लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ”शादाब”

 

सचिन जैसे देश के सपूत को देश के सब से बडे नागरिक सम्मान ” भारत रत्न” देने की मांग यूं तो काफी पहले से की जा रही है किन्तु क्रिकेट वर्ल्ड कप 2011 जीतने के बाद से पूरा राष्ट्र एक सुर में कह रहा है कि सरकार जल्द से जल्द सचिन को ये सम्मान देकर इस सम्मान की अजमत में और चार चांद लगा दें। पर हमारे तुम्हारे चाहने से कुछ नहीं होगा। दरअसल सचिन को ये सम्मान देने के लिये सरकार को कुछ कायदे कानून बदलने होंगे। जो कि कोई मुश्किल काम नही है। 2 जनवरी 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डा0 राजन्द्र प्रसाद जी ने जब ये पुरस्कार स्थापित किया तो मूल कानून में ”भारत रत्न” मरणोपरान्त देने का प्रावधान नहीं था। लेकिन जनवरी 1955 में इस पुरस्कार में ”भारत रत्न” मरणोपरान्त देने का प्रावधान जोड़ दिया गया और इसके बाद दस से अधिक लोगों को ”भारत रत्न” सम्मान मरणोपरान्त दिया जा चुका है। जिस में से एक मात्र भारतीय हस्ती नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जी को दिया गया यह अंलकरण वापस लिया जा चुका है। उन को यह पुरस्कार देने की घोषणा 1992 में मरणोपरान्त की गई थी लेकिन पुरस्कार समिति ये साबित नहीं कर सकी कि नेता जी का निधन हो चुका है।

13 जुलाई 1977 को भारत रत्न सहित तीन और अन्य सम्मान पद्वम विभूषण, पद्वम भूषण और पद्म श्री पुरस्कारों को उस समय खिताब के तौर पर देखा जा रहा था। देश के संविधान के अनुच्छेद 18 के तहत उस समय खिताब देने की देश में पाबंदी थी। यह प्रावधान और पाबंदी अग्रेजी शासन के समय दी गई लोगों को उपाधियां खत्म करने के लिये लगाई गई थी। अंग्रेजी शासन में ”हिज हाईनेज”, राजा दीवान , बहादुर और राय बहादुर जैसे खिताबों से लोगो को नवाजा जाता था। लेकिन बाद में जब उच्चतम न्यायालय ने बालाजी राघवन बनाम भारत सरकार मामले में इन राष्ट्रीय पुरस्कारों को वैध ठहराया और व्यवस्था दी की यह पुरस्कार खिताब नहीं बल्कि शासन की ओर से दिया जाने वाला सम्मान है। इस के बाद 26 जनवरी 1980 से भारत रत्न समेत सभी चारों पुरस्कारो को शुरू कर दिया गया था। अभी तक 41 व्यक्तियों को यह सम्मान दिया जा चुका है जिन में दो विदेशी नागरिक दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति डॉ. नेल्सन मंडेला और मदर टेरेसा का नाम शामिल है। इन 41 व्यक्तियों में कोई भी खिलाड़ी नहीं है। वजह इस पुरस्कार देने के नियम इन नियमों के हिसाब से भारत रत्न सम्मान कला, साहित्य, और विज्ञान के विकास में असाधारण सेवा के लिये तथा सर्वोच्च स्तर की जनसेवा की मान्यता स्वरूप दिया जाता है। इस पुरस्कार नियमावली में बिना संशोधन किये सचिन कभी भी फिट नहीं बैठेंगे। देश के पद्म पुरस्कारों के संबधित नियमों के तहत यह पुरस्कार सभी प्रकार की गतिविधियों के क्षेत्रो जैसे कि कला साहित्य, शिक्षा, खेलकूद, चिकित्सा, सामाजिक कार्य, विज्ञान और इंजीनियरी, सार्वजनिक मामले आदि क्षेत्रो में दिये जाते है इसीलिये इनके नियमों के तहत सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण और खेल के क्षेत्र में दिये जाने वाला राजीव गांधी सर्वोच्च खेल सम्मान ”राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार” सचिन को पहले ही दिया जा चुका है। आज जब सचिन को भारत रत्न देने की मांग उठी है तो अब सरकार को यह निर्णय लेना होगा कि क्या भारत रत्न को खेल से भी जोड़ा जाये। गृह मंत्रालय को इस तरह का एक प्रस्ताव कैबिनेट के सामने रखना होगा। कैबिनेट मंत्रिमण्डल की स्वीकृति के बाद नियमों में संशोधन कर गृह मंत्रालय सचिन ही नही बल्कि किसी खिलाड़ी को खेल में असाधारण सेवा के लिये खिलाडी को भारत रत्न देने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

