भारत बनाम चीन

। लेकिन सबसे बड़ा सच यह है कि यह पं. जवाहरलाल नेहरु के वक्त का भारत नहीं है, यह नरेन्द्र मोदी के वक्त का भारत है। चीन के ज्यादा शक्तिशाली होने और ज्यादा संख्याबल होने के बाबजूद भारत बखूवी चीन का मुकाबला कर सकता है। लोगों को यह पता होना चाहिए कि संख्याबल से ही युद्ध नहीं जीते जाते। चाहे वह फौजों की संख्या हो या हथियारों की संख्या हो। दुनिया में इसका सबसे बड़ा उदाहरण इजरायल है, जो संख्या में बहुत कम होने के बाबजूद कई बार अरब देशों की विशाल सेनाओं को बुरी तरह पराजित कर चुका है।


वीरेन्द्र सिंह परिहार
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भले ही यह कहें कि भारत और चीन के बीच लंबा सीमा विवाद होते हुए भी विगत 50 वर्षों से दोनों के बीच एक गोली नहीं चली। पर हकीकत यही है कि चीन का भारत के प्रति शत्रु-भाव सतत् कायम है। भारत की एन.एस.जी. पर सदस्यता को लेकर वह बराबर अवरोध तो बनाए ही हुए है, मसूद अख्तर जैसे कुख्यात आतंकवादी को भी सरंक्षण दे रहा है। बाबजूद इसके कि चीनी वस्तुओं के निर्यात से चीन प्रतिवर्ष भारत से अरबों रुपयों की आमदनी कर रहा है। ताजा विवाद डोकलाम का है जहां 16 जून से दोनों सेनाएॅ आमने-सामने हैं। डोकलाम तिब्बत-भूटान और सिक्किम के त्रिकोण पर स्थित है। चीन यहां पर सड़क बनाने की तैयारी में आया था, जिसे भारतीय सैनिकों ने सफल नहीं होने दिया। उल्लेखनीय है कि यदि चीन यहां सड़क बना लेता तो भूटान समेत उसके उत्तरी-पूर्वी राज्य खतरे की जद में आ जाएंगे। क्योंकि सिलीगुड़ी गलियारा जिसे चिकननेक भी कहते हैं, यहां से मात्र 50 कि.मी. दूर है। यहां पर चीन द्वारा सड़क बनाने से उसकी फौजें कभी भी सिलीगुड़ी गलियारा को भारत से काट सकती है। चीन का कहना है कि विवादित इलाके पर चीन और भूटान का दावा है फिर भारत उसमें क्यों हस्तक्षेप कर रहा है? जबकि भारत की भूटान से मैत्री संधि है, जिसके तहत भारत, भूटान की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। चीन ने इस बीच भारत को तरह-तरह से धमकाने और दबाव डालने का प्रयास किया ताकि भारतीय फौजें डोकलाम से हट जाएं।

कभी 1962 की याद दिलाई, तो कभी जबरजस्ती भारतीय फौजों को हटा देने को कहा। कभी ये कहा कि भारत के इस रवैए के चलते वह सिक्किम को भारत में हुए विलय को स्वीकार नहीं करेगा और वहां अलगाववाद को हवा देगा। कभी कहा कि यदि भारत भूटान के पक्ष में इस तरह से खड़ा होता है, तो वह भी कश्मीर मामले में पाकिस्तान के साथ खड़ा हो सकता है। जैसा कि रक्षामंत्री अरुण जेटली ने कहा कि हमें चीन 1962 की याद न दिलाए, भारत अब 1962 का भारत नहीं है। चीन का भी कहना है कि वह भी 1962 का चीन नहीं है। दोनों ही बात सच है। यह भी सच है कि चीन अब भी भारत की तुलना में आर्थिक और सामरिक दृष्टि से ज्यादा शक्तिशाली देश है। लेकिन सबसे बड़ा सच यह है कि यह पं. जवाहरलाल नेहरु के वक्त का भारत नहीं है, यह नरेन्द्र मोदी के वक्त का भारत है। चीन के ज्यादा शक्तिशाली होने और ज्यादा संख्याबल होने के बाबजूद भारत बखूवी चीन का मुकाबला कर सकता है। लोगों को यह पता होना चाहिए कि संख्याबल से ही युद्ध नहीं जीते जाते। चाहे वह फौजों की संख्या हो या हथियारों की संख्या हो। दुनिया में इसका सबसे बड़ा उदाहरण इजरायल है, जो संख्या में बहुत कम होने के बाबजूद कई बार अरब देशों की विशाल सेनाओं को बुरी तरह पराजित कर चुका है। हकीकत यही है कि जहां तक आधुनिकतम हथियारों का प्रश्न है भारत व चीन में उन्नीस-बीस का ही मामला है। फिर भारत कुछ मामलों में बीस भी है। जैसे इजरायल की दी हुई अवाक्स मिसाईल प्रणाली जिसकी कोई काट नहीं है और जो चीन के पास नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि आज नरेन्द्र मोदी जैसे दृढ़ता से भरपूर और देशभक्ति से ओतप्रोत राजनेता का नेतृत्व भारत को प्राप्त है और ऐसे नेतृत्व युद्ध के क्षणों में निर्णायक साबित होते हैं। जैसे कि द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन को बिस्टन चर्चिल के नेतृत्व के चलते विजयश्री की प्राप्ति हुई थी। सच्चाई यह है कि मोदी सरकार के तीन वर्ष की सघन तैयारियों के चलते भारतीय सेना चीन समेत किसी भी सेना से सफलतापूर्वक लोहा ले सकती है। बड़ी बात यह कि आज विश्व का शक्ति संतुलन भारत के पक्ष में है। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका भारत से रक्षा-संधि से बंध चुका है। इजरायल जैसा लड़ाका और आधुनिकतम तकनीक से लैश देश भारत का अभिन्न सहयोगी है। ऐसी स्थिति में चीन को भारत पर युद्ध थोपने के लिए हजार बार सोचना पड़ेगा। खासकर के तब जब दक्षिण चीन सागर में चीन की सरहंगई के चलते अमेरिका उससे हिसाब बराबर करने को तैयार बैठा हो।

