भारत की मिट्टी की विशिष्टता और बंदा बैरागी

स्वतंत्रता और भारती का संबंध गहन है बड़ा ,
स्वतंत्रता का संदेश विश्व ने भारत से है पढ़ा ।
उपदेश हमको आज जो दे रहे हैं संविधान का , अस्तित्व उनका भी हमारे वेद के कारण है खड़ा ।।

विश्व को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाने वाला भारत है । अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि यदि भारत विश्व को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाने वाला है तो यह स्वयं पराधीन क्यों हुआ ? इसका उत्तर यह है कि भारत के स्वराज्य संबंधी चिंतन को जब घुन लगने लगा और भारत की स्वतंत्रता प्रेमी संस्कृति को जब दुर्योधन जैसे लोगों ने मसलना आरंभ कर दिया तो यहां पर दुर्योधनवादी शक्तियों का प्राबल्य हुआ । जिसके कारण धीरे-धीरे हमारी स्वतंत्रता प्रेमी चिंतनधारा बाधित होने लगी। इससे वेद ज्ञान की निर्मल धारा प्रभावित हुई और उसमें वैचारिक प्रदूषण बढ़ने लगा। फलस्वरूप महाभारत के युद्ध के पश्चात भारत में अनेकों संप्रदायों का जन्म हुआ । प्रत्येक संप्रदाय मनुष्य के मूल धर्म की एक विकृति है। धर्म में किसी प्रकार की प्रतियोगिता का लक्षण दिखाई नहीं देता । धर्म तो शांत समुद्र की भाँति है । जबकि संप्रदायों में ‘ सबसे श्रेष्ठ कौन ‘ – की प्रतियोगिता मिलती है । जिसके कारण प्रत्येक संप्रदाय विपरीत संप्रदाय वालों के लिए प्राणघातक बन जाता है ।
धीरे-धीरे यह संप्रदाय विश्व के अन्य देशों में भी जन्म लेने लगे । भारत के संप्रदाय तो फिर भी उदारवादी थे । क्योंकि उनका चिंतन कहीं ना कहीं वेद से मिलता जुलता था या वे वेद को ही अपना आदर्श बना कर चलना चाहते थे , परंतु भारत से बाहर जिन संप्रदायों का जन्म हुआ , उन्होंने वेद और वैदिक संस्कृति को मिटाने के लिए उठ खड़े होने में ही अपना लाभ देखा । कहने का अभिप्राय है कि वे पहले दिन से ही वेद और वैदिक संस्कृति को मिटाने के उद्देश्य से आगे बढ़े । भारत से बाहर जन्मे इन संप्रदायों की इस मानसिकता को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मानवता के विनाश का जब समय आया तो उसने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए अपने ही गुरु को अर्थात विश्वगुरु भारत को ही मिटाने का संकल्प ले लिया । इसी को दूसरी भाषा में यह भी कहा जा सकता है कि जब गीदड़ के दिन खराब आते हैं तो वह गांव की ओर भाग लेता है । इस्लाम और ईसाइयत दोनों ही मानवता के विरुद्ध उठ खड़े होकर भारत और भारत से प्रेरित शक्तियों को मिटाने का संकल्प लेकर अपने अपने घर से चले । उन्होंने संसार पर अपना एक छत्र साम्राज्य स्थापित कर भारतीय संस्कृति का विनाश करने को ही अपना लक्ष्य बना लिया । इससे संपूर्ण भूमंडल पर अधिकारों की आपाधापी मच गई ।
भारत की ओर इस्लाम का क्रूर पंजा बढ़ने लगा और इसके सीमावर्ती क्षेत्रों पर अपना शिकंजा कसते हुए इसको नष्ट – भ्रष्ट करने लगा। भारत पर इस्लाम के इस आक्रमण को राजनीतिक संदर्भ में देखना मूर्खता होगी । यद्यपि हमें इस्लाम के भारत पर आक्रमण को केवल राजनीतिक आक्रमण के रूप में ही दिखाने का प्रयास किया गया है । इतिहासकारों ने देश के साथ छल करते हुए इस्लाम की अच्छाइयों को भारत की सांस्कृतिक रूप से समृद्ध परंपरा की अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया है । जिससे भारत में तथाकथित ‘ गंगा जमुनी संस्कृति ‘ का विकास हो सके और इस्लाम को यहां पर आज भी एक ‘अच्छाई ‘ के रूप में स्वीकार करने की सोच को विकसित किया जा सके । इतिहासकारों ने अपने इस प्रयास में इस्लाम के बादशाहों के सारे नरसंहारों की लम्बी श्रृंखला को और नारी जाति के साथ किए गए क्रूर , पाशविक और जघन्यतम अपराधों को भी क्षम्य मान लिया है ।
वास्तव में इस्लाम का भारत पर आक्रमण सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भारत को नष्ट – भ्रष्ट कर देना था । इसके धर्म को मिटा देना था । इसकी संस्कृति को मिटा देना था और इसके सभी धर्म ग्रंथों को आग के हवाले कर देना था । इस्लाम और ईसाइयत की ऐसी सोच के चलते संसार में आपाधापी का परिवेश सृजित हुआ । सब एक दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने पर उतारू हो गए । देशों की संस्कृतियों को मिटा कर डाकू संस्कृति का प्रचलन करने पर बल दिया जाने लगा। इससे सारे विश्व की व्यवस्था अस्त-व्यस्त होकर रह गई । इस अस्त-व्यस्तता का वैश्विक – व्यवस्था के साथ – साथ भारत पर भी दुष्प्रभाव पड़ा । फलस्वरूप भारत पर अनेकों विदेशी आक्रमणकारियों ने हमला करना आरंभ कर दिया । उन सब विदेशी आक्रमणकारियों का उद्देश्य भारत की महान सांस्कृतिक विरासत को नष्ट – भ्रष्ट कर यहां पर अपनी संस्कृति को स्थापित करना था।
अपने साथ विदेशी आक्रमणकारियों के होने वाले इस व्यवहार को देखकर बहुत देर तक तो भारत हतप्रभ सा खड़ा रहा। वह समझ नहीं पाया कि उसके मानवतावाद पर इस प्रकार का दानवतावादी डाकू दल हमला भी कर सकता है ? परंतु यह भी एक सत्य है कि भारत को संभलने में अधिक समय नहीं लगा । यहां पर एक से एक बढ़कर राजा दाहिर और पोरस की परंपरा के अनेकों सैनिक योद्धा , राजा – महाराजा और जनसाधारण से जुड़े हुए अनेकों वीर , मां भारती के ऐसे सपूत खड़े थे , जिन्होंने चिरकाल तक अपने प्राणों का उत्सर्ग करते रहकर भारत की स्वतंत्रता की रक्षा करने का संकल्प ले लिया।

