श्रीमद्भगवद्गीता और छद्म धर्मनिरपेक्षवादी – चर्चा-६

विपिन किशोर सिन्हा

छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों का श्रीमद्भगवद्गीता पर एक आरोप यह भी है कि गीता जाति-व्यवस्था को न सिर्फ स्वीकृति देती है, वरन् इसे ईश्वरीय भी मानती है। अपने समर्थन में वे गीता के अध्याय चार के निम्न श्लोक का उद्धरण देते हैं –

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥

“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं” – चार वर्णों की रचना मैंने की । तो क्या मनुष्यों को चार भागों में बांट दिया? श्रीकृष्ण कहते हैं – नहीं, “गुणकर्म विभागशः”- गुणों के माध्यम से कर्म चार भाग में बांटा। गुण एक पैमाना है। उस गुण के ही कारण मनुष्य एक वर्ण विषेश का प्रतिनिधित्व करेगा। सृष्टि के आरंभ से लेकर आजतक मनुष्यों का वर्गीकरण होता आया है। यह कोई नई बात नहीं है। गुण और कर्म के आधार पर वर्गीकरण न्यायोचित और स्वाभाविक है। जब यह विभाजन जन्मना हो जाता है, तो जातियां पैदा होती हैं। सनातन/हिन्दू धर्म का दर्शन विश्व में सर्वोत्तम है लेकिन कालक्रम में इसको माननेवालों के आचरण में क्षय आता गया। जिस व्यवस्था को श्रीकृष्ण गुणकर्म के आधार पर स्वीकृति देते हैं, वही व्यवस्था चुपके से जन्मना बन गई। दबे पांव इस कुरीति ने कब और कैसे सामाजिक स्वीकृति भी प्राप्त कर ली, यह शोध का विषय है। आशा थी कि देश के स्वतंत्र होने के बाद इस व्यवस्था को तिलांजलि दे दी जाएगी। महात्मा गांधी जाति व्यवस्था के मुखर विरोधी थे लेकिन उनके ही शिष्यों द्वारा निर्मित संविधान ने जन्मना जाति-व्यवस्था पर मुहर लगा दी। जाति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था संविधान ने मात्र १० वर्षों के लिए की थी लेकिन इस लोकतंत्र ने इसे अनन्त काल का विस्तार दे दिया है। उपरी मन से भ्रष्ट राजनीतिज्ञ भी जाति का विरोध करते हैं लेकिन अंदर से सभी समर्थन करते हैं। यह सभी को सूट करता है। वोट-बैंक की राजनीति ने इसे स्थाई स्वरूप दे दिया है। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में जाति आधारित जनगणना का क्या औचित्य? लेकिन वह भी हो रहा है। हमने श्रीकृष्ण के गीता संदेश को भुला दिया। परिणाम सामने है – समाज में टूटन, बिखराव, वैमनस्य और अविश्वास। यह बीमारी इतनी बढ़ गई है कि अब लगता है इसके उपचार के लिए श्रीकृष्ण को पुनः आना ही पड़ेगा।

दुनिया का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है, जहां गुणकर्म के आधार पर समाज में वर्गों का निर्माण न हुआ हो। आज भी सरकार ने कानून बनाकर राजकीय सेवकों को चार श्रेणियों में बांट रखा है —

. क्लास-१ — नीति निर्माण, प्रबंधकीय, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार से संपन्न उच्च अधिकारी।

२. क्लास-२ — आदेश पालक अधिकारी।

३. क्लास-३ — इन्हें आफिसियल या सबआर्डिनेट स्टाफ़ कहा जाता है। ये कार्यालय सहायक या तकनिकी सहायक कर्मचारी होते हैं।

