वैज्ञानिक जीवन शैली के प्रणेता भगवान महावीर

10 अप्रैल महावीर जयंती


डॉ. वीरेन्द्र भाटी मंगल


भगवान् महावीर के सिद्धांत आज वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वमान्य हो चुके हैं। महावीर द्वारा बताये गये अहिंसक मार्ग पर चलने से स्वस्थ, समृद्ध एवं सुखी समाज का निर्माण संभव है। मानव समाज के विकास के लिए शांति आवश्यक है। सभी वर्गों के परस्पर विकास से अनेक समस्याओं का समाधान संभव है। महावीर की दृष्टि में अभाव और अत्यधिक उपलब्धता दोनों ही हानिकारक हैं। भगवान् महावीर की शिक्षाओं से पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का असंतुलन, युद्ध, आतंकवाद, हिंसा, धार्मिक असहिष्णुता व गरीबों के आर्थिक शोषण जैसी समस्याओं के समाधान प्राप्त किये जा सकते हैं। भगवान् महावीर ने छब्बीस सौ वर्ष पूर्व वैज्ञानिक रूप में एक ऐसी अहिंसक जीवन शैली जीने की शिक्षा दी, जिससे स्वस्थ समाज की संरचना का साकार रूप सामने आया। सही मायने में स्वस्थ समाज की स्थापना के लिए अहिंसा का प्रषिक्षण की ही सर्वमान्य है।
महात्मा गांधी का दर्शन कहता है, हमें पशु से भिन्न करने में एकमात्र अहिंसा ही है। व्यक्ति हिंसक है, तो फिर वह पशु के समान है। मनुष्य होने या बनने के लिए व्यक्ति में अहिंसा का भाव होना आवश्यक है। गांधी कहते है कि हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए। जिसमें मालिक-मजदूर एवं जमींदार-किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण व्यवहार हो। निःशस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से श्रेष्ठ ही होगी। व्यक्ति को जीवन में बहादुरी, निर्भीकता, स्पष्टता, सत्यनिष्ठा का इस हद तक विकास कर लेना कि तीर-तलवार उसके आगे तुच्छ जान पड़ें, यही अहिंसा की साधना है। शरीर की नश्वरता को समझते हुए, उसके न रहने का अवसर आने पर विचलित न होना ही अहिंसा है। मन, वचन और कर्म से किसी की हिंसा न करना अहिंसा कहा जाता है। यहाँ तक कि वाणी भी कठोर नहीं होनी चाहिए। फिर भी अहिंसा का इससे कहीं ज्यादा गहरा अर्थ है।


आज के दौर में शांतिप्रिय इंसान भी कहने लगा है कि अहिंसा अब सिर्फ उपदेश की चीज बन गई है। उसमें न तो किसी की आस्था है और न उससे किसी परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है। इस सवाल और सोच में समस्याओं से पलायन की प्रवृत्ति छिपी है। इसमें बुद्ध, महावीर और गांधी के सिद्धांतों पर अविश्वास की छाया भी है, जिन्होंने न केवल अहिंसा को अपना जीवन बनाया था, बल्कि प्रयोगों से साबित भी कर दिया था, कि अहिंसा एक सकारात्मक ताकत का नाम है। कुछ वर्षो पहले जैन संत आचार्य तुलसी ने इस अवधारणा को जन्म दिया था कि अगर हिंसा का प्रशिक्षण दिया जा सकता है, तो अहिंसा का क्यों नहीं? दरअसल हिंसा के लिए हमारा मस्तिष्क बहुत प्रशिक्षित है, इस आधार पर यह मान्यता स्थापित कर दी गई है कि हिंसा समस्या का समाधान है जबकि अहिंसा प्रशिक्षण से व्यक्ति के मानस को बदला जा सकता है।


वर्तमान दौर में लोगों का चिंतन इस ओर विकसित हो रहा है कि हिंसा के बिना कुछ नहीं हो सकता, न कोई सुनता है। आज सरकारों से मांगे मनवाने के लिए भी लोग हिंसा का सहारा लेते हैं, तो वहीं सरकारें भी इस स्थिति से निपटने के लिए पुलिस से लाठी-गोली चलवाने के लिए मजबूर दिखती हैं यानी हिंसा एक हथियार हैं जो अहिंसा को मात देने में लगा है। दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ कहते  है कि अहिंसा में हमारी आस्था तो है, मगर  उसमें गहराई नहीं है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि अहिंसा में आस्था जगाने वाले प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। जैसे पुलिस और सेना की जमात खड़ी की जा रही है, वैसे ही अहिंसक सैनिकों की जमात भी खड़ी की जाए, तभी अहिंसा की चेतना को जन-जन में प्रसारित किया जा सकता है। महाप्रज्ञ कहते है कि हिंसक ताकतों का सामने करने के लिए अहिंसक व्यक्तित्व, अहिंसा प्रशिक्षण के माध्यम से तैयार कर ही इन समस्याओं से निजात पायी जा सकती है।