भारत सबके लिए लड़ा

जब भारत अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा था तो उसका यह लड़ना केवल अपनी स्वतंत्रता के लिए नहीं था , अपितु वह वैश्विक स्वतंत्रता के लिए लड़ रहा था। वह संपूर्ण भूमंडल पर अपनी उसी वैदिक संस्कृति की महान परंपरा का साम्राज्य स्थापित हुआ देखना चाहता था ,जो भूमंडल पर छाई दानवी संस्कृति को मिटाना अपना उद्देश्य मानती थी । भारत के चिरकालीन स्वतंत्रता समर को इसी दृष्टिकोण से व्याख्यायित और स्थापित करके देखने की आवश्यकता है।

हम स्वार्थवाद को त्यागकर विश्व पोषक थे सभी ,
करते थे प्रतिकार उनका जो विश्व शोषक थे कभी । अधर्म की वृद्धि के लिए हमने रचाये थे समर ,
अधर्म मिटाने के लिए लिये महा संकल्प भी ।।

इस्लाम के आक्रमण अपने जन्म के कुछ कालोपरांत ही न केवल भारत पर होने लगे थे ,अपितु विश्व के अन्य देशों को भी वह अपने तेज अंधड़ से मिटाने लगे थे । यह एक प्रकार से आज के वैश्विक आतंकवाद से भी अधिक भयानक वैश्विक आतंकवाद की काली छाया थी। यदि ईमानदारी से देखा जाए तो उस समय के इस वैश्विक आतंकवाद से लड़ने वाला केवल और केवल भारत ही था , या वे शक्तियां थीं जो भारत की मानवतावादी संस्कृति से प्रेरणा लेकर इन वैश्विक आतंकवादियों को मिटा देना मानवता की सेवा करना समझती थीं। इतिहास को इस प्रकार सच के साथ यदि प्रस्तुत किया जाएगा तो बहुत कुछ समस्याओं का समाधान तो होगा ही साथ ही हमें बीते हुए कल की अनेकों सच्चाइयों का ज्ञान भी होने लगेगा । तब हमें यह भी ज्ञात हो जाएगा कि भारत में बंदा वीर बैरागी जैसे अनेकों योद्धा क्यों अपनी आत्मोन्नति के मार्ग को छोड़कर मानवोन्नति व राष्ट्रोत्थान को लक्ष्य बनाकर युद्ध के मैदान में उतर आए थे ? निश्चय ही उनका लक्ष्य भारत को पुनः विश्व गुरु बना देना था और भारत की उस मानवहितकारी शासकीय नीति को संपूर्ण भूमंडल पर स्थापित कर देना था जो किसी भी जाति ,संप्रदाय , क्षेत्र के लोगों को किसी दूसरी जाति , संप्रदाय या क्षेत्र के लोगों के अधिकारों का अतिक्रमण करने से रोकती है ।
इस प्रकार भारत के यह सभी योद्धा जिस समय इस्लाम या उसके पश्चात ईसाइयत की तलवार का सामना कर रहे थे , उस समय वह भारत के प्राचीनकाल के चक्रवर्ती साम्राज्य को स्थापित कर आधुनिक समय की संयुक्त राष्ट्र की धारणा को वैश्विक समस्याओं के समाधान के संदर्भ में स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। वह चाहते थे कि विश्वशांति के लिए एक ऐसी वैश्विक सरकार गठित हो या ऐसा वैश्विक मंच तैयार हो जो किसी को भी किसी दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने से रोके । जब हमारे बप्पा रावल ने अपना साम्राज्य ईरान तक स्थापित किया और जब ललितादित्य मुक्तापीड़ ने कश्मीर से चलकर इसी प्रकार दूर तक धावा बोला , तब उनके इन अभियानों का अर्थ समझने की आवश्यकता थी। आज के इतिहासकारों को हमारे इन बप्पा रावल और ललितादित्य मुक्तापीड़ जैसे अनेकों शासकों के साथ न्याय करते हुए इसी दृष्टिकोण से इतिहास को लिखना होगा । उनकी नीतियों को समझने की आवश्यकता है । जिनमें कहीं पर भी नरसंहार का कोई एक भी आदेश अंतर्निहित नहीं था। इसके विपरीत उनके यह अभियान उन विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध थे जो नरसंहार को अपना सबसे बड़ा हथियार मानते थे।
भारत की जिजीविषा इतनी प्रबल रही कि वह कभी पराधीन नहीं हुआ अपितु पराधीन करने वाली शक्तियों के साथ युद्धरत रहा।

