भाषा की लक्ष्मण रेखा

अभी दो सप्ताह पूर्व पांच सितम्बर को शिक्षक दिवस और 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया गया जिसका मकसद था हिंदी भाषा और अन्य भाषाओं का प्रचार प्रसार किया जाए जिससे हमारी प्राचीन सभ्यता व संस्कृति बनी रहे और भारत विभिन्न भाषा भाषी होते हुए भी विश्व में एक सबल,सभ्य, स्वस्थ सुसंस्कृत व सनमानिय राष्ट बने सके और हमारी हिंदी भाषा को अंतरराष्ट्रीय दर्जा प्राप्त हो पर दूसरी ओर इस भाषा की आड़ में अभद्र भाषा का हम प्रयोग करने लगे हैं और भाषा की लक्ष्मण रेखा को लांघने लगने लगे हैं । इस अभद्र भाषा का प्रयोग और उसकी सीमा को लांघने पर भाषा का प्रचार, प्रसार तो रुक ही जाएगा ,अपितु हमारी भाषाओं का विशेषकर हिंदी भाषा को विश्व में हीन दृष्टि से देखा जाने लगेगा है और हमारा हिंदी भाषा को अंतरराष्टीय भाषा का सपना साकार नहीं होगा । मेरा सभी से नम्र निवेदन है कि भाषा की लक्ष्मण रेखा को कदापि ना लांघे।           जब कभी कोई व्यक्ति अभद्र भाषा का प्रयोग करता है तो वह अपनी भाषा को बदनाम तो करता ही है साथ में अपनी मानसिकता ,संस्कार ,संस्कृति का भी परिचय  देता है और यह इंगित करता है कि वह किस परिवार व समाज से आ रहा है । भाषा का अभद्र प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है चाहे वह राजनीतिक क्षेत्रों हो या शिक्षा का क्षेत्र हो या सामाजिक क्षेत्र हो या आर्थिक क्षेत्र हो। विशेषकर शिक्षा का क्षेत्र जो कि भाषा का प्रथम क्षेत्र माना जाता है,जहा हम अपनी भाषा सीखते हैं। यहां पर मै जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी का जिक्र अवश्य करना चाहूंगा ।जहां विचारों की आजादी के नाम पर देश विरोधी नारे लगाए जाते हैं और हमारी मातृभाषा का दुरुपयोग किया जाता है ,अगर जल्द इनको नहीं रोका गया तो हिंदी भाषा का दुरूपयोग बढ़ता जाएगा और हमेशा के लिए हमारी आजादी भी खतरे में पड़ सकती है और शायद हमे इस प्रकार की संस्थाओं को जबरदस्ती बंद करना पड़े ।              अभी हाल में संसद में मानसून सत्र में यह सब कुछ देखने को मिला। विशेषकर जयबच्चन जी के बयान को । उन्होंने अपने बयान में कहा कि जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं इसके बाद तो अभद्र भाषा बोलने की बरसात व बोछार होने लगी । आजम खान ने कहा जयप्रदा तो एक नाचने वाली अभिनेत्री है । कंगना ने कहा महाराष्ट्र किसी के बाप का नहीं है । संजय राउत ने कहा कंगना  हरामखोर है। एक तरह हम नारी के सम्मान की बात करते हैं तो दूसरी तरफ नारी पर अपनी अभद्र भाषा का प्रयोग कर उनका अपमान करते हैं । भाषा की चरम सीमा उस समय और भी अधिक लाघने को मिलती है जब एक नारी दूसरी नारी के लिए अभद्र भाषा का उपयोग करती है जो उनकी मानसिकता संस्कृति का परिचायक है भाषा का दुरूप्रयोग अभी यहीं बात खत्म नहीं होता है परंतु पीछे भी भाषा का दुरूप्रयोग होता रहा है । मैं किसी व्यक्ति का नाम नहीं लेना चाहता हूं। क्योंकि यह सर्व विदित है कि राजनीतिक क्षेत्र में तो इस भाषा की सीमा अत्यधिक लांघी जा रही है जैसे चौकीदार चोर है मोदी चोर है आदि-आदि जब हम अपने देश में ही अपने प्रधानमंत्री को चोर बताते हैं तो हमारे देश के प्रधानमंत्री का विदेशों में कैसे सम्मान हो सकता है । फिल्म उद्योग में भी अभद्र भाषा का प्रयोग ज्वलंत उदाहरण है जिससे अपनी मर्यादा संस्कृति अपने देवी-देवताओं के प्रति गलत शब्दों का प्रयोग हो रहा है पिछले दिनों  शाहिद कपूर ने एक फिल्म बनाई ,”कबीर सिंह” जिसमें संत कबीर की आड़ में शराब सिगरेट का तांडव नृत्य दिखाया गया है। मेरी समझ में यह नहीं आता  कि फिल्म सेंसर बोर्ड इस प्रकार की फिल्में कैसे पास कर देते हैं जबकि फिल्म सेंसर बोर्ड में सबसे उच्च अधिकारी एक कवि लेखक व बुद्धिजीवी है जो समाज सुधारक भी माने जाते हैं।फिल्म उद्योग में अभद्र भाषा के अलावा चरस,गांजा,अफीम,व अन्य ड्रग का इस्तेमाल हो रहा है। जिसकी एन सी बी द्वारा जांच पड़ताल की जा रही है।जिसमे सुशांत,रिया,श्रद्धा कपूर,रकुल प्रीत व अन्य अभिनेताओं व अभिनेत्रियों का नाम लिया जा रहा हैं।             तीसरी तरफ हमारा भारत देश सारे विश्व के साथ कोविड की महामारी से झूज रहा है। हर नागरिक परेशान है और काफी डर रहा है। काम धंधे बंद हो चुके हैं ।आय के साधन सीमित होते जा रहे हैं । निकट भविष्य में कोई आशा व प्रकाश की किरण नहीं दिखाई दे रही है। क्योंकि अभी कोई कोविड़ महामारी की वैक्सीन नहीं बनी है । दूसरी तरफ भाषा का दुरूप्रयोग बढ़ता जा रहा है। मेरा नम्र निवेदन  है कि कम से कम भाषा का अभद्र प्रयोग न करें और ड्रग व नशे पर नियंत्रण रखें जो कि हमारे ही हाथों में है । जिससे हम हर भारतवासी का भविष्य उज्जवल बना सकें ।हम सब मिलकर बुरी बातो को रोके। शरुआत अपने से ही करे। तभी भारत को आत्मनिर्भर व संकट व बुरी बातो से बचाया जा सकता है।जय हिंद जय भारत
आर के रस्तोगी

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