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ललित गर्ग

ललित गर्ग

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ललित गर्ग –
संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने ‘2017 में वैश्विक रोजगार एवं सामाजिक दृष्टिकोण’ पर हाल ही में अपनी रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट के अनुसार रोजगार की जरूरतों के कारण आर्थिक विकास पिछड़ता प्रतीत हो रहा है और इसमें पूरे 2017 के दौरान बेरोजगारी बढ़ने तथा सामाजिक असामनता की स्थिति के और बिगड़ने की आशंका जताई गई है। इस रिपोर्ट में दुनिया में अशांति की संभावनाओं को उजागर किया गया है और इसका मूल कारण बढ़ती बेरोजगारी, असमानता और अच्छी नौकरियों की कमी को माना है। विशेषतः दुनिया की युवापीढ़ी के जीवन में जबर्दस्त उथल-पुथल होने वाली है, उनका जीवन भयावह एवं त्रासद बन सकता है। नीति बनाने वाले लोग और सरकारें चलाने वाले अगर इस समस्या के समाधान की दिशा में यदि सक्रिय नहीं होंगे मामला ज्यादा बिगड़ सकता है। बेरोजगारी और असमानता का एक बड़ा कारण दुनिया के लगभग सभी देशों में व्याप्त राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता है। रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा दिक्कत अरब और अफ्रीकी देशों को उठानी पड़ेगी, जहां पहले से ही अशांति का माहौल है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक बेरोजगार और अपनी मौजूदा नौकरियों से असंतुष्ट लोग बड़ी संख्या में माइग्रेशन के लिए तैयार हैं। पिछली मंदी से बेरोजगार हुए लोगों को ही अभी सिस्टम में ठीक से वापसी नहीं हो पाई है, फिर नए लोगों को मनमाफिक रोजगार कहां से मिलेंगे, रिपोर्ट कहती है कि पिछले चार दशक में सबसे ज्यादा अशांति पिछले दो सालों में बढ़ी है। इस रिपोर्ट के पहले वल्र्ड इकनॉमिक फोरम भी कह चुका है कि 2017 में दुनियाभर में लोगों की आय में असमानता बढ़ने जा रही है, जिसकी वजह से समाज का ध्रूवीकरण और तेज होगा। इसका एक कनेक्शन ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से अलग होने और अमेरिका में हुई डॉनल्ड ट्रंप की प्रेसिडेंसी से भी जोड़ा जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक जो लोग फिलहाल स्थिर जीवन जी रहे हैं, उनके मन में भी दुनिया में व्याप्त अस्थिरता से एक भय घर कर गया है, जिसका समय से समाधान जरूरी है। भारत भी इन बदलावों से अछूता नहीं है।
युवा यानी ऊर्जा से लबरेज शख्स, जो छोटी-छोटी बातों पर उत्तेजित होता है, मित्र के सम्मान से ईष्र्या करता है, समाज से क्षणिक प्रतिष्ठा की मांग करता है। और जब न्याय की जिद करता है, तो अंतिम सांस तक उसे पाने के लिए संघर्ष करता है। ऐसे ही युवाओं की भीड़ जब कैरो के सेंट्रल तहरीर चैक पर इकट्ठी हुई, तो इजिप्ट से होस्नी मुबारक की 30 वर्ष पुरानी सत्ता उखड़ गई। अव्यवस्था के खिलाफ टयूनिशिया से बही इस बयार ने लीबिया समेत मिडिल ईस्ट के कई देशों में सत्ता परिवर्तन का अभियान शुरू करा दिया। इन देशांे के युवा करप्शन के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे।
इन आंदोलनों ने भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को भी सबक दिया है, जहां की 50 फीसदी आबादी (15 से 35 वर्ष) युवा है। और इसी युवा शक्ति के भरोसे हम गाहे-बगाहे विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की दावेदारी करते हैं। जंतर-मंतर पर शुरू हुए अन्ना हजारे के अनशन के पीछे तेजी से उमड़ी इस युवा भीड़ ने सरकार को तुरंत घुटने टेकने पर मजबूर किया था। मगर यह सिक्के का एक सुनहरा पहलू है। इसके दूसरे हिस्से में जिंदगी की समस्याओं से परेशान युवाओं की भी एक बड़ी फौज खड़ी दिखाई देती है। आने वाले 20 वर्षों में जब यहां युवाओं की तादाद में करीब 24 करोड़ का इजाफा होगा, तब समाज और सरकार के पास उसे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और मौलिक अधिकार देने की चुनौती बहुत बड़ी होगी।