मन-वचन-काया से किसी भी जीव को किंचित् मात्र भी दुःख न हो। जब यह सिद्धांत हमारे निश्चय और जागृति में दृढ़ हो जाएगा, तभी हमअहिंसा के पालक बन सकते हैं।देश भर में अहिंसा यात्रा कर रहे तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता आचार्य महाश्रमण का मानना है कि शांति केवल अहिंसा से ही संभव है पर अहिंसा का अर्थ इतना ही नहीं है कि किसी जीव की हत्या न की जाये. दूसरों को पीड़ा न पंहुचाना, उनके अधिकारों का हनन करना भी अहिंसा है। इस अहिंसा की पहले भी आवश्यकता थी और आज भी है। पर आज विनाशक शस्त्रों के अंबार लगे हुए हैं. गरीबी एवं अभाव के कारण लोग नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हैं। सैनिक छावनियों में लाखों-लाख सैनिक प्रतिदिन युद्धाभ्यास करते हैं. हिंसा की इतनी सूक्ष्म जानकारी और प्रशिक्षण दी जा रही है कि वर्षों तक यह क्रम चलता रहता है। हर वर्ष उसकी नयी-नयी तकनीक खोजी जाती है। नये-नये आधुनिक हथियार, नये-नये टैंक सामने आ रहे है। हिंसा के प्रशिक्षण के लिए प्रचार-प्रसार पर मुट्ठी भर निहित स्वार्थी शक्तियों द्वारा अकूत संसाधन लगाये जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में मन में एक विकल्प उठता है कि इतनी ट्रेनिंग दी जाती है, तो क्या अहिंसा प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है?


निश्चय ही आवश्यकता तो है पर सवाल यह है कि उसे पूरा कैसे किया जाये? क्या केवल धर्मशास्त्रों के पढ़ने मात्र से अहिंसा जीवन में उतर आयेगी? क्या केवल प्रवचन सुनने मात्र से अहिंसा का जीवन में अवतरण हो जायेगा? नहीं। उसके लिए हमें अहिंसा के प्रशिक्षण पर विचार करना होगा। यह सोचना होगा कि हिंसा के क्या कारण हैं, तथा कैसे उनका निवारण किया जा सकता है। हिंसा के दो कारण हैं- आंतरिक एवं बाहरी।
हिंसा के आंतरिक कारण में सबसे बड़ा पोषक कारण है-तनाव। वही आदमी हिंसा करता है, जो तनाव से ग्रस्त रहता है। हिंसा का दूसरा पोषक कारण है-रासायनिक असंतुलन। हिंसा केवल बाहरी कारणों से ही नहीं होती, उसके भीतरी कारण भी होते हैं। हमारी ग्रंथियों में जो रसायन बनते हैं, उन रसायनों में जब असंतुलन पैदा हो जाता है, तब व्यक्ति हिंसक बन जाता है। हिंसा का तीसरा पोषक कारण है- नाड़ी तंत्रीय असंतुलन. नाड़ी तंत्रीय असंतुलन होते ही आदमी हिंसा पर उतारू हो जाता है। हिंसा का चौथा कारण है- निषेधात्मक दृष्टिकोण। घृणा, ईर्ष्या, भय, कामवासना ये सब निषेधक दृष्टिकोण हैं। उनसे भावतंत्र प्रभावित होता है और मनुष्य हिंसा में प्रवृत्त हो जाता है।
आज युवाओं के सामने ऐसे आदर्श व्यक्तित्वों की कमी है, जिसे वो अपना आदर्श व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार कर सकें। महात्मा गांधी हर पीढ़ी के युवाओं के आदर्श रहे हैं, एवं होने भी चाहिए। वर्तमान में हमारा समाज सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे दौर में सरकारों को चाहिए कि सामाजिक परिवर्तनों को सही दिशा देने में गांधीजी के सिद्धांतोंको जन-जन तक पहुंचाने के साथ-साथ अहिंसा प्रशिक्षण के लिए भी पृष्ठभूमि तैयार करनी चाहिए। ताकि देश के युवाओं को अहिंसा प्रशिक्षण देकर स्वस्थ समाज निर्माण की दिशा में अग्रसर किया जा सके।

डॉ. वीरेन्द्र भाटी मंगल

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