४. क्लास-४ — चपरासी, रनर, कूली, अकुशल श्रमिक।

क्लास-१ और २ में भी कई उपवर्ग हैं। इसी तरह क्लास-३ और ४ में भी सैकड़ों उपवर्ग हैं। उपरोक्त व्यवस्था आज का सच है जिसे संविधान सम्मत बताकर हर कोई मौन साध लेता है। क्या एक क्लास-१ के अधिकारी ( जिलाधिकारी का उदाहरण ले लें) और उसके चपरासी जो क्लास-४ का कर्मचारी होता है, के वेतन, ग्रेड वेतन, सुविधाओं, सामाजिक प्रतिष्ठा (social atatus) और रहन-सहन में कोई समानता है? दोनों सरकारी कर्मचारी हैं। एक के पास सरकारी कारों का काफ़िला है, तो दूसरे के पास सरकारी सायकिल भी नहीं। एक के पास कई एकड़ में विस्तृत आवास है, तो दूसरे के पास एक झोंपड़ी भी नहीं। दोनों सरकारी यात्रा करते हैं – एक हवाई जहाज के एक्ज़िक्युटीव क्लास में, दूसरा भारतीय रेल के सामान्य डिब्बे में, धक्के खाता हुआ खड़े-खड़े। इस विभाजन का आखिर आधार क्या है? गुण और कर्म ही न? बस, इस व्यवस्था की एक अच्छाई है, और वह यह है कि यह विभाजन जन्मना नहीं है। यहां श्रीकृष्ण के संदेश ने काम किया है।

श्रीकृष्ण ने जो भी कहा है, विश्वास के साथ कहा है। वे स्पष्ट कहते हैं कि चारों वर्णों की रचना गुणकर्म के आधार पर की गई। ध्यान देने की बात है कि यह व्यवस्था कही से भी जन्मना नहीं थी। ब्राह्मण अपने गुणकर्म से च्युत होता था, तो उस वर्ण से निष्कासन का विधान था और शूद्र भी अगर शुभ कर्म करता था, तो उच्चीकृत करके ब्राह्मण वर्ग में सम्मिलित किया जाता था। महर्षि बाल्मीकि और वेद व्यास जन्मना शूद्र ही थे। लेकिन स्वाध्याय, त्याग, तपस्या के द्वारा गुणों का विकास करके ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। एक ने रामायण लिखी, तो दूसरे ने महाभारत जिसमें गीता भी सम्मिलित है। परम ज्ञान की पुस्तक वेद को उसके विषय के अनुसार चार भागों में बांटकर सर्वसुलभ बनाने का पुनीत कार्य जिस कृष्ण द्वैपायन ने किया, वे एक कुंआरी केवट कन्या के अवैध पुत्र थे। आज सारा हिन्दू समाज उन्हें वेद व्यास के नाम से जानता है और पूजता है। गुणहीन ब्राह्मण का हमारे स्वर्ण काल में कोई स्थान नहीं था। महाभारत के शान्ति पर्व में शर- शय्या पर पड़े भीष्म पितामह श्रीकृष्ण की उपस्थिति में पांचो पाण्डव और द्रौपदी को राजा के धर्म-कर्म को विस्तार से समझाते हुए स्पष्ट कहते हैं —

“जो विद्वान-द्रोह और अभिमान से रहित, लज्जा-क्षमा-शम-दम आदि गुणों से युक्त बुद्धिमान, सत्यवादी, धीर, अहिंसक, राग-द्वेष से शून्य, सदाचारी, शास्त्रज्ञ और ज्ञान से संतुष्ट हो, वही ब्रह्मा के आसन पर बैठने का अधिकारी है – वही ब्राह्मण है।”

(शान्ति पर्व, महाभारत)

महर्षि वेद व्यास देखने में अत्यन्त कुरूप थे, रंग भी काला था लेकिन उन्होंने उपर वर्णित समस्त गुणों को धारण किया था; इसलिए वे वेद व्यास कहलाए। महाभारत काल से लेकर आजतक के वे सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण थे। आज भी जो कथा वाचक रामायण, महाभारत, गीता या भागवत्पुराण पर प्रवचन देता है, उसे व्यास ही कहा जाता है और जिस आसन पर बैठकर वह श्रोताओं को संबोधित करता है, उसे व्यास गद्दी कहा जाता है।