आज भारत में करीब 67.2 प्रतिशत बेरोजगार हैं। सरकारी दफ्तरों और मल्टी नेशनल कंपनियों में उनके लिए रोजगार नहीं है। दरअसल, नौकरी देने वाली संस्थाओं और सरकारी मानकों के अनुरूप शिक्षित नहीं होने के कारण एंप्लायर उन्हें नौकरी के लायक नहीं मानते। यही कारण है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को कौशल विकास पर बल देना पड़ा है। छात्र संगठनों एवं युवापीढ़ी ने समाज के लिए कोई रचनात्मक भूमिका नहीं निभाई, उनसे जुड़े युवा बस राजनीतिक दलों के मोहरे बनते रहे। इसी कारण युवापीढ़ी गुमराह होती रही है और भटकाव की शिकार बनी है। यह समझना होगा कि आज कश्मीर में पत्थर फेंकने वाले और नाॅर्थ ईस्ट में हथियार उठाने वाले अधिकांश हाथ युवाओं के ही हैं। मणिपुर, नागालैंड, असम और मेघालय में युवाओं के बीच आईवी ड्रग्स के सबसे बड़े खरीददार युवक और युवतियां हैं। नशे की तस्करी के कारण म्यांमार का बाॅर्डर गोल्डन टैंªगल बन चुका है। यूनीसेफ की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार यहां ज्यादातर युवा बदलती हुए आर्थिक परिदृश्य अपनी जगह नहीं तलाश पाने के कारण डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं।
वर्ष 2011-12 में, जब दुनिया मंदी से उबरने की प्रक्रिया में थी, तब भारत समेत कई देशों में जबर्दस्त उथल-पुथल देखी जा रही थी। तब ऐसा माना जा रहा था कि समय बीतने के साथ चीजें नॉर्मल होती जाएंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इससे पहले कि दुनिया को बेहतर बनाने की तरफ बढ़ा जाता, खासकर पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में, मामला दूसरी तरफ बढ़ गया और वहां लोकतंत्र की गुंजाइश पहले से भी कम हो गई। एक तरफ दुनिया में अच्छा जीवन जीने की जगहें कम होती जा रही हैं और इन स्थितियों की सबसे ज्यादा शिकार युवापीढ़ी हो रही है। इनमें कहा गया है कि बेरोजगारों में 10वीं या 12वीं तक पढ़े युवाओं की तादाद 15 फीसदी है. यह तादाद लगभग 2.70 करोड़ है. तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले 16 फीसदी युवा भी बेरोजागारों की कतार में हैं। इससे साफ है कि देश के तकनीकी संस्थानों और उद्योग जगत में और बेहतर तालमेल जरूरी है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बेरोजगार युवाओं की तेजी से बढ़ती तादाद देश के लिए खतरे की घंटी है और नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार को तुरंत इस मुद्दे पर ध्यान देना चाहिए। भारी तादाद में रोजगार देने वाले उद्योग नई नौकरियां पैदा करने में नाकाम रहे हैं। इसी से यह हालत पैदा हुई है। अर्थशास्त्री प्रोफेसर डीके भट्टाचार्य कहते हैं, ‘बेरोजगारों को नई सरकार से काफी उम्मीदें हैं। इस समस्या के समाधान के लिए कौशल विकास और लघु उद्योगों को बढ़ावा देना जरूरी है। वे कहते हैं कि युवाओं को नौकरी के लायक बनाने के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग के जरिये कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उद्योगों व तकनीकी संस्थानों में बेहतर तालमेल जरूरी है. विशेषज्ञों का कहना है कि मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद कौशल विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे जरूर किए थे लेकिन अब तक उसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका है। आनलाइन व्यवसाय की उभरती शख्सियत एवं स्काईकेण्डल के संस्थापक गौरव गर्ग का कहना है कि देश की युवापीढ़ी को