भव भय से मुक्त अनासक्त !

(मधुगीति २००१२२ अग्रसा) ब्रज

भव भय से मुक्त अनासक्त, विचरि जो पाबत;

बाधा औ व्याधि पार करत, स्मित रहबत !

वह झँझावात झेल जात, झँकृत कर उर;

वो सोंपि देत जो है आत, उनके बृहत सुर !

जग उनकौ लहर उनकी हरेक, प्राणी थिरकत;

पल बदलि ज्वार-भाटा देत, चितवन चाहत !

चहुँ ओर प्रलय कबहु लखे, लय कभू लगे;

विलयन की व्यथा मीठी लगे, साधना मखे !

आधार धार कबहु बहत, ऊर्द्ध्व भाव बह;

‘मधु’ त्रिलोकी की तर्ज़ सुनत, जगत में रमत !

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