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    भावनाओं का स्वरूप

    शिवदेव आर्य

    भावनाएं बड़ी विशाल होती हैं। भावनाओं के आधार पर ही हम प्राणी परस्पर व्यवहार करते हैं। जो भावनाओं के महत्त्व को समझ गया वह समझो इस बन्धरूपी संसार से मुक्त हो गया। इसलिए हम समझने का प्रयास करेंगे कि भावनाओं में आखिर क्या शक्ति है, जो इस संसार में हमें किसी का प्रिय बना देती हैं, किसी का अप्रिय, किसी का मित्र, किसी का दुश्मन आदि-आदि। संसार में ऐसा भी देखा गया है कि कोई किसी की भावनाओं में इतना ज्यादा आकृष्ट हो जाता है कि वह अपने बारे में सोचता तक नहीं।

    यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि जैसा भाव हमारे मन में सामने वाले के प्रति होता है वैसा ही सामने वाले के मन में भी होता है। यदि हम किसी के प्रति दुष्टता का विचार अपने मन में लायेंगे तो वैसा ही विचार वह भी हमारे लिए अपने मन मे लायेगा। इसलिए दुसरों के प्रति हितकर भावों को जागृत करें। इस प्रसंग में एक आख्यान स्मरण हो उठता है-कहते है कि एकबार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा ने उसे देखते ही उनके मन में आया कि इसका सब कुछ छीन लिया जाना चाहिये।

    व्यापारी के जाने के बाद राजा ने सोचा-मैं प्रजा को हमेशा न्याय देता हूं । आज मेरे मन में यह कालुष्य क्यों आ गया कि व्यापारी की सम्पत्ति छीन ली जाय? उसने अपने मन्त्री को पास आहुत कर पूछा कि ये विचार मेरे मन में कैसे आ गये? मन्त्री ने कहा कि- इसका सही उत्तर मैं कुछ समय के पश्चात् दूंगा।

    मन्त्री विलक्षण बुद्धि का था। वह इधर-उधर के सोच-विचार में समय न खोकर सीधा व्यापारी से मैत्री गांठने के लिए पहुंच गया । व्यापारी से मित्रता करके पूछा कि तुम इतने चिन्तित क्यों हो? तुम तो भारी मुनाफे वाले चन्दन के व्यापारी हो।

    व्यापारी बोला-धारा नगरी सहित अनेक नगरों में चन्दन की गाडि़यां भरे फिर रहा हॅूं, पर चन्दन नहीं बिक रहा। बहुत सारा धन इसमें फॅंसा पड़ा है। अब नुकसान से बच पाने का कोई उपाय नहीं है। व्यापारी की बातें सुनकर मन्त्री ने पूछा-क्या कोई रास्ता नहीं बचा? व्यापारी हॅंसकर बोला-अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाये तो उनके दाह-संस्कार के लिये सारा चन्दन बिक सकता है।

    मन्त्री को राजा का उत्तर देने की सामग्री मिल चुकी थी। अगले ही दिन मन्त्री ने व्यापारी से कहा-तुम प्रतिदिन राजा का भोजन पकाने के लिए एक मन चन्दन दे दिया करो और नगद पैसे भी उसी समय ले लिया करो। व्यापारी मन्त्री के आदेश को सुन कर बड़ा प्रसन्न हुआ। वह मन-ही-मन राजा को शतायु (लम्बी आयु) होने की कामना करने लगा।

    एक दिन राजा की सभा चल रही थी। व्यापारी दोबारा राजा को वहां दिखायी दे गया तो राजा सोचने लगा कि कितना आकर्षक व्यक्ति है, बहुत परिश्रमी है। इसे कुछ उपहार देना चाहिए।

    राजा ने पुनः मन्त्री को बुलाकर कहा कि हे मन्त्रीवर! यह व्यापारी प्रथम बार आया था, उस दिन मैंने   सवाल किया था, उसका उत्तर तुमने अभी तक नहीं दिया। आज इसे देखकर मेरे मन की भावनाएं परिवर्तित हो गई हैं, जिससे मेरे मन में अनेको प्रश्न उत्पन्न हो रहे हैं। इसे दूसरी बार देखा तो मेरे मन में इतना परिवर्तन कैसे हो गया?

