हक़ीक़त और सियासत के मध्य मंहगाई का समाधान

तनवीर जा़फरी

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में मंहगाई का बढऩा एक सामान्य व साधारण प्रक्रिया है। महंगाई पूरे विश्व में हमेशा से ही बढ़ती रही है और भविष्य में भी बढ़ती रहेगी। उत्पादन में कमी तथा खपत में होने वाली अधिकता ही आमतौर पर मंहगाई का कारण बनती है। हमारे देश में भी महंगाई का बढऩा तथा इस विषय को लेकर होने वाला विलाप कोई नई बात नहीं है। हमारे बुज़ुर्ग आज भी अपने पुराने दिनों को याद कर तमाम वस्तुओं व सामग्रियों के कुछ ऐसे पुराने मूल्य बताते हैं जिन्हें सुनकर विश्वास नहीं होता। परंतु यह हकीकत है कि तब देश की कुल जनसंख्या भारत-पाकिस्तान तथा बंगलादेश समेत चालीस करोड़ की थी उस समय से लेकर अब तक मंहगाई में कई गुणा इज़ाफा हो चुका है। इसका कारण भी साफ है कि आज आबादी के लिहाज़ से केवल विभाजित भारत ही अकेला लगभग सवा अरब की आबादी वाला देश बन चुका है। ऐसे में पैदावार तथा उत्पाद का संतुलन बिगडऩा भी सामान्य सी बात है।

परंतु कुछ अर्थशास्त्री यह तर्क भी देते हैं कि आम लोगों की आय भी मंहगाई की तुलना में ही कई गुणा बढ़ चुकी है। यानी आय तथा व्यय के अनुपात में कोई अधिक अंतर नहीं आया है। फिर भी आम जनता अपनी आय की बात तो हरगिज़ नहीं करती हां यह ज़रूर याद करती है कि 30 वर्ष पहले अमुक वस्तु इस रेट में थी तथा फलां वस्तु इस भाव में। जनता यह याद करना ही नहीं चाहती कि तीन या चार दशक पूर्व उसकी आय क्या थी और आज क्या है। बहरहाल इन सबके बावजूद यह माना जा सकता है कि इन दिनों भारत सहित पूरे विश्व में मंहगाई तथा मंदी का जो दृश्य देखा जा रहा है वह शायद पहले कभी नहीं देखा गया। नित्य प्रयोग में आने वाली तमाम खाद्य वस्तुएं जिनमें दालें,चीनी,रिफाईंड तथा दूध जैसी वस्तुएं शामिल हैं,के दाम इतनी तेज़ी से आसमान पर पहुंच गए जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। इसी प्रकार पिछले दिनों प्याज़ जैसी साधारण व अत्यंत आवश्यक वस्तु को लेकर पूरे देश में कोहराम बरपा होते हुए देखा गया। बावजूद इसके कि महाराष्ट्र के प्याज़ उत्पादक किसान 1500 रुपये प्रति क्विंटल का मूल्य मंडी से वसूल होने की बात कह रहे थे। उनका कहना था कि प्याज़ का मूल्य प्रत्येक आढ़ती व एजेंट के माध्यम से होते हुए ग्राहक तक पहुंचने में 10 से लेकर 20 रुपये प्रति डीलर तक बढ़ जाता है। परिणामस्वरूप 10 से 15 रुपये किलो तक आमतौर पर मिलने वाले प्याज़ के मूल्य देखते ही देखते कहीं 40 तो कहीं 50 और कहीं-कहीं 70 और 80 रुपये किलो तक पहुंच गए। ज़ाहिर है चूंकि इतनी मंहगी प्याज़ खरीदकर इस्तेमाल कर पाना हर व्यक्ति के बूते की बात नहीं है। लिहाज़ा तमाम गरीब व मध्यमवर्गीय तब$के ने तो प्याज़ खरीदना और खाना ही छोड़ दिया। जबकि धनाढ्य लोगों ने प्याज़ के बढ़ते मूल्य को देखकर प्याज़ का भंडारण कर लिया।