पितामह भीष्म की शान्ति पर्व में ही एक और उक्ति अत्यन्त महत्वपूर्ण है —

“काठ का हाथी, चमड़े का हिरन, हिजड़ा मनुष्य, ऊसर खेत, नहीं बरसने वाला बादल, अपढ़ ब्राह्मण और रक्षा न करने वाला राजा — ये सबके सब निरर्थक और त्याज्य हैं।”

श्रीकृष्ण ने गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बांटा। गुण ही एकमात्र पैमाना है, मापदण्ड है। तामसी गुण होगा तो आलस्य, निद्रा, प्रमाद, कर्म में न प्रवृत होने का स्वभाव, जानते हुए भी अकर्तव्य से निवृति न हो पाने की विवशता रहेगी। ऐसे लोगों को शूद्र की श्रेणी में रखा गया। उनके लिए कहा गया – “परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।” जो महापुरुष अव्यक्त की स्थिति वाले हैं, अविनाशी तत्त्व में स्थित हैं, उनकी तथा इस पथ पर अग्रसर अपने से उन्नत लोगों की सेवा में लग जाओ। इससे दूषित संस्कारों का शमन होगा और साधना में प्रवेश दिलाने वाले संस्कार सबल हो जाएंगे।

क्रमशः तामसी गुण न्यून होने पर राजसी गुणों की प्रधानता तथा सात्विक गुण के साथ साधक की क्षमता वैश्य श्रेणी की हो जाती है। उस समय वही साधक इन्द्रिय संयम, आत्मिक संपत्ति का संग्रह स्वभावतः करने लगेगा। कर्म करते-करते उसी साधक में सात्विक गुणों का बाहुल्य हो जाएगा, राजसी गुण कम रह जाएंगे, तामसी गुण शान्त रहेंगे। उसी समय वही साधक क्षत्रिय श्रेणी में प्रवेश पा लेगा। शौर्य कर्म में प्रवृत रहने की क्षमता, पीछे न हटने का स्वभाव, समस्त भावों पर स्वामीभाव, प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता उसके स्वभाव में ढल जाएगी। वही कर्म और सूक्ष्म होने पर, मात्र सात्विक गुण कार्यरत रह जानेपर मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण, एकाग्रता, सरलता ध्यान, समाधि, ईश्वरीय निर्देश, आस्तिकता इत्यादि ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली स्वभाविक क्षमता के साथ वही साधक ब्राह्मण श्रेणी का कहा जाता है। यह ब्राह्मण श्रेणी के कर्म की निम्नतम सीमा है। जब वही साधक ब्रह्म में स्थित हो जाता है, तो उस अन्तिम सीमा में वह स्वयं न ब्राह्मण रहता है, न क्षत्रिय, न वैश्य, न शूद्र। किन्तु दूसरों के मार्गदर्शन हेतु वही ब्राह्मण है। कर्म एक ही है – नियत कर्म, आराधना। अवस्था भेद से इसी कर्म को उँची-नीची चार सीढ़ियों मे बांटा गया।