    मन्त्री ने उत्तर देते हुए कहा – महाराज! दोनो ही प्रश्नों के उत्तर आज ही दे रहा हूं। यह पहले आया था तब आपकी मृत्यु के विषय में सोच रहा था। अब यह आपके जीवन की कामना करता है, इसीलिए आपके मनमें इसके प्रति दो प्रकार की भावनाओं को उदय हुआ है। इससे सि द्ध होता है कि हम जैसी भावना किसी के प्रति रखेंगे वैसी ही भावना वह व्यक्ति हमारे प्रति रखेगा।

     

    शिवदेव आर्य
    शिवदेव आर्य
    आर्ष-ज्योतिः मासिक द्विभाषीय शोधपत्रिका के सम्पादक
    1. ध्यान करनेपर मनुष्य, अपने मन की चित्तवृत्तियों के पार चला जाता है।
      ऐसा पतंजलि का योगशास्त्र कहता है; कुछ सीमित, मेरा अनुभव भी है।

      व्यक्ति अपने वैयक्तिक विचार मण्डल को पार कर, अपनी मानसिकता से उपर ( बाहर) उठ जाता है।

      इस प्रकार, जब वह अपनी वैयक्तिकता और स्वयं की पहचान से परे चला जाता है; तो उसे सारा संसार तटस्थ और निष्पक्ष होकर देखने की क्षमता प्राप्त हो जाती है।
      उस समय, उसका, अपना-पराया भेद मिट जाता है।
      मिटते ही सत्य सामने आ जाता है।
      –जैसे सपने से जागनेपर आप अनुभव करते हैं।

      ==>सामान्य जन, अपनी ही चित्तवृत्तियों को दूसरोंपर आरोपित करते हैं। उसी में सारा जीवन ही बिता देते हैं। इसी मर्यादित अंग के विस्तार पर यह कहानी है।

      इतनी बात समझमें आती है।
      इससे अधिक मुझे सच नहीं लगती।
      कहानी की यही मर्यादा भी प्रतीत होती है।
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      हमारे पुरखों ने जो सनातन सत्य खोजे थे, वे ध्यान द्वारा निःसृत हुए थे; इसलिए वे सत्य सार्वलौकिक, सार्वदेशिक, सारे मतमतांतरों को आवरित करनेवाले, त्रिकालाबाधित और इसी लिए, वास्तव में आध्यात्मिक सिद्धान्त थे।
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      उदा: सर्वं खल्विदं ब्रह्मं, तत्त्वमसि, अहंब्रह्मास्मि, एकं सत्‌ विप्राः बहुधा वदन्ति, …….असतो मा सत गमय…. इत्यादि झडी लगा दी थी उन्होंने।
      सारे वेदोपनिषद ऐसे सत्यों से भरे पडे है।
      कुछ ज्यादा ही कह गया।….कहानी के बहाने…. अब काटता नहीं।

      डॉ. मधुसूदन

    2. आदरणीय,दिक्कत यह है की हम द्वन्द मैं फंसे हैं. जब हमारे पास कोई वास्तु,व्यक्ति ,वस्तु सजह रूप से उपलब्ध होती है तो हम उसकी चिंता नहीं करते मगर यदि वही पदार्थ हम से दूर हो जाय या अप्राप्त हो जाए तो हम दुखी हो जाते हैं या हमारी भावना बदल जाती है. भावना के खेल इतने विचित्र हैं की यदि विवेक पर भावना हावी हो जाय तो मित्र शत्रु बन जाते हैं.

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