यह तो है मंहगाई से होने वाले उतार-चढ़ाव की कुछ ज़मीनी हकीकतें। परंतु इन सब की पृष्ठभूमि में मंहगाई जैसे संवेदनशील तथा आम जनता से सीधे जुड़े हुए विषय को लेकर जो कुछ चल रहा होता है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। बल्कि मैं तो यह समझता हूं कि मंहगाई को लेकर पर्दे के पीछे चलने वाली घटनाएं मंहगाई के बढऩे के लिए कहीं ज्य़ादा जि़म्मेदार होती हैं। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों प्याज़ की कीमतें आसमान को छूने लगीं। पूरे देश में विपक्षी दलों ने कांग्रेस पार्टी को निशाना बनाते हुए प्याज़ के मूल्यों पर नियंत्रण न रख पाने का जि़म्मेदार कांग्रेस को ठहरा दिया। भारतीय जनता पार्टी को याद आया कि किस प्रकार प्याज़ के मूल्यों में हुई बेतहाशा वृद्धि के परिणामस्वरूप ही उसे दिल्ली की अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी थी। भाजपा को लगा कि शायद प्याज़ के कारण आम लोगों की आंखों से निकलने वाले आंसू उन्हें सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा सकते हैं तथा मंहगाई से त्रस्त जनता कांग्रेस की सरकार को उखाड़कर फेंक सकती है। लिहाज़ा विपक्षी दलों ने मंहगाई पर राजनीति करनी शुरु कर दी। गोया मंहगाई से पीडि़त आम जनता से भी ज्य़ादा विलाप भाजपाई करने लगे। उधर कांग्रेस पार्टी तथा प्याज़ के उत्पादन से जुड़े महाराष्ट्र के किसान यह बार-बार बताते रहे कि राज्य में असमय आई भारी बारिश के चलते लाखों एकड़ में लगी प्याज़ की फसल खराब हो गई है। परंतु राजनीतिज्ञों को वास्तविक व ज़मीनी तर्क कहां समझ आते हैं। इनका तो एक ही विलाप चलता रहा कि कांग्रेस ने मंहगाई को नियंत्रित रखने में पूरी अक्षमता व असफलता का प्रदर्शन किया है।

यह तो थी विपक्ष के रवैये की बात। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि गठबंधन सरकारों में कई घटक ऐसे नकारात्मक बर्ताव करते हैं जिनसे कि सत्तारुढ़ दल को सत्तापक्ष में ही विपक्ष का आभास होता रहता है। मंहगाई के विषय को लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता तथा केंद्रीय खाद्य व कृषि मंत्री शरद पवार की स्थिति भी यूपीए सरकार में कुछ इसी प्रकार की है। पहले भी शरद पवार ने मंहगाई को लेकर कई ऐसे वादे किए जिन्हें वे पूरा नहीं कर सके। तमाम बातें ऐसी भी हुईं जिसे जनता पचा नहीं सकी। अब एक बार फिर प्याज़ को लेकर शरद पवार तो एक ओर यह फरमा रहे थे कि तीन सप्ताह में प्याज़ के मूल्य नियंत्रित हो जाएंगे। परंतु शरद पवार के इस वक्तव्य के आते ही अचानक प्याज़ के मूल्यों में लगभग 1 हज़ार रुपये प्रति मन के हिसाब से कमी आने की खबरें भी आने लगीं। ऐसे समाचार आए कि प्याज़ के मूल्यों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वयं अपनी नज़र रखी हुई है तथा केबिनेट सचिव को इस विषय पर पूरी चौकसी बरतने तथा पल-पल की जानकारी रखने के निर्देश दिए गए हैं। शरद पवार अपनी भाषा बोलते रहे उधर केंद्र सरकार ने प्याज़ निर्यात तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया तथा प्याज़ के आयात शुल्क में 7 प्रतिशत की कमी भी कर दी गई। पाकिस्तान से प्याज़ की आमद फौरन शुरु हुई। कई प्याज़ के जमाखोर आढ़तियों के गोदामों पर दिल्ली में बड़े पैमाने पर छापे मारे गए। दिल्ली सरकार ने अपने कई सरकारी उपक्रमों जैसे मदर डेयरी तथा नैफ़ेड जैसे संस्थानों के माध्यम से नियंत्रित व कम मूल्य पर प्याज़ बेचनी शुरु कर दी। इस प्रकार मात्र 4 दिनों के भीतर ही प्याज़ के मूल्य पर नियंत्रण हासिल कर लिया गया। अन्यथा इस बात की संभावना व्यक्त की जा रही थी कि प्याज़ का मूल्य 100 रुपया प्रति किलो तक भी जा सकता है।