क्रमशः

4 thoughts on “श्रीमद्भगवद्गीता और छद्म धर्मनिरपेक्षवादी – चर्चा-६

  1. जातिगत दुकानदार अचानक सक्रिय हो गए है वैसे भी आज का माहौल है की यत्र तत्र जाती और आरक्षण की चरचा होती रहती है हर नयी जाती अपने को आरक्षण पाने के योग्य बनाने पर तुली रहती है तो हर नयी जाती आरक्षण का विरोध करती नजर आती है इन सबसे ज्यादा फायदा उन दुकान दारो का भला होता है जो जातिगत रोटिया सेकते है व भविष्य मे अपने लिए राजनीति का डगर फीक्स कर देते है मेरे इस लेख को लिखने का उद्धेशय जाती वर्ण फिर वर्णाश्रम फिर आरक्षण पर मेरे विचार व अनेक चिंतको के विचारो का संकलन कर मेरे विचार को पुष्ट करना है और बिना किसी लग लपेट के मैं कहता हूँ की किसी भी प्रकार का आरक्षण इसी क्षण से समाप्त होना ही समाज हित में है जाहीर है अपने लेख से पहले ही मेने अपने विचार स्पष्ट कर दिये तो अगली पंक्तियो मे मैं उसके पक्ष मे विभिन्न प्रकार के तर्क व तथ्य व उध्ध्रन देने का प्रयास करूंगा |
    1॰ ये सारा का सारा झमेला या यूं कहे आखाडा जिस एक सूक्त से प्रारम्भ होता है उसका नाम है पुरुष सूक्त ,पुरुष सूक्त अत्यंत पवित्र समझा जाता है और मैं भी उसे बहुत पवित्र मानता हूँ उसके उच्चारण के कम्पन्न से होने वाले भीतरी परिवर्तन को मेने अनेकों बार अनुभव किया है अनुभव किसी को करना हो तो वो इसे किसी जानकार से सीख कर उस स्वर व पवित्र मन से उच्चरित करें व असर को खुद अनुभूत करे खैर मूल बात पर आते है एसे कहा जाता है की जातिगत भेदभाव का आरंभ पुरुष सूक्त से हुवा है और उसके प्रमाण मे स॒हस्र॑ शीर्षा॒ पुरु॑षः । स॒ह॒स्रा॒क्षः सहस्र॑पात् । स भूमिं॑ वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वा । अत्य॒तिष्ठद्दशांगु॒लम् । पुरु॑ष ए॒वेदग्ं सर्वम्॓ व आगे के “ब्राह्मणो मुखमसीत से लेकर शूद्रो अजायत “ का विवरण दिया जाता है ,पर जब हम इस सूक्त को पूरा का पूरा पढ़ते है तब ये भान होता है की इसमे जिन पुरुष का वर्णन है वो को शशिर धारी नहीं है न ही उसकी कोई देह है न लोकिक न परमार्थिक,फिर क्यो कर उससे विराट पुरुष को समाज जनित भेद से जोड़ा??तो ध्यान मे आ जाता है की सारे वर्ण, सारी जातीय सारे भेद तो शरीर के है मन के है पर प्राण व आत्मा का क्या भेद??मनुष्य जो इतने भेदो मे पड़ा है वो उसका अज्ञान है जबकि हर जगह वो विराट पुरुष है माने ये की वो ही ब्रहम्न है वो ही शूद्र है वो ही क्षत्रिय है वो ही वैश्य है यहा तक की हर प्राणी वो ही है भूमि वायु जल अग्नि आकाश सब कुछ वो ही है हर एक में उस विराट पुरुष याने परम ब्रह्म की सत्ता का अनुभव करो जो जो उस को परम तत्व को हर एक मे देख लेगा वो वो पंडित हो जाएगा प्रमाण रूप मे स्मृति गीता को देखे |
    अत: मैं इस निष्कर्ष पर पाहुच सकता हूँ की ये सूक्त भेद को नहीं बल्कि अभेद को बडावा देता है जिसकी जैसे बुधधी होगी वो इसे वैसे ही रूप मे लेगा क्योकि तर्क की तलवार हमेश दुधारी होती है |
    २.अब प्रश्न आता है ये वर्ण क्या है ???वर्ण शब्द ‘वृञ वरणे या ‘वरी” धातु से बना है जिसका अर्थ है वरण करना ?क्या वरण करना ??किसको वरण करना???तो गीता कहती है “चतुरवर्णयम मया सृष्टि गुण: कर्म: विभागश:” मतलब ये की इन वर्णों की उत्तपति खुद भगवान से हुयी है मतलब ये की सभी मानुषी खुद भगवान से ही जन्मे है मैं यहा पर भगवान शंकरचार्य के गीता पर शंकर भाष्य के मूल इस श्लोक का संस्कृत देता हूँ जरा खुद अवलोकन करें :चातुवर्ण्यम चत्वार एव वर्णा: चातुवर्ण्यम मया ईश्वरेण सृष्टम
    उत्पादित्म,”ब्राह्मणो`अस्य मुखमासीत’इत्यादिश्रुते:,गुंणकर्मविभागशा गुणविभागश: च गुणा: सत्त्वर्जस्तमांसी|
    तत्र सात्त्विकस्य सत्त्वप्रधानस्य ब्राह्मणस्य शमों दम: तप इत्यादिनी कर्माणी|
    सतत्वोपसर्जनरज: प्रधानस्य क्षत्रियस्य शौर्यतेज:प्रभृतिनी कर्माणी|
    तमउपसर्जनतम: प्रधानस्य वैश्यस्य कृष्यादिनी कर्माणी|
    रजउपसर्जनतम: प्रधानस्य शूद्रस्य शुश्रूषा एव कर्म|
    इति एवं गुणकर्मविभागश: चतुरवर्णयम मया सृष्टम इत्यर्थ:|
    तत च इदं चातुवर्ण्यम न अन्येषु लोकेषु आटो मानुषे लोके इति विशेषणम|