5 जनवरी 1971 को जब एकदिवसीय क्रिकेट की शुरूआत हुई थी तो किसी ने यह सोचा भी नहीं होगा कि सचिन नाम का कोई बल्लेबाज क्रिकेट का भगवान बनकर क्रिकेट कि दुनिया का हर रिकॉर्ड अपने नाम कर लेगा। दरअसल क्रिकेट वो खेल है जिस में मैच की आखिरी गेंद पर भी चमत्कार हो सकता है। 16 साल के सचिन ने जब पाकिस्तान की धरती पर अपने कैरियर की शुरूआत की थी तब क्रिकेट के विशेषज्ञों ने सचिन को तुनक मिजाज क्रिकेटर बताया था। और जोखिम वाले शॉटस खेलने की उन की आदत को देखते हुए उस वक्त क्रिकेट के समीक्षक अन्दाजा लगा रहे थे की ये बच्चा क्रिकेट के मैदान पर लम्बी रेस का घोडा नहीं बन पायेगा। लेकिन अपने क्रिकेट कैरियर में जितनी खूबसूरत और यादगार पारिया सचिन ने खेली है वो गवाह है इस महान बल्लेबाज की गवाही देने के लिये की आज तक के क्रिकेट इतिहास में ऐसा महान बल्लेबाज दुनिया में पैदा नहीं हुआ।

ये सब यू अचानक ही नहीं हुआ। अपने क्रिकेट गुरू रमाकांत अचरेकर की देखरेख में सचिन ने मुम्बईया उमस और कड़ी धूप में घन्टों अभ्यास किया। वैसे एक हकीकत यह भी है कि मेहनत और अभ्यास तो सभी करते है फिर सारे क्रिकेटर सचिन क्यों नहीं बने, तो यहां ये कहना पडता है कि सचिन में एक मैजिक टच दिखता है। तकनीक, निरंतरता और मजबूत एकाग्रता सचिन में अपने खालिसपन के साथ मौजूद है। आज बीस साल के उन के क्रिकेट कैरियर में दुनिया का कोई भी गेंदबाज उन की कमी को नहीं भांप सका। उन की मैदान पर एकाग्रता देखने वाली होती है। शतक पूरा करने के बाद भी ऐसा महसूस होता है कि सचिन ने पारी की शुरूआत अभी की है। पीठ की चोट हो कंधे की चोट या टेनिस एल्बो की चोट सचिन की रनो की भूख कोई चोट नहीं रोक पाई। वन डे हो या टेस्ट क्रिकेट आज सचिन तेन्दुलकर रनों के माऊन्ट ऐवरेस्ट पर बैठे है। वन डे क्रिकेट में 99 शतकों का विश्‍व रिकार्ड इन के नाम दर्ज हो गया है। ये शतक एक ओर जहॉ उन्हें रन मशीन का खिताब देते है। साथ ही क्रिकेट की दुनिया में अकेले बल्लेबाज की बादशाहत का सचिन उदाहरण है। क्रिकेट के मैदान में रोज रोज खिलाडियों में तू-तू मैं-मैं सुनने और देखने को मिलती है पर सचिन को आज तक किसी भी क्रिकेट प्रेमी ने संयम खोते या किसी छोट या बडे खिलाड़ी के साथ उलझते हुए नहीं देखा होगा। विश्‍व रिकार्डों के अलावा सचिन के व्यवहार ने भी उन्हें महान बनाया है। सचिन के कैरियर में अम्पायरों द्वारा कई बार उन्हें गलत आउट दिया गया और सचिन ने हर बार अम्पायर के गलत निर्णय का भी स्वागत किया, मान रखा और बिना कुछ कहे पवेलियन चले गये। सचिन के खेल और व्यक्तित्व का ही जादू है कि डॉन ब्रैडमैन, शेन वॉर्न, गैरी सोबर्स, ब्रायन लारा, रिचर्ड हेडली, विवि रिचडर्स, सईद अनवर, जावेद मियॉदाद, जैसे क्रिकेट के दिग्गज सचिन के कायल रहे है। सचिन ने खेल को हमेशा खेल की भावना से खेला है।

आज सचिन बुलन्दी के जिस शिखर पर पहुंच चुके है उन्हें वहां तक पहुंचाने में सचिन के आलोचकों का बहुत बड़ा योगदान है क्योंकि जब जब मीडिया या क्रिकेट पंडितों ने सचिन के खेल की ये कहकर आलोचना की कि अब सचिन थक गये है, उन में वो क्षमता नहीं रही, उन का खेल फीका पड़ने लगा है। सचिन दबाव के दौरान अपना बेहतर प्रर्दशन नहीं कर पाते है और उन में लम्बी पारियां खेलने की क्षमता अब नहीं रही है तब तब सचिन और अच्छा खेले है। हाल ही में सम्पन्न हुए वर्ल्ड कप में सचिन ने दिखाया कि उन में रन बनाने की भूख और अपने आलोचकों को जवाब देने का दम अभी बाकी है।

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