भारत की मिट्टी की विशिष्टता

भारत को गुलाम करने वाली शक्तियों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली शक्तियों में पंजाब की गुरु परंपरा का भी विशेष योगदान रहा । भारत का अध्यात्म सदा ही हमें आत्मिक रूप से बल प्रदान करने वाला रहा है । यहां पर हर गुरु ने अपने शिष्य को आत्मरक्षा करना पहले सिखाया है वैसे भी हमारे यहां पर अन्याय के विरुद्ध लड़ना या उठ खड़ा होना प्राचीन काल से शिक्षा के एक आवश्यक अंग के रूप में स्वीकार किया गया है। भारत की संस्कृति की इसी पृष्ठभूमि में जब हम खड़े होकर देखते हैं तो हमें यह सहज ही अनुमान हो जाता है कि यहां पर अनेकों बंदा वीर बैरागी , छत्रसाल , शिवाजी या उन जैसे अनेकों योद्धाओं का निर्माण क्यों होता रहा ?
वास्तव में भारत की मिट्टी में ही वह विशिष्टता है जो ऐसे योद्धाओं का निर्माण स्वयं ही करती रहती है । यह जिसको भी लग जाती है उसी के भीतर देशभक्ति का ऐसा संचार कर देती है कि वह जीवन भर अपनी इस पवित्र भूमि को माता कहकर पुकारता रहता है और इसके ऋण से उऋण होने के लिए यदि उसके सम्मुख कोई भी अवसर आता है तो उसे वह चूकना नहीं चाहता। भारत की देशभक्ति की इस महान परंपरा का सामना संसार का कोई भी देश नहीं कर पाया । कारण कि संसार के अन्य देश अपने देश की मिट्टी को केवल मिट्टी मानते हैं , उसे माता नहीं मानते । देश की मिट्टी को माता मानकर उसे माथे पर तिलक के रूप में लगाना तो केवल भारत की ही अनोखी और निराली परंपरा है ।
क्या संसार के किसी अन्य देश की मिट्टी में इतनी शक्ति है कि उसके चार रजकण माथे पर लगते ही माथे में इतनी शक्ति उत्पन्न कर देते हैं कि वह किसी के सामने झुक नहीं पाता और यदि किसी ने उसे झुकाने का प्रयास किया तो वह उसी की गर्दन को उड़ाने का साहस कर बैठता है ? नहीं , यह विशेषता केवल भारत की मिट्टी में है । और इसका कारण केवल यह है कि भारत ने ही मिट्टी को चंदन मानकर उसका तिलक लगाने की महान परंपरा प्राचीन काल से प्रारंभ की । देशभक्ति जगाने का इससे सस्ता और सच्चा सौदा कोई नहीं हो सकता । जो लोग ‘सच्चा सौदा ‘ का व्यापार करते हैं उन्हें भारत के इस ‘ सस्ते और सच्चे सौदे ‘ का गंभीर अर्थ समझना चाहिए । साथ ही जो लोग ‘सच्चा सौदा ‘ का उपहास उड़ाते हैं , या उसे पाखंड समझते हैं , उन्हें भारत की मिट्टी के इस ‘सच्चे और सस्ते सौदा ‘ की सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए । भारत की मिट्टी की यह विशिष्टता उस भारतीय संस्कृति की देन है जो कण – कण में शंकर का निवास देखती है , कण-कण में ईश्वर का वास देखती है , और कण- कण में ब्रह्म का नाद होता हुआ अनुभव करती है। इसलिए भारत की मिट्टी के रज कणों में ब्रह्म समाविष्ट है ,ईश्वर का वास है ,शंकर का वास है । ब्रह्म , ईश्वर और शंकर की इस त्रिवेणी में स्नान करना केवल भारत के लोगों ने ही सीखा है ,और जब वह इस त्रिवेणी में स्नान करते हैं तो अपने आप को ऐसी असीम ऊर्जा के केंद्र के साथ जुड़ा हुआ देखते हैं जो उन्हें आग में कूद जाने का भी हौसला प्रदान कर देती है । पहाड़ों को विजय करना , समुंद्र को लांघना और चंदा से मामा कहकर बात करना , यह केवल भारत की माताओं के दूध की लोरियां का गाना मात्र नहीं है , इसमें इस सनातन राष्ट्र की संस्कृति के गहरे मूल्य छिपे हुए हैं। जिन्हें समझना आज भी संसार के लिए कौतूहल और जिज्ञासा का विषय हो सकता है परंतु भारत की संस्कृति को समझने वाले भारत के किसी बच्चे के लिए भी यह बड़ी बात नहीं है।
