्मा, सेवक और संत आगे आए। उन्होंने वर्ग-हीन, वर्ण-हीन, जाति-हीन व्यवस्था की रचना कर एक महान धार्मिक एवं सामाजिक  क्रांति को मूर्त्तता प्रदान की।
प्राणार्पण से पीछे न हटने वाले वीरों के बल पर ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवनकाल में मुगलों के विरुद्ध पाँच प्रमुख युद्ध लड़े- सन 1689 में हिमाचल क्षेत्र के पर्वतीय राजा भीमचंद के विरुद्ध भंगारी का युद्ध, सन 1690 में राजा भीमचंद के अनुरोध पर मुग़लों के विरुद्ध नादौन का युद्ध, सन 1700 में मुगलों और पर्वतीय राजाओं की संयुक्त सेना के विरुद्ध आनंदपुर साहिब का युद्ध, सन 1703 में केवल 40 सिख योद्धाओं के साथ मुगल सेना के विरुद्ध प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक ‘चमकौर का युद्ध’ और सन 1704 में महत्त्वपूर्ण एवं अंतिम मुक्तसर का युद्ध। ‘चमकौर’ का युद्ध तो गुरु जी के अद्वितीय रणकौशल और सिख वीरों की अप्रतिम वीरता एवं धर्म के प्रति अटूट आस्था के लिए जाना जाता है। इस युद्ध में वज़ीर खान के नेतृत्व में लड़ रही दस लाख मुग़ल सेना के केवल 40 सिख वीरों ने छक्के छुड़ा दिए थे। वज़ीर खान गुरु गोबिंद सिंह जी को ज़िंदा या मुर्दा पकड़ने का इरादा लेकर आया था, पर सिख वीरों ने अपराजेय वीरता का परिचय देते हुए उसके इन मंसूबों पर पानी फेर दिया। मुगल आक्रांता औरगंजेब की सेना को धूल चटाकर गुरु जी ने- ‘चिडियन से मैं बाज तड़ाऊँ, सवा लाख से एक लड़ाऊँ, तब गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ” उक्ति को सचमुच चरितार्थ कर दिखाया। इस युद्ध में गुरु जी के दोनों साहिबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह 40 सिंह सैनिक भी शहीद हो गए। 27 दिसंबर सन 1704 को उनके दोनों छोटे साहिबज़ादों जोरावर सिंह जी और फ़तेह सिंह जी को भी सनकी सल्तनत ने ज़िंदा दीवारों में चिनबा दिया। दो पठानों द्वारा धोखे से किए गए घातक वार के कारण 7 अक्तूबर, 1708 को गुरु जी भी नांदेड़ साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हुए। गुरु जी महाप्रयाण से पूर्व ऐसी गौरवशाली परंपरा छोड़ गए जो आज भी राष्ट्र की धमनियों में ऊर्जादायी लहू बन दौड़ता है।
ऐसी महान परंपराओं का अनुगामी, श्रद्धाभिमुख समाज उन उत्तेजक, अलगाववादी, देश-विरोधी स्वरों को भली-भाँति पहचानता है जो उन्हें दिग्भ्रमित या इस महान विरासत से विमुख करने का षड्यंत्र रचते रहते हैं। ऐसी कुचक्री-षड्यंत्रकारी ताक़तें तब तक अपने मंसूबों में क़ामयाब न होने पाएगी जब तक गुरुओं की इस बलिदानी परंपरा की पावन स्मृतियाँ उनके सभी अनुयायियों और समस्त देशवासियों के हृदय में स्थित और जीवित हैं। 

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