    ईसका अर्थ समझना ज्यादा कठिन न है फिर भी मैं एक टेबल फोरम मे इसका अर्थ देता हूँ
    गुणों की प्रधानता के क्रम में वर्ण कर्म
    सत्त्व रज तम ब्राह्मण शम दम तप आदि|
    रज सत्त्व तम क्षत्रिय शूरवीरता,तेज प्रभृति
    रज तम सत्त्व वैश्य कृषि जनित क्रम
    तम रज सत्त्व शूद्र शुश्रूषा

    यहा पर मैं सिर्फ शूद्र वर्ण का कर्म बताउगा यहा लिखा है शुश्रूषा क्या अर्थ है इसका??
    सीधी से बात है जो शूद्र वर्ण से संबन्धित होगा उसका बौद्धिक स्तर बहुत कम होगा अपने क्रोध अपने मानव जनित गुण अवगुणो पर उसका नियंत्रण बहुत कम होगा एसे मानव की भी मोक्ष गति होती है अगर वह अपना सारा कर्म सेवा समझ कर करे जैसे एक मजदूर है वो कोई मकान बनाता है तो उसकी विचार पद्धति क्या होनी चाहिए ??
    1 मजबूरी है इस लिए बना रहा हूँ।2।मुझे सिर्फ ये ही आता है अत: क्या करू? 3 ईश्वर की कृपा है की मैं ईश्वर के निवास स्थान बनाने में महत्व पूर्ण भूमिका निभा रहा हूँ क्योकि मकान मे निवास करने वाले मानव के हृदय मे भी ईश्वर है और ईश्वर का घर तो वैसे भी इसमे बनेगा ही 4 मैं अपने कर्तव्य का पालन कर रहा हूँ |
    अब ऊपर के चार विचार देखिये उसमे जो प्रथम दो विचार है वो नकारात्मक है एसे विचार रहेंगे तो धीरे धीरे वो व्यक्ति कुंठित होगा उसका कोई जागतिक विकास न होगा जबकि अंतिम दो विचार उसे क्रमश: परमार्थिक व लोकीक स्तर में उन्नत्त करने मे साधक होंगे और इस भाव से कर्म करने को ही सेवा कहा गया है न की दूसरे वर्णो की गुलामी करने को सेवा, याद रखिए गुलामी को हमारे शास्त्र बहुत बड़ा पाप मानते है फिर चाहे वो गुलामी किसी की भी हो|कर्म चाहे कैसा भी हो मानव को उसे करने मे केवल कर्तव्य पालन का भाव रख कर करना चाहिए कर्म पालन से भागना ही पाप है यहा भागना से तात्पर्य मन को खिन्न रख कर कर्म करने व कर्म को छोड़ देने दोनों से ही है अंहकार को त्याग कर सेवा बुद्धि से करम करना ही सेवा है और ये ही इस कलियुग में तप है वर्ण काल का भी होता है माने ये की काल का भी एक स्वभाव होता है
    {कर्म बाहर भी हो सकता है व कर्म मन के अंदर भी हो सकता है-जिसे मानसिक कर्म कहते है |मन जो भी सोचे वह भी कर्म है |संकल्पपूर्वक चिंतन का एक क्रम रखते है तो वह भी एक मानसिक कर्म है |हम ‘सर्वे भावन्तु सूखीं:’ प्रार्थना कराते हैं यह भी मानसिक कर्म हो गया| तो चार वरणों का उल्लेख हो गया| अभी हम कौन से वर्ण में बैठे हुए हैं| कौन से युग में बैठे हुवे हैं?कलियुग में-कलियुग का भी अपना एक स्वभाव है|जैसे स्थान का एक स्वभाव होता है,एक प्रभाव होता है,वैसे प्रत्येक युग का भी एक स्वभाव होता है|ओउर इसका प्रभाव प्रकट होना शुरू हो गया-जब द्वापर का अंत हुआ|कृष्ण भगवान ने जब अपनी लीला समाप्त की तब कलियुग के प्रारम्भ को ही हम मानते हैं……पुराण बताते है की प्रारम्भ में सभी सत्त्व्गुनी होते थे |अत: सब ब्राह्मण वर्ण के होते थे|पर आज के युग के संदर्भ में हम यह कह नहीं सकते की जन्मजात ही इन सारे गुणों को लेकर कोई प्रकट होता है| कालजयी सनातन धर्म-संवित सोमगिरी जी से उधृधत }