भारतीय संस्कृति की इस विलक्षणता के कारण ही जब – जब देश पर संकट आया तब – तब अनेकों बंदा वीर बैरागी अपनी समाधि को छोड़कर राष्ट्र की समाधि की रक्षा के लिए उठ खड़े हुए । अतः बंदा बैरागी के निर्माण के लिए उत्तरदायी कारकों को खोजने से पहले भारतीय संस्कृति की इस विलक्षणता को समझना बहुत आवश्यक है। भारतीय संस्कृति की यह विलक्षणता नहीं होती कि वह स्वतंत्रता पर प्रत्येक मानव का अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानती है और संसार के प्रत्येक मानव की ही नहीं अपितु प्रत्येक प्राणी की भी स्वतंत्रता की समर्थक है , तो भारत अपनी स्वाधीनता को बहुत पहले ही खो देता ।
भारत में संन्यासी लोगों को निकम्मा और देश व समाज के लिए कुछ न करने वाले व्यक्ति के रूप में देखने की परंपरा भी विदेशियों की भारत को देन है। वास्तव में यह संन्यासी लोग भारत का प्राचीन काल से मार्गदर्शन करते आए हैं । संन्यास में जाकर व्यक्ति स्वार्थवाद की सभी सीमाओं से ऊपर उठ जाता है और परमार्थ उसके चिंतन का एक आवश्यक अंग बन जाता है। इस पारमार्थिक चिंतन से ही वह राष्ट्र की उन्नति के सरल और गंभीर उपाय अपने राजा और अपने देशवासियों को प्राचीन काल से बताते आए हैं ।
जब देश पराधीनता के पराभवपूर्ण काल में प्रविष्ट हुआ तो उस समय भी अनेकों संन्यासियों ने राजनीति का मार्गदर्शन वैसे ही किया जैसे वे प्राचीन काल से करते आ रहे थे । यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘ राजा दार्शनिक और दार्शनिक राजा होना चाहिए ‘ – यह चिंतन भारत के चाणक्य ने ही समस्त भूमंडल के लोगों को दिया है। जिसे आज के सभी राजनीतिक मनीषी एक आदर्श के रूप में स्वीकार करते हैं । अतः ऐसे में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि राजा दार्शनिक तभी होगा जब वह संन्यस्त भावों से ओतप्रोत होगा । यही कारण है कि राजनीति में संन्यस्त भावों का सम्मेलन भारत की राजनीति का एक अनिवार्य गुण है। आज भारत की राजनीति इसलिए ही विकृति को प्राप्त है कि इसमें संन्यस्त भावों का अभाव हो गया है ।
हमारा मानना है कि जब बंदा बैरागी अपने संन्यास को छोड़कर देश के लिए सामने आए तो उनका यह कार्य देश की राजनीति को उत्कृष्टता देना तो था ही साथ ही भारत के समाज में दानवी संस्कृति के कसते शिकंजे को समाप्त करना भी उनका एक प्रमुख लक्ष्य था । अपने इस चरितनायक के जीवन की महानतम घटनाओं को इतिहास में उचित स्थान देने का अवसर अब आ गया है । अगले अध्यायों में हम अपने इस चरितनायक के जीवन की एक – एक घटना पर प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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