इन हालात में हमें मंहगाई की हकीकत तथा इस को लेकर होती सियासत पर भी पूरी नज़र रखनी चाहिए। विपक्ष का तो काम ही है जनता को वरगलाना तथा गुमराह करना और किसी भी हथकंडे को इस्तेमाल कर सत्तारुढ़ दलों को बदनाम करना और स्वयं सत्ता तक पहुंचनें का उपाय करना। परंतु इसमें भी कोई दो राय नहीं कि आम लोगों को मंहगाई से निजात दिलाने का उपाय करना भी सत्तारुढ़ दल तथा सरकार का ही काम है। सरकार को हमेशा ही उसी प्रकार की सक्रियता व चुस्ती दिखानी चाहिए जैसी कि प्याज़ के मूल्यों को नियंत्रित करने में दिखाई गई है। सरकार को यह याद रखना चाहिए कि विपक्षी दलों की हमेशा ही यही कोशिश रही है और रहेगी कि किसी प्रकार मंहगाई का ठीकरा सरकार के सिर पर ही फोड़ा जाए। ऐसे में इन्हें इस बात को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं रहती कि किन-किन खाद्य सामग्रियों की जमाखोरी की जा रही है और इस जमाखोरी में कौन-कौन सी शक्तियां सक्रिय हैं। भारतीय राजनीति क चेहरा तो इतना गंदा व भयावह हो चुका है कि एक दल को बदनाम करने के लिए दूसरा राजनैतिक दल स्वयं कोई भी हथकंडे अपना सकता है। ऐसे में जमाखोरी को बढ़ावा देना अथवा इन्हें संरक्षण प्रदान करना तो बहुत मामूली से हथकंडे की श्रेणी में आता है।

ऐसे में यह केंद्र सरकार की जि़म्मदारी है कि वह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्रों की परवाह किए बिना स्वयं अपनी मशीनरी के माध्यम से इस बात पर सूक्ष्म व गहरी नज़र रखे कि कहां-कहां, कौन-कौन से जमाखोर सक्रिय हैं। जमाखोरों को तत्काल गिरफ्तार करे तथा उनके विरुद्ध फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकद्दमे चला कर उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम जैसे सख्त कानून के अंतर्गत लंबे समय के लिए जेलों में ठूंस दे। निश्चित रूप से यदि देश के केवल 10-20 जमाखोरों व उनके सरपरस्तों के साथ ऐसी सख्त कार्रवाई हो गई तो पूरे देश के जमाखोर अपनी गंदी आदतों से बाज़ आ जाएंगे। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हमारे देश की आज़ादी ने हमें आज़ादी के जो गुण सिखाए हैं उनमें हमने गुण कम ग्रहण किए हैं जबकि अवगुण की तलाश कुछ ज्य़ादा ही कर ली है। और यह आज़ादी जमाखोरों,भ्रष्टाचारियों,घपलेबाज़ों,घोटालेबाज़ों तथा अवसरवादी राजनीति करने वालों को अपनी मनमानी करने की पूरी छूट दे रही है। यदि देश की व्यवस्था को ठीक ढंग से संचालित करना है तो केंद्र सरकार को न केवल सख्त कदम उठाने पड़ेंगे बल्कि आम जनता के हितैषी नज़र आने वाले अवसरवादी राजनीति के महारथियों तथा जमाखोरों यहां तक कि अपने ही साथ नज़र आने वाले परंतु अपनी ही डाल को भी काट रहे सहयोगियों से भी पूरी तरह सचेत रहना होगा।

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