    वर्ण का निर्धारण करने की पद्धति क्या थी??कैसे वर्ण का निर्धार्ण होता था??काल के प्रवाह में वो पदध्द्ध्ती चली गयी है लेकिन फिर भी कुछ रूप मे अभी भी विध्यमान है जैसे किसी बच्चे के सामने एक कलाम एक छोटी कृपाण एक बहीखाता व एक छोटा हथोड़ा या हल रख दो और देखिये की उस बच्चे की स्वाभाविक प्रवृति की किस तरफ है जिस तरफ हो वो उसका वर्ण हो सकता है लेकिन ये पद्धति भी एकदम से सही हो ईएसए नहीं कहा जा सकता है जैसे जैसे मानुशय का विकास होता है वैसे वैसे उसके मूलभूत गुण प्रकट होते जाते है और वो बहुत ही स्वाभाविक रीति से उस वर्ण का बनता जाता है
    बार बार करने से वो उसका संस्कार बनता जाता है वो उसका स्वभाव भी बनाता है और वर्ण भी |जैसे किसी को सत्य व धर्म की बार बार शिक्षा दी जावे व उसके सामने उसके आत्मीय बंधु उस धर्म का पालन करते मिल जावे तो वो बच्चा अत्यंत स्वाभाविक रीति से उस सत्य धर्म को पालन करना आरंभ कर देता है और उसका वर्ण भी वो ही हो जाता है जो उसके आत्मीयों याने माँ पिता दादा चाचा मामा आदि का इसी तरह अगर बच्चा अपने माँ पिता को मजदूरी करते देखता है तो वो भी वैसा ही करना शुरू कर देगा अगर पिता झूठ बोलेगा तो बच्चा भी ये ही करेगा बहुत ही स्वाभाविक है इस प्रकार के विभिन्न कार्यो को देखते देखते ही वर्ण कब जाती बन गया इसका पता तो किसी इतिहास को नहीं है सभी भ्रम में है अपने अपने सिध्ध्न्त देते है |
    मैं यहा पर दिये गए सिद्धांतो का एक छोटा सा विवरण दे रहा हूँ कृपया अवलोकन करें :वर्ण की उत्तपति का विदेशी एवं भारतीयो द्वारा दिया गया सिद्धान्त
    A।परंपरागत {traditional} सिद्धांत
    B रंग का सिद्धान्त {थियरि ऑफ colour}
    C कर्म तथा धर्म का सिद्धान्त {theory of function and religion}
    D गुण का सिद्धान्त {theory of traits}
    E जन्म का सिद्धान्त {theory ऑफ birth}
    आसान सी बात है की ऊपर दिये गए सिद्धान्त में से अनेक जाती के है वर्ण के नहीं वर्ण व जाती अलग अलग है|\
    अब प्रश्न यह है की आधुनिक भारतीय परंपरागत विद्धान क्या कहते है इस बारे में तो ऊपर मेने वेदान्त के प्रकांड विद्धान पूज्य सोमगिरी जी महाराज को उद्धृत किया था अब मैं पूरे विश्व में कृष्ण भक्ति का प्रचार कर नाम कमाने वाले पूज्य स्वामी प्रभुपाद स्वामी जी को उद्धृत करता हूँ {सर्वप्रथम बुद्धिमान मनुष्यों का वर्ग आता है जो सतोगुणी होने के कारण ब्रहम्न कहलाते है द्व्तिय वर्ग प्रशासक वीआरजी का है जिनहे रजोगुणी होने के कारण क्षत्रिय कहा जाता है वणिक वर्ग या वाइशी वर्ग कहलाने वाले लोग रजो तथा तमो गुण के मिश्रण से युक्त होते हैं ओर शूद्र या श्रमिक वर्ग के लोग तमो गुणी होते है –प-160 गीता यथा रूप }
    अब भारत के द्वितीय राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधा कृष्णन को “वर्णो का विभाजन व्यक्तिगत स्वभाव पर आधारित है,जो अपरिवर्तनीय नहीं है|प्रारम्भ में केवल एक ही वर्ण था|हम सबके सब ब्रहम्न थे या सबके सब शूद्र थे|”