नौकरी लेने वाला नहीं, देना वाला बनना है, ऐसा संभव भी हो सकता है। जरूरत है सरकार की नीतियां बदले, कोरी योजनाएं न बने, बड़े-बडे़ फण्ड की घोषणाएं ही न हो, बल्कि ये योजनाएं और फण्ड जरूरतमंद एवं जज्बे वाले युवकों तक पहुंचे। ऐसा होने से ही देश की युवापीढ़ी भारत को शक्तिशाली बना सकेंगे और अशांति की संभावनाओं को उलट देगी। कोई भी व्यक्ति, प्रसंग, अवसर अगर राष्ट्र को एक दिन के लिए ही आशावान बना देते हैं तो वह महत्वपूर्ण होते हैं। पर यहां तो निराशा और भय की लम्बी रात की काली छाया व्याप्त है। हमारा राष्ट्र नैतिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक सभी क्षेत्रों में मनोबल के दिवालिएपन के कगार पर खड़ा है। और हमारा नेतृत्व गौरवशाली परम्परा, विकास और हर विपरीत स्थिति से मुकाबला करने के लिए तैयार है, का नारा देकर अपनी नेकनीयत का बखान करते रहते हैं। पर अच्छा इरादा, अच्छे कार्य का विकल्प नहीं होता।
भारत में बेरोजगारी की समस्या का हल आसान नहीं है, फिर भी प्रत्येक समस्या का समाधान तो है ही। इस समस्या के समाधान के लिए मनोभावना में परिवर्तन लाना आवश्यक है। मनोभावना में परिवर्तन का तात्पर्य है किसी कार्य को छोटा नहीं समझना और हर कार्य में राजनीतिक लाभ नहीं देखना। नैतिक मूल्यों का हर क्षेत्र में तीव्रता से ह्रास हो रहा है और विशेषतः सरकारी योजनाओं पर इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव देखने को मिलता है। हम कब तक छले जायंेगे, यह भय हर समय बना रहता है। गर्दन के पास गर्म सांसें हर कोई महसूस करता है। हर कदम पर उसे ”श्री झूठ“, ”श्री सत्य“ के कपडे़ पहने मिलता है। जहर नागिन की जीभ में होता तो उसे गिरफ्त में लिया जा सकता है, पर जहर सरकारी योजनाओं के शरीर में हो गया है। आज राष्ट्र के पास बहुत कुछ होते हुए भी ”राष्ट्रीय चरित्र“ के अभाव में हमारे 120 करोड़ युवा हाथ ताकत नहीं, कमजोरी साबित हो रहे हैं। सरकारी नीतियों के दोगलेपन के कारण हमारा वजन राष्ट्र ढो रहा है, जबकि राष्ट्र का भार हमारे कंधों को उठाना चाहिए था। हर राष्ट्र के सामने चाहे वह कितना ही समृद्ध हो, विकसित हो, कोई न कोई चुनौती रहती है। चुनौतियों का सामना करना ही किसी राष्ट्र की जीवन्तता का परिचायक है। चुनौती नहीं तो राष्ट्र सो जायेगा। नेतृत्व निष्क्रिय हो जायेगा। वही हारा जो लड़ा नहीं-चुनौतियां अगर हमारी नियति है, तो उसे स्वीकारना और मुकाबला करना हमें सीखना ही होगा।
इसके लिए सरकारी अथवा नौकरियों की ललक छोड्कर उन धंधों को अपनाना चाहिए, जिनमें देश की तरक्की छिपी है। आज हम चीन जैसे देशों से आयात करके उन्हें समृद्ध बना रहे हैं, क्यों नहीं हम भारत में ही उत्पाद शुरू करें। इस अर्थ में घरेलू उद्योग- धंधों को पुनर्जीवित करना तथा उन्हें विकसित करना आवश्यक है। शिक्षा नीति में परिवर्तन लाकर इसे रोजगारोम्मुखी बनाने की भी आवश्यकता है। केवल डिग्री ले लेना ही महत्त्वपूर्ण नहीं, अधिक महत्त्वपूर्ण है योग्यता और कार्यकुशलता प्राप्त करना।
युवा वर्ग की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होनी चाहिए कि वह शिक्षा प्राप्त कर स्वावलंबी बनने का प्रयास करे। सरकार को भी चाहिए कि योजनाओं में रोजगार के साथ-साथ उत्पाद को विशेष प्रश्रय दिया जाए। भारत सरकार इस दिशा में विशेष प्रयत्नशील है। परन्तु सरकार की तमाम नीतियाँ एवं कार्यान्वयण नाकाफी ही साबित हुए हैं। मतलब साफ है कि सरकार की नीतियों में कहीं-न-कहीं कोई व्यावहारिक कठिनाई अवश्य है। अतः सरकार को चाहिए कि वह इसके निराकरण हेतु एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाए और समस्या को और अधिक बढ़ने न दे ।

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