वस्तुतः चीन की समस्या यह है कि भारत यू.पी.ए. सरकार के दौर की तरह उसके दबाव में आने को तैयार क्यों नहीं है? वह अमेरिका और इजरायल जैसे देशों से मजबूत संबंध क्यों बना रहा है? वह चीन से असंतुष्ट और पीड़ित राष्ट्रों के साथ जैसे जापान, वियतनाम वगैरह के साथ नजदीकी संबंध क्यों बना रहा है? वह अमेरिका और जापान के साथ मिलकर मालाबार तट में सैन्य अभ्यास क्यों कर रहा है? जबकि ऐसे अभ्यासों का मतलब ही यह है कि जरूरत पड़ने पर ऐसे मित्र देश युद्ध में भारत के साथ खड़े होंगे। ऐसी स्थिति में शायद पाकिस्तान के अलावा और कोई राष्ट्र चीन के साथ खड़ा नहीं होगा। चीन इससे भी परेशान है कि चीन से पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट तक पहंुचने के लिए जो ओ.आर.बी. बनाई जा रही है, भारत उसका विरोध कर सार्थक विकल्प क्यों ढूने वाले चीन को भारत की यह महती भूमिका सहन नहीं हो पा रही है।

यह भी बताना प्रासंगिक होगा कि 2014 में चीन ल्हासा से सिक्किम के पास तक अपना रेलवे नेटवर्क कायम कर चुका है, अब उसे वह चुम्बी वैली के मुहाने तक लाना चाहता है। चीन की थीसिस है कि भूटानी, सिक्किमी, लद्दाखी सभी मिलकर एक एकीकृत तिब्बती परिवार बनाते हैं। इस तरह से ये सभी तिब्बत से संबंधित है और इस तरह से महान मातृभूमि चीन से संबंधित है। वस्तुतः भारत और भूटान का संबंध नाभिनाल का संबंध है, जो कि किसी भी तरह से पृथक्करणीय नहीं है। पर चीन का दावा है कि भूटान और लद्दाख भी चीन के हिस्से हैं। अब जरुरत इस बात की है कि भारत भी एक चाइना पाॅलिसी से अपना स्टैण्ड बदले और तिब्बत को चीन का हिस्सा मानने से इन्कार कर दे। इतना तो तय है कि चीन से अब बातचीत और सुलह-समझौता का कोई रास्ता नहीं है। मात्र शक्ति की भाषा ही पाकिस्तान की तरह चीन भी समझ सकता है। एक आत्मविश्वास युक्त और शक्ति सम्पन्न तथा विश्व राजनीति का संतुलन भारत के पक्ष में होने के चलते भारत को चीन से कही भी अपने हितों के विपरीत झुकने की आवश्यकता नहीं है। आज के दौर में इतना ही कहा जा सकता है कि मोदी के दौर में भारत अब वह भारत नहीं है, जब चीन आएदिन सीमाओं में अपनी धौस और दादागिरी दिखाया करता था। अब शक्ति का संतुलन बदल चुका है और चीन को अपनी सीमाओं में रहना सीखना चाहिए। भारत अब किसी भी तरह से अपनी सुरक्षा पर किसी किस्म का खतरा उठाने को तैयार नही है। भले ही चीन भारत की सीमा पर तिब्बत में वास्तविक युद्धाभ्यास करे अथवा यह अफवाह उड़ाए कि उसकी सेनाओं ने 158 भारतीय सैनिकों को मार गिराया है।

 

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