    जरा इस को देखे
    “ न योनीनार्पी संस्कारो न श्रतं न च संतति:||
    कारणानि व्दिजत्वस्य वृत्तमेव तू कारणम|

    और “सर्वोपम ब्राह्मणो लोके वृतेन च विधियते
    वृत्तस्थित्स्तु शूद्रोपि ब्रह्मणत्व्म नियच्छ्ती|

    हम ब्रहम्न जन्म के कारण संस्कार के कारण अध्ययन या कुटुंब के कारण नहीं होते।अपितु अपने आचरण के कारण होते है |”

    अब प्रश्न यह उठता है वो लोग कौन थे जिनहोने इस वर्ण व्यवस्था को जाती के समान बताया???या मैं सही शब्दो मे कहू तो जान बुझ कर वर्णआश्रम को जातिगत व्यवस्था कह कर प्रचारित करवाया गया उसमे हम जानेंगे की पादरियों कम्युनिस्टो व अंग्रेज़ो व उनका अनुसरण करने वाले इतिहासकारो का योगदान है ही साथ मे अपने अपने जाती की जातिगत उचता या नीचता का अभिमान या हिन भाव रखने वालो का भी योगदान है |
    मेने वर्ण के बारे मे इतना विवरण इस लिए ही दिया है की अब मैं आगे की पंक्तियो में जाती का अर्थ उपयोगिता कुरुती उसकाओ दूर करने का तरीका व आरक्षण के बारे मे बता संकु।
    पर उससे पहले मैं यहां यह बता देना चाहता हूँ की मेरी व्यक्तिगत रूप से अनेक महात्माओ से बात हुए है सभी इस बात पर एक मत है की वर्ण तब ही लागू होगा जब आश्रम पद्धति हो माने वर्णाश्रम है न की केवल वर्ण|
    ब्रह्मचारी से लेकर संयास तक के आश्रमो का पालन करने वाले व्यक्ति ही वर्ण के विशेषाधिकार या अनधिकार के हेतु हो सकते है मेरी जानकारी के अनुसार आज कही भी कोई वर्ण नहीं है क्यूकी आश्रम नहीं है हा लक्षणिक रूप से हम विधवान,प्रशासक व्यापारी व कामगार इस रूप मे कह सकते है |क्रमश:…..
    3।जाती क्या है??कैसे ये उत्तप्न्न हुई ???क्या महत्व है इसका??क्या गुण अवगुण है इसके??कैसे ये शोषण का हथियार बनी?? इन सबा को जानने से पहले ये जानना पड़ेगा की ये पैदा कहा से हुयी है इस के पैदा होने के भी अनेक कारण दिये गए है जो विदेशियों व भारतीय विद्धवनों ने दिये है उनको नीचे प्रस्तुत करता हूँ
    A।परंपरागत {traditional} सिद्धांत –खास बात यह है की वर्ण और जाती को एक मानकर ही यह सिद्धांत दिया गया है जिसके अनुसार उस अंगो से जाती की उततापति हुयी है जिसका खंडन मेने पहले ही कर दिया है|
    B राजनीतिक सिद्धांत{थियरि ऑफ पॉलिटिकल }- पहले मैं इसके बारे में बताता हूँ-प्रांभिक यूरोपियन विधवानों ने जाती प्रथा को ब्रहमनों द्वारा आयोजित एक चतुर राजनेतीक योजना का रूप बताया है|इन मे “अबे डुबायस{abb dubois}” का नाम प्रमुख है आप कहते है की ब्रामानों ने अपनी प्रभुता बनाए रखने के लिए धर्म का सहारा लिया और एसी व्यवस्था बनाई जिसमे अपना स्थान सबसे ऊपर रखा और उन लोगो को द्वितीय स्थान दिया जोकि अपने बाहुबल से ब्रहनों के स्वार्थ की रक्षा कर सके याने क्षत्रिय |विदेशी इबेटसन{ibetson} और डॉक्टर घूरिए{ghurye} ने भी इनका समर्थन किया है
