भारतीय मूल्यों की रक्षार्थ…

यह कितना दुःखद है कि घृणित साम्प्रदायिक उन्माद की मानसिकता से ग्रस्त मुसलमान निरंतर देश में कहीं न कहीं मासूम हिन्दू बच्चियों की दुष्कर्म करके दर्दनाक हत्या करते हैं , क्यों ? अगर इस घिनौने अपराध की जड़ में जिहादी जनून है तो उसका समाधान कैसे होगा..?
प्रायः मुस्लिम आरोपियों,अपराधियों व आतंकवादियों को बचाने के लिए अल्पसंख्यकवाद व मानवाधिकारवाद को ढाल बनाया जाता है। धर्मनिरपेक्षता का निर्थक वास्ता दिया जाता है। बुद्धिजीवियों, सेक्युलरों व मानवाधिकारियों के गिरोह सक्रिय हो जाते हैं। लोकतंत्र में वोट बैंक का दबाव बनाने की प्रक्रिया में बड़े बड़े नेता आरोपियों व आतंकवादियों के कवच का काम करते हुए चिल्लाने लगते हैं।
परंतु आज इन सबसे ऊपर उठ कर सोशल मीडिया के सक्रिय होने से पुलिस प्रशासन व शासन पर जो दबाव बनता है उससे उन्हें अपने उत्तरदायित्व का बोध हो रहा है। परिणाम स्वरूप बसई दारापुर (दिल्ली) व टप्पल (अलीगढ़) कांड जैसे कांडों के अपराधियों को पकड़ना शासन की विवशता बन जाती है। यह भी भुलाया नहीं जा सकता कि 14 फरवरी को पुलवामा में हुआ आतंकियों के आक्रमणके विरोध में जागरूक नागरिकों के राष्ट्रव्यापी आक्रोश के सकारात्मक प्रभाव के कारण ही मोदी सरकार सक्रिय हुई और 26 फरवरी को बालाकोट में आतंकियों के अड्डों को ध्वंस किया जा सका था।
अतः राष्ट्रवादी समाज को प्रत्येक उस आपराधिक व आतंकी घटना का जो भारतीय मूल्यों को आहत करती हो वैधानिक आधार पर प्रबल विरोध करना ही होगा। क्योंकि देश में कुछ तत्व राष्ट्रीयता व राष्ट्रवाद के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनाने का दुःसाहस करने में सक्रिय है। अनेक भारतविरोधी व देशविरोधी शक्तियों के गठजोड़ वर्तमान राष्ट्रवादी सत्ताधारियों के विरुद्ध व सत्ताहीनता की पीड़ा में भारतीय समाज व भारत के विरुद्ध अनेक षडयन्त्रों में निरंतर सक्रिय है।
अब सत्ताधारियों को यह भी विचार करना चाहिये कि “जब तक अपराधियों व आतंकवादियों को अल्पसंख्यक होने के कारण मुख्य धारा में लाने की अशुद्ध मानसिकता के कारण अनुचित लाभ देना बंद नहीं होगा तब तक ऐसे घिनौने अपराध व इस्लामिक आतंकवाद पर अंकुश लगाना कठिन होगा”। ऐसे में इनके समर्थकों को चाहे वह कितने ही सशक्त व प्रभावशाली हो, को भी कटघरे में लाना होगा।

~विनोद कुमार सर्वोदय

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