    अब इसकी काट में-जाती एक सामाजिक संस्था है व कम से कम भारत मे 2000 साल से अस्तित्व में है अत: यह कहना की 2000 साल से भारत एक कृतिम आवरण को ढ़ोह रहा है मूर्खता के अलावा क्या होगी??एक कहावत है की आप सबको एक समय के लिए मूर्ख बना सकते हो कुछ को सब समय के लिए मूर्ख बना सकते हो पर सबको सब समय के लिए मूर्ख नहीं बना सकते इस कारण इस सामाजिक ढ़ाचे को खड़ा करना व इतने लंबे समय तक चलाये रखना व सारे समाज का इसको पालन करना उस सबका उत्त्र्दायित्व ब्राह्मण के कंधो पर डाल कर अंग्रेज़ ये साबित करना चाहते थे की सारी कुरुती व सारी गरीबी छूआ छूत आदि का कारण ब्राह्मण है इस कारण उसे प्रताड़ित करने मे हमारा याने अंग्रेज़ो का सहयोग दो ,पर एसा करना अंग्रेज़ क्यो चाहते थे??तो कारण ध्यान मे आता है ब्रहमनों ने कभी भी अंग्रेज़ो की प्रतिष्ठा को हिन्दू समाज ही नहीं सारे भारतीय समाज मे नहीं बढ़ाने दिया सभी उनसे घृणा करते थे एक तो अंग्रेज़ो के पाप भी बहुत थे दूसरे ब्रहम्न लोग हमेशा हिन्दू जनता को अंग्रेज़ो के खिलाफ भड़काते रहते थे उनके भारत में राज को चुनोती देते थे ये मात्र एक संयोग नहीं है की वसुदेव बलवंत फडके से लेकर मंगल पांडे या तिलक महाराज तक सारे के सारे जातिगत ब्राह्मण थे और इनकी बात सारा समाज सुनता था जब तक अंग्रेज़ो ने मैकालेके माध्यम से एक पीढ़ी की पीढ़ी नहीं तैयार कर ली तब तक ये अंग्रेज़ भारत मे बहुत ही घृणा से देखे जाने लगे थे |वास्तव में किसी भी स्मजिक प्रथा या व्यवस्था को चतुराई से या कृतिम रूप से समाज पर नहीं लादा जा सकता है |

  2. आपके विचारो से पूर्णत: सहमत होते हुवेमेरे कुछ विचार है शब्द अलग है पर भाव वो ही है

  3. I have read all articles of shri BIPIN SINHA on GEETA. i am impressed. This has improved my knowledge. इन सो काल्लेद सेकुलरिस्ट को एक्स्पोसे करे.

  4. आदरणीय सिन्हाजी,
    ‘श्रीमद्भगवद्गीता और छद्म धर्मनिरपेक्षता’ पर आपका चर्चासत्र अत्यंत ज्ञानप्रद, धर्मंसंगत एवं समाज को संगठित करने वाला है I
    ऐसी उत्तम समझ तो केवल सत्संग से ही प्राप्त होती है I
    लगता है कि आप किन्ही समर्थ सदगुरु के शिष्य हैं I

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